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Monday, September 20, 2021

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कोरोना पर केंद्र: अक्षमता का शिखर और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा

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सत्ता चरण वंदना में जुटी मीडिया अब तलक मोदी डुगडुगी को जोर-जोर से बजाने में पूर्ण मनोयोग से जुटी है और इधर भारत कोरोना वायरस कोविड-19 संक्रमण के संक्रमित मरीजों के मामले में एक-एक करके सभी देशों को पीछे छोड़ता जा रहा है। क्या इटली क्या स्पेन क्या इंग्लैंड……..मजबूत प्रधानमंत्री मोदी जी की नीतियों की अथाह अयोग्यता देश को गर्त में ले जा रही है।

कोरोना संक्रमण के आंकड़े स्वप्निल बुलेट ट्रेन की तरह सरपट भागती ही जा रही हैं और वर्तमान में भारत इंग्लैंड को पीछे छोड़ते हुए चौथे स्थान पर आ गया है। देश मे कोविड-19 संक्रमित मरीजों की संख्या वर्तमान समय में तीन लाख पार कर चुकी है। भारत से आगे अब केवल रूस, ब्राजील और अमेरिका बचा है। जिस तरह से प्रतिदिन के हिसाब से देश में कोरोना मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है उसे देखते हुए जल्द ही भारत पहले स्थान पर काबिज होने वाला है।

अब जरा याद कीजिए जनता कर्फ्यू और उसके बाद देशव्यापी लॉकडाउन को …. 

■ तारीख 19 मार्च 2020, दिन- बृहस्पतिवार जब माननीय प्रधान सेवक मोदी जी अवतारी पुरुष की तरह टीवी स्क्रीन पर अवतरित हुए और राष्ट्र के नाम संबोधन में कोरोना वायरस के चलते पैदा हुए हालात और उससे निपटने के प्रयासों को लेकर चर्चा की। अपने संबोधन में उन्होंने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाने की बात कही थी। लोगों से स्वेच्छा से अपने घरों के अंदर रहने और शाम को कोरोना योद्धाओं का आभार जताते हुए घर की छत से थाली या ताली बजाने का अनुरोध किया था। मीडिया मोदी महिमा के गुणगान में शिद्दत से जुट गया, और सरकार के अनुयायी ताली-थाली पीटने में।

पीएम मोदी।

■ इसके बाद आया तारीख 24 मार्च 2020, दिन-मंगलवार, जब मोदी जी कोरोना मामले में दूसरी बार टीवी स्क्रीन पर साक्षत दर्शन को आए और नोटबन्दी की याद दिलाते हुए 25 मार्च 2020 से 21 दिनों की देशव्यापी लॉक डाउन की घोषणा कर दी। उस समय भारत में कोविड-19 संक्रमण के मामले मात्र 550 ही थे। आज देश में यह संख्या 3 लाख पर कर चुकी है।

■ तारीख 3 अप्रैल 2020, दिन- मंगलवार को एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी जी ने  देशवासियों को एक वीडियो संदेश के जरिए संबोधित किया। अपने संबोधन के द्वारा मोदी जी ने जनता से 5 अप्रैल 2020 को रात के नौ बजे नौ मिनट का समय मांगा। जिसमें जनता से कोरोना योद्धाओं के प्रति सम्मान और एकजुटता प्रदर्शन के लिए नौ मिनट के लिए अपने घर की लाइटें बुझाकर दीये, मोमबत्ती या मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाने का अनुरोध किया। एक बार फिर विपक्ष समेत तमाम बुद्धिजीवी वर्ग इन अवैज्ञानिक असंवेदनशील रवैये पर सवाल खड़ा करते हुए कोरोना के प्रति सरकार के असल दायित्वों को याद दिलाया।

प्रवासी मजदूर देश के विभिन्न शहरों में सरकार के असंवेदनशील रवैये के कारण भूख-प्यास से तड़पते रहे लेकिन ये तमाम आवश्यक और अति महत्वपूर्ण मुद्दे सत्ता सहयोगी मीडिया के मोदी महिमा के प्रवचन के बीच गुम हो गए। सरकार और उनके अंध समर्थक कोरोना संकट से उपजे हालात में लोगों की हृदयविदारक करुण चीत्कार के बीच दिवाली के रूप में आसुरी उत्सव मनाते रहे ताकि लोगों की दर्दनाक चीत्कार इस आतिशबाजी और आसुरी उत्सव के बीच दब जाए। 

रेल की पटरियों पर चलते मज़दूर।

याद कीजिए उस समय दरबारी मीडिया में लगने वाले मजमे को ……सरकार की असंवेदनशीलता और अक्षमता को कवर फायर देने में जुटी मीडिया ने क्या-क्या तर्क गढ़े थे ? टीवी डिबेट में जब विपक्ष का कोई व्यक्ति या बुद्धिजीवी व्यक्ति सरकार की नीतियों और असफलताओं के बारे में प्रश्न करता उसे चीन, अमेरिका, ब्राजील, इटली, रूस, इंग्लैंड जैसे देशों का न्यूज स्टूडियो से भ्रमण करा दिया जाता था। तर्क दिया जाता था कि जहां इतने सक्षम और विकसित देशों की सरकार कोरोना संक्रमण के कहर का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं वहीं मोदी जी ने लॉकडाउन द्वारा भारत को बचा लिया, हमारे यहां इनकी तुलना में संक्रमण बहुत कम है।

मीडिया तो बीजेपी की प्रवक्ता की तरह मोदी जी को अवतारी पुरुष बनाने में जुटी रही। ऐसे बताया जैसे कोविड-19 का समाधान का नाम ही मोदी है। सरकार के अनियोजित लॉकडाउन से देश की अर्थव्यवस्था रसातल में चली गई, बेरोजगारी के तमाम रिकार्ड ध्वस्त हो गए, प्रवासियों के पलायन का मसला सनकी बादशाह तुगलक की याद दिला दी, कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते रहे लेकिन सरकार और बिकाऊ मीडियाकर्मी मोदी डफली बजाते रहे। आज कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या के मामले में भारत चौथे स्थान पर पहुंच गया है।

■ तारीख 14 अप्रैल 2020 को देश के प्रधान सेवक ने चौथी बार देश की जनता को संबोधित किया उन्होंने जनता के सामने सोशल डिस्टेंसिंग का प्रवचन इस अंदाज में सुनाया मानो सरकार का दायित्व इस प्रवचन के साथ ही पूरी हो गया।

माना जा रहा है कि भारत में जो लॉकडाउन किया गया है वह दुनिया भर में सबसे सख़्त और सबसे ज़्यादा लंबे समय तक किया गया है। लेकिन फिर भी प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ते कोविड-19 संक्रमित मरीजों की संख्या को देखते संभावना यही है कि जल्द ही भारत इस मामले में शीर्ष पर काबिज होगा। वर्तमान समय में देश में कोविड-19 संक्रमित मरीजों की आधिकारिक आंकड़ा 3 लाख पार कर चुका है। हर 16 दिन में संक्रमितों की संख्या दुगनी हो रही है। 15 अगस्त आते-आते आंकड़ा 40 से 50 लाख के बीच पहुंच जाएगा। रफ्तार धीमी भी हुई तब भी अक्टूबर में आंकड़ा दो करोड़ पार कर सकता है।

बिहार में इलाज करती एक डॉक्टर।

लेकिन अगर आप स्थिति पर गम्भीरता से विचार करें तो एक बेहद भयानक स्थिति दिखेगी। क्योंकि सरकार संक्रमितों की संख्या के संदर्भ में जो आँकड़ा दे रही है वो महज छलावा है, वास्तविक संख्या तो इससे बहुत ज्यादा है। सरकार असल आंकड़े जनता के सामने आने ही नहीं देना चाहती है।

देश के प्रमुख वैज्ञानिकों के समूह ‘इंडियन साइंटिस्ट रिस्पांस टू कोविड-19’ (INDSCICOV) के अनुसार वास्तव में देश में पॉजिटिव केस सरकारी आंकड़े से बीस या तीस गुना ज्यादा हैं। यानी अभी देश में पॉजिटिव केस की संख्या एक करोड़ के करीब होगी।

असल मसला तो यह है कि जहां कोरोना के मामले अधिक हैं वहाँ भी कोविड-19 वायरस के संक्रमण की टेस्टिंग की रफ्तार बहुत धीमी है। देश के कई हिस्सों में तो कोई टेस्टिंग हुई ही नहीं है और बहुत सारे लोग सरकारी तंत्र के अकुशल प्रबंधन के कारण टेस्टिंग कराना ही नहीं चाहते हैं। राज्य सरकारें कहती हैं हमारे पास पर्याप्त संसाधन ही नहीं हैं। जिन राज्यो में निकट भविष्य में विधानसभा के चुनाव होने वाले है वहाँ की सरकारें तो लगभग टेस्टिंग पर अघोषित रोक ही लगा रखी हैं ताकि जनता को गुमराह किया जा सके और सरकार के खिलाफ असंतोष न बढ़े।

कोरोना संक्रमित मरीजों की दुर्दशा, संक्रमण से मरने वाले लोगों के शवों की दुर्गति और कोविड-19 संक्रमण की कम टेस्टिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। मामले की सुनवाई करते हुए तीन जजों की बेंच ने कहा कि दिल्ली में कोरोना के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, बावजूद इसके यहां टेस्ट कम क्यों हो रहे हैं ? 

अब जरा सोचिए कि अगर अदालत इसी तरह की फटकार बिहार और यूपी जैसे राज्यों की सरकारों को लगाती है तो हालात क्या होंगे ?

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा देश भर में करवाए गए सेरोलॉजिकल सर्वेक्षण के अनुसार कोरोना के हॉटस्पॉट वाले इलाकों के बाहर, यानी सामान्य क्षेत्रों में, 30 अप्रैल तक 0.73% लोगों में कोरोना फैल चुका था। जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो इसका मतलब है कि अप्रैल के अंत तक 97 लाख लोग संक्रमित हो चुके थे। 

पिछले दिनों AIIMS के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने दिल्ली और मुंबई में कम्युनटी ट्रांसमिशन की आशंका भी जताई है। NDTV को दिए एक विशेष साक्षात्कार में AIIMS के निदेशक रणदीप गुलेरिया नेकहा कि भारत में कोरोनो वायरस के मामले दो से तीन महीनों में चरम पर आ सकते हैं। यानि अभी ये आँकड़े काफी तेजी से बढ़ने वाले हैं ये तय है।

अस्पताल का एक दृश्य।

क्या अब भी सरकार और दरबारी मीडिया उचित चिकित्सीय सुविधा, टेस्टिंग सुविधा, और विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए नीतियों और कार्यक्रमों के निर्धारण और क्रियान्वयन की जगह केवल अनियोजित लॉक डाउन से क्या हासिल किया ये बता पाने की जहमत उठाएगी ?  

अनियोजित लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था अंध महासागर में हिचकोले खा रही है, उद्योग-धंधे ठप्प हो चुके हैं, बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियां चली गईं, रोजी-रोटी का भयावह संकट उत्पन्न हो गया है और कोरोना संक्रमण का नियंत्रण भी नहीं हो पा रहा है। फिर ऐसी निकम्मी सरकार की क्या जरूरत?

अभी चन्द दिनों पूर्व बीजेपी के चुनावी महारथी और देश के गृहमंत्री माननीय अमित शाह जी देश की हालात से बेख़बर चुनावी अभियान में जुटे। इस दौरान उनका एक बयान आया जो सरकार की असंवेदनशीलता और जनता के प्रति उनकी लापरवाहियों को बखूबी बता गया। गृहमंत्री ने अपने बयान में कहा, “मैं मानता हूं कि कोरोना संकट के दौरान सरकार की ओर से उठाए गए क़दमों में कमी रह गई होगी लेकिन विपक्ष ने क्या किया?”

विशाल लोकतांत्रिक देश के गृहमंत्री का बयान ही यह बताने के लिए काफी है कि जनता के प्रति सरकार कितनी जिम्मेवार और संवेदनशील है।

(दया नन्द शिक्षाविद और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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