Thu. Oct 24th, 2019

गांधी:भारतीय समाज की स्पष्ट समझ और परख

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यदि मैं मार्क्सवादी भाषा में कहूं तो उस समय का मुख्य अंतर्विरोध था साम्राज़्यवाद और उसकी दासता से आज़ादी उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के मध्य तक यह अंतर्विरोध प्रमुख बना रहा। गांधी जी अपनी दृष्टि, आस्था और सिद्धांत से मार्गदर्शित होकर इस मुख्य अंतर्विरोध का समाधान करना चाहते थे, और वो भी अहिंसा के माध्यम से। यद्यपि कई और प्रकार के भी अंतर्विरोध थे, जिन पर यहां चर्चा करना उचित नहीं होगा क्योंकि वे इस आलेख के दायरे से बाहर हैं। अलबत्ता मुख्य अंतर्विरोध के समाधान के तरीके पर चर्चा ज़रूर हो सकती है। इस अंतर्विरोध का समाधान वामपंथी व दूसरे क्रांतिकारी (बिस्मिल, अशफ़ाक़, भगतसिंह, चंद्रशेखर, सुभाषचंद्र बोस, खुदीराम बोस सहित अन्य सशस्त्र स्वतंत्रता सेनानी) बलपूर्वक करना चाहते थे वहीं गांधीजी अहिंसात्मक लड़ाई के माध्यम से इसके समाधान की कोशिश में थे। आलोचकों की दृष्टि में गांधी जी ने समाधान नहीं किया, बल्कि इसका ‘ डी फ्यूज़न’ किया। वर्ग सहयोग किया; 15 अगस्त 1947 को सत्ता का हस्तांतरण किया गया था, न कि सच्ची आज़ादी मिली थी क्योंकि राज्य शासन का चरित्र यथावत रहा। यह भी एक नज़रिया है, लेकिन राजनीतिक यथार्थ यह है कि आज भारत एक संप्रभुता संपन्न राष्ट्र राज्य है, इसका अपना संविधान और संसद है।
साम्यवादियों और समाजवादियों के साथ परिवर्तन की प्रक्रिया पर अपने मतभेदों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की थी, “…मैं पक्का कम्युनिस्ट होने का दावा करता हूं। अगरचे मैं धनवानों द्वारा दी गयी मोटरों या दूसरे सुभीतों से फायदा उठाता हूं, मगर मैं उनके वश में नहीं हूं। अगर आम जनता के हितों का वैसा तकाज़ा हुआ, तो बात की बात मैं उनको अपने से दूर हटा सकता हूं।” इससे पहले गांधी जी ने यह भी कहा था, “ रूस का समाजवाद यानी जनता पर जबरदस्ती लादा जानेवाला साम्यवाद भारत को रुचेगा नहीं; भारत की प्रकृति के साथ उसका मेल बैठ नहीं बैठ सकता हैं। हां, यदि साम्यवाद बिना किसी हिंसा के आये तो हम उसका स्वागत करेंगे।” ( मेरे सपनों का भारत, पृष्ठ 29 )
जैसा कि मैंने आरम्भ में कह दिया था कि भारतीय ईथोस या ‘ प्रकृति‘ मूलतः‘ मध्यममार्गी‘ है, चरमवादी या पंथी नहीं है। सम्राट अशोक कलिंग विजय में हज़ारों लोगों का रक्त बहाने के पश्चात अपने राज्य में पशु-पक्षी की हत्या पर ही प्रतिबंध लगा देते हैं, अहिंसा को परमोधर्म के रूप में देखते हैं, भारत की मूल प्रकृति -‘ दूध के उफान के समान‘ है। यही भारतीय मानस है; इस देश में न चरम दक्षिणपंथ और न ही चरम वामपंथ लम्बे समय तक टिके रह सकते हैं। भले ही इन पंथों को तात्कालिक सफलता मिल जाए !
ऐसा लगता है, यदि गांधीजी कुछ और वर्ष जीवित रहते तो देश की गरीबी व विषमता का विनाश करने के लिए अपनी तमाम सुख -सुविधा को त्यागकर सड़कों पर उतरते और धनिकवर्गों के विरुद्ध खड़े हो जाते। नेहरू सरकार क्या कहेगी, इसकी परवाह नहीं करते। यह कहना ही कितना असाधारण है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस की भूमिका समाप्त हो चुकी है। नई पार्टी बनानी चाहिए।इससे उनकी सभी चीजों से निस्पृहता सामने आती है।
उन्होंने तो अपनी मृत्यु से पूर्व बीबीसी को दिये गए एक साक्षात्कार में कहा था कि इस आज़ादी से मेरा मोहभंग हो चुका है। आपका भी हो जाएगा। कितनी बड़ी आत्मस्वीकृति है? जिस महाआंदोलन का नेतृत्व किया हो, उसकी उपलब्धि से ही मोहभंग हो जाना क्या दर्शाता है ?
यहां मैं यह भी याद दिलाना चाहूंगा कि गांधी जी की भविष्य कितनी सटीक निकली।उन्होंने 15 नवंबर 1928 में कहा था “….बोल्शेविक शासन अपने मौजूदा रूप में ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकता। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिंसा की नींव पर किसी भी स्थाई रचना का निर्माण नहीं हो सकता। लेकिन, वह जो भी हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि बोलशेविक आदर्श के पीछे असंख्य पुरुषों-स्त्रियों के-जिन्होंने उसकी सिद्धि के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया है – शुद्धतम त्याग का बल है; और एक ऐसा आदर्श है, जिसके पीछे लेनिन जैसे महापुरुषों के त्याग का बल है, कभी व्यर्थ नहीं जा सकता“ ( मेरे सपनों का भारत, पृष्ठ 29 ) इसलिए मेरे मत से महात्मा गांधी को सतही ढंग से खारिज करना अवैज्ञानिकता होगी, पूर्वाग्रहग्रस्त दृष्टि होगी।
गांधीजी के विराट व्यक्तित्व को उसकी सम्पूर्णता में देखना होगा, न कि इसके विखंडन में। मानवता के एक विराट फ्रेम में देखने की ज़रूरत है। राजनीति के दार्शनिक गांधी जी को अराजकतावादी मानते हैं। जहां कार्ल मार्क्स वर्गहीन समाज की बात करते हैं वहीं गांधीजी राज्यमुक्त समाज की बात करते हैं। दूसरे शब्दों में मनुष्य इतना उन्नत अवस्था में पहुंच जाए जहां उसे किसी नियंत्रण-नियमन की ज़रूरत ही महसूस न हो। वर्ग समाज और राज्यहीन समाज, दोनों ही यूटोपिया हैं। इस समय तो यह तभी सम्भव है जब समाज में सभी प्रकार के अंतर्विरोध समाप्त हो जाएं या उनका वैज्ञानिक ढंग से समाधान कर दिया जाए और पूंजी की सत्ता मनुष्य पर काबिज़ न रहे। गांधी जी ने अपने जीवन काल में ‘ट्रस्टीशिप‘ की अवधारणा को सामने रखा था जोकि सफल नहीं हो सकी थी। कोई भी अपनी सम्पति को आसानी से त्यागने के लिए तैयार नहीं है। भूदान आंदोलन के परिणाम से हम सभी परिचित हैं। इसलिए अंतर्विरोधों का समाधान या विखंडन राज्य के चरित्र पर ही निर्भर करता है। लेकिन जनबल के सामने राज्य बल व धन बलों को भी झुकते देखा है।गांधी जी के इसी जनबल को पुनर्जीवित व सक्रिय करने की ज़रूरत है। इतिहास गवाह है, इसी जनबल के बल पर उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य को झुकाया था। सवाल नेतृत्व के चरित्र व विचारधारा के प्राथमिकताओं का है।
(जारी…)

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