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Categories: बीच बहस

‘इस समय’ और ‘उस समय’ का ‘आपातकाल’

क्या इंदिरा गांधी की इमरजेंसी (आपातकाल) का कुख्यात दौर मौजूदा मोदी-शाह रेजीम से भी बुरा था? इमरजेंसी और फ़ासीवाद में क्या फ़र्क़ है? इमरजेंसी के दौरान आरएसएस की भूमिका क्या थी? क्या इमरजेंसी का तात्कालिक और दूरगामी सबसे ज़्यादा फ़ायदा आरएसएस को हुआ? क्या इमरजेंसी ने भविष्य में आने जा रहे फ़ासीवाद का रास्ता खोल दिया था?

1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आंतरिक और वाह्य खतरों का दावा करते हुए 25 जून को तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के जरिये पूरे देश में इमरजेंसी लागू कर दी थी। 21 मार्च 1977 तक 21 महीने का यह दौर बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के हनन, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियों और नसबंदी जैसे अभियान चलाकर अल्पसंख्यकों, दलितों व दूसरे साधारण लोगों को निशाना बनाने के लिए इतिहास में दर्ज़ है। यही दौर था जब संजय गाँधी कांग्रेस पार्टी संगठन और सत्ता में अपनी प्रधानमंत्री मां से ज़्यादा ताक़तवर माना जा रहा था और दमन की कार्रवाइयों की डोर उसके ही हाथों में मानी जा रही थी।

आज इमरजेंसी की बरसी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ट्वीट किए। मोदी ने ट्वीट में कहा कि आज से ठीक 45 वर्ष पहले देश पर आपातकाल थोपा गया था। उस समय भारत के लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिन लोगों ने संघर्ष किया, यातनाएं झेलीं, उन सबको मेरा शत-शत नमन! उनका त्याग और बलिदान देश कभी नहीं भूल पाएगा।

शाह ने कहा कि भारत की विपक्षी पार्टी होने के नाते कांग्रेस को खुद से पूछना चाहिए कि अब तक इमरजेंसी की मानसिकता क्यों बना रखी है? जो एक वंश से ताल्लुक नहीं रखते, वे कुछ भी बोलने में असमर्थ हैं? कांग्रेस में नेता क्यों हताश हो रहे हैं?’ भाजपा के दूसरे नेताओं ने भी कांग्रेस को आड़े हाथों लिया है। सभी चैनल मोदी-शाह के ट्वीट का हवाला देते हुए इमरजेंसी पर कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं और लोकतंत्र की दुहाई देते हुए कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। जाहिर है कि भारतीय लोकतंत्र के सामने पैदा हुए ऐसे किसी भी पहले सबसे बड़े संकट को याद रखना ज़रूरी है। लेकिन, सवाल यह है कि जिस लोकतंत्र को इंदिरा की इमरजेंसी में बंधक बना लिया गया था, आज वह किस हाल में है। इमरजेंसी की बरसी पर आज दिखाई दे रहे ज़्यादातर लेखों में यह बिंदु या तो नदारद है या फिर उसे काफ़ी अंडरप्ले किया गया है।

इस समय और उस समय के अंतर को समझने के लिए इमरजेंसी के दौरान दमन के मुक़ाबले खड़े हुए जन-प्रतिरोध को याद करना ज़रूरी है। इंदिरा बल्कि उनसे ज़्यादा उनके लाडले युवराज संजय गांधी का आतंक चरम पर था। इमरजेंसी लागू होने से पहले ही कांग्रेस में बहुत से दिग्गज उनके हाथों अपमानित होते रहे थे और राजनीति में गुंडागर्दी और दलाली की एक नयी इबारत लिखी जा रही थी। इमरजेंसी के अत्याचार का असर राजनीति और मीडिया के फील्ड में ज़्यादा था। मीडिया को कंट्रोल करने की कोशिशें की जा रही थीं और विपक्ष के नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया था या फिर भूमिगत होने के लिए मज़बूर कर दिया गया था। हां, इसी दौरान नक्सलवाद के नाम पर भी दमनचक्र तेज़ कर दिया गया था।

अगर, सीधे आम लोगों पर इमरजेंसी के असर की बात करें तो इसके निशाने पर ख़ासतौर से मुसलमान और दलित थे। नसबंदी और ग़रीबों की बस्तियों को मिस्मार करने के अभियान के शिकार यही दो तबके सबसे ज़्यादा हुए। नेस्तनाबूद करने के अभियानों में बाद तक शासकों के भरोसेमंद रहे जगमोहन ने तब डीडीए के उपाध्यक्ष के तौर पर दिल्ली के तुर्कमान गेट को रौंद डाला था और तबाही का यह मंज़र देखने के लिए संजय गांधी ख़ुद मौजूद था। ओस टपकी है कैसी ज़हर आलूद !..., शमशेर बहादुर सिंह की कविता तुर्कमान गेट इस तबाही से आहत होकर ही लिखी गई थी।

नसबंदी का टार्गेट जिस तरह पूरा किया जा रहा था, उसका आतंक ऐसा था कि नौजवानों से लेकर बूढ़े तक मर्द खेतों में जाकर छुपने लगे थे। असल में आम लोगों में इमरजेंसी से ज़्य़ादा गुस्सा नसबंदी को लेकर था। नसबंदी की आड़ में ही साम्प्रदायिक अभियान को भी गति दी जा रही थी। मुज़फ़्फ़रनगर के खालापार में तब के जनसंहार का शहीद स्मारक ख़स्ताहाल में आज भी मौजूद है। यूं, बाद में तो कांग्रेस की सरकार में ही मुस्लिम जनसंहार की देश की सबसे कुख्यात घटनाओं में शामिल ‘मुरादाबाद जनसंहार’ भी हुआ। संजय द्वारा ही मुख्यमंत्री बनाए गए वीपी के यूपी शासनकाल में।

मार्के की बात यह थी कि जितना आतंक था, इमरजेंसी का विरोध भी उतना ही प्रबल था। अखबारों को प्रभावित कर लिया गया था पर आज की तरह मीडिया से प्रतिरोध नदारद नहीं हुआ था। न्यायालयों को लेकर भी यही स्थिति थी। विपक्षी नेताओं में लड़ने का साहस था। जनता लामबंद हो गई थी। युवा और ख़ासकर छात्रों में प्रतिरोध की ज़बरदस्त लहर थी। जयप्रकाश नारायण की बड़ी शक्ति यही युवा बने थे। प्रतिरोध की क़ीमत अदा करते हुए एक जनमत तैयार किया जा चुका था जिससे इंदिरा घबराई हुई थीं। आलम यह था कि व्यापक एकता के नाम पर असंभव के संभव होने जैसी जो बात हुई थी, वह थी लेफ्ट-राइट यूनिटी

लेफ्ट के लिए यह कदम कितना उचित था, यह एक अलग सवाल है। अगर आरएसएस फ़ासीवादी संगठन है, तो जेपी भी फ़ासीवादी है, जैसी घोषणा कर उसे आंदोलन में शामिल करने के विरोध को सिरे से खारिज कर देने वाले लोकनायक जेपी थे। यह दिलचस्प है कि आरएसएस के संबंध में जिस फ़ासीवादी टर्म के इस्तेमाल को लेकर बाद तक बहुत से बुद्धिजीवी और अधिकांश विपक्षी नेता बचते रहे, उसका ऐसा प्रबल हवाला इमरजेंसी के दौरान भी था। बहरहाल, राजनीतिक रूप से अलग-थलग आरएसएस और उसकी पॉलिटिकल विंग जनसंघ को एक बड़ी ताक़त के रूप में जीवित करने का श्रेय/बदनामी भी जेपी के ही हिस्से में है।

इमरजेंसी के दौरान आरएसएस और उसकी राजनीतिक विंग जनसंघ की भूमिका बड़ी विरोधाभासी रही। इमरजेंसी के विरोध में बड़े जनांदोलन में जेपी के जरिये शामिल हो जाने से संघ को देश की राजनीति की मुख्यधारा में मज़बूती से खड़े होने का मौक़ा हासिल हो गया। जेल यात्राओं के दौरान ही आरएसएस ने इंदिरा गांधी के साथ खिचड़ी भी पका ली थी।

आरएसएस के तीसरे संघचालक, मधुकर दत्तात्रेय देवरस जिन्हें बालासाहेब देवरस के नाम से जाना जाता है, इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी को चिट्ठियां लिखकर उनके कसीदे काढ़ रहे थे। उसी तरह जैसे कि कभी आरएसएस के नायक सावरकर ने जेल से चिट्ठियां लिखकर अंग्रेजों की स्तुति की थी। देवरस सहित संघ के अधिकांश लोग विरोध न करने का हलफनामा देकर ज़ल्दी ही रिहा हो गए थे। उस वक़्त के अख़बारों की कतरनों के रिकॉर्ड हैं कि इनमें से बहुत से 20 दिनों की जेल भी नहीं झेल पाये थे और हलफ़नामा देकर बाहर आ गए थे।

आम चुनाव में इंदिरा गांधी की सरकार साफ़ हो गई तो जनता पार्टी में विलय हो चुकी जनसंघ के अटल-आडवाणी जैसे नेता पहली गैरकांग्रेसी सरकार के मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभाग झटकने में सफल रहे। सूचना-प्रसारण मंत्री की हैसियत से लालकृष्ण आडवाणी ने संघ से जुड़े युवाओं को महत्वपूर्ण विभागों और मीडिया में बड़े पैमाने पर घुसा दिया जिसका लाभ आरएसएस को अपने पक्ष में जनमत तैयार करने और बाबरी मस्जिद के विरोध में चलाए गए अभियानों से लेकर बाद तक लगातार मिलता रहा। यह भी दिलचस्प है कि जिस जमाने में आरएसएस और उसके आनुषांगिक संगठनों के पास सोशल मीडिया जैसी ताक़त नहीं थी तब भी मनचाहे प्रचार का उसका नेटवर्क नीचे जनता तक आश्चर्यजनक रूप से मज़बूत था।

यह कम दिलचस्प नहीं है कि जिस तरह गोडसे की छवि को लेकर नीचे-नीचे नायक के रूप में प्रचारित किया जाता था, उसी तर्ज़ पर संजय गांधी की बतौर मुस्लिम संहारकछवि भी आम चर्चाओं में यह कहते हुए प्रचारित की जाती थी कि संजय गांधी की जवान मौत न होती तो नसबंदी जैसे अभियानों से शुरू किया गया सफाये का काम पूरा हो जाता। ऐसे प्रचार किसके काम आते हैं, यह समझना कठिन नहीं है। दिलचस्प तो यह भी कम नहीं है कि इमरजेंसी के विलेन संजय की पत्नी मेनका गांधी और फायरब्रांड कहे जाने वाले संजय के बेटे वरुण भाजपा में ही हैं।

जनता सरकार के तुरत-फुरत पतन के बाद सत्ता में भव्य वापसी करने वाली इंदिरा गांधी पहले से ज्यादा हिन्दू थीं। संसद में प्रतिनिधित्व के तौर पर कोई हैसियत नहीं रखने वाले जनसंघ और उसके मातृ संगठन आरएसएस के समाज में बढ़ते असर को भांपकर इंदिरा इमरजेंसी से पहले ही हिन्दूवादी कार्ड खेलने लगी थीं। अब यह उनकी रणनीति में अहम था। इमरजेंसी के दौरान आरएसएस नेताओं से कायम हुए राब्ते भी काम आने थे (अंतत: दूर तलक आरएसएस ही के)। इमरजेंसी ने जिस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं बल्कि लोकतांत्रिक परिकल्पना पर ही जो वार किया था, संघ का तो एजेंडा हमेशा ही यही था।

इमरजेंसी के बाद देश में तेजी से आए बदलावों ने संघ की मुहिम को काफी आसान किया। बेशक, बंगाल और केरल में वाम सत्ता में आया पर जनता पार्टी की सरकार के दारुण पतन ने हिन्दी पट्टी में बेहतर राजनीति के सपने को ध्वस्त कर दिया। फिर, इंदिरा और उसके उत्तराधिकारियों के नेतृत्व में कांग्रेस ने उत्तरोत्तर दक्षिणपंथ व पूंजीवाद की जड़ें सींचने में कसर नहीं उठा रखी। पंजाब में इंदिरा की राजनीति इसी रवैये का एक निकृष्ट उदाहरण है।

बाद में कांग्रेस की राव सरकार ने बड़ी ख़ुशी से आरएसएस को बाबरी मस्जिद गिराने दी और राव-मनमोहन जोड़ी ही निजीकरण और उदार पूंजीवाद के शुरुआती मसीहा बनकर उभरी। इमरजेंसी से फासिस्टों के लिए जो राह बनी थी, वह नए आर्थिक ताने-बाने के सूत्रधारों की मदद से और मज़बूत हुई। अंतत: फ़ासिस्टों को जनचेतना को कुंठित, रूढ़िवादी, साम्प्रदायिक, भ्रष्ट, लालची और हिंसक बनाने में बड़ी कामयाबी हासिल हो गई।

इमरजेंसी की बरसी पर इसके सबसे बड़े लाभान्वित लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हों तो आज के हालात पर नज़र डाल लेना ज़रूरी है। यूं भी अतीत में लोकतंत्र पर किसी हमले को याद करने का कोई अर्थ तभी है जब हम उससे सबक लेकर लोकतंत्र की आज की स्थिति को लेकर सचेत हों। सवाल यह है कि इमरजेंसी में लोकतंत्र की जिन संस्थाओं को कब्ज़े में लेने की कोशिशें हुई थीं, क्या उस वक़्त वे पूरी तरह सरेंडर थीं या आज।

आज जबकि इमरजेंसी जैसी किसी औपचारिक घोषणा की ज़रूरत के बिना प्रतिरोध के हर लोकतांत्रिक स्वर को कुचल दिया जा रहा हो, अल्पसंख्यकों के जीवन के लाले पड़ रहे हों, बड़े पैमाने पर बुद्धिजीवी, ऐसे बुद्धिजीवी भी जिनके सोचने-समझने की दुनिया भर में साख हो, जेलों में बंद किए जा रहे हों, एक पूरा राज्य कश्मीर बेहाल हो, सोशल एक्टिविस्ट, युवा स्त्री-पुरुष, प्रतिरोध के किसी आंदोलन में शामिल हो जाने वाले आम नागरिक कड़े कानूनों से घेरे जा रहे हों और लोकतंत्र में नागरिक होने के अधिकार पर ही संकट हों, तब क्या इमरजेंसी के दौर जैसी विपक्ष की आंदोलनकारी आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं?

लोकतंत्र में वंचित तबकों को हासिल हुए अधिकारों को छीनने की गति पिछले कुछ सालों में भयानक रूप से तेज़ हुई है। एक महामारी के दौरान करोड़ों मज़दूरों को सड़कों पर बेबस मार-खाते, मरते-गिरते पैदल हजारों-हज़ार किलोमीटर चलने पर मज़बूर कर दिए जाने और संकट के समय जन कल्याण के बजाय कॉरपोरेट के हितों पर ही ज़ोर होने की नीतिय़ों को आप क्या कहेंगे?

याद रखिए, इमरजेंसी में इंदिरा के अधिनायकवाद के बावजूद सार्वजनिक संसाधनों की ऐसी लूट नहीं हो रही थी और स्टेट के रुटीन वेलफेयर प्रोग्राम भी भयानक अभियानों के साथ ज़ारी थे। सबसे बड़ी बात थी कि जो हो रहा था, उसे रेकॉर्ड पर लाया जा रहा था। उन अत्याचारों का डॉक्यूमेंन्टेशन भी किया गया और कमीशन भी बैठाए गए। आज पॉपुलर मीडिया तक में प्रतिरोध के किसी स्वर को स्पेस मिलना संभव नहीं है। उलटे मीडिया विपक्ष की लिचिंग में बढ़-चढ़कर भूमिका अदा करता है।

घुग्घु बनी बैठी अधिकांश विपक्षी पार्टियां भी जब सिर्फ़ इमरजेंसी को ही याद करें और वर्तमान पर चुप्पी साधे रखें तो स्थिति को समझा जा सकता है। बहुत से ख़ुशरंग लिबरल बुद्धिजीवी इसी अटकल पर लेख लिख रहे हैं कि क्या भविष्य में कभी इमरजेंसी की पुनराव़ृत्ति हो सकती है। लेकिन, वाम के बहुत से बुद्धिजीवियों के लेख भी इमरजेंसी के कारनामों तक ही महदूद हों तो क्या उन्हें भी इस समवेत गान में शामिल माना जाए? सही है कि वे उस परंपरा से आए हैं जो इमरजेंसी के दौरान प्रतिरोध (एक धारा के समर्पण के बावजूद) में थी। उसका बार-बार ज़िक्र ज़रूरी है पर आज के फ़ासिज़्म का उल्लेख करते हुए।

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)

This post was last modified on June 26, 2020 5:46 pm

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