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26 जुलाई 1902 : भारतीय समाज का लोकतंत्रीकरण दिवस

26 जुलाई, 1902 को कोल्हापुर के शासक छत्रपति शाहू जी महाराज ने अपने कोल्हापुर राज्य की सरकारी नौकरियों में सभी सोपानों पर पिछड़े वर्ग (अर्थात ब्राह्मण, कायस्थ और पारसी को छोड़कर सभी समुदायों) के लिए 50 प्रतिशत पदों को आरक्षित किया। यह आरक्षण तब तक लागू रहना था जब तक कि सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुसार सरकारी नौकरियों में पूर्ण नहीं हो जाता। भारतीय संविधान में भी आरक्षण की इसी अवधारणा को समाहित किया गया है। समाज को लोकतांत्रिक बनाने की प्रक्रिया शासन और प्रशासन को लोकतांत्रिक बनाने के पश्चात प्रारंभ होती है। इसलिए 26 जुलाई 1902 की तिथि भारतीय इतिहास में मील का पत्थर है। विशेषकर उनके लिए जो यह मानते हैं कि एक लोकतांत्रिक समाज में ही लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था सुचारु ढंग से कार्य कर सकती है।

लेकिन इस देश का ब्राह्मण समुदाय जो तीन-तिकड़म से भारत का बुद्धिजीवी वर्ग बना हुआ है अपने चरित्र में लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। वैसे तो यह समुदाय विदेशों में भारत के विशाल एवं जीवंत लोकतंत्र का गुणगान करता है क्योंकि इस तरह के गुणगान से वह विदेशों में अच्छी शिक्षा और नौकरी प्राप्त कर सकता है लेकिन उन्हीं लोकतांत्रिक सिद्धांतों का भारत में विरोध करता है क्योंकि यदि लोकतांत्रिक सिद्धांत भारत में लागू होगा तो भारत के शासन-प्रशासन पर से इनका विशेषाधिकार समाप्त हो जाएगा। इस समय इस पाखंडी चरित्र के सच्चे प्रतिनिधि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।

मोदी विदेश में जाते हैं तो कहते हैं कि मैं बुद्ध की भूमि से आया हूं लेकिन बुद्ध के जीवन-मूल्यों यथा करुणा और मैत्री में इनकी तनिक भी आस्था नहीं है। इस तरह के बुद्धिजीवी भारतीय समाज का लोकतंत्रीकरण नहीं चाहते हैं इसलिए न केवल वर्तमान में बल्कि इतिहास में भी ब्राह्मण समुदाय ने शासन और प्रशासन में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण नीति का विरोध किया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक विधान मंडलों में पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधियों के लिए आरक्षण के इतने विरोधी थे कि वे खुलेआम कहते थे कि ‘तेली, तमोली, कुर्मी विधानमंडलों में जाकर क्या हल चलायेंगे।’

ईस्ट इंडिया कंपनी राज और ब्रिटिश राज के समय में भी भारतीय प्रशासन में ‘ब्राह्मण कुलीन तंत्र’ स्थापित था जो लोकतंत्रीकरण के किसी भी प्रयास को अवरुद्ध कर देता था। शाहू जी महाराज ने अपने राज्य में ‘ब्राह्मण कुलीन तंत्र’ को तोड़ने के लिए सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए सभी सोपानों पर पद आरक्षित कर दिए। यह आधुनिक भारत के इतिहास में भारतीय समाज को लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में उठाया गया पहला और ठोस कदम था। इसके पूर्व कंपनी तथा क्राउन ने कई नियम बनाये थे लेकिन उनका प्रभाव उतना नहीं पड़ा। इसका कारण कंपनी तथा क्राउन के अधिकारियों में इच्छा शक्ति की कमी तथा ब्राह्मणों से डर था। इस डर का एक उदाहरण प्रस्तुत करना उचित होगा।

1856 में एक महार युवक ने धारवाड़ के सरकारी हाईस्कूल में प्रवेश प्राप्त करने के लिए जून माह में सरकार के पास निवेदन किया। उस समय बंबई सरकार ने उसको प्रवेश दिया जाए या नहीं, इसके विषय में दिशा निर्देश प्राप्त करने हेतु लंदन के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के साथ पत्र-व्यवहार किया। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर ने निर्णय दिया कि यदि इस महार युवक को प्रवेश दिया गया तो उच्च वर्ग के बच्चों के संरक्षक और मां-बाप यह समझकर अपने बच्चों को स्कूल से निकाल लेंगे कि धारवाड़ का हाईस्कूल भ्रष्ट हो गया है। परिणामतः महार युवक को प्रवेश नहीं दिया गया। ब्राह्मणों के डर से कंपनी सरकार ने महार युवक को पढ़ने से रोका। ऐसा नहीं है कि शाहू जी महाराज को ब्राह्मणों का डर नहीं था।

उस समय कांग्रेस के सबसे बड़े नेता बाल गंगाधर तिलक शाहू जी महाराज के धुर विरोधी थे। कांग्रेसी नेता शाहू जी के विरुद्ध उनकी प्रजा को ही भड़का देते थे। इस तथ्य का उल्लेख सितंबर 1918 में लार्ड सिडेनहम को लिखे एक पत्र में शाहू जी महाराज ने स्वयं किया है। लेकिन शाहू जी महाराज की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता एवं अगाध प्रेम के कारण उन्होंने अपने राज्य में पिछड़े वर्ग के लिए नौकरियों में आरक्षण तथा सभी के लिए निःशुल्क शिक्षा जैसे तमाम लोक कल्याणकारी कार्य किया। उन्होंने गैर ब्राह्मणों के लिए विधानमंडलों में भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सीटों को आरक्षित करने की भी मांग की।

ब्राह्मण बुद्धिजीवियों का तो समझ में आता है कि वे आरक्षण नीति के विरुद्ध हैं क्योंकि इससे भारत का शासन-प्रशासन ‘ब्राह्मण कुलीन तंत्र’ से परिवर्तित होकर ‘बहुजन लोकतंत्र’ के रूप में स्थापित हो जाएगा। इसलिए वे आरक्षण नीति के विरुद्ध विसंगतिपूर्ण तार्किक प्रणाली का सहारा लेते हैं। जैसे- आरक्षण बनाम योग्यता, आरक्षण का आधार आर्थिक हो, क्रिमी लेयर की अवधारणा लागू हो, आदि-आदि। लेकिन बहुजन बुद्धिजीवी जिनके समाज के हित में आरक्षण नीति को लागू किया गया, वे आरक्षण के पक्ष में संगतिपूर्ण तार्किक पद्धति को क्यों नहीं विकसित कर पाये। इसका सीधा सा उत्तर है- बहुजन बुद्धिजीवियों का फुले, शाहू जी महाराज, पेरियार रामास्वामी नायकर, आयोथी दास एवं डा. आंबेडकर के साहित्यों का गहन अध्ययन नहीं करना।

बहुजन महापुरुषों के साहित्यों का अध्ययन न करने के कारण बहुजन साहित्य के स्थापित बुद्धिजीवी अभी तक आरक्षण के पक्ष में मजबूत जनमत बनाने में असफल रहे हैं। कोई कहता है कि दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों को आरक्षण उनको मुख्यधारा में लाने के लिए दिया गया है। कोई कहता है कि सामाजिक उत्थान के लिए दिया गया है। कोई कहता है कि गरीबी के कारण दिया गया है। कोई इसकी तुलना अमेरिका की अफरमेटिव एक्शन नीति से करता है। जबकि भारत में आरक्षण की मांग फुले ने उठायी और 1902 में छत्रपति शाहू जी ने लागू किया, तब अमेरिका में इसकी चर्चा तक नहीं थी।

आरक्षण नीति का उद्देश्य भारत की शासन प्रणाली को ‘ब्राह्मण कुलीनतंत्र’ से परिवर्तित कर ‘बहुजन लोकतंत्र’ बनाना है। यह उद्देश्य आरक्षण नीति के जनक शाहू जी महाराज ने लार्ड सिडेनहम को लिखे अपने पत्र में घोषित किया है। लेकिन बहुजन बुद्धिजीवियों ने शाहू जी महाराज के साहित्य को पढ़ने की जरूरत ही नहीं समझी। इसी पत्र में शाहू जी महाराज ने यह भी कहा है कि आरक्षण तब तक जारी रहेगा जब तक शासन-प्रशासन में समुदायों की जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं हो जाता है। अर्थात जिन प्रश्नों के उत्तर के लिए बहुजन बुद्धिजीवी इधर-उधर भटकते हैं तथा ऊल-जुलूल तर्क देते हैं उन सबका उत्तर बहुजन महापुरुषों के साहित्यों में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में वर्णित है।

हालांकि आरक्षण नीति, जो भारतीय समाज के लोकतंत्रीकरण की आधारशिला है, वह बहुजनों और लोकतंत्र के समर्थकों की विरासत भी है। दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों के हित में आरक्षण एवं सार्वभौम मताधिकार ही दो ऐसे अधिकार हैं जो बहुजनों को विरासत में मिले हैं, इसका प्रभाव सीमित है लेकिन अत्यधिक मारक है। एक आरक्षण नीति वर्ण-व्यवस्था के सभी दर्शनों की ऐसी-तैसी कर देती है। इसलिए ब्राह्मण आरक्षण नीति का न केवल विरोध करता है बल्कि चिढ़ता भी है।

इसलिए इसको निष्प्रभावी बनाने के लिए तरह-तरह के तीन-तिकड़म करता रहता है। लेकिन यह भी तथ्य है कि आरक्षण नीति को लागू कराने में बहुजन असफल हो रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण बहुजनों का अपने महापुरुषों के संघर्षों एवं साहित्यों से अनभिज्ञ होना है। बहुजनों को ब्राह्मणों के पाखंडपूर्ण चरित्र को उजागर करना होगा। इसके लिए बहुजन महापुरुषों के साहित्य का गहन अध्ययन आवश्यक है। 26 जुलाई को ‘भारतीय समाज का लोकतंत्रीकरण दिवस’ के रूप में मनाना एक ठोस कदम हो सकता है।

(डॉ. अलख निरंजन गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग से पी-एचडी हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन करते हैं। इनकी दो महत्वपूर्ण किताबें- ‘नई राह के खोज में समकालीन दलित चिंतक’ और ‘समकालीन भारत में दलित: विरासत, विमर्श विद्रोह’ प्रकाशित हैं।)

नोट: लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी हैं।

This post was last modified on July 26, 2020 7:45 pm

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