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Categories: बीच बहस

फिर सवालों के घेरे में कॉलेजियम प्रणाली

उच्चतम न्यायालय और देश के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं बनाई गई कॉलेजियम प्रणाली अपारदर्शिता, पक्षपात, भाई-भतीजावाद और राजनीतिक पूर्वागृहों के कारण लगातार अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है। इस पर न्यायपालिका के अंदर से भी आवाजें उठनी शुरू हो गई हैं।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा सिर्फ एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि कॉलेजियम प्रणाली का विरोध न केवल संबंधित उच्च न्यायालयों के वकील कर रहे हैं, बल्कि उच्च न्यायालय कॉलेजियम की सिफारिशों में से आधे नामों को उच्चतम न्यायालय का कॉलेजियम रद्द कर दे रहा है और जब शेष सिफारिशें सरकार के पास जाती हैं तो वहां न केवल अनिश्चित काल तक लटकी रहती हैं, बल्कि वहां से भी अधिकांश सिफारिशें पुनर्विचार के लिए उच्चतम न्यायालय को वापस लौटा दी जा रही हैं। नतीजतन कॉलेजियम प्रणाली लगभग असफल होती दिख रही है।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता में उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने दिल्ली उच्च न्यायालय के छह अधिवक्ताओं की न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति की सिफारिश की है। जस्टिस बोबडे के साथ, जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस यूयू ललित कॉलेजियम में शामिल हैं।

सोमवार को हुई बैठक में कॉलेजियम ने अधिवक्ता जसमीत सिंह, अमित बंसल, तारा वितास्ता गंजू, अनीश दयाल, अमित शर्मा और मिनी पुष्करना ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में अनुशंसा की, जबकि पूनम ए बामबा, यशवंत कुमार, नीना बंसल कृष्णा, धर्मेश शर्मा, दिनेश कुमार शर्मा और एइ मेंहदीरत्ता का नाम वरिष्ठता की अनदेखी और प्रतिकूल आईबी रिपोर्ट के हवाले से वापस लौटा दिया।

इससे पहले कॉलेजियम ने इलाहाबाद, केरल और गुजरात हाईकोर्ट के न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के रूप में नियुक्ति की अनुशंसा की थी। 14 अगस्त को हुई बैठक में कॉलेजियम ने इलाहबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में न्यायिक अधिकारियों सुभाष चंद्र, संजय कुमार पचौरी, सुभाष चंद्र शर्मा और सरोज यादव के नामों की अनुशंसा की थी।

कॉलेजियम ने इसके अलावा अधिवक्ता जियाद रहमान और मुरली पुरुषोत्तम और न्यायिक अधिकारी कौसर इडप्पागठ और करुणाकरण बाबू को केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधिश के रूप नियुक्ति की स्वीकृति के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दी थी। इसके अलावा कॉलेजियम ने निर्जर कुमार सुशील कुमार देसाई, वैभवी देवांग नानावती और निखिल श्रीधरन करियल को गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति की मंजूरी दी। कॉलेजियम का निर्णय उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है।

इसी तरह उच्चतम न्यायालय  के कॉलेजियम ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा भेजे गए पांच नामों में से राजेश भारद्वाज के नाम की मंजूरी दी। कॉलेजियम ने 17 अगस्त को हुई अपनी बैठक में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अधिवक्ता राजेश कुमार भारद्वाज के नाम  को मंजूरी दी है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने पांच और अधिवक्ताओं, जसजीत सिंह बेदी, पंकज जैन, विकास सूरी, संदीप मौदगिल और विनोद भारद्वाज के नाम की सिफारिश की है। यह पांच की पिछली सूची के अतिरिक्त है। भारद्वाज का नाम पिछले साल अगस्त में किसी समय भेजे गए पांच लोगों में से था।

इसके पहले मई 2020 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हाइकोर्ट जजों के पद पर बहाली के लिए जिन एक दर्जन नामों की सिफ़ारिश की थी, उन्हें नरेंद्र मोदी सरकार ने उन नामों पर ‘पुनर्विचार’ के लिए कहकर लौटा दिया था। सरकार ने ये नाम धीरे-धीरे वापस किए थे और ऐसा करते हुए सरकार ने कुछ नामों को वापस करते हुए निरर्थक कारण बताए, तो बाकी के लिए कोई कारण नहीं बताया। ये नाम जो एक साथ एक फाइल में वापस नहीं भेजे गए थे, बल्कि कुछ-कुछ समय बाद अलग-अलग भेजे गए, वे आठ हाइकोर्टों में नियुक्ति के लिए थे।

जो नाम वापस भेजे गए उनकी सिफ़ारिश इलाहाबाद, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हरियाणा, राजस्थान, मद्रास, केरल और कर्नाटक हाइकोर्ट में जजों के पदों पर नियुक्ति के लिए की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की सिफ़ारिश के साथ भेजे गए जिन कुछ और नामों को सरकार ने पुनर्विचार के लिए वापस भेजा है, उनमें इलाहाबाद हाइकोर्ट के एडवोकेट रामानंद पांडेय, विवेक रत्न अग्रवाल, रमेंदर प्रताप सिंह, और आलोक कुमार भी हैं।

मई 2018 में राजस्थान हाइकोर्ट के कॉलेजियम ने जज के पद पर नियुक्ति के लिए नौ वकीलों के नामों की सिफ़ारिश की थी। एक साल बाद 24 जुलाई 2019 को सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने इनमें से दो नामों महेंद्र गोयल और फ़रज़ंद अली के नाम मंजूर किए और बाकी को या तो खारिज कर दिया या उन पर फैसला स्थगित रखा। चार नवंबर 2019 को केंद्र सरकार ने महेंद्र गोयल की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की, मगर फ़रज़ंद अली के नाम को ठंडे बस्ते में डाल दिया और अब अली के नाम पर भी पुनर्विचार करने के लिए कहा है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इलाहाबाद हाइकोर्ट में 57 जजों के, जम्मू-कश्मीर में पांच, पंजाब और हरियाणा में 29, राजस्थान में 25, मद्रास में 21, केरल में 10 और कर्नाटक हाइकोर्ट में 16 जजों के पद खाली हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on August 21, 2020 11:34 am

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