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जयंती पर विशेष: टैगोर की दृष्टि में, देशभक्ति और राष्ट्रवाद

गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का व्यक्तित्व अंतरराष्ट्रीय था। बंगाल के कुछ बेहद सम्पन्न लोगों में उनका परिवार आता था। उनके बड़े भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर, देश के प्रथम हिंदुस्तानी आईसीएस थे। वे 1864 बैच के आईसीएस थे। अपने माता-पिता की आठ संतानों में एक टैगोर बांग्ला साहित्य और संगीत के शिखर पुरुषों में से एक थे। हम उन्हें उनके कविता संग्रह गीतांजलि पर मिले नोबेल पुरस्कार से अधिक जानते हैं पर टैगोर ने गोरा, नौका डूबी जैसे बेहद लोकप्रिय और खूबसूरत उपन्यास भी लिखे हैं। रवींद्र संगीत के नाम से बांग्ला का सबसे लोकप्रिय संगीत भी उन्हीं की यश गाथा कहता है।

टैगोर भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सीधे तो नहीं शामिल हुए पर अपने विख्यात शिक्षा केन्द्र शांतिनिकेतन जो अब विश्वभारती विश्वविद्यालय के रूप में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, के माध्यम से देश के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहे। महात्मा गांधी को, महात्मा नाम, टैगोर ने ही दिया था। और कहते हैं टैगोर को गुरुदेव नाम से सबसे पहले गांधी ने ही पुकारा था।

देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर टैगोर के विचार इन दोनों की परंपरागत परिभाषा से कुछ हट कर हैं। 1908 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की राष्ट्रवाद पर अपनी आलोचना का जवाब देते हुए टैगोर ने कहा था,

” देशभक्ति मेरे लिये मेरा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकता है। मैं हीरे की कीमत में, शीशा नहीं खरीद सकता हूँ। जब तक मेरा जीवन है मैं मनुष्यता के ऊपर देशभक्ति की जीत हावी नहीं होने दूंगा। “

यह पत्र 1997 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक टैगोर के चुने हुये पत्र में संग्रहीत है।

” जब तक मैं जिंदा हूं, मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत हावी नहीं होने दूंगा.’

यह बयान अगर आज कोई भी देता, या खुद टैगोर ही जीवित रहते और कह देते, तो उन्हें  तुरंत आज़ादी की लड़ाई में खामोश रहने वाले तबके के समर्थक नव देशभक्त  पाकिस्तान भेजने का फरमान जारी कर देते। लेकिन टैगोर ने यह बात खुल कर कही थी। उन्होंने भारतीय समाज, संस्कृति और परंपरा में खुल कर कहने की प्रथा का ही अनुसरण किया था। सौ साल पहले कही गयी उनकी बात पर बौद्धिक बहस तो हुई, पर उन्हें कोसा नहीं गया, वे निंदित नहीं हुए और उनका मज़ाक़ नहीं उड़ाया गया।

ग़ुलाम भारत और ब्रिटिश उपनिवेश की किसी भी संवैधानिक अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार जैसी किसी चीज के न होते हुए भी भारतीय परंपरा में अपनी बात कहने और तर्क-वितर्क करने की जो स्वाभाविक परंपरा आदि काल से हमें प्राप्त है, और वर्तमान अभिव्यक्ति की अवधारणा जैसी पाश्चात्य अवधारणा के बहुत पहले से भारतीय जन मानस में व्याप्त है के अनुसार उन्होंने अपनी बात कही थी ।

नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने एक बेहद विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी है ‘ द आरगुमेंटेटिव इंडियन ‘ । यह पुस्तक उनके द्वारा समय समय पर लिखे गए, लेखों का एक संकलन है । इसमें उन्होंने भारतीय तर्क पद्धति और तर्क परंपरा का इतिहास खंगालने की कोशिश की है। अमर्त्य सेन ने इस किताब में टैगोर से संबंधित एक अध्याय ‘टैगोर और उनका भारत’ में टैगोर के राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जुड़ी बातें और उनके विचार  बताये हैं, जो सामाजिक कार्यकर्ता और पादरी सी एफ एंड्रूज के हवाले से समय समय पर कहे गए हैं। राष्ट्रवाद के बारे में टैगोर की अवधारणा आजकल की राष्ट्रवादी अवधारणा जो एक प्रकार की प्रथम विश्वयुद्ध के बाद इटली और जर्मनी मॉडल से उपजी राष्ट्रवाद की अवधारणा है, से बिल्कुल उलट है। यही नहीं यह भारतीय वांग्मय में वर्णित राष्ट्रवाद की अवधारणा से भी बिलकुल अलग है।

उक्त लेख में टैगोर, सीएफ एंड्रयूज़ और गांधी जी के बीच होने वाले अनेक रोचक वार्तालाप का उल्लेख है जिसमे टैगोर के राष्ट्रवाद का पूरा खाका मिलता है। एंड्रूज, महात्मा गांधी और टैगोर के करीबी मित्रों में से एक थे, लेकिन गांधी और टैगोर के विचार एक दूसरे से अलग थे। टैगोर मानते थे कि देशभक्ति चारदीवारी से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है, साथ ही दूसरे देशों की जनता के दुख दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है। वह अपने लेखन में राष्ट्रवाद को लेकर आलोचनात्मक नजरिया रखते थे। यह भी एक संयोग है कि अमर्त्य सेन का जन्म शांतिनिकेतन में हुआ था, और उनका नामकरण, गुरुदेव टैगोर ने ही किया था।

टैगोर ने 1916-17 के कालखंड में, जापान और अमेरिका की यात्रा के दौरान राष्ट्रवाद पर कई वक्तव्य दिए थे, जो उनकी राष्ट्रवाद पर लिखी पुस्तक के रूप में सामने आये। इसमें 1917 में दिए गए एक भाषण में टैगोर ने कहा था,

” राष्ट्रवाद का राजनीतिक और आर्थिक संगठनात्मक आधार उत्पादन में बढ़ोत्तरी और मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता हासिल करने का प्रयास है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः राष्ट्र की समृद्धि और राजनैतिक शक्ति में बढ़ोत्तरी करने में इस्तेमाल की गई है। शक्ति की बढ़ोत्तरी की इस संकल्पना ने देशों में पारस्परिक द्वेष, घृणा और भय का वातावरण बनाकर मानव जीवन को अस्थिर और असुरक्षित बना दिया है।

यह सीधे-सीधे जीवन से खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग बाहरी संबंधों के साथ ही राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है। ऐसी स्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे में समाज और व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप हासिल कर लेता है। दुर्बल और असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करने की कोशिश राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है। इससे पैदा हुआ साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है। “

भारत के संदर्भ में टैगोर ने लिखा है,

” भारत की समस्या राजनैतिक नहीं सामाजिक है। यहां राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। हकीकत तो ये है कि यहां पर पश्चिमी देशों जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक काम में अपनी रूढ़िवादिता का हवाला देने वाले लोग जब राष्ट्रवाद की बात करें तो वह कैसे प्रसारित होगा? भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता छोड़कर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। “

टैगोर ने हमेशा नेशन स्टेट (राष्ट्र-राज्य) संकल्पना की आलोचना की है। उन्होंने उसे ‘यह शुद्ध यूरोप की देन है’ ऐसा कहा है। अपने 1917 के ‘नेशनलिज्म इन इंडिया’ नामक निबंध में उन्होंने साफ़ तौर पर लिखा है कि,

” राष्ट्रवाद का राजनीतिक एवं आर्थिक संगठनात्मक आधार सिर्फ उत्पादन में वृद्धि तथा मानवीय श्रम की बचत कर अधिक संपन्नता प्राप्त करने का यांत्रिक प्रयास इतना ही है। राष्ट्रवाद की धारणा मूलतः विज्ञापन तथा अन्य माध्यमों का लाभ उठाकर राष्ट्र की समृद्धि एवं राजनीतिक शक्ति में अभिवृद्धि करने में प्रयुक्त हुई है। शक्ति की वृद्धि की इस संकल्पना ने राष्ट्रों मे पारस्परिक द्वेष, घृणा तथा भय का वातावरण उत्पन्न कर मानव जीवन को अस्थिर एवं असुरक्षित बना दिया है। यह सीधे सीधे जीवन के साथ खिलवाड़ है, क्योंकि राष्ट्रवाद की इस शक्ति का प्रयोग वाह्य संबंधों के साथ-साथ राष्ट्र की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित करने में भी होता है। ऐसी परिस्थिति में समाज पर नियंत्रण बढ़ना स्वाभाविक है। फलस्वरूप, समाज तथा व्यक्ति के निजी जीवन पर राष्ट्र छा जाता है और एक भयावह नियंत्रणकारी स्वरूप प्राप्त कर लेता है। “

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसी आधार पर राष्ट्रवाद की आलोचना की है। उनके अनुसार,

” राष्ट्र के विचार को जनता के स्वार्थ का ऐसा संगठित रूप माना है, जिसमें मानवीयता तथा आत्मत्व लेशमात्र भी नहीं रह पाता है। दुर्बल एवं असंगठित पड़ोसी राज्यों पर अधिकार प्राप्त करने का प्रयास यह राष्ट्रवाद का ही स्वाभाविक प्रतिफल है। इस से उपजा साम्राज्यवाद अंततः मानवता का संहारक बनता है। राष्ट्र की शक्ति में वृद्धि पर कोई नियंत्रण स्वंभव नहीं, इसके विस्तार की कोई सीमा नहीं। उसकी इस अनियंत्रित शक्ति में ही मानवता के विनाश के बीज उपस्थित हैं। राष्ट्रों का पारस्परिक संघर्ष जब विश्वव्यापी युद्ध का रूप धारण कर लेता है, तब उसकी संहारकता के सामने सब कुछ नष्ट हो जाता है। यह निर्माण का मार्ग नहीं, बल्कि विनाश का मार्ग है। “

राष्ट्रवाद की यह अवधारणा किस तरह शक्ति के आधार पर विभिन्न मानवी समुदायों में वैमनस्य तथा स्वार्थ उत्पन्न करती है, इस बात को उजागर करता रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह मौलिक चिंतन समूचे विश्व के लिए एक अमूल्य योगदान है।

क्या भारत के लिए राष्ट्रवाद विकल्प बन सकता है ? इस विषय पर चर्चा करते हुये टैगोर कहते हैं,

” भारत में राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। वास्तव में भारत में यूरोप जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक कार्यों में रूढ़िवादिता का पालन करने वाले यदि राष्ट्रवाद की बात करें तो राष्ट्रवाद कहां से प्रसारित होगा? उस ज़माने के कुछ राष्ट्रवादी विचारक स्विट्जरलैंड ( जो बहुभाषी एवं बहुजातीय होते हुए भी राष्ट्र के रूप में स्थापित है) को भारत के लिए एक अनुकरणीय प्रतिरूप मानते थे।”

लेकिन रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह विचार था कि

” स्विट्जरलैंड तथा भारत में काफी अंतर एवं भिन्नताएं हैं। वहां व्यक्तियों में जातीय भेदभाव नहीं है और वे आपसी मेलजोल रखते हैं तथा सामाजिक अन्तर्सम्बन्ध सामान्य रूप से हैं, क्योंकि वे अपने को एक ही रक्त के मानते हैं। लेकिन भारत में जन्माधिकार समान नहीं है। जातीय विभिन्नता तथा पारस्परिक भेद भाव के कारण भारत में उस प्रकार की राजनीतिक एकता की स्थापना करना कठिन दिखाई देता है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत आवश्यक है। समाज द्वारा बहिष्कृत होने के भय से भारतीय डरपोक एवं कायर हो गए हैं। जहाँ पर खान-पान तक की स्वतंत्रता न हो, वहां राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ कुछ व्यक्तियों का सब पर नियंत्रण ऐसा ही होकर रहेगा। इस से निरंकुश राज्य ही जन्म लेगा और राजनैतिक जीवन में विरोध अथवा मतभेद रखने वाले का जीवन दूभर हो जाएगा। क्या ऐसी नाम मात्र स्वतंत्रता के लिए हम अपनी नैतिक स्वतंत्रता को तिलांजलि दे दें ? “

संकीर्ण राष्ट्रवाद के विरोध में वे आगे लिखते हैं कि

” राष्ट्रवाद जनित संकीर्णता यह मानव की प्राकृतिक स्वच्छंदता एवं आध्यात्मिक विकास के मार्ग में बाधा है। ऐसा राष्ट्रवाद  युद्धोन्मादवर्धक एवं समाज विरोधी ही होगा। क्योंकि राष्ट्रवाद के नाम पर राज्य द्वारा सत्ता की शक्ति का अनियंत्रित प्रयोग अनेक अपराधों को जन्म देता है। “

उनके इसी पुस्तक के अनुसार, व्यक्ति को राष्ट्र के प्रति समर्पित कर देना उन्हें कदापि स्वीकार नहीं था। राष्ट्र के नाम पर मानव संहार तथा मानवीय संगठनों का संचालन उन के लिए असहनीय था। उन के विचार में राष्ट्रवाद का सब से बड़ा खतरा यह है कि

” मानव की सहिष्णुता तथा उसमें स्थित नैतिकताजन्य परमार्थ की भावना राष्ट्र की स्वार्थपरायण नीति के चलते समाप्त हो जाएंगे। ऐसे अप्राकृतिक एवं अमानवीय विचार को राजनैतिक जीवन का आधार बनाने से सर्वनाश ही होगा।”

इसी लिए टैगोर ने राष्ट्र की धारणा को भारत के लिए ही नहीं, अपितु विश्वव्यापी स्तर पर अमान्य करने का आग्रह रखा था। वे मानते थे कि

“भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता को छोड़ अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। आर्थिक रूप से भारत भले ही पिछड़ा हो, मानवीय मूल्यों में पिछड़ापन उसमें नहीं होना चाहिए। निर्धन भारत भी विश्व का मार्ग दर्शन कर मानवीय एकता में आदर्श को प्राप्त कर सकता है। भारत का इतिहास यह सिद्ध करता है कि भौतिक संपन्नता की चिंता न कर भारत ने आध्यात्मिक चेतना का सफलतापूर्वक प्रचार किया है “

टैगोर के राष्ट्रवाद पर यह लेख, उनकी पुस्तक नेशनलिज़्म इन इंडिया और अमर्त्य सेन की पुस्तक द आरगुमेंटेटिव इंडियन में लिखे गए उनके विचारों पर आधारित है। 1916-17 का काल दुनिया में युद्धों का काल था। उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी ताकतें अपने वर्चस्व के लिये लड़ रही थीं। दुनिया मे अफरातफरी मची तो थी, पर उतनी नहीं जितनी 1939 से 45 के बीच हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मची थी।

हो सकता है इसका एक कारण यह भी हो कि संहार के युद्धक उपकरण प्रथम विश्वयुद्ध तक उतने नहीं आविष्कृत हो सके हों। युद्ध में सत्ता लड़ती है और जनता मरती है। यह एक कटु सत्य है। आप दुनिया भर के युद्धों के इतिहास का अध्ययन करेंगे तो मेरी बात से सहमत होंगे। ऐसा ही प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी हुआ। अगर कोई तीसरा इस स्केल का युद्ध होगा तो उसमें क्या होगा, इसकी कल्पना ही भयावह है। क्या पता उसका इतिहास लिखने के लिये कोई व्यास बचेगा भी कि नहीं।

यह भी एक संयोग ही है कि जिस राष्ट्रवाद को 1917 में, टैगोर मानवता के लिये खतरा बता रहे थे, उसी खतरे के फलस्वरुप 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया। पर टैगोर, 6 अगस्त 1945 को हुई हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी देखने और सुनने के लिये जीवित नहीं रहे, उसके पहले ही उनका निधन हो गया था।

आज हम फिर उसी आक्रामक राष्ट्रवाद की चपेट में हैं। यह राष्ट्रवाद का वह चेहरा नहीं है जो हम अपने महान स्वाधीनता संग्राम के दौरान जन गण मन में देख चुके हैं। यह राष्ट्रवाद का वह चेहरा है जो यूरोपीय तानाशाही से भरी श्रेष्ठतावाद और मिथ्या तुच्छता के प्रति अपार और हिंसक घृणा से भरा पड़ा है। जो युयुत्सु है। जन विरोधी है। अनुदार है। और जिसका अंत महाविनाश के रूप में हो चुका है, उसी की पुनरावृत्ति है। ग्रह तो बहुत से है।

पृथ्वी भी एक ग्रह ही है। पर इसका महत्व इसकी निर्झरता, शस्यश्यामला, हरीतिमा, इस धरती पर विचरने वाले जीव, जंतु, वनस्पतियों और मनुष्यों पर टिका है। राष्ट्र एक भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं है कि सब कुछ मिडास की तरह स्वर्ण की लालसा में जड़ बना दिया जाए। राष्ट्र उसके नागरिकों, नागरिकों के सुख और उनके जीवन स्तर, बौद्धिक विकास और सुख तथा प्रसन्नता के मापदंड पर आधारित है। टैगोर की यही अवधारणा है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on May 7, 2020 12:58 pm

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