किसान आंदोलन: ब्राह्मण धर्म से बगावत के संकेत

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अक्सर भारतीय जनमानस में यह चर्चा दिमाग मे बिठाने की कोशिश की जाती रही है कि अत्याचारों के डर से बड़े स्तर पर लोगों ने धर्म परिवर्तन किये थे। भारत की नौकरी वाली किताबों की पाठक पीढ़ी को सेलेबस से परे अन्य कुछ पढ़ने को मिला हो या न मिला हो लेकिन यह जरूर पढ़ने सुनने को मिलता है कि औरंगजेब ने जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन करवाया था। मंदिर तोड़े गए थे।

क्या वास्तव में ऐसा ही था? ईसा पूर्व छठी शताब्दी में बुद्ध, जैन, आजीवक, चार्वाक बने थे क्या उन को भी किसी ने जबर्दस्ती बनाया था? उस समय इस्लाम दुनियां के परदे पर भी नहीं था और ईसाईयत भी नहीं। भारतीय इतिहास जो सिंधु सभ्यता के बाद वैदिक काल, उत्तर वैदिक काल, रामायण-महाभारत काल कहा जाता है, वैसा कुछ नहीं था। पुरातात्विक तथ्य इस की पुष्टि नहीं करते। भाषा की लिपि भी नहीं मिली। ज्ञात रहे सिंधु सभ्यता की लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी, लेकिन पाली व प्राकृत भाषाओं का उद्गम उसी बोली से हुआ था।

मौर्य राजा वृहद्रथ की हत्या भारतीय इतिहास का टर्निंग पॉइंट माना जाता है। मौर्यकाल मे बौद्ध धर्म चरम पर था। साफ जाहिर होता है कि वो पिछले लंबे समय से चला आ रहा था और अशोक के बाद सत्ता ने अहिंसा का इतना मोटा आवरण ओढ़ लिया। लड़ने की ताकत को कमजोर कर बैठे और कोई धर्म जितना पुराना होता है, उस में उतनी व्याधियां भी आ जाती हैं।

वृहद्रथ की हत्या के बाद अराजकता फैली व आपसी संघर्ष शुरू हुआ, जिसे तथाकथित इतिहासकारों ने अंधकार युग, संक्रमण काल कहा था। बुद्ध धर्म के साथ ब्राह्मणों ने क्या किया था वो दुनिया जानती है। गुप्तकाल को स्वर्णकाल यूं ही नहीं कहा जाता है।

औरंगजेब काल में ब्राह्मण जजिया कर से मुक्त थे जब कि गोकुलसिंह जाट अंतिम दम तक मुकाबला कर रहे थे। टोडरमल/बीरबल मुगलों के दरबारी थे लेकिन इन का धर्म परिवर्तन नहीं करवाया। औरंगजेब ने मंदिर तोड़े तो मस्जिदें भी तोड़ीं। मंदिरों का जीर्णोद्धार भी करवाया।

सब से रोचक बात है कि ऐबक, गौरी, तुगलक से होते हुए बाबर तक पहुंच गए लेकिन सिंधु सभ्यता के लोगों ने इस्लाम अपनाने के बजाय गुरु नानक के नेतृत्व में सिख धर्म खड़ा कर लिया। धार्मिक सत्ता से डर कर अपना धर्म छोड़ कर नया धर्म खड़ा कर ले, यह गजब का डर था।

जब अपना कह कर नजदीक आता है और फिर जहर फैलाना शुरू करता है तो उस से बगावत होती है। गुप्तकाल के बाद धीरेधीरे बगावत की तरफ बढ़ने लगे। इसी बगावत का नेतृत्व संत परंपरा के लोगों ने किया। गोरखनाथ, कबीर, नानक आदि संतों ने ब्राह्मणधर्म के पाखंड व अंधविश्वास के खिलाफ बड़ी चोट की थी।

नाथ व कबीर अलग पंथ बने लेकिन अनुयायी लोग तुलसीदास के अनुयायियों से ढंग से मुकाबला न कर सके। गुरु नानक के अनुयायियों ने सिक्खिज्म को संगठित कर के अलग धर्म की पहचान दे दी। ज्ञात रहे वाल्मीकि रामायण में राम एक राजा होते हैं। कबीर-गोरखनाथ के राम एक भगवान होते हैं। इस के मुकाबले के लिए तुलसीदास कृत रामचरितमानस में राजा राम को भगवान श्रीराम के रूप में प्रस्तुत किया गया।

उस के बाद भी दादू, दरियाव, जसनाथजी, जाम्भोजी आदि के नेतृत्व में करोड़ों लोगों ने ब्राह्मणधर्म से बगावत की मगर धर्म के रूप में अलग पहचान स्थापित नहीं कर पाए। किसान कौमों ने ब्राह्मण धर्म की वर्णिक व्यवस्था का सदा मुकाबला किया। जब भी हमला करने की कोशिश की गई तो बड़ी बगावतें हुईं। सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले के मुताबिक हिन्दू जीवन जीने की पद्धति है धर्म नहीं।

 जब गुरु गोविंदसिंह ने खालसा पंथ की स्थापना कर दी और विधिवित रूप से सिक्खिज्म धर्म के रूप में उभरा तो उत्तर भारत की सब से बड़ी किसान कौम अर्थात जाटों ने बड़े स्तर पर सिक्खिज्म धारण करना शुरू कर दिया। तभी बीच में मूलशंकर तिवारी आते हैं और यह गति थम सी जाती है। उस समय भी मुगल काल ही था और बगावत ब्राह्मण धर्म के खिलाफ हो रही थी और जा रहे थे सिक्ख धर्म में। इस्लामी सत्ता जरूर थी मगर प्रजा के सोशल रिफॉर्म्स के आस पास भी नहीं थी।

हालिया किसान आंदोलन को शुरू से अब तक देखें तो जैसे-जैसे लंबा खिंचता जा रहा है, वैसे-वैसे सदियों का दर्द साथ पर आ रहा है। लोग अलग-अलग तरीके से अपनी-अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं। तीन कृषि कानूनों को ले कर जो सरकार की तरफ से हठधर्मिता अपनाई जा रही है, उस से आमजन को अहसास होने लगा है कि सत्ता में बैठे लोग हमारे नहीं हैं, हमारे हितेषी नहीं हैं। यह संघर्ष अब सोशल रिफॉर्म्स की तरफ बढ़ने का संकेत दे रहा है।

किसान नेता राकेश टिकैत द्वारा यह कहना कि जीत के बाद या न भी जीतेंगे तो अमृतसर में माथा टेक कर क्रांति का आगाज करेंगे व आज अखिल भारतीय जाट महासभा के राजस्थान अध्यक्ष द्वारा यह कहना कि किसानों गुरुद्वारों की तरफ चलो, बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा है।

क्या एक बार फिर ब्राह्मण धर्म के खिलाफ बगावत की बयार चलने वाली है? हालात तो इसी तरफ इशारा कर रहे हैं।

(मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

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