Sunday, May 22, 2022

पुण्यतिथि पर विशेष: भारतीय सिनेमा, शरतचंद्र और ऑल टाइम क्लासिक ‘देवदास’

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सौ बरस से ज़्यादा उम्र के हिंदी सिनेमा में साहित्यिक कृतियों पर अनेक कामयाब फ़िल्में बनी हैं। कथा सम्राट प्रेमचंद की कृतियों पर ‘गबन’, ‘गोदान’ और ‘शतरंज के ख़िलाड़ी’, विमल मित्र के उपन्यास पर ‘साहिब, बीबी और ग़ुलाम’, फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर ‘तीसरी कसम’, पर्ल एस बक के उपन्यास ‘द गुड अर्थ’ पर महबूब खान की ‘औरत’ और ‘मदर इंडिया’, अमृता प्रीतम के उपन्यास ‘पिंजर’ पर चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म ‘पिंजर’ मगर इन सबसे ऊपर साल 1917 में लिखे गए शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के कालजयी उपन्यास ‘देवदास’ में बात ही कुछ ऐसी है कि इस उपन्यास पर कमोबेश सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में फ़िल्म बन चुकी है।

हिंदी और बांग्ला के अलावा इस उपन्यास पर तमिल, तेलुगु और असमिया भाषा में भी फ़िल्म बनी है। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगी कि उपन्यास का हिंदी अनुवाद, फ़िल्म प्रदर्शित होने के बाद प्रकाशित हुआ था। फ़िल्म हिट होने के बाद उपन्यास ‘देवदास’ की मांग पाठकों में बहुत ज्यादा बढ़ गई। उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय अपने दौर में दीगर बांग्ला लेखकों बंकिमचंद्र चटर्जी, रबीन्द्रनाथ टैगोर से भी ज़्यादा लोकप्रिय लेखक थे। महाकवि रबीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर रोमां रोलां तक ने उन्हें आला दर्जे का लेखक माना था।

‘देवदास’ पर बांग्ला भाषा में छह बार, तो हिंदी में चार बार फ़िल्म बनी। इस उपन्यास को सबसे पहले साल 1928 में बांग्ला निर्देशक नरेश मित्रा ने सेल्युलाईड से फ़िल्म के पर्दे पर उतारा। इस कृति को पूरे देश में उस वक़्त मक़बूलियत हासिल हुई, जब निर्देशक पीसी बरुआ ने साल 1935 में इसे निर्देशन के लिए चुना। गायक-अभिनेता केएल सहगल इस फ़िल्म से मानो देवदास के पर्याय बन गए। उनके द्वारा गाये विरह के गीत, हर टूटे हुए प्रेमी की आवाज़ हो गए। संगीतकार तिमिर बरन का संगीत और गायक केएल सहगल के गाये इन गीतों ‘बालम आय बसो मोरे मन में’, ‘दुख के दिन अब बीतत नाहीं’ और ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन’ ने उस वक़्त पूरे देश में धूम मचा दी। इस फ़िल्म के पूरे बीस साल बाद यानी साल 1955 में आई जीनियस निर्देशक बिमल रॉय की ‘देवदास’।

बिमल रॉय ने अपनी फ़िल्म में उर्दू के दो बड़े साहित्यकारों को और जोड़ा। कथाकार राजिंदर सिंह बेदी ने इस फ़िल्म के संवाद लिखे, तो शायर साहिर लुधियानवी ने गीत। ‘देवदास’ के किरदार में थे, अभिनय सम्राट दिलीप कुमार। दिलीप कुमार ने अपनी अदाकारी से ‘देवदास’ के किरदार को बुलंदियों पर पहुंचा दिया। अपनी माशूक से बिछुड़ने के ग़म व शराब के नशे में डूबे किरदार को पर्दे पर उन्होंने कुछ इस तरह से साकार किया कि इस फ़िल्म से फ़िल्मी दुनिया में उन्हें ट्रेजडी किंग की उपाधि मिल गई। पूरे सैंतालिस साल बाद यानी साल 2002 में हिंदी सिनेमा में एक बार फिर ‘देवदास’ वापस लौटा। इस मर्तबा ‘देवदास’ को फ़िल्मी पर्दे पर उतारा निर्देशक संजय लीला भंसाली ने और ‘देवदास’ बने शाहरुख़ ख़ान। यह बात अब पुरानी हो चुकी है कि यह फ़िल्म भी ‘देवदास’ श्रंखला की दीगर फ़िल्मों की तरह टिकिट खिड़की पर सुपर हिट साबित हुई।

एक टूटे हुए कायर प्रेमी की त्रासद प्रेम कहानी ‘देवदास’ को दर्शकों से हमेशा प्यार मिला। जीवनपर्यंत असफलता की मूरत रहा ‘देवदास’, फ़िल्मी पर्दे पर निर्माताओं के लिए सफलता की चाबी बन गया। ‘देवदास’ के किरदार में कुछ ऐसी बातें समाहित हैं, जो इस उपन्यास को कालजयी बनाती हैं। अगर हर दौर का नौजवान ‘देवदास’ को पसंद करता है, तो कहीं न कहीं इस किरदार में कुछ तो ऐसी बात है, जो उसे आकर्षित करती है। आज जब प्रेम, वासना में बदल गया हो। वहां निःस्वार्थ, निष्कपट व मूक प्रेम की अभिव्यक्ति और प्रेम में नाकाम होने पर अपनी पूरी हस्ती शराब में डुबो, मिटा देने की प्रवृत्ति विरले ही देखने को मिलती है। ‘देवदास’ लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का शुरुआती उपन्यास है।

उस समय शरत दा ‘मझली दीदी’, ‘परिणीता’ और ‘स्वामी’ जैसी पारिवारिक कहानियां लिख रहे थे। ‘देवदास’ जब लिखा गया, उस वक़्त उनकी उम्र बमुश्किल अठारह साल रही होगी। ज़ाहिर है किशोर उम्र के प्रेम की तीव्र अनुभूति अगर इस उपन्यास में हमें देखने को मिलती है, तो यह स्वाभाविक भी है। ‘देवदास’ का जिस तरह से चरित्र गढ़ा गया, वह हिंदी फ़िल्मों के लिए आज भी आकर्षित करता है। एक विद्रोही नौजवान, जो अपने प्यार में नाकाम होने पर ख़ुद अपने आत्मपतन का रास्ता चुनता है। देवदास विद्रोही तो है पर अपने प्रति, ना कि समाज और व्यवस्था के प्रति। यह मनोवृत्ति उस दौर के नौजवान के मन को प्रतिबिम्बित करती है। वह आत्मपीड़क है, परपीड़क नहीं। बचपन का चंचल शरारती बच्चा बड़ा होकर एकाकी, आत्मसंकोची, अंतर्मुखी देवदास बन जाता है। वह मूलतः अंतर्मुखी है और हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहता है। उपन्यास की शुरुआत पाठशाला से होती है। जहां बालक देवदास कहता है-‘‘हिसाब नहीं हो रहा ?’’

‘‘कौनसा हिसाब ?’’

‘‘मन सेर और छटांक वाला !’’

देवदास हिसाब में तो कमजोर है ही, ज़िंदगी के गणित से भी अनभिज्ञ है। उसे धन-दौलत का भी कोई मोह नहीं। छेड़छाड़ और बाल्यकाल की सहज सुलभ प्रवृत्तियों से होता हुआ, देवदास और पारो का प्रेम उस समय प्रकट होता है, जब पारो का विवाह हाथीपोता गांव के जमींदार के साथ तय होता है। जिनकी उम्र 40 साल से ऊपर है। देवदास जब यह बात सुनता है, तो बेचैन हो उठता है। यहीं उसे पारो के प्रति प्रेम का पहली बार एहसास होता है। रात के अंधेरे में पारो, चोरी छिपे देवदास के कमरे में अपना सर्वस्व लुटाने और उसके साथ भाग जाने के लिए आती है, पर देवदास के सामने परिवार के संस्कार और मान-मर्यादा आड़े आ जाती है। देवदास, पारो की यह पेशकश ठुकरा देता है और कलकत्ता चला जाता है। कलकत्ता से पारो के नाम भेजे गए पत्र में भी वह परिवार और समाज के रीति-रिवाजों और आदर्शों की दुहाई दे, पारो से ख़ुद को भूल जाने को कहता है। कुछ दिन बाद ही उसे पारो की याद सताने लगती है। देवदास, पारो से मिलता है, लेकिन इस बार स्वाभिमानी और गुणी पारो, देवदास का विवाह प्रस्ताव ठुकरा देती है। पारो का यही इंकार, देवदास को शराब में डुबा देता है।

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में नारी पात्रों और उनकी समस्याओं को जिस संवेदनात्मक तरीके से उठाया है, साहित्य आलोचकों ने उन्हें फेमिनिस्ट साहित्यकार घोषित कर दिया। आलोचकों का कहना है कि वे मूलतः नारी वेदना के लेखक हैं। आलोचकों की यह राय, किसी हद तक सही भी है। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के लेखनकाल में, देश नवजागरण के दौर से गुज़र रहा था। राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारक समाज में व्याप्त कुरीतियों, स्त्री की सामाजिक, आर्थिक स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए लड़ रहे थे। भारतीय समाज में बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह, छुआ-छूत, ऊंच-नीच आदि सामाजिक कुरीतियां चरम पर थीं। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने यायावरी जीवन में हर जगह की महिलाओं को करीब से देखा और जाना-समझा। उन्हें महिलाओं की दशा हर जगह एक सी दिखी।

उनके उपन्यासों में यदि स्त्री चरित्र इतनी जीवटता और प्रखरता से आए हैं, तो यह महिलाओं के प्रति उनकी संवेदनाओं को ही दर्शाता है। ‘ग्रामीण समाज’, ‘गृहदाह’, ‘श्रीकांत’, ‘चरित्रहीन’, ‘स्वामी’ आदि शरत दा के सभी उपन्यासों में महिलाएं ही मुख्य पात्र हैं। उस दौर में महिलाओं की समाज में जो स्थिति और उनकी समस्याएं थीं, अपने उपन्यासों में उन्होंने इन सब बातों को बहुत ही आक्रामकता से उठाया है। ‘देवदास’ में भी उन्होंने, पारो का किरदार बेहद सूक्ष्मता से गढ़ा है। पारो स्वाभिमानी है। गंभीर है और उसे अपने कर्त्तव्यों का पूरी तरह से एहसास है। एक बार देवदास से नाता टूट जाने के बाद, वह अपने परिवार में पूरी तरह डूब जाती है। अपने अनचाहे, बेमेल विवाह और देवदास से अथाह प्यार करने के बावजूद वह अपने कर्त्तव्यों से विमुख नहीं होती। देवदास के पिता की मृत्यु के बाद, जब देवदास पारो का पुनर्मिलन होता है, तो देवदास पारो से भाग चलने के लिए कहता है। तब भी पारो का जवाब, ना ही होता है।

देवदास-पारो की प्रेम कहानी निष्पाप और निःस्वार्थ है। इस प्रेम कहानी में एक तीसरा कोण भी है, वह है वेश्या चंद्रमुखी। जो देवदास से एकतरफ़ा प्यार करती है और प्यार के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए तैयार है। चंद्रमुखी को प्यार का पहला एहसास, देवदास से मिलने के बाद होता है। देवदास-पारो और चंद्रमुखी का यह प्रेम त्रिकोण भी फ़िल्मी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करता है। सच बात तो यह है कि उपन्यास ‘देवदास’ ने ही हिंदी फ़िल्मों को सबसे पहले प्रेम त्रिकोण विषय दिया। ‘देवदास’ के बाद आई कई हिट फिल्मों में यह प्रेम त्रिकोण फार्मूला बार-बार भुनाया गया। ‘अंदाज़’, ‘संगम’, ‘कभी-कभी’, ‘सिलसिला’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘साजन’ जैसी अनगिनत फ़िल्मों का अहम कंटेंट प्रेम त्रिकोण ही है। कुल मिलाकर ‘देवदास’ पहले भी फ़िल्मी दुनिया में ट्रेंड—सेटर थी, और आज भी है।

उपन्यास ‘देवदास’ का अंत काफी करुण और मर्मस्पर्शी बन पड़ा है। पारो से अंतिम बार मिलने की आस में ज़िंदगी और मौत से जूझते हुए देवदास का बैलगाड़ी से पारो के घर तक का सफ़र असहनीय और अविस्मरणीय है। ज़िंदगी की एक-एक कड़ी को थामते देवदास के सामने अपनी मां, पारो और चंद्रमुखी के चेहरे एक के बाद एक सामने आते-जाते हैं। तीनों के जीवन की दुर्दशा के लिए वह खु़द को ज़िम्मेदार मानता हुआ, अंतिम प्रायश्चित्त के लिए चल पड़ा है। यही वह सीन है, जब पाठक और दर्शक पूरी तरह देवदास से जुड़ जाते हैं। पाठकों, दर्शकों के बीच अभी तक ख़लनायक बना देवदास, नायक बन जाता है। उनकी सहानुभूति, सहृदयता देवदास को मिल जाती है। यही उपन्यासकार की सबसे बड़ी जीत है। किशोर प्रेम, प्रेम त्रिकोण, संयुक्त परिवार, विद्रोही नायक, अमीर हीरो-गरीब हीरोइन और इन सबसे बढ़कर शानदार क्लाइमेक्स उपन्यास में समाहित यही सब कारक ‘देवदास’ को फ़िल्मी दुनिया में अमर करते हैं। ‘देवदास’ पर अब तक कई फ़िल्में बन चुकी हैं और कोई तअज्जुब की बात नहीं कि कुछ साल बाद दर्शक एक बार फ़िर, नये देवदास को फ़िल्मी पर्दे पर गाते हुए देखें ‘‘दुख के दिन बीतत नाहीं।’’

(वरिष्ठ पत्रकार जाहिद खान लेखक और समीक्षक हैं। आप आजकल एमपी के शिवपुरी में रहते हैं।)

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