Friday, January 21, 2022

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सरकार की शह पर जारी है देश में गृहयुद्ध के हालात पैदा करने के प्रयास

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उत्तराखंड के हरिद्वार और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हिंदुत्ववादी संगठनों की हाल ही में हुई तथाकथित धर्म संसद में जिस तरह की बातें कही गईं, वैसी बातें अगर मुसलमानों, ईसाइयों या सिखों की किसी मजलिस या जलसे में हुई होती तो उसके आयोजकों और उसमें भाषण देने वालों पर देश भर में राजद्रोह के मुकदमे कायम हो जाते और संभवतया कुछ लोगों की गिरफ्तारी भी हो जाती। हरिद्वार और रायपुर में भगवाधारियों की तथाकथित धर्म संसद में जो बातें कही गईं उन्हें सुनने के बाद सवाल उठता है कि क्या दुनिया के किसी भी सभ्य देश में इस तरह की बातों की अनुमति दी जा सकती है?

रायपुर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या का समर्थन करने वाले साधु-वेशधारी कालीचरण को तो छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने मध्य प्रदेश से गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन हरिद्वार में जहरीले और भड़काऊ भाषण देने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होना और केंद्र सरकार तथा भाजपा का उन भाषणों पर चुप्पी साधे रहना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश को गृह युद्ध की ओर धकेलने और लोकतांत्रिक भारत का तालिबानीकरण करने या उसको हिंदू राष्ट्र बनाने का उपक्रम अब एक सरकारी परियोजना की शक्ल लेता जा रहा है। इसलिए मशहूर फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की यह चिंता बेजा या नाजायज नहीं है कि देश में सुनियोजित तरीके से गृह युद्ध के हालात पैदा किए जा रहे हैं। उनका यह कहना भी गलत नहीं है, ”भारत में 20 करोड़ मुसलमान आसानी से खत्म होने वाले नहीं हैं। भारत हमारी मातृभूमि है, हम लड़ेंगे और यह लड़ाई मजहब की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपने घर-परिवार को बचाने के लिए होगी।’’

वैसे सावरकर-गोलवलकर प्रणित हिंदुत्व की विभाजनकारी विचारधारा को बढ़त तो 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही मिलने लगी थी लेकिन उसके दूरगामी नतीजे 2019 से आना शुरू हुए और साल 2021 में तो वे बहुत साफ तौर पर नजर आने लगे। कोई आश्चर्य नहीं कि 2022 में उन नतीजों का विस्तार देखने को मिले।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपमानित-लांछित करने और उनके हत्यारे गिरोह को महिमामंडित करने के सिलसिले में भी इस साल अभूतपूर्व तेजी आई और उसने नए आयाम छूए हैं। गांधी की हत्या को खुलेआम जायज ठहराया जाने लगा है, नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे की मूर्तियां स्थापित होने लगी हैं और उनके मंदिर बनने लगे हैं। यही नहीं, 2014 से शुरू हुए इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अब देश को 1947 में मिली आजादी को भीख में मिली आजादी बताया जाने लगा है। बताया जा रहा है कि देश को वास्तविक आजादी 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मिली। स्वाधीनता संग्राम के नायकों और आधुनिक भारत के निर्माताओं को तरह-तरह से लांछित-अपमानित करने का सिलसिला तो सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर पहले से जारी है ही।

हाल के दिनों में उत्तराखंड के हरिद्वार और छत्तीसगढ़ के रायपुर में ‘धर्म संसद’ के नाम पर हुए जमावड़ों में जिस तरह की बातें कही गई हैं, वे परेशान और चिंतित करने वाली हैं। हरिद्वार की तथाकथित धर्म संसद में देश की मुस्लिम आबादी मिटाने का संकल्प लिया गया। हिंदुओं से अपील की गई कि वे किताब-कॉपी छोड़ कर हाथों में तलवार लें और ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें। एक तथाकथित महंत ने कहा कि अगर दस साल पहले वह संसद में होता तो उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को गोलियों से उसी तरह छलनी कर देता जैसा नाथूराम गोडसे ने गांधी को किया था। साधु-वेशधारी जिन लोगों ने अपने भाषणों में यह बातें कहीं, वे सभी अक्सर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के मंचों पर भी मौजूद रहते हैं और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित भाजपा और आरएसएस के शीर्ष नेताओं के साथ भी उनकी तस्वीरें देखी जा सकती हैं।

इसी तरह रायपुर में हुई कथित धर्म संसद में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को गालियां दी गईं, उनकी हत्या का समर्थन किया गया और उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को महानायक बताया गया। जिस भगवाधारी लफंगे ने यह बातें कही उसे तो छत्तीसगढ़ पुलिस ने मध्य प्रदेश के खजुराहो से गिरफ्तार कर लिया। लेकिन उसकी गिरफ्तारी पर मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र ने जिस तरह ऐतराज जताया, वह हैरान करने वाला है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सुप्रीमो मोहन राव भागवत वैसे तो आए दिन अपने भाषणों में हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें करते रहते हैं। वे भारत में रहने वाले सभी लोगों के पूर्वज और सभी का डीएनए एक बताते हैं, किसी भी तरह की हिंसा को भी हिंदुत्व के खिलाफ करार देते हैं, लेकिन हरिद्वार और रायपुर में जो कुछ कहा गया उस पर उन्होंने भी चुप्पी साध रखी है। मुसलमानों, ईसाइयों और उनके उपासना स्थलों पर हमले की घटनाओं की भी उन्होंने कभी निंदा नहीं की है। जाहिर है कि भारत का तालिबानीकरण करने तथा देश को गृह युद्ध में झोंकने की परियोजना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है, जो अब धीरे-धीरे सरकारी परियोजना की शक्ल लेती जा रही है।

इस तरह की घटनाओं को लेकर दुनिया भर में भारत का डंका बजने का आलम यह है कि दुनिया के कई देशों ने हरिद्वार और रायपुर में कथित धर्म संसद में हुए भाषणों और उसको लेकर केंद्र सरकार की चुप्पी पर चिंता और हैरानी जताई है। मालदीव जैसे छोटे से पड़ोसी देश में विपक्ष मांग कर रहा है कि भारत से दूरी बना कर रखी जाए, क्योंकि उसका तालिबानीकरण मालदीव के हितों को नुकसान पहुंचाएगा।

अल्पसंख्यकों और उनके उपासना स्थलों पर हमले तथा उनके खिलाफ जहरीले और भड़काऊ भाषण जहां सरकार समर्थक हिंदुत्ववादी संगठनों के तत्वावधान हो रहे हैं, तो सरकारी स्तर पर भी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने के वीभत्स और डरावने प्रयास लगातार देखने को मिल रहे हैं। साल खत्म होते-होते वाराणसी में सरकारी खजाने के 650 करोड़ रुपए से बने काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लोकार्पण के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रचा गया बेहद खर्चीला प्रहसन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

जिस गंगा नदी में इसी साल कोरोना महामारी के दौरान उचित इलाज और ऑक्सीजन के अभाव में मारे गए असंख्य लोगों की लाशें तैरती हुई देखी गई थीं, उसी गंगा में और उसके तट पर प्रधानमंत्री मोदी ने टीवी कैमरों की मौजूदगी में खूब ‘धार्मिक क्रीड़ाएं’ कीं। पंथनिरपेक्ष संविधान की शपथ लेकर प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए नरेंद्र मोदी इस पूरे प्रहसन में विशुद्ध रूप से एक धर्म विशेष के नेता के रूप में नजर आए, ठीक उसी तरह जैसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोड़ कर बनाए जा रहे राम मंदिर के शिलान्यास के मौके पर पिछले साल नजर आए थे। इसके अलावा भी सरकारी तामझाम के साथ प्रधानमंत्री ने धार्मिक स्थलों की यात्राओं का सिलसिला बनाए रखा है।

भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश के प्रधानमंत्री का इस तरह एक धर्म विशेष तक सीमित या संकुचित हो जाना संवैधानिक मूल्यों का संविधान की शपथ का मखौल उड़ाना है। यह स्थिति भारत के भविष्य को लेकर चिंतित और परेशान करने वाली है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाओं और गतिविधियों पर जो संवैधानिक संस्थाएं अंकुश लगाने में सक्षम है, वे सभी लगभग पंगु बनी हुई हैं। विपक्षी दलों की ओर से भी ऐसी घटनाओं के प्रतिरोध का कोई ठोस स्वर नहीं उठ रहा है। कुल मिलाकर इस समय देश का जो परिदृश्य बना हुआ है, वह आने वाले समय में हालात और ज्यादा संगीन होने के साफ-साफ संकेत दे रहा है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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