Mon. Sep 16th, 2019

कारपोरेट फासीवाद को बढ़ाता बजट

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बजट के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में बजट की आलोचना करने वालों के सम्बंध में कहा कि देश में कुछ लोग ‘पेशेवर निराशावादी‘ होते हैं, जो हमारे 5000 अरब डालर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य पर सवाल उठा रहे हैं। हमारी सरकार ने ‘गांव, गरीब और किसान‘ के लिए यह बजट बनाया है। अर्थव्यवस्था की तुलना केक से करते हुए मोदी जी कहते हैं कि जितना बड़ा केक होगा उतना ही ज्यादा हिस्सा मिलेगा। इस हिस्से की सच्चाई को मौजूदा बजट के कुछ तथ्यों से आपके सामने ला रहे हैं। आप मोदी सरकार के नीचे दिए तथ्यों पर खुद गौर करेंगे तो पायेंगे कि मौजूदा बजट में गांव, गरीब, किसान, नौजवान और महिलाओं, दलितों, आदिवासियों 
व समाज के कमजोर तबकों का हिस्से को हर जगह कम कर दिया गया है और इसे काटकर कारपोरेट के चरणों में परोसा गया है।

कारपोरेट फासीवाद को देश में स्थापित करने में लगे संघ के लोग हिटलर की नाजी पार्टी के मंत्री गोएबल्स के इस दर्शन को मानते हैं कि एक झूठ को हजार बार बोलो तो वह सच हो जाता है। ‘पेशेवर झूठे‘ संघ-भाजपा के लोग इसी रणनीति का इस्तेमाल कर बजट संबंधी अपनी झूठी बातों को भी सही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। 
बजट में कारपोरेट टैक्स में बड़ी छूट दी गयी है। कारपोरेट पर लग रहे 30 प्रतिशत टैक्स को घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया है और कारपोरेट टैक्स के दायरे को उसकी सीमा 250 करोड़ से बढ़ाकर 400 करोड़ कर दिया गया है। बजट में बड़े कारपोरेट घरानों पर उत्तराधिकार कर और सम्पत्ति कर लगाने की न्यूनतम मांग को भी पूरा करने की कौन कहे वित्त मंत्री ने सम्पत्ति कर को पूर्ण विलोपित करने की बजट भाषण में घोषणा की है। बैंकों को उबारने के लिए सरकार द्वारा दिए 70 हजार करोड़ रुपये भी कारपोरेट को और कर्ज देने के लिए है। कारपोरेट घरानों के लिए अब सरकार खुद विदेशों से कर्ज लेगी। देश की महत्वपूर्ण सार्वजनिक सम्पत्ति रेलवे में निजीकरण और ऊर्जा, एयर इंडिया, तेल, कोयला, इस्पात, दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में विनिवेशीकरण इसे बर्बाद करने का काम करेगा। बीमा और मीडिया में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी गयी है।

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‘मिनिमम गर्वमेंट-मैक्सिमम गर्वनेंस‘ जैसी घोषणाएं सरकारी विभागों को बड़ी संख्या में खत्म करेगी और डाउनसाइजिंग, विनिवेशीकरण व निजीकरण पहले से मौजूद सरकारी नौकरियों को घटायेगी। इसकी सबसे बुरी मार असुरक्षित जीवन दशाओं में ठेके पर काम कर रहे मजदूरों पर पड़ेगी, उनकी सबसे पहले छटंनी की जायेगी जिसकी बीएसएनएल आदि में शुरूआत भी हो चुकी है। यह बजट रोजगार संकट में वृद्धि करेगा। आजादी से पहले संघर्षों से हासिल मजदूरों के अधिकारों पर हमला करते हुए 44 श्रम कानूनों को खत्म कर चार श्रम संहिता बनाने का प्रस्ताव कारपोरेट को मजदूरों के शोषण की खुली छूट देना है। 27.86 लाख करोड़ के बजट में कृषि के लिए 1.30 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया है जिसमें से 75 हजार करोड़ किसान सम्मान निधि और 14 हजार करोड़ फसल बीमा योजना का है और 18000 करोड़ अल्पकालीन ऋण के मद में ब्याज सब्सिडी है। 
यानी खेती में मात्र 23 करोड़ दिया गया है जिसमें ज्यादातर अवस्थावना पर खर्च है। फसल बीमा में दिया गया पैसा देशी विदेशी बीमा कम्पनियों के और ब्याज सब्सिडी का पैसा बैंकों के खाते में जायेगा। जीरो बजट खेती देश के 87 प्रतिशत छोटे मझोले किसानों के साथ किया गया भद्दा मजाक है। इसका नारा देने वाली सरकार ने बजट में जैविक खेती के लिए महज 2 करोड़ रूपए दिए हैं। परम्परागत कृषि विकास योजना में भी 35 करोड़ की कटौती की गयी है। अपने भाषण में तिलहन और बांस खेती के विकास की बात करने वाली वित्त मंत्री के बजट में तिलहन खेती के लिए बजट ही नहीं दिया गया है जबकि पिछली बार यह 400 करोड़ रुपए था और राष्ट्रीय बांस मिशन के बजट को आधा करके 150 करोड़ रुपये कर दिया गया है। पर्यावरण की रक्षा के लिए पूरे देश में बड़े पैमाने पर पौधारोपण का प्रचार करने वाली सरकार ने कृषि वानकी और वानकी के बजट को घटाया है, इतना ही नहीं पौधा संरक्षण के लिए पिछले वर्ष आवंटित बजट 129.5 करोड़ रुपये को घटाकर 50 करोड़ कर दिया गया है।

मोदी अपने भाषणों में जिस मृदा विकास की बात करते नहीं अघाते उसके बजट में 80 करोड़ की कटौती कर दी गयी है। कृषि को बचाने के एक मात्र रास्ते सहकारी खेती के बजट को वर्ष 2017 की तुलना में आधा कर दिया गया है जो 2017 में आवंटित 228 करोड़ और 2018 में आवंटित 144.68 करोड़ की तुलना में महज 85 करोड़ है। 
कृषि बाजार के लिए 2018-19 में आवंटित बजट 1050 करोड़ को घटाकर 600 करोड़ रुपये कर दिया गया है। वहीं देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों को सीधे मदद पहुंचाने वाली यूरिया सब्सिडी में 8 हजार करोड़ की वृद्धि की गयी है। दुग्ध व मछली पालन करने वाले किसानों की तारीफ करने वाली वित्त मंत्री ने श्वेत क्रांति यानि डेयरी उद्योग के बजट में ही कमी कर दी, इसे पिछले वर्ष आंवटित 1323.37 करोड़ की जगह 1073.74 करोड़ कर दिया गया है। इसी प्रकार नीली क्रांति जो मत्स्य पालन करने वाले किसानों के लिए बजट में प्रयुक्त की गयी है उसके आवंटन में 80 करोड़ की कमी की गयी है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में 500 करोड से ज्यादा़ की कटौती की गयी है। वृहद और मध्यम सिंचाई में लगभग 500 करोड़, लघु सिंचाई में 16 करोड़ और बाढ़ नियंत्रण और जल निकासी में 40 करोड़ रुपये की कमी की गयी है। 
गांव की उन्नति का नारा देने वाली सरकार ने मनरेगा के बजट में 1084 करोड़ रूपए की कटौती की है। इसी प्रकार भूमि सुधार के बजट में 90 करोड़ और अन्य ग्रामीण विकास कार्यक्रम के बजट को आधा कर दिया है जो पिछले बार से करीब 600 करोड़ रुपये कम है। 
गरीबों को एलपीजी कनेक्शन देने की योजना में 500 करोड़ की कटौती की गयी है। हर घर को बिजली देने वाली दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में 1000 करोड़ की कमी की गयी है। हर घर को नल से पानी और शौचालय देने की बातें करने वाली वित्त मंत्री ने जलापूर्ति और स्वच्छता के बजट में भरी कमी की है जहां 2017 में इसमें 3443.94 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे वहीं इस वर्ष महज 1147.93 करोड़ रुपये ही आवंटित किए गए हैं। 
गरीब की उन्नति की उद्घोषणा करने वाली सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगी एक्साइज ड्यूटी के कारण महंगाई को और बढ़ाने का काम किया है। 2024 तक हर देशवासी को आवास देने की बात करने वाली सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना में 600 करोड़ का बजट आवंटन घटाया है। नारी से नारायणी महिलाओं को बनाने वाली पहली पूर्ण महिला वित्त मंत्री ने महिलाओं, बालिकाओं व बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए चल रही आईसीडीएस के बजट में आंशिक वृद्धि की है पर यह पिछले वर्ष आंगनबाड़ियों के बढ़े मानदेय की वजह से है। वास्तविकता में पोषण और अन्य जनहितकारी मदों में कटौती ही की गयी है। महिलाओं के संरक्षण व सशक्तिकरण के 
लिए आवंटित बजट में 36 करोड़ की कमी कर दी गयी है। अनुसूचित जाति के लिए पिछले वर्ष आवंटित 7609 करोड़ के बजट में कमी कर उसे 5445 करोड़ कर दिया गया और आदिवासियों के लिए आवंटित बजट में भी महज आंशिक वृद्धि की गयी है। यह भी उनकी जनसंख्या की तुलना में अनुपातिक रूप से बेहद कम है। ‘सबका विश्वास‘ की बात करने वाली मोदी सरकार ने अल्पसंख्यकों के विकास के लिए आवंटित बजट को 2017 की तुलना में आधा कर दिया। जहां 2017 में इस मद में 3948 करोड़ रूपया खर्च किया गया था वहीं इस वर्ष महज 1590 करोड़ रुपया ही दिया गया है। इसी प्रकार विकलांग, विधवा महिलाओं जैसे अन्य वंचित समूहों के विकास के लिए आवंटित बजट में करीब 400 करोड़ की कटौती की गयी है। 

जिस व्यापारी वर्ग ने बहुतायत में मोदी जी को मत दिया उसे भी सरकार ने बक्शा नहीं है। सरकार के एक करोड़ कैश निकालने पर दो लाख रुपये टैक्स देने जैसे निर्णयों से छोटे-मझोले व्यापारियों पर बोझ बढ़ेगा। व्यापारियों के लिए भी शुरू की गयी प्रधानमंत्री कर्मयोगी मानधन पेंशन योजना पेंशन धारकों के साथ धोखाधड़ी के सिवा और कुछ नहीं है। 18 से 40 आयु वर्ग के व्यापारी 100 से ज्यादा अंशदान जमा करेंगे तब 60 साल की उम्र के बाद इस पेंशन योजना में 3000 महीना उन्हें मिलेगा। 
सरकार ने पहली बार देश में किताबों पर कस्टम ड्यूटी लगाई गई है। विदेश से छात्र बुलाकर भारत में पढ़ाने वाली सरकार ने तकनीकी शिक्षा के बजट में 1000 करोड़ की कटौती की है। इसका परिणाम आईआईटी जैसे हमारे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संस्थानों पर पड़ेगा जिसकी तारीफ वित्त मंत्री अपने भाषण में कर रही थीं।

(दिनकर कपूर स्वराज इंडिया, यूपी की राज्य कार्यसमिति के सदस्य हैं।) 

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