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Friday, September 24, 2021

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पूंजी की सभ्यता-समीक्षा के कवि मुक्तिबोध

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मुक्तिबोध गहन संवेदनात्मक वैचारिकी के कवि हैं। उनके सृजन-कर्म का केंद्रीय कथ्य है-सभ्यता-समीक्षा। न केवल कवितायें बल्कि उनकी कहानियां, डायरियां, समीक्षायें तथा टिप्पणियां सार रूप में सभ्यता समीक्षा की ही विविध विधायें हैं, वह जो उपन्यास लिखना चाहते थे, उसके केंद्र में भी सभ्यता समीक्षा को ही रखना चाहते थे, इसके संकेत उन्होंने अनेक जगहों पर दिए हैं।

सुव्यवस्थित, गंभीर तथा विस्तृत समीक्षा के लिए उन्होंने प्रसाद जी की कामायनी को चुना, क्योंकि कामायनी की केंद्रीय समस्या सभ्यता समीक्षा ही है। मुक्तिबोध कामायनी को छायावाद तथा आधुनिक हिंदी साहित्य की महत्त्वपूर्ण कृति मानते थे, क्योंकि उसके केंद्र में आधुनिक सभ्यता की समीक्षा है। भले ही वह रूपक के तौर पर आदिम मिथक को चुनती हो। पूरी मनुष्य जाति तथा मनुष्य जाति के एक सदस्य के रूप में एक व्यक्ति के जीवन की चरम चारितार्थता क्या है? यही कामायनी के केंद्र में है। मुक्तिबोध इसे मानवता के भवितव्य के संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न मानते थे। यह दीगर बात है कि वे कामायनी में उठाई गई आधुनिक सभ्यता के संकट एवं समस्याओं के समाधान के स्वरूप से असहमत थे।

मुक्तिबोध और प्रसाद जी से भी बहुत पहले गांधी जी ने भी ‘हिन्द स्वराज’ में आधुनिक सभ्यता पर गंभीर प्रश्न उठाए थे। प्रेमचंद ने भी आधुनिक सभ्यता पर कड़ा प्रहार किया और इसे ‘महाजनी सभ्यता’ कहा। मुक्तिबोध का काव्य-संसार इसी सभ्यता से जूझता है। इस सभ्यता को वे पूंजी की सभ्यता कहते हैं, जिसकी मूल संस्कृति पैसे की संस्कृति है। वे इसे यूरोपीय-अमेरिकी पश्चिमी सभ्यता भी कहते हैं। मुक्तिबोध जिस समय सृजनरत थे, उस समय यह सभ्यता अपने को पूरी दुनिया में स्थापित करने की कोशिश में लगी हुई थी, वह भारत को भी अपने रंग में रंगने को आतुर थी-‘साम्राज्यवादियों के/पैसे की संस्कृति/भारतीय आकृति में बंधकर/दिल्ली को/ वाशिंगटन और लंदन का उपनगर/ बनाने पर तुली है!!’ दिल्ली को वाशिंगटन और लंदन बनाने की पश्चिमी कोशिश अब पूरी तरह सफल हो चुकी है। दिल्ली को कौन कहे, हर शहर, कस्बा यहां तक कि गांवों को भी वाशिंगटन या लंदन का एक छोटा रूप, भले ही वह कितना ही विकृत एवं विरूप क्यों न हो, बनाने की कोशिश काफी हद तक कामयाब हो चुकी है।

न केवल भारत बल्कि दुनिया के बहुलांश को पैसे की संस्कृति ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। वह आज विश्वव्यापी संस्कृति बन चुकी है, क्योंकि उसका प्रतिरोध करने वाली तथा उसके बरअक्स वैकल्पिक मानवीय संस्कृति रचने की कोशिश करने वाली दो महान धारायें- राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों की धारा तथा समाजवाद की धारा अपने भीतरी अन्तर्विरोधों, कमजोरियों और भूल-गलतियों के कारण काल-कवलित हो चुकी हैं। पूंजी की सभ्यता के साथ पैदा होने वाले सभी प्रगतिशील सांस्कृतिक मूल्यों को स्वयं उसी ने बहुत पहले ही निगल लिया था। ‘सच तो यह है/तुममें जो भी अच्छा था/सब सड़ गया’ यह संस्कृति जिस तरह की सभ्यता गढ़ती है तथा जिस तरह के मनुष्यों का निर्माण करती है, इसको ही मुक्तिबोध अपनी बहुलांश कविताओं का केंद्रीय कथ्य बनाते हैं। मुक्तिबोध की सारी बेचैनी तथा अभिव्यक्ति की छटपटाहट के केंद्र में यही चीज है। वे भिन्न-भिन्न कविताओं में विविध तरीकों से इस सभ्यता को निर्मित सारभूत तत्व को अभिव्यक्ति देने के लिए छटपटाते हैं तथा इस पैसे की सभ्यता के बरअक्स कैसे मनुष्य को केंद्र में रखने वाली सभ्यता को निर्माण किया जा सकता है इसे भी स्वर देने की कोशिश करते हैं।

शायद इसी तथ्य को रेखांकित करने के लिए हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा कि मुक्तिबोध एक ही कविता बार-बार लिखते रहे। वे मानव-स्वभाव तथा मानव सभ्यता के प्रश्नों से ही जूझते हैं- ‘सहसा वह बहस छेड़ देता/ मानव समाज-रूपान्तर विधि/ की धाराओं में मग्न/मानवीय प्राणों के/ मर्मों की व्यथा-कथा….. अंगार तपस्या पर,/ मानव स्वभाव के प्रश्नों पर,/ मानव-सभ्यता समस्या पर/ वे बार-बार समाज एवं व्यक्ति के भवितव्य पर सोचते हैं, उसे अपनी कविताओं का कथ्य बनाते हैं- ‘फिर वही यात्रा सुदूर की,/ फिर वही भटकती हुई खोज भरपूर की,/ कि वही आत्मचेतस अन्तःसंभावना सभ्यता-समीक्षा करते हुए वे इसकी सत्ता को अर्थवादिनी सत्ता कहते हैं, जिसके केंद्र में मनुष्यता नहीं, लाभ है, लाभ ही इस सभ्यता की धुरी है। वह इसी केंद्र के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसके चलते यह किसी समस्या का समाधान नहीं कर पाती, निरंतर संकटग्रस्त रहती है। अपने अन्तर्विरोधों को हल नहीं कर पाती- ‘क्या किया जाए/इस दुनिया की हड़ियां खोलकर भी/समस्या सुलझ नहीं सकती/यह लाभ-लक्ष्य की अर्थवादिनी सत्ता की/अनिवार्य समस्या है’- ‘लाभ-लक्ष्य आधारित यह सभ्यता व्यक्ति को स्वकेंद्रित एवं चरम स्वार्थी बना देती है। उसके भीतर की मनुष्यता को नित-निरंतर मारने की कोशिश में लगी रहती है। मनुष्य के सामने ऐसी परिस्थितियां रच देती है। वह स्वयं के बारे में ही सोचता रहता है, ‘पर’ के बारे में सोचने-जीने की स्थिति में अपने को नहीं पाता। स्वयं को अपराधी पाता है, जिंदगी व्यर्थ लगती है- ‘अस्तित्व-मात्र की रक्षा की इस उलझन पर/तब आत्म-ग्लानि की लहर न क्योंकर फूट पड़े/फिर आत्म-व्यर्थता भाव नहीं क्यों कर उमड़े।’

यह सभ्यता मनुष्य की आत्मा को ही मारने की कोशिश करती है। मुक्तिबोध व्यक्ति के भीतर की मनुष्यता के सघन एवं सांद्र रूप को ही आत्मा कहकर पुकारते हैं जो शब्द उनकी कविताओं में बार-बार आते हैं, उनमें आत्मा भी शामिल है। स्वयं की आत्मा को जीवित रखने की जद्दोजहद में जीवन भर लगे रहे, हर प्रकार के दुख-कष्ट तथा अभाव सहे और पूरी मनुष्य जाति की आत्मा को जीवित रखने के लिए सृजन करते रहे। पैसे की संस्कृति के हमले का केंद्र मनुष्य की आत्मा ही है। आत्मा भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं मूल्य परंपरा का ऐसा शब्द है, जो मनुष्य की मनुष्यता को प्रतिबिंबित करता है। यही मनुष्य के विवेक एवं न्याय-बोध का भीतरी स्रोत है। आत्मा का जल पीकर ही मनुष्य अपनी प्यास बुझाता है, मनुष्य के रूप में जीवित रहता है। पैसे की संस्कृति, पूंजी की संस्कृति, लाभ की संस्कृति, लोभ की संस्कृति तथा लालच की संस्कृति पर आधारित सभ्यता मनुष्य की आत्मा की रोशनी को बुझा देना चाहती है। उसे उदर एवं शिश्न तक सीमित कर देना चाहती है।

मुक्तिबोध के शब्दों में ‘अनात्म’ या ‘मृतात्मा’ बना देना चाहती है। आत्महीनता अंधेरे में रहने की स्थिति है जबकि जीवित आत्मा रोशनी की प्रतीक है। लाभ-लोभ से पैदा स्वार्थ भीतर की रोशनी को बुझा देता है ‘स्वार्थों ने अब खूब खींचकर/गुलेल मारी बहुत दूर से/मरे डाल पर नीलकण्ठ दल/पावन संकल्पों के कोकिल/मूर्छित होकर गिरे डाल से/सटर-फटर ऊंचे भावों की सूखी झरबेरी से उलझे।/वह गुलेल का कंकर सीधा घुसा किसी में/ देह छेदकर,/मस्तक में घुसकर गुल कर दी/भीतर की रोशनी उसी ने।’ मुक्तिबोध इस सभ्यता द्वारा स्वार्थी एवं स्वकेंद्रित बना दिए गए लोगों को ‘मृतात्मा’ कहते हैं जो केवल भोग के लिए ही जीते हैं- ‘उदरम्भरि बन अनात्म बन गए’। इन अनात्मों की दुनिया में सारे आदर्श बेमानी हो जाते हैं।

अहंकार, दंभ से भरे लोग पद, प्रतिष्ठा की होड़ में लगे रहते हैं। भोग ही जीवन का लक्ष्य बन जाता है। सारी गतिविधियों-क्रियाकलापों के केंद्र में उदर एवं शिश्न होता है- उदर एवं शिश्न की अतृप्त प्यास बुझती ही नहीं- ‘ऊंचा मानव आदर्शों का रूप-स्वरूप/ स्याह होता है/निर्णयकारी स्वार्थों के काले महलों में/पद की और प्रतिष्ठाओं की/अहंकार निष्ठाओं की/ उदर-शिश्न की द्वेषभरी यह क्षुधा-पिपासा/ भू से नभ तक फैल रही है धुएं जैसी’- मुक्तिबोध उदर-शिश्न की द्वेषभरी क्षुधा-पिपासा को धुएं जैसी फैलती देख रहे थे, वह अब पूरी दुनिया पर अपना धुआं फैला चुकी है- ‘इस नगरी के किले-कंगूरे/ पर बैठे हैं विभिन्न स्वार्थों के बंदर लंगूरे’।

पैसे को केंद्र में रखने वाली यह अर्थवादिनी सभ्यता मनुष्य द्वारा हजारों वर्षों की यात्रा में अर्जित रत्नों-करूणा, दया, ममता, प्रेम, स्नेह, उदात्तता तथा आत्मीयता को खत्म कर देती है। बुद्ध तथा ईसा मसीह मनुष्यता के प्रतीक हैं। इनके माध्यम से मुक्तिबोध कहते हैं- ‘बुद्ध के स्तूप में/ मानव के सपने/ गड़ गए, गाड़े-गए!!/ ईसा के पंख सब/झड़ गए, झाड़े गए/ सत्य की देवदासी-अंगिया/उतारी गई/सपनों की आंतें सब/चीरी गईं, फाड़ी गईं’। इस सभ्यता में व्यक्ति जब स्वार्थों को केंद्र बना लेता है, सिक्के को सब कुछ समझने लगता है तो हजारों वर्षों में हासिल हृदय एवं मस्तिष्क के सभी मानवीय गुण नष्ट हो जाते हैं। यह भावना के कर्तव्यों को, हृदय के मन्तव्यों को मार डालती है। तर्क, विवेक, बुद्धि को नष्ट कर देती है। न्याय-अन्याय का बोध ही खत्म कर  देती है, आदर्श-सपने सब खत्म हो जाते हैं, आत्मा पर स्वार्थों का भारी पत्थर उसकी आवाज को बाहर ही नहीं आने देता-‘लोकहित-पिता को घर से निकाल दिया/ जन-मन करुणा सी मां को हकाल दिया,/ स्वार्थों के टेरियर कुत्तों को पाल लिया,/भावना के कर्तव्य त्याग दिए,/ हृदय के मन्तव्य मार डाले!/ बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,/ तर्कों के हाथ उखाड़ दिए,/ विवेक को बघार डाला स्वार्थों के तेल में/ आदर्श खा गए।’

सभ्यता की इस नगरी में अंधेरा ही अंधेरा है, रोशनी गायब है, भीतर सब कुछ मर चुका है, ठण्डा पड़ चुका है- ‘इस नगरी में चांद नहीं है, सूर्य नहीं है/ भीतर पावन ज्वाल नहीं है’। इस सभ्यता ने सब कुछ को दूषित कर दिया है। सभी पवित्रताओं को नष्ट कर दिया है। केवल विषभ रे स्वार्थों का बोलबाला है- ‘इस नगरी के जीवन की अंधियारी गलियों में,/ जहरीले स्वार्थों की कानाफूसी’- विष भरे स्वार्थों ने सब कुछ को अपवित्र कर दिया है। पवित्रता के लिए इसमें कोई जगह नहीं है। भारतीय जन-जीवन में तथा भारतीय परंपरा में ‘तुलसी का पौधा’ पवित्रता का प्रतीक है- ‘घर की तुलसी मुझसे कितनी दूर/ज्यों मरू-क्षेत्रों से नदियों का पूर’।


स्वार्थों से पैदा हुए भाव-विचार ही इस पूरी सभ्यता पर छा जाते हैं। मनुष्य के भीतर पिशाच तथा देवता दोनों मौजूद होता है। यह भीतर के देवता को मार कर पिशाच को सामने लाती है- ‘स्वार्थी भावों की लाल-लाल/ बेचैन चींटियों को सहसा/ अब नये पंख निकले-निकले/ अंधियारे के बिल में झांक रहे सर्पों की आंखें तेज हुई/ अब अहंकार उद्विग्न हुआ/ मानव के सब कपड़े उतरे/ वह रीछ एकदम नग्न हुआ’।

यह शोषण पर आधारित सभ्यता है। व्यापक जन के शोषण से ही इसका जन्म हुआ है। इस शोषण-उत्पीड़न की प्रक्रिया ही इसे विद्रूप बना देती है। इस विकृत सभ्यता से विकृत समस्यायें जन्म लेती हैं। यह भीतर के दानव को जगाती है- ‘शोषण के वीर्य-बीज से अब जन्में दुर्दम/ दो सिर के चार पैर वाले राक्षस बालक/ विद्रूप सभ्यताओं के गर्भों से निकले/ विद्रूप समस्याओं के विश्व-जाल बालक/ मानव की आत्मा से सहसा कुछ दानव और निकल आए’। आत्मा मनुष्यता की जननी है। इस विद्रूप सभ्यता में उसने अपने पुत्र यानि मनुष्यता को त्याग दिया है- ‘आत्मा रूपी माता ने जाने कब त्यागा/ जीवन का ‘आत्मज सत्य’- आत्महीन यह सभ्यता अपने बाहरी रूप रंग से ऐसा चमक बिखेरती है कि बहुतों की आंखें चौंधिया जाती हैं। उन्हें यह सभ्यता पूर्णिमा की चांदनी जैसी शीतल, उजली तथा पवित्र दिखाई देने लगती है, लेकिन इसका यह रूप सतही तथा झूठा है, क्योंकि इसमें प्राण नहीं है। इसमें मनुष्यता की सोंधी गंध नहीं है- ‘उन्नति’ के क्षेत्रों में, ‘प्रतिष्ठा’ के क्षेत्रों में/ मानव की छाती की, आत्मा की, प्राणों की/ सोंधी गंध कहीं, कहीं नहीं, कहीं नहीं/ पूनों की चांदनी यह सही नहीं, सही नहीं।’ इस सभ्यता के भीतरी घिनौने चेहरे को देखने के लिए सतह के नीचे जाना पड़ेगा, तभी इसके विकृत-विद्रूप घिनौने चेहरे को देखा जा सकता है, समझा जा सकता है।

ऊपर-ऊपर दिखने वाली चमक के भीतर के घने अंधेरा को पहचाना जा सकता है- ‘नीचे उतरो, खुरदरा अंधेरा सभी ओर/ वह बड़ा तना, मोटी डालें,/ अधजले फिंके कण्डे व राख/ नीचे तल में’- नीचे उतरने पर आधुनिक सभ्यता का वास्तविक चरित्र सामने आता है- ‘नीचे तल में वह पागल युवती सोयी है/ मैली दरिद्र स्त्री अस्त-व्यस्त/ उसके बिखरे हैं बाल व स्तन है लटका-सा,/ अनगिनत वासना ग्रस्तों का मन अटका था, उनमें से जो उच्छृंखल था, विशृंखल भी था,/ उसने काले पल में इस स्त्री को गर्भ दिया/ शोषिता व व्यभिचारिता आत्मा को पुत्र हुआ/ स्तन मुंह में डाल, मरा बालक!/ उसकी झाई,/ अब तक लेटी है पास उसी की परछाई !!/ आधुनिक सभ्यता-संकट की प्रतीक रेखा’।

यह सभ्यता सब कुछ को सिर्फ एक ही दृष्टि से देखती है। उसके पास देखने का सिर्फ एक ही नजरिया है, सफलता का नजरिया। सफलता कैसे भी, किसी भी प्रकार, किसी भी कीमत पर सफलता। इसमें जो भी व्यक्ति जितना ही मानवीय मूल्यों से अपने को दूर रखेगा, मनुष्यता को छोड़ेगा, आदर्शों का त्याग करेगा, हमेशा अपने स्वार्थ के बारे में सोचेगा, वह उतना ही सफलता की ओर बढ़ेगा। सफल होने की अनिवार्य शर्त है, दूसरे को धक्का देना या प्रतियोगिता में पराजित करना। इस सभ्यता के ऐसे सफल व्यक्तियों को मुक्तिबोध घुग्घू, सियार, भूत, प्रेत, पिशाच तथा बेताल कहकर पुकारते हैं। इसकी सारी चमक-दमक ऐसे ही लोगों के लिए है- ‘इस सल्तनत में/ हर आदमी उचककर चढ़ जाना चाहता है,/ धक्का देते हुए बढ़ जाना चाहता है/ हर एक को अपनी-अपनी/ पड़ी हुई है।’

जिसके अंदर मनुष्यता होगी वह ऐसी सफलता का रास्ता नहीं चुनेगा। सूखे हुए कुओं पर, झुके हुए झाड़ों में/ बैठे हुए घुग्घुओं व चमगादड़ों के हित/ जंगल के सियारों और/ घनी-घनी छायाओं में छिपे हुए/ भूतों और प्रेतों तथा/ पिशाचों और बेतालों के लिए ही/ मनुष्यों के लिए नहीं- फैली यह/ सफलता की, भद्रता की, चांदनी’- सब कुछ सफलता की आंख से देखने के नजरिये को मुक्तिबोध यूरोपियन पूंजी की आंख से देखना कहते हैं- ‘अँधेरे के गुम्बजों-से वृक्षों पर/ बैठे हुए, यूरोपियन पूंजी की आंख से/ दुनिया को निहारकर’ यूरोपीय-अमेरिकन पूंजी की सभ्यता का यह नजरिया मेहनतकश जनता को पशुओं का झुण्ड समझता है।

इन मूक पशुओं को नोचना-खसोटना ही इसका काम है। इसके लोग कौओं-चीलों की तरह जनता पर टूट पड़ते हैं। उसको नोच-नोचकर खा जाते हैं। उन्हें हड्डियों की ठठरी में तब्दील कर देते हैं- ‘जनता को ढोर समझ/ ढोरों की पीठ भरे/ घावों में चोंच मार/ रक्त भोज, मांस-भोज/ करते हुए गर्दन मटकाते दर्प-भरे कौओं-सा/ भूखी अस्थि-पंजर शेष/ रंभाती हुई, अकुलाती गौओं-सा’ यह सभ्यता पूरी दुनिया को बाजार समझती है, जहां मनुष्यों को खरीदा-बेचा जाता है। लूटा-खसोटा जाता है, उनका रक्त चूसा जाता है- ‘दुनिया का हाट समझ/ जन-जन के जीवन का/ मांस काट/ रक्त-मांस विक्रय के/ प्रदर्शन की प्रतिभा का/ नया ठाठ’।

सभ्यता के इस बाजार में दया, माया, ममता तथा करुणा के लिए कोई स्थान नहीं है। यह निर्मम और निष्ठुर सभ्यता है- ‘यह दया-माया बहिष्कृत है यहां/ इस रेस्तरां का नाम मानवता हुआ’। आज तो यह सभ्यता धरती के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन चुकी है। आज के इस यथार्थ को बीज रूप में मुक्तिबोध बहुत पहले ही देख चुके थे, उन्होंने इसके बारे में कहा कि- ‘मुट्ठी में भींचने/ जहरीली घनघोर लपटों की छाती पर/ मृत्यु की गोद में पृथ्वी को खींचने!!’- मनुष्यों के विवेक तथा चेतना को मार कर ही यह सभ्यता विकसित हुई, मरे हुए मनुष्यों की हड्डियों की राख पर यह सभ्यता टिकी हुई है। इसी के चलते भू से नभ तक अंधेरे का राज हो गया है- ‘इसीलिए आजकल/ दिन के उजाले में भी अंधेरे की साख है/ इसीलिए संस्कृति के मुख पर/ मनुष्यों की अस्थियों की राख है’।

मुक्तिबोध इस मनुष्य विरोधी सभ्यता की कैद से सबको निकालना चाहते हैं, क्योंकि इसी में मनुष्य जाति का भविष्य है- ‘जबकि सभ्यता एक अंधेरी/ भीम भयानक जेल/ तोड़ो जेल, भगाओं सबको, भागो खुद भी!!

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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