Saturday, October 16, 2021

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वाद और विचारधारा का बंदी नहीं है साहित्य: गीतांजलि श्री

प्रदीप सिंहhttps://janchowk.com
लेखक डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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गीतांजलि श्री हिन्दी की जानी-मानी कथाकार और उपन्यासकार हैं। अब तक उनके पांच उपन्यास और पांच कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं; तीन उपन्यासों का फ्रेंच में अनुवाद हुआ है। हाल ही प्रकाशित ‘रेत समाधि’ उनकी बहुचर्चित कृति है। कथाकार और उपन्यासकार गीतांजलि श्री से प्रदीप सिंह की बातचीत :

प्रश्न : सबसे पहले आपको बधाई। आपके उपन्यास ‘रेत समाधि’ की असाधारण व्यक्तित्व रखने वाली बूढ़ी अम्मा की कहानी अब फ्रांस के साहित्य का हिस्सा बन, एक नई पहचान में पाठकों के सामने उपलब्ध है। अपने उपन्यास का फ्रांसीसी में अनुवाद होने पर कैसा महसूस कर रहीं हैं?

गीतांजलि श्री : धन्यवाद। फ़्रेंच में किताब अलग जीवन शैली व संस्कृति वाले लोग पढ़ेंगे और उनकी सोच व समझ कृति में नए आयाम खोलेगी। कृति नए सिरे से जीवन पाएगी। ये मेरे लिए उपलब्धि है।

ख़ास अच्छा तब लगता है जब विदेशी पाठक अपनी संस्कृति से भिन्न जीवन में वह पाते हैं जो अलग दिखता है पर उनके अनुभव का हिस्सा भी है, यानी वे बातें जो विशेष होकर भी सार्वजनिक हैं और महज़ इंसानी। पराया भी अपना है!

इसके पहले मेरे दो और उपन्यास फ़्रांसीसी में आ चुके हैं और मैं ख़ुशक़िस्मत हूं कि दोनों अनुवादकों से मेरा अच्छा सम्बंध बन गया है। एक हैं जानी मानी हिंदी की विदुषी प्रोफ़ेसर आनी मौंतो जो पेरिस में हैं, और दूसरे हिंदी पढ़ाते हैं स्विटज़रलैंड में, निकोला पोत्ज़ा। दोनों हिंदी साहित्य और हिंदुस्तान से ख़ूब परिचित हैं और कुछ हद तक भारतीय बन चुके हैं!

रेत समाधि का तर्जुमा आनी ने किया है और बेहतरीन प्रकाशन ‘एडीसीयों दे फ़ाम’, पेरिस, ने उसे शाया किया है।

प्रश्न : रेत समाधि की खासियत ये है कि आपने किरदारों को रचा नहीं उन्हें बस लिख दिया ऐसे जैसे ये दुनिया एकदम सांस लेती अपनी दुनिया हो। क्या वास्तविक जीवन में ऐसे किरदारों से आप का वास्ता रहा है?

गीतांजलि श्री : जिसे आप मेरी पुस्तक की ‘सांस लेती अपनी दुनिया’ कह रहे हैं और उसके बरक्स ‘वास्तविक जीवन’ की बात उठा रहे हैं, असल में यों अलग नहीं हैं। सर्जन क्रिया में कल्पना और वास्तविक जीवन का विचित्र खेल चलता है और अगर एकदम सपाट साधारण लेखन की बात छोड़ दें तो ऐसा नहीं होता कि बस जीवन से सीधे सीधे चरित्र उठाया और साहित्य में बैठा दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत से तत्व मिलते हैं और साहित्य और उसमें आते चरित्र, घटनाएं, इत्यादि जन्मते हैं। अक्सर वास्तविक जीवन के अनेक चरित्र मिलके एक चरित्र निर्मित हो जाता है। सर्जक की कल्पना वहां काम करती है।

असल बात यह है कि साहित्यकार अपने आसपास के जीवन से लेते हैं पर उसका अतिक्रमण भी करते हैं और उनकी कल्पना इस मिश्रण को जीवंत कर देती है और असल का विस्तार करती है।

यह भी कहूंगी कि साहित्यकार को जीवन की सम्भावनाएं, जो हो सकता है अभी हासिल में नहीं आयी हों, भी प्रेरित करती हैं। ये सम्भावनाएं अच्छाई की भी हो सकती हैं और बुराई की भी। साहित्यकार उत्साहित भी कर सकती है, चेतावनी भी दे सकती है। यही कारण है कि भविष्य अक्सर साहित्य में प्रतिध्वनित होने लगता है। जॉर्ज ओरवेल का साहित्य ले लीजिए। या हमारे यहां टैगोर का गोरा देखिए। हिंदू समाज को अभी तक उसका गोरा नहीं मिला है, पर है वह कितना परिष्कृत, परतदार, गहरा चरित्र, और कितना ज़रूरी हमारे उद्धार के लिए।

प्रश्न : रेत समाधि में आप एक जगह लिखती हैं कि- “बेटियां हवा से बनती हैं। निस्पंद पलों में दिखाईं नहीं पड़ती और बेहद बारीक एहसास कर पाने वाले ही उनकी भनक पाते हैं।” ऐसे में क्या आप मानती हैं कि महिलाएं पुरुषों से अलग हैं। जबकि नारीवादी लेखन हर मामले में पुरुषों की बराबरी करने की बात करता है?

गीतांजलि श्री : जो मैंने लिखा है उसमें ढेरों गूंज अनुगूंज हैं। एक बात यह कि बेटियों/औरतों को पुरुषप्रधान समाज में अनदेखा किया जाता है या ख़ास ‘नज़र’ से देखा जाता है, उस नज़र से नहीं जो स्त्रियाँ चाहती हैं और जिसकी वे हक़दार हैं। तो जो उद्धरण आपने लिया है वो उस सम्वेदना की मंशा करता है जिसमें नयी नज़र हो, लड़की पहचानी जाए, उसकी बारीकी दिखे।

महिलाएं पुरुष अलग हैं, कितने अलग, किन बातों में अलग, इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है और वो निर्णायक बात से ज़्यादा एक चर्चा और बहुतेरे आयाम खोलने की बात है। समाज और संस्कृति ने किस तरह उन्हें अलग अलग जीव और पहचान बनाया है, वह चर्चा भी होनी होगी। उसकी जगह यहां नहीं है। अभी नहीं।

बस यह कह दूं कि वे अलग हैं, किन मायनों में हैं, किन मायनों में नहीं, इससे बराबरी की मांग पर फ़र्क़ नहीं ज़रूरी। मैं अलग हूं तो भी बराबरी मांगूंगी। बराबरी यह नहीं कि औरत के भी शिश्न हो और पुरुष के भी स्तन। बल्कि यह कि किसी भी सूरत में दोनों के समान अधिकार हों, समान विकल्प हों, चुनाव की एक-सी आज़ादी हो।

फ्रेंच में रेत समाधि

प्रश्न : आज हिंदी साहित्य में किसी नए क्राफ्ट, नए शिल्प या बुनाई के प्रयोग कम ही होते हैं। लेकिन रेत समाधि में सब बंधन को तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है?

गीतांजलि श्री : मैं दूसरे लेखकों की नहीं कहूंगी, पर मेरी ख़ुद की साहित्यिक यात्रा मुझे यह दिखलाती सिखलाती रही है कि रचना तब सशक्त होती है जब वह अपना विशिष्ट स्वर पा लेती है, अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, अपनी चाल निर्धारित कर लेती है। रचनाकार को अपने को निमित्त बनने देना पड़ता है। मैं प्रयोग करने को प्रयोग नहीं करती, ख़ुद को स्वतंत्र छोड़ने का उपक्रम करती हूं और कृति को रस्ते, भाषा, शिल्प-शैली चुनने देती हूं। मगर ये किसी अराजकता का पालन करना नहीं है।

मेरा अंतर्मन, लेखक-मन, चेतन-अवचेतन, मेरी संवेदना, सूझबूझ, कल्पना-शक्ति, मेरी प्रज्ञा, यह सब मेरी रचना शक्ति को तराशते रहे हैं और अभी भी तराश रहे हैं। मेरा अंतर्मन अनजाने मुझे गाइड करता है। अराजक होने से रोकता है, साहस करने को उकसाता है, जोखिम लेने को भी, मगर धराशायी होने के प्रति चेताता भी है। ज़ाहिर है पांसा ग़लत भी पड़ सकता है। पर वह सृजनधर्म में निहित है। और चैलेंज वही है कि संतुलन मिले पर ऊबा हुआ, रगड़ खाया, सपाट घिसा पिटा अन्दाज़ और ढब न बने।

मुझे रामानुजन का यह कथन बेहद प्रिय है कि- कि मैं कविता का पीछा नहीं करता, अपने को ऐसे ‘माहौल’ या ‘जगह’ में स्थित कर देता हूं कि कविता मुझे ढूंढ़ लेती है।

और फिर, जैसा उस्ताद अली अकबर ख़ां ने कहा है – शुरू करता हूं तब सरोद मैं बजाता हूं, फिर सरोद मुझे बजाने लगता है।

तो गर रेत समाधि ने बंधन तोड़े हैं तो वह उसका अपना तलाशा और पाया हुआ सत्य है। अगर वह विश्वसनीय, ज़ोरदार बन गया, अपना व्यक्तित्व पा गया, तो मैं अनुगृहीत हूं कि इतने बरसों का ‘डूबना’ डुबा नहीं गया, कोई ‘मोती’ तल से भंवरता आख़िरकार ऊपर आया और हाथ लगा। शायद आपके भी!

प्रश्न : आपके उपन्यासों में जिन्दगियां चलती-बदलती हैं, नए-नए राग-द्वेष उभरते हैं, प्रतिदान और प्रतिशोध होते हैं, पर चुपके-चुपके। आपके लेखन में व्यक्त से अधिक अनकहा मुखर होता है?

गीतांजलि श्री : साहित्य तो है ही व्यंजना और लक्षणा का खेल। ढूंढे़ से भी अभिधा नहीं मिलेगी।

यह भी कह दूं कि जहां अनकहा है वहीं सांसें हैं। साहित्य को भी जीवन के लिए सांस लेनी होती है। सब कहे में सांस गुल और सब मृत।

प्रश्न : आपके लेखन में नारी अंर्तमन की संवेदना बहुत गहरा भाव लेकर उभरती है। आज महिलाओं के सवालों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। लेकिन आप फ्लैशबैक से चीजों को उठाती है। महिला सवालों पर लिखने के लिए क्या ‘नारीवादी’ होना आवश्यक है ?

गीतांजलि श्री : फ़्लैशबैक ही मात्र तरीका नहीं होता है चीज़ें उठाने और सम्प्रेषित करने के लिए, तरह तरह से बातें उजागर होती हैं। मेरी समझ से बात संवेदना की है, न कि वाद की। वाद और विचारधारा का बंदी साहित्य नहीं। यह चिंता पाठक, आलोचक, अकादेमिक बहसों में पड़ने वालों की है। मुश्किल यह है कि अक्सर वे हर कलाकृति को वाद और विचारधारा के खांचों में बांटने के आदी हो गए हैं। मैं कहूंगी कि अपने सोच में जो भी हूं, जिस भी वाद/विचारधारा की, मेरे लेखन में उसका अतिक्रमण होता है, जो मुझे समृद्ध और ताज़ा करता है। कभी तो चकित भी।

गीतांजलि श्री

प्रश्न : आप रोज़मर्रा की घटनाओं और अनूठे बिंबों की उंगली पकड़ मन के बीहड़ गहरे अतल में उतर जाती हैं। जहां कभी आसमान है, घर है, चिड़िया है, तो कभी अंधेरा, बेचैनी और हाहाकार, कभी दुख, तकलीफ है…

गीतांजलि श्री : आपने तो ख़ुद इतनी ख़ूबसूरती से बात को कह दिया है।

हां मैं मानती हूँ कि रोज़मर्रा और साधारण के भीतर विशेष और असाधारण का वास है। चुप, शांत, हल्के में बड़े ड्रामे छिपे हो सकते हैं, बड़ा इतिहास और आदिकाल की अनुगूंजें अंतर्निहित हो सकती हैं।

प्रश्न : आप अपने जन्म परिवार और शिक्षा-दीक्षा के बारे में बताएं। मां के नजदीक थीं या पिताजी के?

गीतांजलि श्री : मुख़्तसर- मैं उत्तर प्रदेश में जन्मी, पली बढ़ी हूं। मेरे समय में भी अच्छी शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम वाली मानी जाती थी, सो वह मैंने पायी। पर मेरा सौभाग्य कि मैं महानगर में न रहकर छोटे शहरों में रही, जहां स्कूल के बाहर मैंने देशी शिक्षा अनौपचारिक रूप में पायी। उस समय अंग्रेज़ी आज जितनी हावी नहीं हुई थी सो उन शहरों में हिंदी उर्दू के साहित्यकारों की ख़ूब इज़्ज़त थी। पंत जी, फ़िराक़ साहेब, महादेवी वर्मा, इत्यादि हमारे लिए शीर्ष लोग थे। हम हिंदी की पत्रिकाएं किताबें घर में पढ़ते थे। इसलिए मैं हिंदी से वैसे नहीं कटी जैसे आज के महानगर में पलने बढ़ने वाले बच्चे हो जाते हैं, न हिंदी को वैसे हेय समझा जैसे आज बच्चे मान लेते हैं।

इसलिए मैं बच गयी।

ये अलग बात है कि मुझे पारम्परिक हिंदी शिक्षा दीक्षा नहीं मिली। पर शायद उसने मुझमें अपने ढंग से भाषा को बरतने का जज़्बा जगाया। और मैं करती भी कैसे।

मां मां हैं, पिताजी पिताजी! दोनों से अलग झगड़े, अलग मीतपन रहा। उनका समय और हमारा अलग होता है, उसकी गरमागर्मी बच्चों और मां-बाप के रिश्तों में होती ही है।

नज़दीकी किससे ज़्यादा इसका क्या जवाब दूं। किसी के संग दूर रहकर नज़दीकी है, किसी के संग पास बैठ कर। विश्वास दोनों पर है, त्रस्त दोनों को किया, और दोनों ने मुझे!

प्रश्न : आपने प्रेमचंद पर पीएचडी की, विश्वविद्यालय में अध्यापन किया, फिर सबकुछ छोड़ कर स्वतंत्र लेखन की तरफ मुड़ीं। स्वतंत्र लेखन कितना कठिन है?

गीतांजलि श्री : प्रेमचंद पर शोध किया चूंकि हिंदी में आना चाहती थी। अध्यापन इसलिए किया कि रोज़ी रोटी की वही राह मेरे लिए खुली थी। मगर हिंदी में लिखना तय होता गया और साथ में यह जाना कि अध्यापन के साथ साथ इसको पूरी तवज्जो नहीं दे पाऊंगी। तो एक दिन उधर से मुंह मोड़ ही लिया।आसान निर्णय नहीं था पर भाई, पति ने सपोर्ट किया। शुरुआत अच्छी हुई, शीला संधु जी के साथ राजकमल में छपी, मान मिला, भले ही कथाकर होने से धन में वृद्धि न हुई। पैसों की बहुत चिंता नहीं की और उसी राह चलती बढ़ती गयी। और ख़ुशनसीब हूं कि उतनी भी फ़ाकाकशी नहीं करनी पड़ी, खाती पीती इंसान रह पायी हूं, स्वतंत्र लेखन, प्रॉजेक्ट्स, थीयेटर, आदि में मस्त मगन। पति ने भी मालामाल नहीं किया पर कंगाल भी नहीं!

प्रश्न : आपने साहित्य, थिएटर, अध्यापन और विभिन्न फेलोशिप पर काम किया। सबसे अच्छा अनुभव किस फील्ड का है जहां आपने अपने को संपूर्ण रूप से व्यक्त किया हो?

गीतांजलि श्री : साहित्यिक लेखन कहूंगी और ख़ासकर उपन्यास लेखन, जिसके भटकाव और फैलाव में मुझे लम्बी यात्राओं पर निकलने का सुअवसर मिला। पर साथ साथ यह भी कहूंगी कि और विधाओं को घेरेबंद नहीं करना चाहती – यहां मामला आदान प्रदान का है, हर विधा हर विधा को परतें देती है, सम्पन्न करती है। मेरे थिएटर अनुभव ने मुझे ध्वनि के प्रति सजग किया, इतिहास की पढ़ाई ने चरित्रों घटनाओं की पृष्टभूमि का एहसास दिया। कला आख़िर कलाओं का समागम मांगती है। भाषा में विषय, ध्वनि, रंग, चित्र, नृत्य, बनावट, बुनावट, क्या क्या नहीं।

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