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जन्मदिन पर विशेष: हिंदुओं के धर्म, ईश्वर और जाति का विनाश क्यों चाहते थे राहुल सांकृत्यायन?

राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893-14 अप्रैल 1963) बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डेय, वैरागी साधु बनने पर नाम पड़ा राम उदार दास और बौद्ध धम्मानुयायी बनने पर नाम हो गया राहुल सांकृत्यायन। यह नाम परिवर्तन उनकी वैचारिक यात्रा को दर्शाता है। वह वेदान्ती, आर्य समाजी, बौद्ध मतावलंबी से होते हुए मार्क्सवादी बने और आजीवन साम्यवादी बुद्धिस्ट बने रहे। विद्रोही चेतना, न्याय बोध और जिज्ञासा वृत्ति ने पूरी तरह से ब्राह्मणवादी जातिवादी हिंदू संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया। फुले और आंबेडकर की तरह उन्हें जातिवादी अपमान का व्यक्तिगत तौर पर तो सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन सनातनी हिंदुओं की लाठियां जरूर खानी पड़ी।

राहुल सांकृत्यायन अपने अपार शास्त्र ज्ञान और जीवन अनुभवों के चलते हिंदुओं को सीधे ललकारते थे, उनकी पतनशीलता और जहालत को उजागर करते थे। उन्होंने अपनी किताबों में विशेषकर ‘तुम्हारी क्षय’ में हिंदुओं के समाज, संस्कृति, धर्म, भगवान, सदाचार, जात-पात के अमानवीय चेहरे को बेनकाब किया है। वे स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित एक उन्नत समाज का सपना देखते थे। उन्हें इस बात का गहराई से अहसास था कि मध्यकालीन बर्बर मूल्यों पर आधारित समाज और उसकी व्यवस्था का विध्वंस किए बिना नए समाज की रचना नहीं की जा सकती है।

वे साफ शब्दों में हिंदू समाज व्यवस्था, धर्म, जाति और उसके भगवानों के नाश का आह्वान करते हैं। उनका मानना था कि इनके नाश के बिना नए समाज की रचना नहीं की जा सकती है। वे हिंदू समाज व्यवस्था के सर्वनाश का आह्वान करते हुए कहते हैं कि “हर पीढ़ी के करोड़ों व्यक्तियों के जीवन को कलुषित, पीड़ित और कंटकाकीर्ण बनाकर क्या यह समाज अपनी नर-पिशाचा का परिचय नहीं देता है? ऐसे समाज के लिए हमारे दिल में क्या इज्जत हो सकती है, क्या सहानुभूति हो सकती है और भीतर से जघन्य, कुत्सित कर्म! धिक्कार है ऐसे समाज को!! सर्वनाश हो ऐसे समाज का!!!”

राहुल सांकृत्यायन की नजर में भारत के पतन और हजारों वर्षों की एक के बाद एक पराजय का कारण जात-पात का रोग है। ‘तुम्हारी जात-पात की क्षय’ में वे लिखते हैं- “पिछले हजार बरस के अपने राजनीतिक इतिहास को यदि हम लें तो मालूम होगा कि हिंदुस्तानी लोग विदेशियों से जो पददलित हुए, उसका प्रधान कारण जाति-भेद है, जो न केवल लोगों को टुकड़े-टुकड़े में बांट देता है, बल्कि साथ ही यह सबके मन से ऊंच-नीच का भाव पैदा करता हैं। ब्राह्मण समझता है, हम बड़े हैं, राजपूत छोटे हैं।

राजपूत समझता है, हम बड़े हैं, कहार छोटे हैं। कहार समझता है, हम बड़े हैं, चमार छोटे हैं। चमार सोचता है, हम बड़े हैं, मेहतर छोटे हैं और मेहतर भी अपने मन को समझाने के लिए किसी को अपने से छोटा कह ही लेता है। हिंदुस्तान में हजारों जातियां हैं और सब में यह भाव है।” अंत में वे कहते हैं कि निश्चय ही जात-पात का विनाश करने से ही हमारे देश का भविष्य उज्जवल हो सकता है।

राहुल सांकृत्यायन अपने अनुभव और अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि धर्म के आधार पर बंधुता पर आधारित मानवीय समाज की रचना नहीं की जा सकती है। चाहे वह कोई भी धर्म हो। वे ‘तुम्हारे धर्म की क्षय’ में लिखते हैं कि ‘पिछले दो हजार वर्षों का इतिहास बतला रहा है कि…महजबों ने एक दूसरे के ऊपर जुल्म के कितने पहाड़ ढाए… अपने-अपने खुदा और भगवान के नाम पर, अपनी-अपनी किताबों और पाखंडों के नाम पर मनुष्य के खून को उन्होंने (धर्मों)  पानी से भी सस्ता कर दिखलाया… हिंदुस्तान की भूमि भी ऐसी धार्मिक मतांधता का शिकार रही है… इस्लाम के आने से पहले भी क्या मजहब ने वेद मंत्र के बोलने और सुनने वालों के मुंह और कानों में पिघले रांगे और लाख नहीं भरे?

वे सांप्रदायिक दंगों के लिए भी मूल रूप से धर्म को ही जिम्मेदार ठहराते हुए लिखते हैं- “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’- इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना। अगर मजहब बैर नहीं सिखलाता तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क शामिल क्यों है? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिए, आज भी हिंदुस्तान के शहरों और गांवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा है? और कौन गाय खाने वालों को गोबर खाने वालों से लड़ा रहा है।

असल बात यह है कि ‘मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को सिखाता है भाई का खून पीना।’ हिंदुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसका, मौत को छोड़ कर इलाज नहीं है!”

धर्म जिस ईश्वर के नाम पर टिका है, जिसे वह सृष्टिकर्ता और विश्व का संचालक मानता है, राहुल उस ईश्वर के अस्तित्व से ही इंकार करते हैं। वे स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि ईश्वर अंधकार की उपज है। वे लिखते हैं- ‘जिस समस्या, जिस प्रश्न, जिस प्राकृतिक रहस्य को जानने में आदमी असमर्थ समझता था, उसी के लिए ईश्वर का ख्याल कर लेता था। दरअसल ईश्वर का ख्याल है भी तो अंधकार की उपज। अज्ञान का दूसरा नाम ही ईश्वर है।’ वे इस बात को बार-बार रेखांकित करते हैं कि अन्याय और अत्याचार को बनाए रखने का  शोषकों-उत्पीडितों का एक उपकरण है।

वे लिखते हैं, ‘अज्ञान और असमर्थता के अतिरिक्त यदि कोई और भी आधार ईश्वर-विश्वास के लिए है, तो वह धनिकों और धूर्तों की अपनी स्वार्थ-रक्षा का प्रयास है। समाज में होते अत्याचारों और अन्यायों को वैध साबित करने के लिए उन्होंने ईश्वर का बहाना ढूंढ लिया है। धर्म की धोखा-धड़ी को चलाने और उसे न्यायपूर्ण साबित करने के लिए ईश्वर का ख्याल बहुत सहायक है।’

हिंदुओं के आदर्श समाज रामराज्य और उसके नायक राम की चर्चा करते हुए राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं- “ हिंदुओं के इतिहास में राम का स्थान बहुत ऊंचा है। आजकल हमारे बड़े नेता, गांधी जी मौके-ब-मौके रामराज्य की दुहाई दिया करते हैं। वह रामराज्य कैसा होगा, जिसमें की बेचारे शंबूक की सिर्फ यही अपराध था कि वह धर्म कमाने के लिए तपस्या कर रहा था और उसके लिए राम जैसे अवतार और धर्मात्मा राजा ने उनकी गर्दन काट ली? वह रामराज्य कैसा रहा होगा, जिसमें किसी आदमी के कह देने मात्र से राम ने गर्भिणी सीता को जंगल में छोड़ दिया?”

हिंदुओं की सभ्यता एवं संस्कृति के मानव विरोधी अन्यायी चरित्र को उजागर करते हुए वे लिखते हैं- “हम संस्कृत है, हम सभ्य हैं- इस तरह अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से दुनिया हमें सभ्य नहीं मानेगी। हमारे जीवन का हर एक अंग जिस तरह कलुषित और दिखावट से भरा हुआ है, उस तरह की जाति ( मानव जाति) दुनिया में शायद ही कोई हो। अभी तक तो हमने आदमी की तरह रहना भी नहीं सीखा।”

निष्कर्ष रूप में अपनी किताब ‘तुम्हरी क्षय’ में राहुल सांस्कृत्यायन लिखते हैं कि हिंदू समाज व्यवस्था, धर्म, ईश्वर और जात-पात का विनाश किए बिना नए आधुनिक भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता है।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

This post was last modified on April 9, 2020 10:36 am

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