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आधुनिक भारत के प्रस्तोता ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन

(स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित आधुनिक भारत का सपना देखने वाले तीन महापुरुषों के जन्मदिन का समय है। 9 अप्रैल 1893 राहुल सांकृत्यायन, 11 अप्रैल 1827 जोतिबा फुले और 14 अप्रैल 1891 बाबा साहब भीमराव आंबेडकर। इन तीनों महापुरुषों के सपनों, दर्शन, विचारों, इतिहास दृष्टि, व्यक्तित्व और कृतित्व में बहुत कुछ साझा है। आइए आज के दौर में इन तीनों व्यक्तित्वों का साझा विचारों एवं सपनों पर एक दृष्टि डालते हैं- लेखक)

‘मैं हिंदुओं और हिंदू धर्म से इसलिए घृणा करता हूं, उसे तिरस्कृत करता हूं क्योंकि मैं आश्वस्त हूं कि वह गलत आदर्शों को पोषित करता है, और गलत सामाजिक जीवन जीता है। मेरा हिंदुओं और हिंदू धर्म से मतभेद उनके सामाजिक आचार में केवल कमियों को लेकर नहीं हैं। झगड़ा ज्यादातर  सिद्धांतों को लेकर, आदर्शों को लेकर है।

                (स्रोत- भीमराव आंबेडकर, जातिभेद का उच्छेद पृ. 112)

                  ‘डॉ. आंबेडकर हिंदुत्व के लिए चुनौती हैं।

                                  (मोहनदास करमचंद गांधी)                 

‘विद्या बिना मति गई

मति बिना नीति गई

नीति बिना गति गई

गति बिना वित्त गया

वित्त बिना शूद्र टूटे

इतने अनर्थ

एक अविद्या ने किए

              ( ज्योतिबा फुले )

“’मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना- इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना। अगर मजहब बैर नहीं सिखलाता तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क पागल क्यों है? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिए, आज भी हिंदुस्तान के शहरों और गांवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा है? और कौन गाय खाने वालों को गोबर खाने वालों से लड़ा रहा है।

असल बात यह है कि ‘मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को सिखाता है भाई का खून पीना। हिंदुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसका, मौत को छोड़कर इलाज नहीं हैं।”

                        (स्रोत-राहुल सांकृत्यायन, तुम्हारी क्षय, पृ.13 )

स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित आधुनिक भारत का सपना देखने वाले तीन महापुरुषों के जन्मदिन का समय है। 9 अप्रैल 1893 राहुल सांकृत्यायन, 11 अप्रैल 1827 ज्योतिबा फुले और 14 अप्रैल 1891 बाबा साहब भीमराव आंबेडकर। इन तीनों महापुरुषों के सपनों, दर्शन, विचारों, इतिहास दृष्टि, व्यक्तित्व और कृतित्व में बहुत कुछ साझा है, लेकिन साथ ही भिन्नता भी मौजूद है। इनके बीच के साझे पन और भिन्नता पर विचार करने से पहले हम थोड़ी-सी निगाह आज के भारत पर डाल लें, देखें यह इतिहास के किस मोड़ पर खड़ा है और इस मोड़ से आगे भारत के भविष्य की क्या दिशायें हो सकती हैं, और इन दिशाओं के निर्माण में इन नायकों के सपनों, विचारों, इतिहास दृष्टि और कृतित्व की क्या भूमिका बनती है।

पहली बात तो यह कि शायद ही कोई जन पक्षधर और वैज्ञानिक भौतिकवादी विचारों से लैस व्यक्ति इस बाते से इंकार करे कि आज का भारत दो मनुष्य विरोधी संस्कृतियों के चंगुल में जकड़ा छटपटा रहा है। इसमें पहली संस्कृति का नाम हिंदू संस्कृति है, दूसरी का नाम विश्वव्यापी पतनशील पूंजी की संस्कृति। एक को महान भारतीय संस्कृति के नाम पर पुनर्स्थापित किया जा रहा है तो दूसरी को सबके विकास के नाम पर स्थापित किया गया है। दोनों का आपस में पूर्ण मेल हो गया है। दोनों एक दूसरे को शक्ति और समर्थन दे रहे हैं। दोनों का अस्तित्व एक दूसरे पर टिका है।

दोनों ने लगभग भारतीय जीवन के पोर-पोर को नियंत्रण में ले लिया है। अब हिंदू संस्कृति के नुमाइंदों ने भारतीय राजसत्ता पर भी लगभग पूर्ण नियंत्रण कर लिया है और राजसत्ता पर पहले काबिज पूंजी की संस्कृति के समर्थकों ने इनका जोरदार खैरमकदम किया है। दो टूक शब्दों में कहा जाए तो भारत में ब्रिटिश सत्ता के उप उत्पाद के तौर पर शुरू हुई और आजादी के आंदोलन के साथ जोर पकड़ने वाली, भारत के आधुनिकीकरण की परियोजना आजादी के लगभग सत्तर साल बाद पूरी तरह असफल या पराजित हो गई है। इस पराजय या असफलता को आधुनिकीकरण के मूल तत्वों – देश की संप्रभुता, जनसंप्रभुता, वर्ण-जाति व्यवस्था, जातिवादी पितृसत्ता, धर्म निरपेक्षता, उत्पादन संबधों-संपत्ति संबंधों और नई सृजित होने वाली संपत्ति के न्यायपूर्ण बंटवारे के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

भारतीय पुनर्जागरण- सुधार आंदोलन और आजादी के आंदोलन के दौरान ही आधुनिकीकरण की परियोजना के बीज पड़े थे। देश का दुर्भाग्य यह था कि भारत के आधुनिकीकरण की परियोजना को समग्रता में समेट कर भारतीय जीवन-यथार्थ में तब्दील करने वाली कोई शक्ति नहीं थी। अलग-अलग समूह और व्यक्ति इस परियोजना के भिन्न-भिन्न तत्वों का प्रतिनिधित्व करते थे। जिनकी आपस में तीखी टकराहट और असहमति थी। लेकिन एक ऐसी धारा भी थी, जो आधुनिकीकरण की पूरी परियोजना के ही विरोध में थी और देश को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करना चाहती थी।

उस शक्ति का नाम ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) है, जिसे अब जाकर सफलता मिली है। देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण उसने अपना पांव पसार लिया है और उसके अनुषांगिक संगठन भाजपा ने अपार बहुमत के साथ देश की राजसत्ता पर भी कब्जा कर लिया है तथा उसके अन्य विविध आनुषंगिक संगठनों का देश की विभिन्न औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाओं पर कब्जा हो गया है। औपचारिक-घोषित तौर पर न सही, लेकिन भारत हिंदू राष्ट्र बन चुका है।

आधुनिकता के तत्व

आधुनिकता के विविध मूल तत्वों में से किन तत्वों का प्रतिनिधित्व ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन करते थे, और आज का भारत उस संदर्भ में कहां खड़ा है, इसका जायजा लेने से पहले एक सरसरी नजर आधुनिकता के अन्य तत्वों और उनके हश्र पर डाल लेना जरूरी है। आजादी के आंदोलन के दौरान आधुनिकता का सबसे बड़ा तत्व यह था कि देश की संप्रभुता यानी देश लोगों के द्वारा चलाया जाए। हम सभी जानते हैं कि 1990-1991 के बाद देश अपनी आर्थिक संप्रभुता लगभग खो चुका है।

रही बात जन संप्रभुता की जिसका पारिभाषिक संवैधानिक अर्थ यह था कि देश में जन ही सर्वोपरि है, तो उसका अर्थ यह हो चुका है कि जनविरोधी विभिन्न गिरोहों (राजनीतिक पार्टियों) में जनता किसी एक को पांच साल में चुनने को विवश है, इन सब की आर्थिक नीतियां तो एक ही हैं, सामाजिक-सांस्कृतिक नीतियों और धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में थोड़े- बहुत मतभेद हैं। रही बात धर्मनिरपेक्षता की तो भारत में आजादी के बाद से ही छद्म धर्म निरपेक्षता रही है, अब तो उसका मुखौटा भी कमोबेश उतार कर फेंक दिया गया है, अल्पसंख्यकों के प्रति विद्वेष, घृणा और नफरत रखने वाले और इन चीजों को कार्यरूप देने वाले देश के प्रधानमंत्री-मंत्री और कई सारे लोग प्रदेशों में मुख्यमंत्री-मंत्री बन चुके हैं।

रही बात उत्पादन संबंधों-संपत्ति संबंधों में बुनियादी परिवर्तन और नई सृजित संपत्ति के न्यायोचित बंटवारे की तो, इसका हाल तो यह है कि बुनियादी परिवर्तन की कौन कहे, सत्तर सालों में 1 अरब 30 करोड़ जनसंख्या वाले देश में देश की कुल संपत्ति का 50 प्रतिशत पहले से ही संपत्तिशाली वर्गों और जातियों के चंद लोगों (8-9 लोग) के हाथों में सिमट गया है।

रही बात आधुनिकता की। दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं वर्ण-जाति और जातिवादी पितृसत्ता से मुक्ति अर्थात बर्बर मध्ययुगीन मानसिकता से भारतीयों की मुक्ति का प्रश्न, जो फुले, आंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन के हमले का मुख्य केंद्र था, उस पर इन नायकों का संदर्भ लेते हुए हम विस्तार से बात करेंगे। हमारे देश में बहुत सारे लोगों को यह समझने में भारी भूल हुई कि जाति और पितृ सत्ता दो भिन्न श्रेणियां हैं और समाधान अलग-अलग तरीकों से होगा। जबकि फुले, आंबेडकर और काफी हद तक राहुल सांकृत्यायन भी यह अच्छी तरह समझते और मानते थे कि हिंदू संस्कृति के दो प्राण तत्व हैं, जाति और जातिवादी पितृसत्ता।

इन लोगों का स्पष्ट तौर पर मानना था कि वर्णों और जातियों को तभी कायम रखा जा सकता है, उनकी पवित्रता-शुद्धता को तभी बनाए रखा जा सकता है, जब स्त्रियों की यौनिकता पर पूर्ण नियंत्रण किया जाए। हमारे तीनों नायक इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदुओं की मूल्य व्यवस्था, संस्कारों और सोचने के तरीके का केंद्र बिंदु, जाति की रक्षा और स्त्री की यौनिकता पर पूर्ण नियंत्रण है। इसी बात को लोहिया के शब्दों में कहें तो ‘हिंदुओं का दिमाग जाति और योनि के कटघरे में कैद है।

जाति और स्त्री प्रश्न

जाति और पितृ सत्ता के बीच क्या संबंध है। इस बात को आधुनिक युग में जिस व्यक्तित्व ने सबसे पहले समझा, वह थे: फूले दंपति, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फूले। जाति/ वर्ण के साथ स्त्री की स्थिति को जोड़कर देखने का जहां बड़े इतिहासकारों ने नहीं के बराबर प्रयास किया, वहीं जाति- व्यवस्था की, बहुजन चिंतकों-सुधारकों ने जो समझ विकसित की और जमीनी स्तर पर जो कार्य किया, उसमें स्त्री की पराधीनता और जाति के बीच का गठबंधन स्पष्ट होकर सामने आया। ज्योतिबा फुले ने शूद्रों, अति-शूद्रों और स्त्रियों को ब्राह्मणों द्वारा खड़ी की गई व्यवस्था में शोषित- उत्पीड़ित की तरह देखा। फुले ने जाति और स्त्री प्रश्न को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में देखा और दोनों को अपने संघर्ष का निशाना बनाया।

हिंदू समाज व्यवस्था को उसकी समग्रता में समझने और बदलने की कोशिशों और जाति को भौतिक संसाधनों, ज्ञान और जेंडर : संबंधों के जटिल ताने बाने के तहत समझ विकसित करने के फुले के प्रयासों के कारण समाजशास्त्री गेल ओमवेट ने उन्हें जाति का पहला ऐतिहासिक भौतिकवादी सिद्धांत कार कहा है। जाति और जातिवादी पितृ सत्ता के बीच के संबंधों को रेखांकित करते हुए डॉ. आंबेडकर कहते हैं, ‘जाति- व्यवस्था के लिए सजातीय विवाह और स्त्रियों की यौनिकता के नियंत्रण के लिहाज से ऊंची जातियों, खासकर ब्राह्मणों में सती, बलात् विधवापन, बाल-विवाह जैसे अस्त्र ईजाद किए गए।

जो जातियां ब्राह्मणों के नजदीक हैं उन्होंने स्त्री पर ये तीनों ही कायदे लाद रखे हैं: जो उनसे तनिक दूर हैं। उन्होंने विधवापन और बाल विवाह अपना रखा है; जो और भी दूर हैं उन्होंने बाल-विवाह अपना रखा है, और जो सबसे दूर हैं वे जाति के नियमों में आस्था बनाए रख कर जाति- व्यवस्था के परिचालन में सहयोग करते रहे हैं। हिंदू धर्म ग्रंथों, मिथकों, स्मृतियों, पुराणों आदि ने शूद्र और स्त्री को एक ही श्रेणी में रखा।

आंबेडकर ने विस्तार से हिंदू समाज में स्त्री की स्थिति और जाति/ वर्ण के पितृसत्ता से संबंधों को समझा और उसे तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने अपनी किताब ‘हिंदू नारी उत्थान और पतन’ में तथ्यों-तर्कों से यह प्रमाणित किया कि बौद्ध धर्म के अंदर स्त्रियों को बराबरी का अधिकार प्राप्त था और स्त्रियों को पराधीनता और दोयम दर्जे की स्थिति में ब्राह्मणवाद ने डाला। राहुल सांकृत्यायन अपनी विविध किताबों में स्त्री-पुरुष के बीच पूर्ण बराबरी की हिमायत करते हैं और भोजपुरी के अपने नाटक ‘मेहररूअन की दुरदशा’ में स्त्री पराधीनता के विविध रूपों पर कड़ा प्रहार करते हैं।

भारत की आधुनिकता की परियोजना के इन महानायकों के साझा तत्वों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि हिंदू संस्कृति, ब्राह्मणवादी मूल्य व्यवस्था, संस्कारों, परंपराओं, वर्ण-जाति व्यवस्था, पितृसत्ता और इसका समर्थन करने वाले ईश्वरी अवतारों, धर्मग्रंथों और इनके रचयिता ऋषियों- महाऋषियों पर निर्णायक प्रहार किया है। फुले की किताब ‘गुलामगीरी’, ‘तृतीय रत्न’, आंबेडकर ने अपनी किताब ‘जाति का उच्छेद’ और अन्य लेखन और राहुल ने अपनी किताब ‘तुम्हारी क्षय’ में वर्ण-जाति व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है।

यह सभी एक स्वर से स्वीकार करते थे कि हिंदुओं के धर्म, ईश्वर, मूल्य व्यवस्था में बुनियादी तौर पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बेहतर मानव समाज के निर्माण में मददगार हो। तीनों जातिवाद और ब्राह्मणवादी मूल्य व्यवस्था के समूल उच्छेद के पक्ष में थे। इसके बरक्श किस चीज की स्थापना की जाए, इस बारे में तीनों के दृष्टिकोणों में भिन्नता थी।

आज की चुनौतियों, कार्यभारों और इन व्यक्तित्वों के ऐतिहासिक योगदानों के संदर्भ में इनका मूल्यांकन करने के लिए जरूरी है कि इनके व्यक्तित्व की विशिष्टताओं और इनके बीच की भिन्नताओं को भी रेखांकित किया जाए। इसके लिए संक्षेप में ही सही इन तीनों का अलग विश्लेषण, आकलन और मूल्यांकन हो। ध्यान रहे कि तीनों इतिहास और परंपरा से बहुत कुछ ग्रहण करते हैं, विभिन्न व्यक्तियों का इनके ऊपर प्रभाव है, लेकिन इस सब के बावजूद तीनों स्वतंत्र चेता व्यक्तित्व हैं। ज्योतिबा फुले से शुरुआत करते हैं।

ज्योतिबा फुले

ज्योतिबा फुले आधुनिक भारत के पहला व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने ब्राह्मणवाद पर निर्णायक हमला बोला और ब्राह्मणवाद की गुलामी, अवमानना, अपमान, लांछना, उपेक्षा और शोषण- उत्पीड़ऩ के शिकार शूद्रों, अन्त्यजों और स्त्रियों की मुक्ति और पूर्ण बराबरी का आह्वान किया तथा उसके लिए आजीवन संघर्ष किया। फुले का जन्म शूद्र वर्ण की माली जाति में हुआ था। उनके जन्म (1827) के नौ वर्ष पहले (1818) ही पेशवाओं के शासन का अंत अंग्रेजों ने अन्त्यजों और शूद्रों के सहयोग से कर दिया था।

हम सभी जानते हैं कि पेशवाई शासन एक खुला ब्राह्मणवादी शासन था, जिसमें मनु-याज्ञवल्क्य की स्मृतियों को अक्षरश: लागू करने की कोशिश की गई थी। अंग्रेजों ने पेशवाई का तो अंत कर दिया था, लेकिन सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक जीवन में ब्राह्मणवादी परंपरा और मूल्य व्यवस्था कायम थी। फुले एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे, जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न था, अछूत नहीं माना जाता था, लेकिन उसे उच्च जाति के द्विजों की बराबरी का अधिकार नहीं था, जिसके चलते उन्हें सामाजिक अपमान का भी सामना करना पड़ा, लेकिन अछूतों और स्त्रियों के पक्ष में निर्णायक तौर पर खड़े होने के चलते उनके परिवार ने उन्हें, उनकी पत्नी सहित घर से बेघर कर दिया।

उसके बाद का उनका पूरा जीवन अन्त्यजों, शूद्रों और स्त्रियों के लिए संघर्ष करते बीता। इस दौरान उन्हें पग-पग पर ब्राह्मणवादियों से जूझना पड़ा। जाति और किसानों के प्रश्न पर बाल गंगाधर तिलक जैसे महारथी से टकराना पड़ा, जिनके स्वराज का अर्थ द्विजों, मर्दों और उच्च वर्गों के लिए स्वराज था। तिलक अंग्रेज सरकार द्वारा किसानों के पक्ष में जमींदारों और साहूकारों के लगान और सूद में थोड़ी सी भी कटौती के पक्ष में नहीं थे, जिसकी कोशिश ज्योतिबा फुले ने की थी। उन्होंने अछूतों और स्त्रियों के लिए पहला स्कूल खोला यह दुनिया जानती है, ब्राह्मणी विधवाओं के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह खोला। व्यापक गरीब किसानों के दर्द को अपनी किताब किसान का कोड़ा में व्यक्त किया और आजीवन उनके लिए संघर्ष करते रहे।

फुले की विश्व दृष्टि अत्यंत व्यापक थी। थापस पेन की किताब ‘राइट्स ऑफ मैन’ का उनके ऊपर गहरा प्रभाव था, अमेरिका में काले गोरों के संघर्ष में वह कालों का पक्ष लेते और वहां से उन्होंने अपने संघर्षों की प्रेरणा भी ग्रहण की। पेशवाई की तुलना में अंग्रेजों की उदारता उन्हें आकर्षित करती थी। जो लोग इस बात के लिए उनकी आलोचना करते हैं कि वह अंग्रेजों के पक्ष में खड़े थे और 1857 के संघर्ष में उन्होंने भारतीयों का साथ नहीं दिया, वे लोग इस बात का जवाब नहीं देते हैं कि क्या उन्हें अंतिम पेशवा नाना साहब की वापसी का यानी पेशवाई या ब्राह्मणशाही की पुनर्स्थापना का समर्थन करना चाहिए था या कि उसके बाद तिलक का समर्थन करना चाहिए था, जो जाति और जातिवादी पितृसत्ता का पुरजोर समर्थन करते थे और हर प्रकार के सामाजिक सुधारों के विरोधी थे।

फुले ने धर्म और ईश्वर का निषेध तो नहीं किया, लेकिन उनकी ईश्वर विषयक कल्पना पूर्णत: निर्गुण, निराकार थी। ठीक कबीर जैसी। उनका मानना था कि ईश्वर ने किसी को ऊंच या नीच नहीं बनाया है, और उसकी खोज करना भी व्यर्थ है। वह पूर्ण मानवतावादी और समतावादी थे। वह भारतीय पुनर्जागरण की निम्न जातीय और निम्न वर्गीय परंपरा के जनक थे।

डॉ. भीमराव आंबेडकर

अछूत महार जाति में 14 अप्रैल 1891 को जन्मा एक बालक, जिसने ब्राह्मणवादी हिंदू संस्कृति को इस तरह चुनौती दी कि हिंदुओं के सबसे उदार रूप के समर्थक और पोषक गांधी भी हिल गए और कह उठे कि ”डॉ. आंबेडकर हिंदुत्व के लिए सबसे बड़े चुनौती हैं। इतना ही नहीं उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति जाति का उच्छेद पढ़कर उनकी टिप्पणी थी, ”कोई भी समाज- सुधारक इस किताब की अनदेखी नहीं कर सकता। वह आगे कहते हैं कि ”भविष्य में चाहे उन्हें किसी भी विशेषण से जोड़ा जाए, परंतु डॉ. आंबेडकर ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जो समाज द्वारा भुलाए जा सकेंगे।”

गांधी की यह बात पूरी तरह से सही साबित हुई, आज बाबा साहब भीमराव आंबेडकर हजारों वर्षों से पराधीनता और अपमान की आग में झुलसते दलितों के मसीहा बन चुके हैं, और उनके विचारों से नाइत्तफाकी रखने वाले भी विविध कारणों से उनका नाम लेने और उन्हें स्वीकार करने को आतुर और विवश हैं। हिंदुस्तान की समस्याओं की भीतरी तहों को जानने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात से इंकार नहीं कर पाएगा कि भविष्य के किसी भी खूबसूरत भारत की रचना का रास्ता आंबेडकर से ही गुजर कर जाएगा।

देखने की बात यह है कि वह कौन-सी मूल चीज है जो आंबेडकर को महानायक बना देती है? बिना संदेह वह है आंबेडकर का यह मानना कि अगर किसी एक चीज ने भारतीय समाज को एक पतनशील समाज में परिवर्तित कर दिया और उसे जिंदा कौम की जगह मुर्दा कौम में तब्दील कर दिया, तो उस चीज का नाम है, जाति व्यवस्था। जाति की सर्वव्यापी विनाशक भूमिका के संदर्भ में आंबेडकर लिखते हैं कि ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि जाति आधारभूत रूप से हिंदुओं का प्राण है। लेकिन हिंदुओं ने सारा वातावरण गंदा कर दिया है और सिख, मुस्लिम और क्रिश्चियन सभी इससे पीड़ित हैं।

एक अन्य जगह उन्होंने कहा है, ”हिंदू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदर्शों और प्रतिबंधों की भीड़ है। हिंदू-धर्म वेदों व स्मृतियों, यज्ञ-कर्म, सामाजिक शिष्टाचार, राजनीतिक व्यवहार तथा शुद्धता के नियमों जैसे अनेक विषयों का खिचड़ी मात्र है। हिंदुओं का धर्म बस आदेशों व निषेधों की संहिता के रूप में ही मिलता है, और वास्तविक धर्म, जिसमें आध्यात्मिक सिद्धांतों का विवेचन हो, जो वास्तव में सर्वजनीन और विश्व के सभी समुदायों के लिए हर काम में उपयोगी हो, हिंदुओं में पाया ही नहीं जाता, यदि थोड़े से सिद्धांत पाए भी जाते हैं तो हिंदुओं के जीवन में उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं पाई जाती है। हिंदुओं का धर्म ”आदेशों और निषेधों का ही धर्म है, यह बात वेद और स्मृतियों में ‘धर्म शब्द के प्रयोग तथा व्याख्याकारों द्वारा उसकी व्याख्या से स्पष्ट है।

”तो क्या हिंदू धर्म में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है, जिसके समक्ष आपस के तमाम भेदों के बावजूद नतमस्तक होना सभी हिंदू, अपना कर्तव्य मानते हों? मुझे लगता है, ऐसा एक सिद्धांत है और वह है जाति का सिद्धांत। ”ब्राह्मणवाद के जहर ने हिंदू समाज को बर्बाद किया है।” ( रिवोल्यूशन्स एंड काउंटर रिवोल्यूशन्स इन एंसिएंट इंडिया)

वह मेहनतकश श्रमिकों की एकता के पुरजोर समर्थक थे, लेकिन इस बात से दुखी थे कि जाति ने श्रमिकों को विभाजित कर रखा है। वह लिखते हैं कि ”भारत की जाति व्यवस्था की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती, बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊंच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता है। उन्होंने वामपंथियों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा था कि, ”जाति एक ऐसा राक्षस है, जो आपका रास्ता काटेगा जरूर। जब तक आप इस राक्षस को नहीं मारते, तब तक आप न तो कोई राजनीतिक सुधार कर सकते हैं और न ही कोई आर्थिक सुधार कर सकते हैं।”

आंबेडकर एक मुकम्मल चिंतक, सामाजिक क्रांतिकारी के साथ-साथ राजनेता भी रहे हैं। राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर वह उदारवादी लोकतंत्र के समर्थक हैं, आर्थिक व्यवस्था के तौर पर राज्य नियंत्रित पूंजीवाद के समर्थक हैं या ज्यादा से ज्यादा राजकीय समाजवाद के समर्थक हैं। वह कृषि भूमि के पूर्ण राष्ट्रीयकरण और बुनियादी एवं बड़े उद्योग धंधों के राष्ट्रीयकरण का समर्थन करते हैं। एक अनीश्वरवादी समतावादी धर्म के रूप में बौद्ध धर्म की पैरवी करते हैं।

राहुल सांकृत्यायन

इन दोनों के विपरीत राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893) का जन्म गाय पट्टी (काऊ बेल्ट) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह वेदांती, आर्य समाजी, बौद्ध मतावलंबी से होते हुए मार्क्सवादी बने। विद्रोही चेतना, न्यायबोध और जिज्ञासा वृत्ति ने उन्हें पूरी तरह से ब्राह्मणवादी-जातिवादी हिंदू संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया। फुले और आंबेडकर से विपरीत उन्हें जातिवादी अपमान का सामना तो नहीं करना पड़ा, लेकिन सनातनी हिंदुओं की लाठियां जरूर खानी पड़ीं। राहुल सांकृत्यायन अपने अपार शास्त्र ज्ञान और जीवन अनुभवों के चलते हिंदुओं को सीधे ललकारते थे, उनकी पतनशीलता और जहालत को उजागर करते थे।

उन्होंने अपनी किताबों में विशेषकर ‘तुम्हारी क्षय’ में हिंदुओं के समाज, धर्म, भगवान, सदाचार, जात-पात और तुम्हारी जात-पात की क्षय में हिंदुओं के अमानवीय चेहरे को बेनकाब करते हैं। ‘तुम्हारी जात- पात की क्षय’ में वह लिखते हैं कि ”हमारे देश को जिन बातों पर अभिमान है, उनमें जात-पात भी एक है। …पिछले हजार बरस के अपने राजनीतिक इतिहास को यदि हम लें तो मालूम होता है कि हिंदुस्तानी लोग विदेशियों से जो पददलित हुए, उसका प्रधान कारण जाति-भेद था। जाति-भेद न केवल लोगों को टुकड़ों- टुकड़ों में बांट देता है, बल्कि साथ ही यह सबके मन में ऊंच- नीच का भाव पैदा करता है। ब्राह्मण समझता है कि हम बड़े हैं, राजपूत छोटे हैं। राजपूत समझता है हम बड़े हैं, कहार छोटे हैं। कहार समझता है, हम बड़े हैं, चमार छोटे हैं। चमार समझता है, हम बड़े हैं, मेहतर छोटा है। और मेहतर भी अपने मन को समझाने के लिए किसी को छोटा कह ही लेता है।”

राहुल सांकृत्यायन भी आधुनिकता की परियोजना के अधिकांश  तत्वों को अपने में समेटे हुए हैं, वह हिंदू संस्कृति के मनुष्य विरोधी मूल्यों पर निर्णायक हमला तो करते ही हैं। वह यह भी मानते हैं कि मनुष्य को धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है, इंसान वैज्ञानिक विचारों के आधार पर खूबसूरत समाज का निर्माण कर सकता है, एक बेहतर जिंदगी जी सकता है। सबसे बड़ी बात यह कि वह उत्पादन- संपत्ति संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन के हिमायती हैं, क्योंकि मार्क्स की इस बात से वह पूरी तरह सहमत हैं कि भौतिक आधारों में क्रांतिकारी परिवर्तन किए बिना राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया ही नहीं जा सकता है और जो परिवर्तन लाया जाएगा, उसे टिकाए रखना मुश्किल होगा।

जाति के संबंध में भी उनकी यही धारणा थी। हां, वह वामपंथियों में अकेले व्यक्ति थे, जो इस यांत्रिक और जड़सूत्रवादी सोच के विरोधी थे कि आधार में परिवर्तन से अपने आप जाति व्यवस्था टूट जाएगी। इसके साथ ही हिंदी क्षेत्र के वह एक मात्र वामपंथी थे, जो ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म-संस्कृति पर करारी चोट करते थे और भारत में सामंतवाद की विशिष्ट संरचना, जाति को समझते थे और आधार और अधिरचना (जाति) दोनों के खिलाफ एक साथ निर्णायक संघर्ष के हिमायती थे। इस समझ को कायम करने में ब्राह्मण विरोधी बौद्ध धर्म के उनके गहन अध्ययन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी तीन किताबें ‘बौद्ध दर्शन’, ‘दर्शन- दिग्दर्शन’ और ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

जो भी, इन दो पतनशील जीवन दर्शन- ब्राह्मणवाद-पूंजीवाद- के नाभिनाल संबंध पर निर्मित हो रहे आज के भारत की जगह स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित भारत का निर्माण करना चाहते हैं, उन सबके लिए इन तीनों व्यक्तित्वों के सपनों, विचारों और कृतित्व को व्यापक तौर पर जानना, आत्मसात करना और इन से प्रेरणा लेना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

This post was last modified on April 12, 2020 1:35 pm

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