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स्थापना दिवस पर विशेष: इप्टा का इंकलाबी इतिहास और भविष्य

‘‘लेखक और कलाकार आओ, अभिनेता और नाटककार आओ, हाथ से और दिमाग़ से काम करने वाले आओ और स्वंय को आज़ादी और सामाजिक न्याय की नयी दुनिया के निर्माण के लिये समर्पित कर दो।’’ आज से 77 साल पहले 25 मई, 1943 को मुंबई के मारवाड़ी हाल में प्रो. हीरेन मुखर्जी ने इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोशिएसन यानी इप्टा की स्थापना के अवसर पर, इस आयोजन की अध्यक्षता करते हुए, जब संस्कृतिकर्मियों और कलाकारों से ये क्रांतिकारी आह्वान किया था, तब उन्होंने भी यह नहीं सोचा होगा कि इप्टा आगे चलकर देश में एक ऐसा सांस्कृतिक पुनर्जागरण करेगा, जिससे ना सिर्फ़ कला और संस्कृति में नए आयाम जुड़ेंगे, बल्कि ये सांस्कृतिक आंदोलन बड़े पैमाने पर अवाम को आजादी के लिए जागृत करेगा। ये वक्त का तकाजा था या फिर इप्टा का करिश्मा, देश की सभी ललित कलाओं, काव्य, नाटक, गीत, पारंपरिक नाट्यरूप आदि से जुड़े हुए हजारों लेखक, कलाकार, संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी इसकी ओर खिंचे चले आए और कारवां बनता चला गया। यह वह दौर था जब नाटक, गीत-संगीत, नृत्य, चित्रकला, लेखन, फिल्म से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा, जो इप्टा से न जुड़ा हुआ हो और जिसे इस संगठन ने अपनी ओर आकर्षित न किया हो।

पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, दमयंती साहनी, चेतन आनंद, हबीब तनवीर, शंभु मित्रा, तृप्ति मित्रा, जोहरा सहगल, दीना पाठक जैसे आला दर्जे के कलाकार, कृश्न चंदर, सज्जाद ज़हीर, अली सरदार ज़ाफ़री, डॉ. रशीद जहां, इस्मत चुगताई, ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे उर्दू के नामचीन लेखक, शांति बर्धन, गुल बर्धन, रेखा जैन, सचिन शंकर, नागेश जैसे मुल्क के उम्दा नर्तक, पं. रविशंकर, सलिल चौधरी, हेमांग विश्वास, अबनी दासगुप्ता जैसे शानदार संगीतकार, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, मखदूम मोहिउद्दीन, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, प्रेम धवन जैसे इंकलाबी गीतकार, विनय राय, अण्णा भाऊ साठे, अमर शेख, दशरथ लाल जैसे होनहार लोक गायक, फोटोग्राफर-सुनील जाना, निर्देशक-अनिल डि सिल्वा, भीष्म साहनी, ए.के. हंगल, एम एस सथ्यू, ऋत्विक घटक और चित्तो प्रसाद, रामकिंकर बैज, जैनुल आबदीन, सोमनाथ होर जैसे बेमिसाल चित्रकार इप्टा की शान बढ़ाते थे। उसमें चार चांद लगाते थे।

इन लेखक, कलाकार, गीतकार, नर्तक, संगीतकार और नाटककारों ने इप्टा के मार्फत हिन्दोस्तानी तहजीब में नए रंग भरे। उसका आकाश सतरंगी किया। मुल्क की आजादी के लिए अनथक कोशिशें कीं। अपनी दीगर मशरुफियतों के बावजूद ये संस्कृतिकर्मी इप्टा के लिए जरूर समय निकालते थे। संगठन की मकबूलियत कुछ इस कदर बढ़ी कि मुल्क के कोने-कोने में इसके हमसफर और हिमायती हो गए। एक वक्त ऐसा भी आया, जब मुल्क के 22 राज्यों में तक़रीबन 12 हज़ार से ज्यादा कलाकार इप्टा से सक्रिय तौर पर जुड़े हुए थे और अपने कामों से अवाम में जनचेतना फैला रहे थे। सचमुच इप्टा का ये सुनहरा दौर था।

उस दौर में इप्टा एक ऐसी संस्था बनी, जो सीधे तौर पर अवाम से जुड़ी और अवाम को भी अपने साथ जोड़ा। बंगाल का भीषण अकाल हो, या जापान का साम्राज्यवादी हमला या फिर आज़ादी की जद्दोजहद, इप्टा ने अपने जन गीतों और नाटकों को देशवासियों की आवाज़ बनाया। जन गीतों और नाटकों के जरिए समाज को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आलम यह था कि अपने शुरूआती दौर में इप्टा ने सिर्फ परफॅार्मिंग आर्ट का एक प्लेटफार्म न होकर, एक तहरीक की शक्ल अख्तियार कर ली थी। जिसमें वतन के लोग खुशी-खुशी शामिल हो रहे थे। इप्टा के गठन की पृष्ठभूमि में यदि जाएं, तो इसके पीछे देश में घटा एक बड़ा वाकया है। साल 1943 में बंगाल में भीषण अकाल पड़ा।

इस अकाल में तकरीबन तीस लाख लोग भूख से मारे गए। वह तब, जब देश में अनाज की कोई कमी नहीं थी। गोदाम भरे पड़े हुए थे, लेकिन लोगों को अनाज नहीं मिल रहा था। एक तरफ लोग भूख से तड़प-तड़पकर मर रहे थे, दूसरी ओर अंग्रेज़ सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही थी। ऐसे अमानवीय और संवेदनहीन हालात में बंगाल अकाल पीड़ितों के लिए राहत जुटाने के वास्ते खुद देशवासी आगे आए और उन्होंने ‘बंगाल कल्चरल स्कवॉड’ स्थापित किया। इस सांस्कृतिक दल ने बंगाल में घूम-घूमकर अपने नाटक ‘जबानबंदी’ और ‘नबान्न’ के जरिए अकाल पीड़ितों के लिए चंदा इकट्ठा किया।

‘बंगाल कल्चरल स्कवॉड’ के इन नाटकों की लोकप्रियता ने ही इप्टा के स्थापना की प्रेरणा दी। कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े बुद्धिजीवियों और तरक्कीपसंद तहरीक से जुड़े लेखक-कलाकारों ने सोचा कि यूरोप के ‘यूनिटी थियेटर’, अमेरिका के ‘रिवोल्यूशनरी थियेटर’ और चीन के ‘पीपुल्स थियेटर’ की तर्ज पर हिन्दुस्तान में भी एक पीपुल्स थियेटर यानी अवामी थियेटर का गठन किया जाए। ये थियेटर देश भर में ना सिर्फ़ आज़ादी की अलख जगाए, बल्कि सामाजिक बुराइयों अशिक्षा और अंधविश्वास आदि से भी लोहा ले। देशवासियों में एकता का पैगाम पहुंचाए। बहरहाल इस थियेटर को आकार देने में शुरुआती काम किया श्रीलंकाई मूल की महिला अनिल डि सिल्वा ने। उन्हीं की कोशिशों का ही नतीजा था कि बहुत से हम-ख्याल लोग एक साथ आते चले गए और मुंबई में बाकायदा ‘इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन’ का गठन हुआ।

इस बात का बहुत कम लोगों को इल्म होगा कि इप्टा का नामकरण मशहूर वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने किया था, तो वहीं इप्टा का प्रतीक चिन्ह ‘कॉल आफ द ड्रम्स’ प्रसिद्ध चित्रकार चित्तप्रसाद ने बनाया था। संगठन का नारा बना, ‘इप्टा की नायक जनता है।’ मुंबई में इप्टा का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ, जिसके अध्यक्ष ट्रेड यूनियन लीडर एनएम जोशी और महासचिव अनिल डि सिल्वा चुनी गईं। इस मौक़े पर एक प्रस्ताव पारित किया गया। जो इप्टा का घोषणा-पत्र है। इसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया कि ‘‘इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन के तत्वावधान में आयोजित यह सम्मेलन रंगमंच और परंपरागत कलाओं को पुनर्जीवित करने और साथ ही उन्हें स्वतंत्रता, सांस्कृतिक प्रगति और आर्थिक न्याय के लिए लोगों के संघर्ष को अभिव्यक्ति और संगठन का माध्यम बनाने और पूरे भारत में जन थियेटर आंदोलन शुरू करने की तत्काल आवश्यकता को स्वीकार करता है।’’ इतिहास गवाह है, आगे चलकर इप्टा अपने इस एलान पर पूरी तरह से खरा उतरा।

इप्टा का जन्म वैसे तो अंग्रेजी हुकूमत और फासिस्ट ताकतों के विरोध में हुआ था, लेकिन देखते-देखते उसने एक जन आंदोलन का रूप ले लिया। इप्टा एक ऐसा अजीम आंदोलन बना जिसने पूरे मुल्क में न सिर्फ लोक कलाओं की परिवर्तनकारी ताकत को पहचाना बल्कि मेहनतकश अवाम को भी इससे जोड़ा। किसान आंदोलन के लिए किसानों को जागृत और संगठित किया। किसानों के बीच जब नाटक, छोटे-छोटे रूपक खेले जाते या जनगीत, नज्में पढ़ी जातीं, तो उनमें एकता, संगठन और जुल्म के खिलाफ जद्दोजहद का जबर्दस्त जज्बा पैदा होता। जाहिर है कि आज़ादी के आंदोलन के दौरान यह एक बड़ा कारनामा था।

इप्टा के साथी अवाम को जागरूक करने के लिए लोक कलाओं का किस तरह से इस्तेमाल कर रहे थे, यदि इसे जानना है तो ‘पीपुल्स वार’ में 21 जनवरी 1945 को छपे लेख का यह अंश देखना लाजमी होगा,‘‘केरल के कय्यूर शहीदों की कथा को लोकप्रिय बनाने के लिए इप्टा के कलाकार दयाल कुमार ने ‘पांचाली’ रूप का प्रयोग और दुलाल रॉय ने लेनिन ग्राद की रक्षा का जोशीला विवरण देने के लिए ‘कीर्तन’ को अंगीकार किया। एक मौखिक साक्षात्कार में दुलाल रॉय ने जोर देकर कहा कि उन्होंने ‘तर्जा’ रूप के साथ प्रयोग किया और अपने नए संदेश के अनुकूल मुकंददास के ‘स्वदेशी जात्रा’ और नजरुल के गीतों से धुनों का समावेश किया।

आंध्र में ‘बुर्रकथा का नए ढंग से प्रयोग हुआ। अन्ना भाऊ साठे और गावंकर जैसे प्रतिभावान कलाकारों सहित बंबई दल ने ‘तमाशा’ और ‘पवाडा’ रूपों को नया जीवन दिया और बंबई मजदूरों तथा ग्रामीण इलाकों में ये प्रयोग किए। उन्होंने भारी संख्या में दर्शकों को आकर्षित किया।’’ आगे चलकर इन नाटकों में ‘कोलट्टम’ (छड़ी नृत्य), ‘जरी नृत्य’, ‘बाउल’, ‘लंबाड़ी नृत्य’, ‘गजन’, ‘रामलीला’ जैसी लोक कलाओं का भी सफलतापूर्वक इस्तेमाल हुआ।

इप्टा की तत्कालीन गतिविधियों का केंद्र मुंबई था, लेकिन बंगाल, आसाम, पंजाब, दिल्ली, संयुक्त प्रांत, मालाबार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु में भी प्रांतीय समितियां बनीं। इप्टा की अहमियत को बयां करते हुए सज्जाद जहीर अपनी किताब ‘रौशनाई’ में लिखते हैं,‘‘देश के विभिन्न हिस्सों में पीपुल्स थियेटर की सफल स्थापना हमारे सांस्कृतिक विकास के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसके कार्यकर्ता अक्सर वे नौजवान लड़के और लड़कियां थीं, जो राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे और जिनमें से अधिकांश देश के जनतांत्रिक आंदोलनों से जुड़े हुए थे। इनके व्यक्तित्व और अवामी थियेटर में कला, राजनीति और संस्कृति का भेदभाव नहीं होता था। इनका सारा जीवन वतनी आजादी और जनवाद की जीत के प्रयासों के लिए समर्पित था। इसलिए इनकी कला जाने-अनजाने उसी महान राष्ट्रीय अभियान और संघर्ष का एक हिस्सा और पहलू थी।’’

बहरहाल ‘बंगाल कल्चरल स्कवॉड’  की प्रस्तुतियों और कार्यशैली से प्रभावित होकर बिनय राय के नेतृत्व में इप्टा के सबसे सक्रिय समूह ‘सेंट्रल ट्रूप’ का जुलाई, 1944 में गठन हुआ। जिसमें पूर्णकालिक कार्यकर्ता शामिल थे। इप्टा के इस सेंट्रल स्क्वॉड यानी केन्द्रीय दल में अबनी दासगुप्ता, शांति बर्धन, प्रेम धवन, पंडित रविशंकर, मराठी के मशहूर गायक अमर शेख़, ख्वाजा अहमद अब्बास के अलावा देश के विविध क्षेत्रों की विविध शैलियों से संबंधित सदस्य एक साथ रहते। इनके साहचर्य ने ‘स्प्रिट ऑफ इंडिया’, ‘इंडिया इमोर्टल’, ‘कश्मीर’ जैसी लाजवाब पेशकशों को जन्म दिया। ‘स्प्रिट ऑफ इंडिया’ के बारे में केन्द्रीय दल की पहली स्मारिका में जिक्र मिलता है कि ‘‘वह सिर्फ नृत्य नाटक नहीं बल्कि देशभक्ति पूर्ण शानदार प्रदर्शन था। इसमें साम्राज्यवाद, सामंतवाद और नवसाम्राज्यवादी पूंजीवाद के तिहरे अभिशाप के अधीन लोगों की दुर्दशा को दर्शाया गया था और उसका समापन लोगों की एकता से उत्पन्न आशा की भावना के साथ होता था।’’

साल 1943-44 के दरमियान ही इप्टा की बंगाल शाखा ने ‘बंगाल स्कवॉड’ तैयार किया। इस दल ने पंजाब, मुंबई, महाराष्ट्र और गुजरात में घूम-घूम कर अपने कार्यक्रमों के ज़रिए बंगाल के अकाल पीड़ितों के लिए लाखों रुपये का चंदा इकट्ठा किया। इस दल की सर्वाधिक लोकप्रिय प्रस्तुति विनय रॉय की संक्षिप्त नाटिका ‘मैं भूखा हूं’ और उषा दत्त का ‘हंगर डांस’ था। इसके अलावा ‘भूखा है बंगाल रे साथी, भूखा है बंगाल’, वामिक़ जौनपुरी का ये गीत लोगों के दिलों पर गहरा असर छोड़ता था। यह गीत जैसे बंगाल के अकाल पीड़ितों की आवाज़ बन गया। वामिक जौनपुरी के इस गीत की तारीफ करते हुए अपनी किताब ‘रौशनाई’ में सज्जाद जहीर ने लिखा है, ‘‘तरक्कीपसंद अदब की तारीख में वामिक का यह तराना सही मायने में साने के हरूफ से लिखे जाने लायक है। वह वक्त की आवाज थी।

वह हमारी इंसान दोस्ती की भावना को सीधे-सीधे उभारता था।’’ इप्टा के ‘बंगाल स्कवॉड’ और ‘सेंट्रल स्क्वॉड’ दल के कार्यक्रमों ने बंगाल के अकाल के प्रति देश के दूसरे हिस्सों में बंधुत्व का भाव पैदा किया। किसानों, मजदूरों और मध्यम वर्ग को तकलीफ़ झेल रही बंगाल की जनता से जोड़ा। इप्टा के इस योगदान की जितनी भी चर्चा की जाए, वह कम है। इप्टा ने अपने आप को यहीं तक सीमित नहीं कर लिया। मेहनतकशों, कामगारों पर जब भी कोई मुसीबत आती, वह उनकी आवाज बनता। जन गीतों एवं नाटकों के जरिए एकता का पैगाम देकर, उन्हें संघर्ष के लिए खड़ा करता। इस सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना का ही नतीजा था कि देश में आजादी के हक में माहौल बनता चला गया। लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गए। और वह दिन भी आया, जब अंग्रेजों की गुलामी से मुल्क आजाद हो गया।

इप्टा के इंकलाबी आंदोलन ने रंगमंच के क्षेत्र में भी युगांतकारी परिवर्तन किए। जो नाटक, गीत, संगीत थिएटर हॉल की बंद दीवारों के भीतर सीमित था, उसे वह लोगों के बीच बाहर लेकर आया। कला, अब कला के लिए नहीं, जिंदगी के लिए थी। इंसानियत को बचाने के लिए थी। अवाम में सामाजिक जागरुकता की अलख जगाना ही जैसे इप्टा के मेंबरों का काम था। गलियों में, सड़कों पर, खेतों में, कारखानों पर हर जगह नाटक खेले जाने लगे। एक अहम बात और, इस सांस्कृतिक आंदोलन से पहले भारतीय संगीत में कोरस यानी सामूहिक गान की अहमियत नहीं थी। अलबत्ता लोकगीतों में ये परंपरा ज़रूर थी। इप्टा ने सामूहिक गान को मुख्य धारा के संगीत का अहम हिस्सा बनाया। इप्टा के गीतों की खासियत ये थी कि वे जोशीले थे, लोगों को आंदोलित करते थे। फ़ैज अहमद फैज़, साहिर लुधियानवी, मख्दूम, शैलेंद्र, कैफी आजमी जैसे शायर, गीतकार जब कोई नज्म या गीत लिखते, तो वह नारे बन जाते।

हजारों लोगों के हुजूम में जब यह नज्म, गीत गाये जाते, तो लोग आंदोलित हो जाते। इप्टा के ऐसे कई जनगीत और नज्म हैं, जो आज भी किसान और ट्रेड यूनियनों की बैठकों व आंदोलन में जोश से गाए जाते हैं। मसलन ‘हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’, ‘तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पर यक़ीन कर, अगर कहीं भी स्वर्ग है उतार ला ज़मींन पर’ (शैलेन्द्र), ‘हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ (फैज अहमद फैज), ’जाने वाले सिपाही से पूछो, वो कहां जा रहा है’ (मख़दूम), ‘भड़का रहे हैं आग लबे नग़्मागार से हम, ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम’, ‘सरकश बने हैं गीत बगावत के गाये हैं/बरसों नए निजाम के नक्शे बनाये हैं।’ ‘‘वह सुबह कभी तो आएगी/बीतेंगे कभी तो दिन आखिर, यह भूख के और बेकारी के।’ (साहिर लुधियानवी)

कथ्य, कहानी और विचार के स्तर पर ही नहीं इप्टा के ’नबान्न’, ‘जबानबंदी’, ‘रामलीला’, ’ये किसका ख़ून है’, ‘यह है अमृता’, ‘पर्दे के पीछे’, ‘परछाइयां’, ‘हरी चूड़ियां’, ‘भूत गाड़ी’ और ’ज़ुबैदा’ जैसे नाटकों ने सैट डिज़ाइन, अभिनय, प्रस्तुति के स्तर पर भी भारतीय रंगमंच की तस्वीर को पूरी तरह से बदल दिया। इप्टा ने देश में जनवादी, यथार्थवादी नाटकों की नींव रखी। नाटक के केन्द्र में आम आदमी आया। नाटक जनता एवं उनकी समस्याओं पर लिखे जाने लगे। इप्टा द्वारा खेले जाने वाले नाटकों की एक लंबी फेहरिस्त है, जो अपने शानदार कथ्य और ट्रीटमेंट की बदौलत आज भी लोगों द्वारा खूब पसंद किए जाते हैं।

मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ पर आधारित नाटक ‘होरी’, जिसे विष्णु प्रभाकर ने लिखा, ‘ये किसका ख़ून है’ (अली सरदार जाफ़री), ‘धरती के लाल’ (ख्वाजा अहमद अब्बास), ‘जादू की कुर्सी’ (बलराज साहनी), ‘आखिरी शमां’ (कैफी आजमी), ‘ख़ालिद की ख़ाला’ (क़ुदसिया ज़ैदी), चरणदास चोर (हबीब तनवीर), ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ (भीष्म साहनी) के अलावा प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘सत्याग्रह’ पर सफ़दर हाशमी और हबीब तनवीर ने मिलकर नाटक ‘मोटेराम का सत्याग्रह’ लिखा, जिसका निर्देशन एमएस सथ्यू ने किया, तो वहीं ‘शतरंज के मोहरे’ कहानी पर न सिर्फ नाटक लिखा गया, बल्कि खेला भी गया। इन नाटकों के अलावा ‘ताजमहल का टेंडर’, ‘हम दीवाने, हम परवाने’, ‘एक बार फिर’, ‘सैंया भये कोतवाल’, ‘कशमकश’ आदि इप्टा के मशहूर नाटकों में से एक हैं।

इप्टा ने भारतीय रंगमंच के साथ-साथ भारतीय सिनेमा पर भी गहरा असर छोड़ा। इप्टा से निकले कलाकारों, गीतकारों और निर्देशकों का ही असर था कि फिल्मों में यथार्थवाद ने दस्तक दी। इप्टा ने एक फिल्म ‘धरती के लाल’ भी बनाई। जो बलराज साहनी की पहली फ़िल्म थी। यह मूल रूप से बंगाली नाटक ‘नबान्न’ और ‘जबानबंदी’ पर आधारित थी। जिसका निर्देशन ख्वाजा अहमद अब्बास ने किया था। इसके गीत अली सरदार जाफ़री और प्रेम धवन ने लिखे और पंडित रविशंकर ने इसका संगीत तैयार किया था। फ़िल्म व्यावसायिक तौर पर भले ही कामयाब नहीं हुई हो, लेकिन इसने भारतीय सिनेमा में एक नई धारा को जन्म दिया।

‘नीचा नगर’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘पाथेर पांचाली’, ‘दो आंखें, बारह हाथ’, ‘नया दौर’, ‘आवारा’ इस धारा की प्रमुख फिल्में हैं। इप्टा का एक और महत्वपूर्ण कार्य, महिलाओं को नाटकों से जोड़ना था। दीना गांधी, ज़ोहरा सहगल, तृप्ति मित्रा, गुल बर्धन. दीना पाठक, शीला भाटिया, शांता गांधी, रेखा जैन, रेवा रॉय चौधरी, रूबी दत्त, दमयंती साहनी, ऊषा दत्त, क़ुदसिया ज़ैदी, रशीद जहां, गौरी दत्त, प्रीति सरकार, नूर धवन जैसी महिलाओं ने इप्टा में मिली अलग-अलग भूमिकाओं को सफलतापूर्वक निभाया। अभिनय, गायन, नृत्य, निर्देशन से लेकर उन्होंने नाटक तक लिखे। इप्टा ने अपने नाटकों में हमारी आधी आबादी महिलाओं को हमेशा तवज्जोह दी। उनकी समस्याओं को नाटकों का मुख्य विषय बनाया। उन्हें एक आवाज दी।

ऐसा नहीं कि इप्टा को यह सब करने के लिए मुल्क में हमेशा खुशगवार माहौल मिला, आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद भी उसे सरकारी दमन, पाबंदियों का सामना करना पड़ा। कई जगहों पर उसके जनगीतों, नाटकों और कार्यक्रमों पर पाबंदी लगी। अंग्रेजी हुकूमत के साथ-साथ संकीर्णतावादियों ने भी इप्टा के नाटकों का विरोध किया। नाटक खेलने में कई तरह की अड़चनें पैदा कीं। नाटक करने की वजह से कुछ साथियों को जेल हुई, तो कुछ मारे भी गए। बावजूद इसके इप्टा नाट्यकर्म करती रही। अपने उद्देश्यों से जरा सा भी नहीं भटकी। देश की आजादी को एक लंबा अरसा गुजर गया, लेकिन इप्टा आज भी अपने महान उद्देश्यों पर कायम है। सामाजिक, सांस्कृतिक जागरण के कामों में उसकी कोई कमी नहीं आई है। मनुष्य की वास्तविक आजादी, वर्गविहीन समाज और सामाजिक न्याय उसके प्रमुख लक्ष्यों में शामिल है। देश में समाजवाद आए, आज भी उसका एक सपना है। आजादी के पहले इप्टा के सामने जो चुनौतियां थीं, आज उस तरह की कोई चुनौती नहीं, लेकिन जो भी चुनौतियां हैं, वह कम नहीं।

इप्टा के सामने सबसे बड़ी चुनौती, सांगठनिक तौर पर मजबूत होना है। संगठन के स्तर पर इसमें बहुत बड़ा बिखराव आया है। नये कलाकार, लेखक, निर्देशक इससे जुड़ नहीं रहे और जो जुड़ते हैं, उनमें वह वैचारिकता नहीं। नई इकाइयां बन नहीं रही और जो हैं, वे काम नहीं कर रहीं। कभी अच्छी स्क्रिप्ट, कलाकार, तो कभी फंड के अभाव में नाटक नहीं हो पाते। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जिस तरह देश के अंदर आए दिन हमले होते रहते हैं, उसने नाट्यकर्म को और भी ज्यादा मुश्किल बना दिया है। कोई भी हुकूमत हो, वह नहीं चाहती कि उसके खिलाफ कोई काम करे। अवाम को हक, हुकूक और इंसाफ के लिए बेदार करे। यही वजह है कि इप्टा को सत्ता की भी सरपरस्ती हासिल नहीं होती। आगे इस माहौल में कोई तब्दीली आएगी, इस बात का इंतजार किए बिना, इप्टा और इप्टा से जुड़े सभी लेखक, कलाकारों, निर्देशकों का दायित्व है कि वे अपने इंकलाबी इतिहास से प्रेरणा लेकर भविष्य का निर्माण करें।

(मध्यप्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

This post was last modified on May 25, 2020 1:14 pm

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