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Categories: बीच बहस

अपनी जड़ों से उजड़ कर जिसके सपनों के महल खड़े किए, उसी ने दिखा दिया ठेंगा

रेल की पटरी पर मज़दूरों के क्षत विक्षत शव और फैली हुयी रोटियों ने हमारी व्यवस्था, नीति, नीयत, और संवेदनशीलता की पोल खोल कर रख कर दी है। दुनियाभर ने पटरियो पर बिखरे मांस पिंड और चंद रोटियों के लिये हज़ार हज़ार किमी की यात्रा पर गए लोगों का जो दृश्य देखा है वह औपनिवेशिक काल मे बंगाल के अकाल के कुछ दृश्यों की ही तरह मर्माहत कर देने वाला है। पटरियां, कोई सोने की जगह होती हैं ! इस मासूम से दिखते पर बेहद शातिर और खुदगर्ज वाक्य में वही ध्वन्यात्मकता है जो लुई 16 की बीवी ने कभी कहा था, उन्हें रोटी नहीं मिलती तो केक क्यों नहीं खाते।

लुई की बीबी को न रोटी की कमी थी न केक का अभाव। उसे भूख, अभाव, और निराशा का अनुभव भी नहीं था। उसने यह वाक्य, जो दुनिया मे इतिहास परिवर्तन का एक कालजयी वाक्य बन गया, बेहद मासूमियत से कहा था। पर पटरिया कही सोने के लिए होती हैं, यह कहने वाले न तो लुई 16 हैं और न ही कहीं के राजा रानी। वे, हमारे ही समाज के वे लोग हैं जो एक अच्छे खासे मुखर लोकतंत्र को तानाशाही में बदलते देख कर भी दुंदुभिवादन कर रहे हैं। लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु, सरकार का हर बात में समर्थन करने वाला होता है और वह न केवल अपनी अस्मिता को गिरवी रख देता है बल्कि आगे चल कर वह देश, समाज और जनता का सबसे अधिक नुकसान करता है।

25 अप्रैल से देश मे लॉक डाउन है। सारी व्यावसायिक गतिविधियां ठप हैं। लोग घरों में बंद हैं। पर देश मे एक ऐसी समस्या उत्पन्न हो गयी है, जिसके बारे में सरकार के नीति नियंताओं ने शायद सोचा ही नहीं। वह समस्या है देश के प्रवासी मज़दूरों की। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तमिलनाडु आदि राज्य जो औद्योगिक रूप से विकसित हैं, में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश राजस्थान आदि राज्यो से भारी संख्या में रोजी रोटी कमाने के लिये प्रवासी कामगार जाते हैं। अब जब लॉक डाउन हुआ और उद्योगों में ताले लगे तो इस मज़दूरों के घरवापसी की समस्या उभर कर सामने आ गयी।

इन प्रवासी कामगारों के समक्ष अब दो ही रास्ता था, या तो जहां वे हैं वहां उन्हें रोजगार देने वाले उद्योग बैठा कर खिलायें, या सरकार कोई वैकल्पिक व्यवस्था करे या उन्हें उनके घर उनका जो भी देना पावना हो देकर भेज दिया जाए और फिर जब लॉक डाउन खुले और स्थिति सामान्य हो तो उन्हें बुलाया जाए। लेकिन इन कामगारों के बारे में कोई भी चिंतन न तो सरकार ने किया और न ही उद्योगपतियों ने। शुरू में लगा कि यह लॉक डाउन कुछ ही दिनों का होगा, लेकिन लॉक डाउन का निर्णय लेने वालों को भी संभवतः यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि यह कब तक किया जाएगा और इससे क्या-क्या समस्याएं आ सकती हैं, और उनसे कैसे निपटा जाएगा।

अन्ततः अब धनाभाव के कारण ऊब कर मज़दूर अपने गांव की ओर जाने लगे हैं तो एक माह बाद सरकार को सूझा कि कुछ स्पेशल ट्रेन चला दी जाए। कुछ चली। कुछ किराए की बात हुई। पर कामगारों की संख्या इतनी अधिक है कि सबको बिना किसी योजना के उनके घरों की ओर वापस भेजाना संभव भी नहीं है। अब स्थिति यह है कि गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र में मज़दूर अपने घर जाना चाहते हैं तो उद्योगपति उन्हें जाने नहीं दे रहे हैं। सरकार तय नहीं कर पा रही है कि वह आखिर करे तो क्या करे। अब रोज ही ऐसी सैकड़ों किलोमीटर पैदल, या साइकिल से चलते मज़दूरों की खबरें आ रही हैं। और हम सब 5 ट्रिलियन आर्थिकी का सपना देख रहे हैं।

प्रवासी मज़दूरों की स्थिति पर अध्ययन करने के लिये 2015 में एक कार्यबल  का गठन किया गया था, जिसने कुछ सिफारिशें की थीं, लेकिन वे सिफारिशें अभी भी फाइलों में ही पड़ी हैं। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के डॉ. पार्थ मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के निर्देश पर इस 18 सदस्यीय कार्यदल का गठन देश में पहली बार 2015 में किया गया था, जिसने जनवरी 2017 में अपनी संस्तुतियों को अध्ययन के साथ प्रस्तुत किया था। इस टास्कफोर्स ने अपने अध्ययन में पाया कि सबसे अधिक प्रवासी मज़दूर, बंगाल, ओडिशा, बिहार, यूपी और झारखंड से ही विभिन्न जगहों पर गए हैं। पर ओडिशा को छोड़कर, इन राज्यों ने अपने राज्य से गये प्रवासी मज़दूरों को किसी भी प्रकार के शोषण से बचाने के लिये किसी तन्त्र का विकास नहीं किया है।

सबसे अधिक प्रवासी मज़दूर भेजने वाला राज्य बिहार जो अपनी इस श्रम संपदा पर गर्व भी करता है, ने कोई भी ऐसा विभाग गठित नहीं किया है, जो उसके राज्य से गये मज़दूरों के हित के लिये उनको मदद पहुंचाए। जिन राज्यों के ये प्रवासी मज़दूर हैं, उन्हें अपने प्रवास स्थल पर क्या समस्या हो सकती है, उनक़ी स्थिति क्या है, उन्हें वेतन, या रहने आदि की जगह कैसी है और उन्हें किसी समस्या पर किससे संपर्क करना है, आदि के सम्बंध में एक विस्तृत हेल्पलाइन की बात टास्क फोर्स ने अपने अध्ययन में की है

केरल सरकार ने अपने राज्य के प्रवासी कामगारों के लिये नॉन रेजिडेंट केरलाइट अफेयर्स के नाम से एक विभाग बना रखा है जिसके, कार्यालय चेन्नई, मुंबई, और दिल्ली में हैं, जहां इन्होंने अपने राज्य के लिये एक हेल्पलाइन नम्बर ज़ारी कर रखा है। ऐसी ही व्यवस्था खाड़ी देशों में भी है, क्योंकि केरल से बहुत अधिक संख्या में लोग खाड़ी देशों में रहते हैं। केरल एक छोटा राज्य है और  हिंदी पट्टी के राज्यों की तुलना में उसके प्रवासी कामगार भी कम हैं, अतः यह व्यवस्था हो सकता है सफल हो रही हो, पर यूपी, बिहार, एमपी, झारखंड, ओडिशा, बंगाल की व्यापक प्रवासी जनसंख्या को देखते हुए इन राज्यों के लिये ऐसी व्यवस्था करना शायद सम्भव न हो। फिर भी इन राज्यों का यह दायित्व बनता है कि वे कुछ न कुछ ऐसी व्यवस्था करें जिससे प्रवासी कामगारों पर ऐसी विपत्ति में सहायता की जा सके।

देश में प्रवासी मज़दूरों के पलायन पर अगर नक्शे में देखें तो अधिकतर पलायन उत्तर और पूर्व के राज्यों से दक्षिण और पश्चिम के राज्यों की तरफ हुआ है। जो राज्य अधिक मज़दूर भेजते हैं, उनमें उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा हैं और जो राज्य अधिकतम ऐसे प्रवासी मज़दूरों को रोजगार देते हैं, वे हैं, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, तमिल और केरल प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त ईंट भट्ठों और खेती के लिये अस्थायी रूप से प्रवासी मज़दूरों की संख्या अलग है। अब हम 2011 की जनगणना और 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इन प्रवासी मज़दूरों की संख्या का एक विवरण देखते हैं। इस टास्कफोर्स के अध्ययन समूहों ने इन मज़दूरों की संख्या और इसका भारत की आर्थिकी पर क्या प्रभाव पड़ा है, का एक विस्तृत अध्ययन किया है। 2015 में गठित इस कार्यबल ने, इन मज़दूरों की विविध समस्याओं का अध्ययन किया और 2017 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में ऐसे प्रवासी कामगारों के हित और उनके बेहतर जीवन के लिए भी सुझाव दिए गए हैं, लेकिन सरकार ने उन सुझावों पर कोई कार्यवाही की या नहीं यह ज्ञात नहीं है।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1 अरब 21 करोड़ थी। अध्ययन दल ने कुल प्रवासी जनसंख्या का आकलन 45 करोड़ यानी आबादी का 37 % है, माना। भारत में सबसे तेजी से औद्योगिक प्रगति, लगभग 31.8 % की गति से 2001 से 2011 के बीच हुई है। भारत में उन क्षेत्रों या राज्यों में जहां औद्योगिक प्रगति तेजी से हो रही है वहां प्रवासी जनसंख्या में तेजी से वृद्धि भी हो रही है।

अध्ययन दल का अनुमान है कि 2021 तक भारत में कुल आंतरिक प्रवासी आबादी की संख्या 55 करोड़ हो सकती है। इस प्रवासी आबादी के आंकड़े में गांव से शहर या कस्बों से शहर की ओर जाने वाली आबादी को भी जोड़ा गया है। कस्बाई शहरों के आधुनिक और विकसित शहरों में बदलने के कारण भी ग्रामीण आबादी का पलायन बहुत तेजी से हुआ है। 2001 से 2011 के बीच प्रवासी कामगारों की संख्या में 13 करोड़ 90 लाख की वृद्धि हुई है। इस प्रकार कुल आंतरिक पलायन जो 1991 में 22 करोड़ था, वह 2011 में 45 करोड़ से अधिक हो गया है।

अध्ययन दल ने प्रवासी पलायन की प्रकृति पर अध्ययन करते हुए इसे दो भागों में विभक्त किया है।

● पहला दीर्घ अवधि के लिये हुआ पलायन, जिसमें पूरा परिवार एक जगह से उठ कर कहीं और स्थापित होता है।

● दूसरा, अल्प अवधि के लिये पलायन, या मौसमी पलायन, जिसमें रोजगार आदि के लिये, मूल स्थान से उठ कर जहां रोजगार मिलता है, वहां लोग जाते हैं और फिर जब काम नहीं रहता है तो, वापस अपने मूल स्थान पर आ जाते हैं।

नेशनल सैम्पल सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, देश के 28.3% कामगार अल्प अवधि यानी रोजगार की तलाश में विस्थापन करते हैं, और इसी सर्वे के अनुसार, देश के असंगठित क्षेत्र में कुल प्रवासी कामगारों की संख्या 17 करोड़ 50 लाख है जो देश के विभिन्न राज्यों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में अपना योगदान देते हैं।

2017 के आर्थिक सर्वेक्षण में यह बताया गया कि औसतन 90 लाख लोग हर वर्ष शिक्षा या रोजगार के लिये अपने राज्यों से अन्यत्र विस्थापन करते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात सबसे अधिक विस्थापन आकर्षित करने वाले राज्य हैं और उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश सबसे अधिक विस्थापन देने वाले राज्य हैं। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में महाराष्ट्र के प्रति, प्रवासी जनसंख्या का मोह तमिलनाडु और केरल की तुलना में कम हुआ है। इसका एक कारण मुंबई में उत्तर भारतीय विरोधी मानसिकता का होना भी बताया गया है। यह प्रवास की एक नयी प्रवृत्ति है, क्योंकि उत्तर भारतीय राज्यों के लिये मुंबई सबसे आकर्षक गंतव्य हुआ करता था।

केरल और तमिलनाडु भाषा की समस्या के कारण पहले उतना आकर्षित नहीं करते थे, लेकिन अब यह बदलाव आया है । राज्यों से बाहर जाने की गति, जिसे रिपोर्ट में आउट माइग्रेशन दर,  कहा गया है, में मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश से बाहर जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आउट माइग्रेशन दर उन राज्यों की अधिक है जो अपेक्षाकृत उन राज्यों से कम विकसित हैं, जो इन राज्यों के प्रवास को आकर्षित करते हैं।

सर्वेक्षण में राज्यों से राज्यों में प्रवास के आंकड़े जहां 1991- 2001 में 55 % था वह गिर कर 2001- 2011 में 33% हो गया है। लेकिन इसके विपरीत एक ही राज्य के एक जिले से दूसरे जिले में होने वाले विस्थापन की दर जो 1991- 2001 में 33% थी वह 2001 – 2011 में बढ़ कर 58% हो गयी है। इसी प्रकार एक ही जिले के अंतर्गत होने वाले विस्थापन का भी अध्ययन किया गया है तो यह दर 1991 – 2001 में 33 % थी जो 2001- 2011 में 58 % हो गयी। यह सर्वेक्षण तीन स्तरों में राज्य से राज्य, राज्य के अंदर एक जिले से दूसरे जिले और फिर जिले के अंदर ही हुए विस्थापन के अनुसार विभक्त कर की गयी है।

विस्थापन के कारणों पर चर्चा करते हुये सर्वेक्षण में कहा गया है कि, महिलाओं के विस्थापन का एक कारण उनकी वैवाहिक स्थिति और स्थान का बदल जाना है जबकि पुरुषों और कामकाजी महिलाओं में यह कारण रोजगार और शिक्षा का है। अधिकतर अंतरराज्यीय विस्थापन एकल पुरूष या महिला या यदि दोनों ही कामकाजी हों तो उनके परिवार सहित होते हैं। लेकिन कुछ मामलों में पूरा परिवार ही, जब लम्बे समय तक या स्थायी रूप से रहना होता है, तब विस्थापित होता है। कुछ परिवार सहित विस्थापन निम्न आय वर्ग में उन मज़दूरों का भी होता है जो, ईंट भट्ठों और खेती किसानी के काम से प्रवास पर खाने कमाने गए हैं।

इस पैनल ने अपनी रिपोर्ट में यह माना कि, देश की अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ा योगदान इन प्रवासी कामगारों का है अतः उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के लिये सरकार द्वारा कुछ आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिए। रिपोर्ट में संस्तुतियों की चर्चा करते हुए प्रारंभ में ही कहा गया है कि, केवल अलग से इन प्रवासी कामगारों के लिये किन्ही प्रावधानों की आवश्यकता नहीं है, बल्कि सभी कामगारों के लिये जो श्रमिक तथा अन्य कामगार हितों के लिये कानून है उन्हें इनके लिये भी सख्ती से लागू किये जाने की ज़रूरत है। अलग से कानून बनाने पर स्थानीय कामगारों में असंतोष उत्पन्न हो सकता है, अतः यह कानून सभी पर बिना भेदभाव के ही लागू किया जाना चाहिए। लेकिन फिर भी कार्यदल ने कुछ अतिरिक्त सिफारिशें की हैं, जो इस प्रकार हैं।

● सामाजिक संरक्षण को ध्यान में रखते हुए यह सुझाव दिया गया कि राज्य सभी प्रवासी कामगारों के लिये एक

1. असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा परिषद ( अनआर्गनाइज्ड सोशल प्रोटेक्शन बोर्ड ) का गठन करें।

2. इस बोर्ड में कामगारों के पंजीकरण हेतु एक सरल उपाय बनाये जाएं जैसे, मोबाइल फोन से एसएमएस द्वारा, पंजीकरण की सुविधा हो।

3. सभी पंजीकरण का डेटा बेस तैयार किया जाए जिनकी सूचनाएं और डेटा उक्त कामगार के मूल राज्य में भी ज़रूरत पड़ने पर भेजी जा सके,  जिससे उसके मूल राज्य में भी अगर उक्त कामगार या उसके परिवार को आवश्यकता पड़े तो सुविधा दी जा सके।

● सभी प्रवासी कामगारों को, बिना उनके एम्प्लॉयमेंट के भेदभाव के  स्वास्थ्य सुविधा और न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा मिले । यह सुविधाएं, राज्य सरकार कामगार की आर्थिक हैसियत का आकलन कर के दे।

● 2013 में संसद द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के पारित होने के बाद भी प्रवासी कामगारों के पास, राशन कार्ड न होने से इस कानून का लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है, विशेषकर उन्हें जो अल्प आय से गुजारा करते हैं। जब इनके पंजीकरण का व्यापक रूप से डिजिटाइजेशन हो जाएगा, तो उन्हें भी इस कानून के अंतर्गत लाभ दिया जा सकेगा। यह लाभ दो प्रकार का होगा।

1. अगर परिवार मूल राज्य में है, तो अकेले उस कामगार को यह पीडीएस की सुविधा मिल सकती है।

2. अगर काम में बदलाव के कारण कामगार उसी राज्य में ही अन्यत्र या राज्य के बाहर किसी अन्य राज्य में रोजगार के लिये चला जाता है, तो वहां भी उसे यह सब सुविधा मिल सकती है।

● डिजिटाइजेशन के कारण प्रवासी कामगार को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और ईएसआई के अंतर्गत भी स्वास्थ्य सुविधाएं दी जा सकती हैं। संगठित क्षेत्र के कामगारों को तो ईएसआई की सुविधा उपलब्ध है, पर ठेके पर काम करने वाले कामगारों को भी, इन दो महत्वपूर्ण स्वास्थ्य योजनाओं में लाया जाना चाहिए। साथ ही असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिये ईएसआई के अंतर्गत ही अनऑर्गेनाइज़्ड वर्कर्स सोशल सिक्योरिटी का भी प्रावधान है, लेकिन उसका ढांचा अभी उतना सुगठित नहीं है, जितना होना चाहिये, अतः इसे और व्यवस्थित किया जाना चाहिए।

● आंगनबाड़ी, एएनएम आदि की सुविधाएं प्रवासी महिला कामगारों और उनके बच्चों के लिये भी उपलब्ध करायी जानी चाहिये।

● कामगारों के बच्चों के लिये सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत आने वाली वैकल्पिक और इन्नोवेटिव शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

● इन सबके साथ प्रवासी कामगारों को रहने और कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिये क्रच आदि की सुविधा दी जाए।

● कौशल विकास और अन्य नौकरियों के लिये डोमिसाइल की अनिवार्यता समाप्त कर उन्हें भी इनका लाभ दिया जाए। क्योंकि यह सारी योजनाएं केंद सरकार द्वारा वित्त पोषित केंद्रीय बजट का अंग हैं।

2017 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि अगर इन सुझावों पर सरकार अमल करती है तो, इससे प्रवासी कामगारों की दशा तो सुधरेगी ही और श्रम के महत्व के साथ, उनकी उत्पादकता भी बढ़ेगी। केंद्र सरकार ने इन सुझावों पर कोई अमल तो नहीं किया लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने अपने राज्यों के प्रवासी कामगारों के लिये कुछ सुविधाएं अपने स्तर से दी हैं। कुछ राज्यों जहां के उद्योग इन प्रवासी कामगारों के ही दम पर आश्रित हैं, ने अपने अपने राज्यों में, इनके रहने खाने और अन्य सुख सुविधाओं का ध्यान रखा है। केरल सरकार ने 15,541 राहत शिविरों और सामुदायिक रसोई की व्यवस्था की है।

साथ ही निवास, स्वास्थ्य आदि की भी सुविधाएं दी जा रही हैं। अपने राज्य के प्रवासी कामगारों को जो दूसरे राज्यों में हैं की सुख सुविधा का ध्यान सबसे अधिक ओडिशा राज्य ने रखा है। ओडिशा सरकार ने प्रवासी कामगारों के लिये जहां वे हैं वहां भी उनके लिये शेल्टर होम तथा बच्चों के शिक्षा की व्यवस्था की है और अपने राज्य में जहां से वे गए हैं वहां भी उनके शेष परिवार के लिये व्यवस्था की है। उन ठेकेदारों के खिलाफ भी कार्यवाही की है जो श्रम कानूनों को धता बता कर ऐसे कामगारों का शोषण करते हैं।

अब एक स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि जिस कार्यदल का गठन सरकार ने खुद ही किया हो, फिर उसकी सिफारिशों पर सरकार ने विचार क्यों नहीं किया ? अगर इन सिफारिशों पर अंशतः ही सही, सरकार द्वारा विचार किया गया होता तो, संभव है आज जो संकट प्रवासी कामगारों के संबंध में देश को भोगना पड़ है, कम से कम उनकी गम्भीरता भी कम होती और उन संकटों का सामना करने के लिये सरकार के पास साधन और योजनाएं भी होते। इन प्रवासी कामगारों की जो आय होती है उसका एक बड़ा हिस्सा ये कामगार, अपने परिवार के लिये अपने घर परिवार को भेज देते हैं, जो इन्हीं की कमाई पर निर्भर हैं। ऐसी परिस्थितियों में आज इनके पास धन का अभाव भी है। साधन की कमी है, और जैसे तैसे सैकड़ों किमी की पैदल यात्रा कर के अपने गंतव्य की ओर चलने लगे हैं।

रास्ते में कितने मर गए हैं, कितने बीमार हैं, कितने कोरोना से संक्रमित हैं, यह न उन्हें पता है और न ही सरकार के पास कोई ऐसा साधन है जो यह पता लगा सके। कारण, सरकार के पास  उचित डेटाबेस का अभाव। यह सिलसिला कब तक चलेगा और इसका क्या परिणाम होगा, किसी को भी अब तक पता नहीं है। ऐसी विषम  स्थिति में सबसे पहले यही आवश्यक है कि इन प्रवासी कामगारों और इन पर आश्रित इनके परिवार को भी भुखमरी से बचाया जाए।

हम डिजिटाइजेशन का बड़ा ढोल पीटते हैं पर न तो हमारे पास देश के विकास औऱ जनशक्ति तथा अन्य बिन्दुओं पर कोई विश्वसनीय डेटा बेस है और न ही उन्हें सुरक्षित रखने की तकनीक है, भले ही हम यह दावा सुप्रीम कोर्ट में कर दें कि कई फुट ऊंची और मोटी दीवाल से हमने अपने डेटाबेस को सुरक्षित कर रखा है। प्रधानमंत्री यह तो कहते हैं कि डेटा आज के लिये सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है पर न तो सही डेटाबेस बना पा रहे हैं और न ही उन्हें सुरक्षित रखने का कोई उपक्रम कर पा रहे हैं। प्रवासी कामगारों के संदर्भ में भी, उचित और पर्याप्त डेटाबेस का अभाव भी एक समस्या है ।

आज हम तमाम श्रमिक कानूनों और विभागों के होते हुए भी हमारे पास इनके संदर्भ में कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं है। अतः यह ज़रूरी है कि, इन कामगारों को, उनके खाते में, नक़द धन स्थानांतरित करने के अलावा, इन्हें अस्थायी रूप से रोजगार उत्पन्न करने वाली योजनाओं से भी जोड़ा जाना चाहिए। दान का कृपापात्र बना कर दानदाताओं के एहसान से इन कामगारों को उपकृत करने के बजाय इन्हें सम्मान से जीने और इनका आत्मसम्मान बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि इन्हें खुद ही कमाने और व्यय करने का सम्मानजनक अवसर उपलब्ध कराया जाय।

लॉक डाउन के दौरान, जो इन प्रवासी मज़दूरों पर बीत रही है उसने हमारी संवेदनशीलता के साथ साथ हमारी योजनाओं, उनके क्रियान्वयन, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की पोल खोल कर रख दी है। सत्ता एक वाचाल ढपोर शंख की तरह से नज़र आ रही है जो बदामि च, ददामि न का आचरण कर रही है। वर्तमान संकट में प्रवासी कामगार, दोनो ही जगहों, अपने मूल राज्य और प्रवास के राज्य में उपेक्षित रहे। इसका कारण उचित योजना और उनके क्रियान्वयन का अभाव रहा है।

इनके हितों को सुरक्षित रखने के लिये सरकार ने 1979 में इंटरस्टेट माइग्रेंट वर्कमैन ( रेगुलेशंस ऑफ एम्प्लॉयमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ) एक्ट भी बनाया है। यह कानून भी न्यूनतम मजदूरी, विस्थापन भत्ता, आवास, चिकित्सा सुविधा, सुरक्षात्मक उपकरण आदि मामलों में पर्याप्त संरक्षण और अधिकार देता है पर यही समस्या, कि क्या हम अपनी प्राथमिकता में इन प्रवासी कामगारों को भी कहीं रखते है या नहीं, उभर कर सामने आ जाती है।

हम एक लोक कल्याणकारी राज्य हैं। हमारे संविधान के नीति निर्देशक तत्व हमें एक ऐसा राज्य बनाने की ओर प्रेरित करते हैं जो जनकल्याण पर आधारित हो। इसीलिए मज़दूर, किसान सभी के हित के लिये सरकारें कानून बनाती रहती हैं। पर विडंबना भी यह है कि इन तमाम कानूनों और सिफारिशों के होते हुए भी देश और समाज के विकास में अहम योगदान देने वाला यह तबका वंचित और उपेक्षित ही बना रहता है।

इस संकट की घड़ी में कहां तो उम्मीद थी कि सरकार इनके साथ खड़ी नज़र आएगी, पर अभी कुछ ही दिन पहले गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारों ने श्रमिक कानूनों, जो उन्हें नागरिक और श्रमिक हित संरक्षण देते हैं को, उद्योगों को आमंत्रित करने के बहाने पर स्थगित कर दिया है। अंत्योदय, दरिद्रनारायण, निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का विकास, आदि बेहद आकर्षक शब्दों के बीच सरकार और हमारी प्राथमिकता में कहीं कोई मज़दूर किसान है भी, यह अब सोचना पड़ रहा है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

This post was last modified on May 12, 2020 10:57 am

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