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Categories: बीच बहस

विनिवेश: शौरी तो महज मुखौटा थे, मलाई ‘दामाद’ और दूसरों ने खायी

एनडीए प्रथम सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आरएसएस की निजीकरण की नीति के तहत सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में सरकारी हिस्सेदारी के विनिवेश को अपने शासन का नीतिगत आचरण बना लिया था। उस दौर में मारुति, बाल्को, आईपीसीएल समेत दर्जनों विनिवेश सौदों में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे पर यह कवायद लगातार चलती रही। कवायद थमती भी कैसे जब स्वयं वाजपेयी अर्जुन थे और उनके दामाद रंजन भट्टाचार्य बने हुए थे उनके गांडीव! दरअसल इस आख्यान में तब के केंद्रीय विनिवेश मंत्री अरुण शौरी की हैसियत एक शिखंडी की कही जानी चाहिए।

अब जोधपुर की स्पेशल कोर्ट ने दो दशक पहले के अटल सरकार के ऐसे ही एक विनिवेश घोटाले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को अस्वीकार करते हुए मंत्री शौरी और तब के विनिवेश सचिव प्रदीप बैजल समेत पांच लोगों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज कर इन्वेस्टीगेशन का आदेश दिया है। उदयपुर स्थित आईटीडीसी के लक्ष्मी विलास होटल को तब इस गिरोह ने विनिवेश के नाम पर मात्र 7 करोड़ 52 लाख में ललित सूरी के भारत होटल्स लिमिटेड को बाजार की कीमत से 244 करोड़ रुपये कम में बेच दिया था।

वाजपेयी सरकार ने 10 दिसंबर, 1999 को अलग विनिवेश विभाग का गठन कर इसे पहले प्रमोद महाजन को सौंपा था। महाजन की फंड-जुटाऊ ख्याति के चलते उन पर आरोप लगने स्वाभाविक थे और उनके राजनीतिक कद को देखते हुए उनसे शिखंडी की भूमिका निभाने की उम्मीद करना भी व्यर्थ होता। 6 सितंबर, 2001 को विनिवेश मंत्रालय बना दिया गया और कमान स्वच्छ छवि के अरुण शौरी को पकड़ा दी गई। उन्हें आगे करके पर्दे के पीछे से बड़े-बड़े खेल खेलने वालों को सुविधा रहती। वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य स्वयं एक वरिष्ठ होटल अधिकारी रहे थे और लक्ष्मी विलास होटल के सौदे में उनकी सक्रियता किसी से छिपी नहीं थी।

2004 में यूपीए सरकार बनने के बाद कर्मचारी संगठनों के लक्ष्मी विलास होटल के विनिवेश की उच्च स्तरीय जांच कराए जाने की मांग ने तूल पकड़ा और काफी जद्दोजहद के बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपी दी गई। सीबीआई तब भी यानी यूपीए शासन में भी उसी तरह पिंजरे में बंद तोता होती थी जैसे अब एनडीए के मोदी राज में नजर आती है। सीबीआई ने अपनी जांच में लक्ष्मी विलास पैलेस होटल की संपत्ति को लगभग 151 करोड़ रुपये की बताया लेकिन अगस्त 2019 में केस में क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। जोधपुर की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने अब इस रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया है और मंत्री शौरी, विनिवेश सचिव बैजल, पर्यटन सचिव रवि विनय झा, फाइनेंशियल एडवाइजर आशीष गुहा, निजी वैल्यूअर कंपनी कांति करमसे के साथ भारत होटल्स लिमिटेड के खिलाफ भी इन्वेस्टीगेशन कर केस चलाने का आदेश दिया है।

यूपीए के दस-साला मनमोहन सिंह शासन के दौर में सीबीआई में यस मैन डायरेक्टरों के बाद दो सर्वाधिक शातिर डायरेक्टर आये थे। इनमें से एक रंजीत सिन्हा के जमाने में वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य ने उनसे घर पर मुलाकातें भी कीं, जो सुप्रीम कोर्ट निर्देशित जांच में सिद्ध भी हो चुका है और उस पर कार्यवाही होनी है। एनडीए के मोदी जमाने में भी यस मैन डायरेक्टर ही लगते रहे हैं और उनमें से दो के बीच की एक दूसरे से बढ़-चढ़ कर राजनीतिक वफादारी का कीचड़ उछालने की जंग भी सार्वजनिक जानकारी का विषय रही है। ऐसे माहौल में आरएसएस के पुराने वफादार सिपाही अरुण शौरी को केस में बाँध पाना सीबीआई के बस में नहीं था।

अब भी यदि जांच के घेरे में वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य को नहीं शामिल किया जा सका तो यह आख्यान बस एक शिखंडी की भूमिका जांचने तक सिमट कर रह जाएगा। ध्यान रहे कि 1998 से 2004 के बीच वाजपेयी सरकार ने कुल 37000 करोड़ का विनिवेश किया था जबकि इससे पहले 1995-96 में कुल सरकारी विनिवेश 168 करोड़ का ही था। आज के सन्दर्भ में वाजिब सवाल होगा कि मोदी सरकार भी जो एक के बाद एक सरकारी संपत्ति अंधाधुंध निपटाती जा रही है, वह क्या है?

(विकास नारायण राय हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पुलिस एकैडमी के निदेशक रह चुके हैं।)

This post was last modified on September 18, 2020 12:53 pm

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