Wednesday, April 17, 2024

एक चर्चा इस पर कि भारत की दुनिया में असल हैसियत क्या है?

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने इस आम चुनाव में अपना प्रमुख एजेंडा “विकसित भारत” की कहानी को बनाया है। आज जबकि सत्ताधारी पार्टी, देश की राजनीति को नियंत्रित करने वाला कॉर्पोरेट जगत और उसके स्वामित्व वाले कॉर्पोरेट मीडिया के बीच समान हित बन गए हैं, तो लाजिमी ही है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा “विकसित भारत” के नैरेटिव को अलग-अलग कोण से परिवर्धित और प्रचारित करने की कोशिशों में जुटा रहता है। इस सिलसिले में विभिन्न मीडिया घरानों की तरफ से हाल में आयोजित कॉन्क्लेव्स का जिक्र किया जा सकता है। मोटे तौर पर उनका सबका थीम (विषय-वस्तु) रहा है- नरेंद्र मोदी काल में हो रहा कथित भारत उदय। मकसद इस कहानी को और वजन प्रदान करना रहा है।

इन चर्चाओं का कुल सार यह है कि भारत अपनी “तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था” के साथ उतनी ही तेजी से विश्व महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ रहा है। कई बार तो संदेश यह दिया जाता है कि अब दुनिया के सभी प्रमुख घटनाक्रमों के सूत्र भारत- यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में हैं। यह प्रचार इतना प्रभावी है कि बहुत से लोग- जो यह मानते हैं कि रोजी-रोटी के मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार विफल रही है या आम जन की समस्याएं इसके दस साल के शासनकाल में बढ़ी हैं, वे भी यह कहते सुने जाते हैं कि ‘लेकिन इस दौर में देश की इज्जत बढ़ी है।’

बेशक यह नैरेटिव फैलने के पीछे सबसे बड़ा कारण मेनस्ट्रीम मीडिया का दिन-रात इस प्रचार में जुटे रहना रहा है। लेकिन एक बड़ा कारण यह भी है कि विपक्ष के पास विदेश नीति संबंधी अपनी कोई कहानी नहीं है। नतीजतन, आम जन के पास तथ्यों और हकीकत की रोशनी में मोदी सरकार के दावों की पड़ताल करने का कोई जरिया आज मौजूद नहीं है। दरअसल, इसे विपक्षी दलों का नीतिगत दिवालियापन ही कहा जाएगा कि आज चाहे यूक्रेन युद्ध हो या फिलिस्तीन की समस्या, अथवा पश्चिमी साम्राज्यवाद का टूटता शिकंजा- इन मुद्दों पर उनके पास अपना कोई अलग नजरिया नहीं है। उनकी विदेश नीति का एकमात्र सूत्र राष्ट्रवाद के सवाल पर भाजपा से भी अधिक उग्रता दिखाने की कोशिश है। लेकिन ऐतिहासिक कारणों से यह मुमकिन नहीं है कि इस बिंदु पर वे भाजपा को पछाड़ पाएं। नतीजा, यह है कि हकीकत के उलट देश का बहुत बड़ा जनमत आज भाजपा की तरफ से प्रचारित कहानी पर यकीन कर रहा है। जबकि जिस तरह भारत की आर्थिक संपन्नता की कहानी खोखली है, उसी तरह भारत के विश्व महाशक्ति बनने के दावे भी बेहद कमजोर हैं।

हकीकत यह है कि आज की उभर रहे विश्व शक्ति संतुलन और नए बनते समीकरणों के बीच भारत अपनी वह हैसियत और आवाज भी खोता चला गया है, जो स्वतंत्रता के तुरंत बाद की परिस्थितियों में निर्गुट आंदोलन में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका के कारण उसने बनाई थी। अगर अमेरिका (जिसकी धुरी से जुड़ना मोदी सरकार की प्राथमिकता रही है) खुलेआम भारत को एक स्विंग स्टेट (India plays the field as a swing state. But for how long? – OrissaPOST)- यानी बिना ठोस रुख वाला देश- कह डालता हो, तो यह समझा जा सकता है कि दुनिया में आज हमारे देश की कैसी छवि बनी हुई है।

लेकिन इस हकीकत के उलट मेनस्ट्रीम मीडिया विश्व की प्रतिष्ठित शख्यितों से भारत को महाशक्ति कहवा देने के प्रयास में जुटा रहता है। इसकी एक नायाब मिसाल देश के संभवतः सबसे बड़े मीडिया घराने की तरफ से आयोजित कॉन्क्लेव में देखने को मिली। इस कॉन्क्लेव का थीम ही ‘भारत राइजिंग’- यानी भारत उदय रखा गया था। इसमें जो बड़ी शख्सियतें बुलाई गईं, उनमें मशहूर अमेरिकी राजनीति-शास्त्री जॉन मियरशाइमर भी शामिल थे।

जॉन मियरशाइमर का संबंध राजनीति-शास्त्र की यथार्थवादी धारा (realist school of thought) से है। इस धारा में उन्होंने कुछ खास योगदान किया है। उनकी सोच को नव-यथार्थवादी समझ (neorealist school of thought) के नाम से जाना जाता है। सोच की यह धारा मानती है कि

  • दुनिया में मुख्य भूमिका महाशक्तियों (great powers) की होती है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था मूल रूप से अराजक है। इसके बीच महाशक्तियां संतुलन कायम करती हैं।
  • हर देश का प्राथमिक उद्देश्य अपने अस्तित्व की रक्षा है।
  • राज्य एक विवेकशील एजेंसी है, जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ठोस रणनीति बनाने की क्षमता रखता है।
  • राज्य का उद्देश्य अपने अस्तित्व की सुरक्षा को अधिकतम संभव बनाए रखना होता है।
  • इसलिए यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है कि हर बड़ी ताकत अपने इलाके को अपना प्रभाव क्षेत्र बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहता है।
  • कोई देश दूसरे देश के मकसदों के बारे में हमेशा निश्चित अनुमान नहीं लगा सकता। (इसलिए दूसरे राज्य के प्रति संदिग्ध रुख एक व्यावहारिक नजरिया है।)

अपनी इसी समझ के आधार पर मियरशाइमर ने 2014 में भविष्यवाणी कर दी थी कि नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के विस्तार की अमेरिकी जिद अंततः उसे रूस के साथ युद्ध की तरफ ले जाएगी। तभी उन्होंने कहा था कि यूक्रेन का नाटो में शामिल होना रूस कभी मंजूर नहीं करेगा, क्योंकि इससे उसके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा होगा।

मियरशाइमर चीन के साथ अमेरिका के टकराव को एक स्वाभाविक घटनाक्रम के रूप में देखते हैं। उनकी राय है कि बढ़ती ताकत के साथ अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश चीन के स्वाभाविक कदम हैं। इसी तरह उस प्रभाव को सीमित करने की कोशिश अमेरिका की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। अमेरिका की रूस संबंधी रणनीति की मियरशाइमर इस तर्क के साथ आलोचना करते हैं कि इससे अमेरिका ने रूस को चीन के करीब जाने को मजबूर कर दिया है। जबकि अमेरिका का असल मुकाबला चीन से है और ऐसे में उसकी कोशिश रूस को अपने अधिक करीब लाने की होनी चाहिए थी।

मियरशाइमर अमेरिका के गिने-चुने बुद्धिजीवियों में हैं, जिन्होंने अमेरिका में इजराइल लॉबी के प्रभाव की खुलेआम चर्चा की है। दो दशक पहले इस बारे में उन्होंने किताब लिखी थी।

चूंकि इस समय दुनिया की प्रमुख चिंताएं यूक्रेन, इजराइल के हाथों फिलस्तीनियों का नरसंहार और ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका-चीन का बढ़ रहा टकराव हैं, इसलिए पिछले दो वर्षों से मियरशाइमर बहुचर्चित बने हुए हैं। दुनिया भर में उनके विश्लेषणों को आज गौर से सुना जाता है। उनकी बातों पर वे लोग भी गौर करते हैं, तो उनके निष्कर्षों से सहमत ना हों। इसीलिए उनके भारत के एक मीडिया कॉन्क्लेव में आने की खबर ने ध्यान खींचा।

इस कॉन्क्लेव में जिस एंकर ने उनका इंटरव्यू लिया, वो इस जद्दोजहद में लगी दिखीं कि किसी तरह मियरशाइमर कुछ ऐसा बोल दें, जिससे यह हेडलाइन बने कि भारत आज की महाशक्ति है या ऐसा बनने की तरफ वह तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन उनकी ये कोशिश सफल नहीं हुई। अनुमान लगाया जा सकता है कि इससे उनके साथ-साथ कॉन्क्लेव के आयोजकों को भी मायूसी हुई होगी।

भारत के संदर्भ में मियरशाइमर से मुख्य रूप से तीन मुद्दों पर बात की गई (LIVE: News18 Rising Bharat Summit 2024 | John Mearsheimer in Conversation with Palki Sharma (youtube.com))-

  • आज की अशांत वैश्विक भू-राजनीति के बीच क्या भारत को एक महाशक्ति माना जा सकता है?
  • अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो उसके बाद संभावित अमेरिका-चीन युद्ध में भारत की क्या भूमिका होगी?
  • अगर भारत और चीन के बीच युद्ध होता है, तो क्या रूस भारत का साथ देगा?

प्रश्न और उत्तर दोनों में असल में ग्रेट पॉवर शब्द का इस्तेमाल किया गया, जिसका अनुवाद हमने यहां महाशक्ति किया है। पहले प्रश्न के उत्तर में मियरशाइमर ने कहा कि भारत ग्रेट पॉवर नहीं है। उन्होंने भारत को एस्पायरिंग ग्रेट पॉवर- यानी महाशक्ति बनने वाले की आकांक्षा रखने वाला देश बताया।

मियरशाइमर ने कहा कि ताइवान पर चीन के हमला करने की संभावना नहीं है। ऐसा वह इसलिए नहीं करेगा, क्योंकि 1979 के बाद उसने कोई लड़ाई नहीं लड़ी है, जबकि इस बीच अमेरिका लगातार युद्धरत रहा है। ऐसे में चीन को युद्ध में अपनी विजय का आत्म-विश्वास नहीं है। मियरशाइमर के मुताबिक ताइवान के सवाल पर युद्ध तभी हो सकता है, अगर इस मामले में कोई ऐसी भड़काऊ कार्रवाई हो, जिसके बाद चीन के पास युद्ध करने के अलावा कोई रास्ता ना रह जाए।

मियरशाइमर ने कहा कि ताइवान से ज्यादा युद्ध की संभावना दक्षिण चीन सागर में है, जहां फिलीपीन्स के साथ चीन का टकराव बढ़ रहा है। फिलीपीन्स में अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं और ऐसा समझा जाता है कि फिलीपीन्स के हालिया आक्रामक रुख को अमेरिका का समर्थन प्राप्त है। मियरशाइमर ने कहा कि अगर वहां युद्ध होता है, तो उसमें भारत की कोई भूमिका नहीं होगी। उस स्थिति में भारत एक दर्शक की भूमिका में होगा।

तीसरे प्रश्न पर उन्होंने कहा कि अगर भारत और चीन के बीच युद्ध होता है, तो रूस निष्क्रिय रहेगा। इस समझ के पीछे संभवतः तर्क यह है कि आज चीन और रूस के बीच इतनी मजबूत धुरी बन चुकी है, रूस के लिए चीन के खिलाफ जाना लगभग नामुमकिन हो गया है। लेकिन भारत से अपने पारंपरिक संबंधों के कारण रूस भारत के विरुद्ध चीन का भी खुला समर्थन नहीं करेगा।

मियरशाइमर की इन टिप्पणियों ने भारत में स्वायत्त सोच और सूचना-संपन्न राय रखने वाले गिने-चुने विश्लेषकों में से एक प्रवीण साहनी को इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित किया। चीन की सैन्य तैयारियों की खास समझ रखने वाले और इस विषय पर किताबें लिख चुके साहनी ने प्रमुख रूप से दो बिंदुओं पर मियरशाइमर की बातों को अपूर्ण माना है। (Pravin Sawhney Responds to John Mearsheimer’s Interview: Analyzing India’s Global Standing (youtube.com))

  • साहनी ने मियरशाइमर की इस समझ का समर्थन किया कि इस समय दुनिया में तीन ग्रेट पॉवर ही हैं। ये हैं- अमेरिका, चीन और रूस। भारत के बारे में साहनी की समझ है कि भारत एस्पायरिंग ग्रेट पॉवर नहीं, बल्कि क्षेत्र विशेष में एक मेजर पॉवर है। मियरशाइमर ने ग्रेट पॉवर की कसौटी के तौर पर आबादी और धन का उल्लेख किया। कहा कि चीन और भारत दोनों के पास आरंभ से ही बड़ी आबादी है, लेकिन चीन धनी भी बन गया और इस तरह महाशक्ति बन गया। भारत अभी ऐसा बनने का आकांक्षी है।
  • लेकिन साहनी की मान्यता है कि आबादी और समृद्धि के साथ-साथ आबादी की गुणवत्ता और सैनिक ताकत भी ग्रेट पॉवर को परिभाषित करने वाले तत्व हैं। उनकी राय में भारत के पास बड़ी आबादी है, लेकिन शिक्षा, तकनीकी ट्रेनिंग, स्वास्थ्य एवं कुशल कर्मी होने की कसौटियों पर भारत की स्थिति बेहद कमजोर है। इसलिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और सुपरसोनिक तकनीक के युग में हमारी आबादी अपने देश को महाशक्ति बना सकने में सक्षम नहीं है। फिर सैनिक ताकत और नौ वहन ताकत के क्षेत्र में भारत की हैसियत ऐसी नहीं है, जिससे वह ग्रेट पॉवर की भूमिका निभा पाने में सक्षम हो।
  • साहनी भी सोचते हैं कि ताइवान को लेकर युद्ध की संभावना नहीं है। लेकिन उनके ऐसा मानने की वजहें वो नहीं हैं, जो मियरशाइमर ने बताईं। इसके विपरीत साहनी की मान्यता रही है कि चीन की शांतिपूर्ण उदय की रणनीति सफल रही है, जिससे वह विश्व में अपना प्रभाव बढ़ा पाया है। ऐसे में युद्ध में शामिल होकर अपनी इस रणनीति से हटने के लिए वह इच्छुक नहीं होगा। यह दीगर बात है कि ताइवान अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दे और अमेरिका उसे मान्यता दे दे। उस हाल में चीन के पास ताइवान पर हमला करने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। साहनी मानते हैं कि उस हाल में भी भारत अपने बंदरगाहों की सेवा अमेरिका नौ सेना को उपलब्ध कराने और खुफिया मामलों में कुछ आदान-प्रदान के अलावा कोई अन्य भूमिका निभा सकने की स्थिति में नहीं होगा।
  • रूस के मामले में साहनी और मियरशाइमर की समझ लगभग मिलती-जुलती है।

तो यह एक विमर्श है, जो आज की दुनिया में शक्ति संतुलन की स्थिति और बनते समीकरणों का एक ठोस विवरण प्रस्तुत करता है। इस रूप में कहा जा सकता है कि मियरशाइमर ने अपनी टिप्पणियों से संबंधित मीडिया संस्थान को भले मायूस किया हो, लेकिन इससे भारत की असल ताकत, दुनिया में उसकी हैसियत, एवं भूमिका के बारे में चर्चा का एक मौका पेश आया।

भले यह चर्चा भारत के आम जन तक ना पहुंच पाए और देश की आबादी का बड़ा हिस्सा मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा फैलाए जाने वाले सरकारी नैरेटिव के प्रभाव में बना रहे, लेकिन उससे हकीकत बदल नहीं जाती। हमेशा अपना भला इसमें होता है कि अपनी असल हैसियत से हमेशा परिचित रहा जाए। जॉन मियरशाइमर और प्रवीण साहनी ने जो कहा है, उससे इस हकीकत पर रोशनी पड़ी है। उससे इस बारे में सोच-विचार करने के लिए प्रासंगिक सूचनाएं उपलब्ध हुई हैं। हम चाहें, तो उस पर ध्यान देकर अपनी समझ को आगे बढ़ा सकते हैं।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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