Thursday, February 2, 2023

पश्चिमी सिंहभूम में सुरक्षा बलों का नंगा नाच, हिंसा से लेकर महिलाओं के साथ की छेड़खानी

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झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिला मुख्यालय व सदर प्रखंड मुख्यालय से करीब 32किमी दूर है अंजेड़बेड़ा राजस्व गांव, जिसका एक टोला है चिरियाबेड़ा, जहां पिछली 11 नवम्बर, 2022 को कथित सर्च अभियान के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा निर्दोष आदिवासियों के साथ मारपीट व तोड़फोड़ की घटना हुई। मगर 12 नवम्बर को स्थानीय अख़बारों में आदिवासियों के साथ की गई हिंसा की खबर सिरे से गायब थी। और अख़बारों में छपी खबरों में केवल बताया गया कि कोबरा-209/205, झारखंड जगुआर, सीआरपीएफ की बटालियन व स्थानीय पुलिस के संयुक्त अभियान के तहत चिरियाबेड़ा, लोवाबेड़ा व हाथीबुरु में चलाए गए अभियान में जंगलों में लगे सीरीज में बम पाए गए और डिफ्यूज किए गए। इन अखबारों ने छापा कि अभियान के दौरान भाकपा (माओवादी) का पोस्टर, बैनर समेत कई दैनिक इस्तेमाल के समान पाए गए।

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लेकिन इन स्थानीय अखबारों की खबरें में जो प्रायः जज की भूमिका में होती हैं और पुलिस द्वारा आरोपित किए गए लोगों को बिना किसी लाग-लपेट के दोषी करार देती हैं, उनमें आदिवासियों पर की गई हिंसा का ज़िक्र तक नहीं था।

आदिवासियों के साथ हुई हिंसा की यह जानकारी तब हुई जब झारखंड का एक जन संगठन झारखंड जनाधिकार महासभा, जो विभिन्न जन संगठनों व सामाजिक कार्यकर्ताओं का मंच है, द्वारा इस मामले पर फैक्ट फाइडिंग रिपोर्ट तैयार की गयी और उक्त मामले पर महासभा के प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त व पुलिस अधीक्षक से 2 दिसम्बर 2022 को मिलकर फैक्ट फाइडिंग रिपोर्ट सौंपी। इसमें जोहार, आदिवासी वीमेंस नेटवर्क, आदिवासी यंगस्टर यूनिटी, झारखंड किसान परिषद समेत कई संगठनों के प्रतिनिधियों में अम्बिका यादव, एलिना होरो, कमल पूर्ति, मिली होरो, नारायण कांडेयांग, रमेश जेराई, रेयांस समाद, सोनल, सिराज दत्त शामिल थे।

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बता दें कि इस क्षेत्र में हो आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं और वे कमोबेश हिन्दी तो समझ ही लेते हैं लेकिन हिन्दी बोल नहीं पाते और अपनी बात केवल हो भाषा में ही रखते हैं।

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फैक्ट फाइडिंग रिपोर्ट के अनुसार अभियान के दौरान गांव के निर्दोष आदिवासी पुरूषों सहित महिलाओं की भी पिटाई की गयी। इतना ही नहीं एक नाबालिक लड़की के साथ बलात्कार की नीयत से छेड़खानी की गयी। विरोध करने पर घर में रखे समान को तहस-नहस किया गया।

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विधवा वृद्ध महिला नोनीकुई जोजो के घर में सुरक्षा बल के जवानों ने घुस कर सामान को बिखेर दिया। फिर घर के अन्दर उनकी नाबालिक बेटी शांति जोजो को दो जवानों ने पकड़ा और तीसरे जवान उसके स्तनों को दबाने लगा। वे उसे खींच कर झाड़ी की तरफ ले जाना चाहते थे, लेकिन वह किसी तरह अपने को उनसे छुड़ाकर भागी और रोती चिल्लाती मां से लिपट गयी। उसके बाद जवानों ने नोनीकुई को डंडों से बुरी तरह पीटना शुरू किया, लेकिन उसने अपनी बेटी को नहीं छोड़ा। नोनीकुई जोजो ने बताया कि जवानों द्वारा उसकी बेटी के साथ की गई हरकत से उसको साफ लगा कि वे लोग उसका बलात्कार करने वाले थे।

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ये सारे घटनाक्रम दिन के 11 बजे से शुरू होकर लगभग दो बजे तक चले।

अन्य कई लोगों के साथ हिंसा की गयी

16 वर्षीय बामिया बहंदा ने फैक्ट फाइडिंग टीम को बताया कि उसको पेड़ से उतारकर पीटा गया। जब उसकी माँ कदमा बहंदा उसे बचाने गयी, तो उसे भी पीटा गया। कदमा के दोनों हाथों को जवानों ने पकड़ लिया और फिर आगे-पीछे व कमर में लात व बंदूक के बट से मारते हुए उसको उसके घर तक ले गए। फिर उसके खुले बाल को पकड़कर इधर-उधर गोल-गोल खींच तान कर घुमाया गया।

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सुरक्षा बलों द्वारा कइयों के घरों में रखे सामान (धान, कपड़े, बर्तन आदि) एवं खलियान में रखे धान को तहस-नहस कर दिया गया।

पूरी घटना के दौरान सुरक्षा बल के जवान हिंदी में पूछताछ कर रहे थे, जबकि ग्रामीण लगातार हो भाषा में बोलकर यह बताने का प्रयास कर रहे थे कि उन्हें हिंदी नहीं आती है, हल्की फुल्की हिन्दी समझते हैं। लेकिन सुरक्षा बल के जवान इसे समझने जानने को तैयार नहीं थे कि सामने वाला क्या कह रहा है, या क्या कहना चाह रहा है। इससे दुखद और क्या हो सकता है कि अपने ही घर में अपनी ही भाषा पर उन्हें तिरस्कृत किया जाए।

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इससे भी दुखद तो यह है कि 11 नवंबर की इस घटना पर 12 नवम्बर को स्थानीय अख़बारों में छपी खबरों में सुरक्षा बलों द्वारा ग्रामीणों के साथ किए गए बर्ताव की कोई खबर नहीं थी। बल्कि अखबार की खबरें केवल पुलिस के बयान पर आधारित थीं।

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उल्लेखनीय है कि विगत 15 जून, 2020 को भी सुरक्षा बल के जवानों ने सर्च अभियान के दौरान इसी गांव के आदिवासियों को डंडों, बैटन, राइफल के बट और बूटों से बेरहमी से पीटा था। पीड़ितों ने कई बार विभिन्न स्तरों पर लिखित आवेदन दिया, लेकिन आज तक, न दोषी सुरक्षा बलों के विरुद्ध कार्रवाई हुई और न पीड़ितों को मुआवज़ा मिला। न्यायालय में भी पीड़ितों का बयान दर्ज करवाने में जांच पदाधिकारी का रवैया नकारात्मक और उदासीन है।

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पश्चिमी सिंहभूम सह उपायुक्त को ज्ञापन देते फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य।

15 जून, 2020 को भी चिरियाबेड़ा गांव में सीआरपीएफ जवानों ने ग्रामीणों की पिटाई की थी। सुरक्षा बल की पिटाई से घायल हुए 20 लोगों में से 11 लोग गंभीर रूप से घायल थे। इस मामले में भी झारखंड जनाधिकार महासभा द्वारा फैक्ट फाइडिंग की गयी तब जाकर मामले की असली जानकरी हुई। टीम ने पाया था कि पुलिस की ओर से दर्ज प्राथमिकी में कई तथ्यों को नजरअंदाज किया गया। उस बार भी चिरियाबेड़ा में आदिवासियों की पिटाई की घटना सुरक्षाबलों के आदिवासी विरोधी चहरे को सामने लाया मगर इस मामले पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

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पीड़ितों के मुताबिक उन्होंने पुलिस को स्पष्ट रूप से बताया था कि सीआरपीएफ ने उनकी पिटाई की। जब कि प्राथमिकी में उल्लेख किया गया कि पीड़ितों को अज्ञात अपराधियों द्वारा पीटा गया। प्राथमिकी में एक बार भी सीआपीएफ का जिक्र नहीं किया गया। पुलिस ने अस्पताल में पीड़ितों पर दबाव भी बनाया कि वे सीआरपीएफ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज न करवाएं और हिंसा में उनकी भूमिका का उल्लेख न करें।

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बता दें कि 1990 में सिंहभूम जिले के विभाजन के बाद पश्चिमी सिंहभूम जिला अस्तित्व में आया। पुनः 2001 में पश्चिमी सिंहभूम दो भागों में विभाजित हो गया। 8 प्रखण्डों के साथ सरायकेला-खरसावां जिला अस्तित्व में आया। वर्तमान में 18 प्रखण्डों एवं 3 अनुमण्डलों के साथ पश्चिमी सिंहभूम जिला जाना जाता है। यह जिला पहाड़ी ढलानों पर घाटियां, खड़ी पहाड़े और घने जंगलों से भरा पड़ा है।

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जिले में सबसे अच्छे साल वृक्ष के वन हैं और सारंडा (सात सौ पहाड़ी) वन क्षेत्र दुनिया भर में जाना जाता है। परिदृश्य रूप में जलप्रपात एवं जंगली जानवर से भरा हुआ है जैसे- हाथी, जंगली भैंसा, बाघ, तेंदुए, भालू, जंगली कुत्तों, जंगली सूअरों, सांभर, हिरण और चित्तीदार हिरण भी पाये जाते हैं। जिले का नामकरण दो युग्म शब्दों से हुआ है। प्रथम शब्द “सिंह” का अर्थ पोड़ाहाट के राजाओं के पितृत्व नाम से लिया गया है एवं दूसरा शब्द “भूम” का अर्थ जिले के आदिवासी देवता सिंहबोंगा का रूप है।

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बताते चलें कि चिरियाबेड़ा व अंजेड़बेड़ा में बुनियादी सुविधाओं व कल्याणकारी सेवाओं की स्थिति दयनीय है। चिरियाबेड़ा में कोई आंगनवाड़ी नहीं है। निकटतम आंगनवाड़ी गांव से 6 किमी दूर अंजेड़बेड़ा में है, जिस कारण से बच्चे आंगनवाड़ी सेवाओं से वंचित हैं। कई वृद्ध व विधवा महिलाएं पेंशन से वंचित हैं। शिकायत के बावज़ूद अंजेड़बेड़ा के आठ अत्यंत वंचित परिवार लगभग एक साल से राशन से वंचित हैं। स्थानीय रोज़गार के अभाव में बड़े पैमाने पर गांव के युवा पलायन करते हैं।

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फैक्ट फाइडिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि अभियान के दौरान आदिवासियों के प्रति ऐसा अमानवीय व गैरकानूनी रवैया पूर्ण रूप से संविधान व लोकतंत्र विरोधी है। ऐसे गावों के ग्रामीणों की विशेष परिस्थिति व समस्याओं को समझने के बजाय सुरक्षा बलों द्वारा संवैधानिक, क़ानूनी व मानवता की सीमाओं को लांघ कर अभियान के नाम पर निर्दोषों पर व्यापक हिंसा की जाती रही है। यह भी देखने को मिल रहा है कि सारंडा क्षेत्र में ग्रामीणों के विरोध के बावज़ूद एवं बिना ग्राम सभा की सहमति के सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित किए जा रहे हैं। यह पांचवीं अनुसूची व पेसा कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। क्षेत्र के निर्दोष आदिवासी-मूलवासी-वंचितों को माओवादी घटनाओं में फ़र्ज़ी रूप से आरोपी बनाया जा रहा है। केंद्र सरकार का आदिवासी-विरोधी चेहरा तो स्पष्ट है। लेकिन यह दुःख की बात है कि इस मामले में हेमंत सोरेन सरकार का रवैया भी अत्यंत उदासीन है।

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अपने इस फैक्ट फाइडिंग रिपोर्ट में महासभा ने सरकार से पीड़ितों को लेकर कई मांगें रखी हैं जिसमें

• 11 नवम्बर, 2022 को चिरियाबेड़ा में लोगों पर हिंसा एवं नाबालिक लड़की के साथ छेड़खानी करने के दोषी सुरक्षा बल जवानों के विरुद्ध सुसंगत धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज हो और न्यायसंगत कार्रवाई हो। इस प्रताड़ना के लिए पीड़ितों को मुआवज़ा दिया जाए।

• 15 जून, 2020 को इस गांव के लोगों पर हुए हिंसा के लिए दोषी सुरक्षा बल के विरुद्ध न्यायसंगत कार्रवाई की जाए व पीड़ितों को मुआवज़ा दिया जाए।

• केवल संदेह के आधार पर अथवा केवल माओवादियों को महज़ खाना खिलाने के लिए निर्दोष आदिवासी-वंचितों को माओवादी घटनाओं के मामलों में न जोड़ा जाए।

• नक्सल सर्च अभियानों की आड़ में सुरक्षा बलों द्वारा लोगों को परेशान न किया जाए और आदिवासियों पर हिंसा न किया जाए। लोगों पर फ़र्ज़ी आरोपों पर मामला दर्ज करना पूर्णतः बंद हो।

• पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में किसी भी गांव के सीमा में सर्च अभियान चलाने से पहले ग्राम सभा व पारंपरिक ग्राम प्रधानों की सहमति ली जाए। स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बलों को आदिवासी भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति और उनके जीवन-मूल्यों के बारे में प्रशिक्षित किया जाए और संवेदनशील बनाया जाए।

• बिना ग्रामीणों के साथ चर्चा किए व ग्राम सभा की सहमति के कैंप ज़बरदस्ती स्थापित न की जाए।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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