सेपियन्स : सितमगर को मसीहा बताने की हरारी की मक्कारी

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युवाल नोह हरारी की बहु-प्रचारित किताब `सेपियंस` पढ़कर एक टिप्पणी। 

“मध्य युग के कुलीन सोने और रेशम के रंग-बिरंगे लबादे पहनते थे और अपना ज़्यादातर समय दावतों, जश्नों और भव्य टूर्नामेंटों में बिताया करते थे। उनकी तुलना में आधुनिक युग के सीईओ सूट नाम की फीके क़िस्म की वेश-भूषाएं धारण करते हैं, जिनमें वे अपनी धुन में मस्त एक ही थैली के चट्टे-बट्टे लगते हैं और जश्नफरोशी के लिए उनके पास बहुत कम समय होता है। यह सही है कि उसका सूट वर्साचे कम्पनी का हो सकता है और हो सकता है वह निजी जेट विमान में यात्रा करता हो, लेकिन ये खर्च उस पैसे के मुक़ाबले कुछ नहीं होते जिसका निवेश वह इंसानी ज़रूरत के उत्पादनों की वृद्धि के लिए करता है।“ (सेपियन्स से)

अगर आपकी आँख में आँसू हैं तो अम्बानी-अडानी दुनिया के लिए जो मेहनत कर रहे हैं, उसे देख कर आज बह जाने चाहिए।

“पूंजीवाद ने एक ऐसी दुनिया की रचना की है, जिसे जारी रखने में एक पूंजीपति के अलावा और कोई सक्षम नहीं है। एक भिन्न तरीके से दुनिया का प्रबंधन करने की एकमात्र कोशिश –साम्यवाद– लगभग हर कल्पनीय तरीके से इतनी ज्यादा बदतर थी कि उसे दोबारा आजमाने का अब किसी का इरादा नहीं है। हम भले ही पूंजीवाद को पसंद न करते हों, लेकिन अब हम इसके बगैर रह नहीं सकते।“ (सेपियन्स से)

दुनिया के हर देश में मार्क्सवादी हैं, मार्क्सवादी पार्टी हैं, मार्क्सवाद की क्लासेज चलती हैं। सारी दुनिया के मार्क्सवादी युवाल को लिख कर दे चुके हैं कि अब उनका साम्यवाद लाने की कोशिश करने का कोई इरादा नहीं है। अमेरिका के वामपंथी लेखक और अर्थशास्त्री रिचर्ड डी वुल्फ अपने एक विडियो में कार्ल मार्क्स के लिए कहते हैं- 

“उसने तर्क दिया कि हर आर्थिक प्रणाली पैदा होती है, वक़्त के साथ फलती-फूलती है और फिर उसका अंत हो जाता है और उसकी जगह दूसरी प्रणाली ले लेती है। पहली प्रणाली दास प्रथा थी, पैदा हुई, उसका प्रसार हुआ और वह मर गयी। फिर जागीरदारी सामंतवाद आया, फला-फूला और फिर ख़त्म हो गया। यही पूंजीवाद के साथ है। पूंजीवाद का जन्म सत्रहवीं या अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड में हुआ। वक़्त के साथ इसका प्रसार हुआ और पूरी दुनिया में फैल गया। अब आगे क्या? अब कौन सा स्टेप आयेगा या यह मर जाएगा?

पूंजीवाद अपने अंतर्विरोधों के कारण ख़त्म हो जाएगा। आदमी पैदा होता है और अंत में मर जाता है। एक वक्त के बाद शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं। अगर कोई आप को चाकू नहीं मारता है, फांसी नहीं देता है तो भी एक दिन आपका मरना तय है। मार्क्स पूंजीवाद के अंतर्विरोधों को पहचानना चाहते थे। वो जानना चाहते थे कि पूंजीवाद अपनी उम्र के किस मुक़ाम पर है। उसके कौन-कौन से अंग ठीक काम नहीं कर रहे हैं। वे मानते थे कि मानव जाति पूंजीवाद से बेहतर सिस्टम डिजर्व करती है। हम आज जहाँ हैं, इसी वजह से हैं कि हर वक़्त कुछ लोग हुए जो यह सोच रखते थे कि और बेहतर सम्भव है।

इसी सोच, इसी मानसिकता ने दास प्रथा और सामंतवाद, जागीरदारी जैसी व्यवस्थाओं से हमारा पीछा छुड़ाया। आज किसी इंसान को ग़ुलाम बनाकर रखने को कोई सही नहीं मानता। जागीरदार जैसे शब्दों को अपमान की नज़र से देखा जाता है। और ऐसा ना मानने के पीछे कोई कारण नज़र नहीं आता कि और बेहतर, और अच्छा करने, पाने की सोच ही हमारा पीछा पूंजीवाद से भी छुड़वाएगी बशर्ते कि आप इस बात में ही विश्वास न करने लग जाओ कि जिस वक़्त आप जी रहे हो, उस वक़्त इतिहास रुक गया है, अब इतिहास, विज्ञान काम नहीं करते हैं।  

जोर से मत हंसो क्योंकि हम उस देश में रहते हैं जो सच में इस बात को मानता है। अमेरिका मानता है कि पूंजीवाद इस दुनिया में आज तक खोजी गयी सबसे प्यारी और कभी न ख़त्म होने वाली व्यवस्था है जिस पर इतिहास और विज्ञान के नियम लागू नहीं होते।“ 

अब फिर `सेपियंस` पर लौटते हैं जिस पर `इतिहास की किताब` होने की तोहमत है। 

“हमें सिर्फ थोड़े से और धीरज की ज़रूरत है –स्वर्ग, जिसका आश्वासन पूंजीपतियों ने दिया है, बहुत क़रीब है। यह सही है कि ग़लतियाँ हुई हैं, जैसे अट्लांटिक गुलाम व्यापार और यूरोपीय कामगार वर्ग का शोषण, लेकिन हम सीख ले चुके हैं और अगर हम थोड़ा सा और इंतज़ार और कर लें और कचौड़ी के थोड़ा और बड़ा होने की गुंजाइश होने दें तो हर किसी को उसका ज्यादा मोटा टुकड़ा हासिल होगा।“ (सेपियन्स से)

यह पढ़कर अल्ताफ़ राज़ा के गाने सुनिए और थोड़े इंतज़ार का मजा लीजिए।

“ज्यादातर लोग इस बात की सराहना नहीं करते कि जिस युग में रह रहे हैं, वह कितना शांतिपूर्ण है। बहुत से लोग आज अफगानिस्तान और इराक़ में जारी जंगों के बारे में तो सोचते हैं लेकिन ये उस शांति के बारे में नहीं सोचते, जिसमें ब्राजीलियाई और हिन्दुस्तानी रह रहे हैं।” (सेपियन्स से)

हिन्दुस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि ग़रीबों की बस्तियों को तोड़ दिया जाए। हिन्दुस्तान में इतनी शांति है, वह काफी नहीं है क्या? घर, रोटी क्यों चाहिए? जैसा कि युवाल ने फरमाया कि जिसको दुखी रहना है, उसे दुखी ही रहना है, चाहे उसे मर्सिडीज मिल जाए।

“मुमकिन है कि तीसरी दुनिया के असंतोष को भड़काने वाली चीजों में सिर्फ गरीबी, बीमारियां और राजनीतिक दमन ही नहीं, बल्कि पहली दुनिया के अमीर देशों के मापदंडों से महज उनका सामना होना भी शामिल हो”

हरारी टाइप प्रवचन हमारे यहां के कॉरपोरेट बाबा भी देते ही हैं। (इंसान अपने दुख से दुखी नहीं है दूसरों के सुख से दुखी है, सुख दुख इंसान के अंदर हैं – सद्गुरु)

“अगर दौलत की तलाश में लगे व्यापारी न होते, तो कोलम्बस अमेरिका न पहुंचा होता, जेम्स कुक ऑस्ट्रेलिया न पहुंचा होता और नील आर्मस्ट्रांग चन्द्रमा की सतह पर वह छोटा सा कदम कभी नहीं रख पाता।“ (सेपियन्स से)

कितनी विडम्बना है कि यह किताब मानव इतिहास पर है। किताब हमें इंसानों के 70 हज़ार साल के इतिहास के बारे में मतलब जब से सेपियंस ने अफ्रीका के बाहर कदम रखा, बताती है। इस किताब में ही लिखा है कि पूंजीवाद के आने से हजारों साल पहले बिना किन्ही संसाधानों के पैदल ही इंसान ने सारी दुनिया नाप दी थी। कोलम्बस के आने से हजारों साल पहले लोग अमेरिका पहुंच गए थे, ऑस्ट्रेलिया भी पहुंच गए थे। उसी किताब में लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि पूंजीवाद नहीं होता तो अमेरिका ऑस्ट्रेलिया हमें मिल ही नहीं पाते। पूंजीवाद न होता तो इंसान चांद पर नहीं जा पाता।

सोवियत यूनियन 1959 में लूना 3 सफलतापूर्वक स्पेस में भेज चुका था। देर-सवेर इंसान को भी वहाँ पहुँच ही जाना था। सोवियत यूनियन में समाजवाद था, युवाल की मानें तो दुनिया की अब तक की सबसे गंदी व्यवस्था, इतनी गंदी कि उसके बारे में तो बात ही करना फिजूल है। समाजवाद जो फेल हो चुका है पर युवाल खुद ही यह भी कह जाता है कि समाजवाद के डर से पूंजीवाद ने मजदूरों को अच्छा जीवन गुज़र-बसर करने लायक़ सुविधाएं दीं। यह इस क़िस्म के सस्ते `मनोरंजन` से भरी किताब है। ख़ैर ये कहानी भी विस्तार से फिर सही।)

मार्क ट्वेन का एक कोट है जो मैंने 20 साल पहले पहली बार पढ़ा था और मैं उसका मुरीद हो गया था। वह कुछ यूं है- “अगर कोई इंसान किताबें नहीं पढ़ता है तो वह उस इंसान से कैसे बेहतर स्थिति में है जो पढ़ नहीं सकता?“

कुछ दिन पहले जब मैं ट्वेन को पढ़ रहा था तो पता चला यह कोट बहुत चालाकी से बदल दिया गया था। मार्क ट्वेन ने कहा था – “अगर कोई इंसान अच्छी किताबें नहीं पढ़ता है…।“ उस कोट में से `गुड` शब्द हटा दिया गया। कोट के मायने ही बदल गए।

खैर, `सेपियंस` एक बुरी किताब है। अगर आपने नहीं पढ़ी है और कोई इसे पढ़ने की सलाह दे रहा है तो आप भी उसे मुर्गा बनने की सलाह दे सकते हो। कोई दिक्कत नहीं है।

अगर अच्छी किताबों की बात करूं तो टॉम फिलिप्स की किताब `HUMANS` अच्छी है। मजाहिया तरीके से लिखी गई है और हर फैक्ट पूरे रेफरेंस के साथ है। (मैंने सेपियन्स का हिंदी अनुवाद पढ़ा था उसमें रेफरेंस नाम की चीज़ नहीं है। कौन सी बात किस किताब से उठाई है, कुछ नहीं लिखा। हो सकता है कि मूल किताब में भी न हो। हिन्दी अनुवादक मदन सोनी कौन हैं, मैं नहीं जानता पर अगर ये वही अशोक वाजपेयी स्कूल वाले दक्षिणपंथी `विचारक` हैं तो मामला `राम मिलाई जोड़ी` जैसा दिलचस्प हो जाता है।) टोनी जोसेफ की `Early Indians` भी बहुत मस्त किताब है।

उसे पढ़ोगे तो आपको 10 और किताबों के नाम मिल जाएंगे । भारत के संदर्भ में  उमा चक्रवती की `Gendering Caste` भी पढ़ सकते हैं। `मोदी जी` की तरह `सेपियंस` के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं है कि विकल्प की कमी है, इस विषय पर बहुत अच्छी-अच्छी किताबें हैं। आप सर्च करेंगे तो और भी मिल जाएंगी। रिचर्ड डी वुल्फ का यू ट्यूब वीडियो `अंडरस्टैंडिग मार्क्स` भी देखना चाहिए। `सेपियन्स` पढ़ चुके हैं तो साम्यवाद को लेकर युवाल की कुंठा से पैदा हुई लिजलिज से उबरने में में मदद मिलेगी।

(अमोल सरोज एक चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं। लेकिन बौद्धिक जगत की गतिविधियों में भी सक्रिय रहते हैं। सोशल मीडिया पर प्रोग्रेसिव- जन पक्षधर नज़रिये से की जाने वाली उनकी टिप्पणियां मारक असर वाली होती हैं। व्यंग्य की उनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है।)

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