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कांग्रेस मरेगी तो लोकतंत्र जीएगा ?

यह बड़ा विचित्र संयोग है कि जब दुनिया मानव सभ्यता की सबसे खतरनाक महामारी के आतंक से जूझ रही है तब देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। बहुत सारे विद्वानों ने यह आकलन भी किया है कि कोरोना काल में वे सारी प्रक्रियाएं तेज हो जाएंगी जो पहले धीरे-धीरे चल रही थीं। बहुत संभव है कि भारतीय जनता पार्टी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह का कांग्रेस मुक्त भारत का स्वप्न पूरा हो जाए और देश के राजनीतिक सौर मंडल के केंद्र में भारतीय जनता पार्टी ही रह जाए और कुछ ढुलमुल क्षेत्रीय दल उसके चारों तरफ परिक्रमा करने वाले उपग्रह के रूप में विद्यमान रहें।

अगर पूर्वोत्तर राज्यों में बार-बार होने वाली राजनीतिक अस्थिरता को छोड़ दें तो भी गोवा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और राजस्थान में सरकारों की उठापटक प्रत्यक्ष तौर पर तो यही साबित करती है कि कांग्रेस के पास अब वह गोंद नहीं है जो दूसरे दलों को तो छोड़िए उसके अपने नेताओं और उनके गुटों को बांध कर रख सके। उसके पास अब वह चुंबकीय शक्ति समाप्त हो चुकी है जो पहले पार्टी को बांधती थी और बाद में पार्टी से बाहर के विभिन्न नेताओं को अपने भीतर खींचकर समाहित कर लेती थी।

राहुल गांधी अपनी चुनावी विफलता के बाद निराश होकर सांगठनिक निष्क्रियता के कोपभवन में बैठे हैं तो सोनिया गांधी उस सांगठनिक क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पा रही हैं जो उन्होंने 2004 से 2014 तक किया था। उस समय तो सोनिया गांधी ने यूपीए बनाने और उसे चलाने जैसी क्षमता का प्रदर्शन किया था लेकिन अब वे कांग्रेस पार्टी के भीतरी विद्रोह को नहीं संभाल पा रही हैं। अगर उनके भीतर वैसी क्षमता होती तो न तो ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाते और न ही सचिन पायलट बगावती तेवर अपनाते।

इस समय कांग्रेस पार्टी के इस संकट की व्याख्या में नई संभावना देखने वाले भी हैं। बेहद समझदार और सेक्युलर सोच के चिंतक इंदौरवासी चिन्मय मिश्र को इस उथल पुथल में उम्मीद दिखाई देती है। उनका मानना है कि आखिर कब तक भाजपा इस तरह का खेल खेलेगी और कब तक कांग्रेस पार्टी इतनी रक्षात्मक बनी रहेगी? कभी न कभी तो कांग्रेस पार्टी खड़ी होगी और तब भाजपा की अलोकतांत्रिक और अनैतिक नीतियों का पर्दाफाश होगा। वे इसे नई और पुरानी पीढ़ी के द्वंद्व के रूप में भी देखते हैं।  इस तरह की टिप्पणी कभी राज्यसभा के सदस्य रहे देवी प्रसाद त्रिपाठी भी करते थे। उनका कहना था कि भारतीय लोकतंत्र में विकल्प फेंकने की अद्भुत क्षमताएं हैं। इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है।

वे ऐसा इसलिए कह पा रहे थे कि 1984 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने विपक्ष को लगभग समाप्त कर दिया था लेकिन 1989 तक आते आते देश में मजबूत विपक्ष खड़ा हो गया। लोकतंत्र में विश्वास करने वालों की इस आस्था को खारिज करना उचित नहीं है लेकिन उस पर आंख मूंदकर विश्वास कर लेना भी सही नहीं है। अगर इस आस्था के साथ एक्शन यानी कर्तव्य जुड़ा हुआ हो तो उसे उसी रूप में देखना चाहिए जिस रूप में महात्मा गांधी ने भारत में अपना संघर्ष शुरू करने से पूर्व दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह की व्याख्या की थी। गांधी का कहना था कि अगर दक्षिण अफ्रीका में सत्य के सहारे विजय प्राप्त की जा सकती है तो कोई कारण नहीं कि भारत में उसी रास्ते पर चल कर जीत नहीं पाई जा सकती। शायद उन्होंने उस रास्ते पर चल कर आजादी का लक्ष्य हासिल भी किया।

लेकिन सवाल यह है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उस दिशा में कितना प्रयास कर रही है? इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ही इस समय विपक्ष की स्थायी भाषा बोल रहे हैं। भले ही उनका संवाद जन जन के हृदय में पैठ न रहा हो लेकिन उनकी चेतावनी और सुझाव है तो जनकल्याण के लिए ही। उनके सवाल भले `नेशन वान्ट्स टू नो’ को न अच्छे लगते हों लेकिन वे सचमुच नेशन की ओर से ही सवाल करते हैं। इस बीच प्रियंका गांधी के भी सवाल कांग्रेस पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं को संबल देते हुए लगते हैं और लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।

लेकिन कांग्रेस पार्टी के इन प्रयासों की स्थिति लगभग वैसी ही है जैसे वन में भटकते हुए विह्वल और व्याकुल मर्यादा पुरुषोत्तम राम की थी, जिनकी भार्या खो गई थीं और वे उन्हें ढूंढते हुए प्रकृति के हर प्राणी से उनका पता पूछ रहे थे। शायद वह राम की सर्वाधिक दयनीय स्थिति है जब उनके पास रोने और सहानुभूति पाने के अलावा कुछ नहीं है। कांग्रेस भी लगभग उसी स्थिति में है। कांग्रेस पार्टी ने अपने लंबे संघर्ष के बाद देश में आजादी और लोकतंत्र की जिस मर्यादा की स्थापना की थी उसका अपहरण हो चुका है और उसके पास उसे वापस पाने की शक्ति अभी दिखाई नहीं पड़ रही है।

रामकथा के इस प्रसंग का हवाला इसलिए देना उचित है क्योंकि कोरोनाकाल के लॉकडाउन में सरकारी चैनलों ने उन्हें फिर से दिखाया है। कुछ लोग उनका संदेश सांप्रदायिक मानकर उसकी उपेक्षा कर रहे हैं और कुछ लोग उसके वाह्य प्रतीकों को हिंदुत्व के अनुकूल मानकर मौजूदा सरकार को शक्ति देने वाला कह रहे हैं। लेकिन अगर ध्यान से देखा जाए तो यह पहचानने की आवश्यकता है कि वैभव और संसाधनों से संपन्न सत्ता में बैठी वह कौन सी शक्तियां हैं जिन्होंने सीता का अपहरण कर लिया है और सजे धजे रथ पर बैठकर राम को चुनौती दे रही हैं। यहां यह बात याद दिलाना जरूरी है कि गांधी जब 1909 में सावरकर के बुलाने पर दशहरे के मौके पर व्याख्यान देने लंदन गए थे तो उन दोनों की रामकथा पर बहस हुई थी।

सावरकर को रामकथा में हिंसा की प्रेरणा दिखाई पड़ रही थी और वे अंग्रेजों की सत्ता को रावण की सत्ता मानकर उसका हर प्रकार से विनाश करने की बात कहते हैं। इसके ठीक विपरीत गांधी रामकथा और राम रावण के युद्ध को सत्य और असत्य के अहिंसक संघर्ष के रूप में देखते हैं। विडंबना देखिए कि सावरकर अंग्रेजों की उस राक्षसी सत्ता से जीवन के मध्याह्न में समझौता कर लेते हैं और गांधी अपना सत्य और असत्य का संघर्ष अंतिम सांस तक चलाते रहते हैं।

आज अगर कांग्रेस को लड़ना और जीतना है तो महात्मा गांधी के उन्हीं शब्दों से प्रेरणा लेनी होगी जो उन्होंने सावरकर से बहस में कही थी और जिसे सत्याग्रह के रूप में उन्होंने स्वाधीनता संग्राम का आधार बनाया था। कांग्रेस की दिक्कत यह है कि वह महात्मा गांधी को भूल गई है। पिछले साल 24 अकबर रोड पर दिन के तीन बजे होने वाली प्रेस कांफ्रेंस में नियमित जाना होता था तब वहां महात्मा गांधी का कोई बड़ा चित्र न देखकर अजीब लगता था। कई नेताओं से कहने के बावजूद उन्हें इसकी कोई जरूरत नहीं लगती थी। उन्हें लगता था कि चुनाव जीतने का सिलसिला शुरू होने दीजिए सब कुछ ठीक हो जाएगा।

माना कि इस बीच कांग्रेस में राजीव गांधी फाउंडेशन के बहाने कांग्रेस में महात्मा गांधी का आख्यान कहने वाले कई बौद्धिक आए हैं। उनमें से कई कम्युनिस्ट रहे हैं और अब उन्हें गांधी में बहुत संभावना लग रही है। लेकिन राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़े ऐसे तमाम बौद्धिकों की दिक्कत यह है कि वे अपने को एलीट मानते हैं। उनकी भी दिक्कत वही है जो दिक्कत राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की है। उनके इस एलीट रवैए से उनके पास सामान्य जन के आने की बात दूर न तो कुजात गांधीवादी फटकने वाला है और न ही कुजात समाजवादी। वे उन्हें घास क्यों डालेंगे और वह भी बेचारा उनके दरबार में मिलने के लिए कब तक इंतजार करेगा?

यहां फिर `रावण रथी विरथ रघुवीरा’ वाले प्रसंग और महात्मा गांधी के अकिंचन रूप का स्मरण दिलाना जरूरी है। अगर राम ने अपने साथ सामान्य वानर भालुओं को न लिया होता या महात्मा गांधी ने आम किसान और मजदूरों का दामन न थामा होता तो क्या वे सत्य को प्रभावशाली बना पाते? क्या वे सत्य को प्रभावशाली बनाए बिना असत्य और अधर्म को निरुत्तर करके अपनी विजय प्राप्त कर सकते थे ? शायद नहीं।

कांग्रेस पार्टी को यह भूल जाना चाहिए कि उसका यह संघर्ष राहुल बनाम मोदी है ? प्रियंका बनाम मोदी है? या सोनिया बनाम मोदी है? या कांग्रेस बनाम भाजपा है ।  निश्चित तौर पर कांग्रेस का यह संघर्ष लोकतांत्रिक धर्म और अलोकतांत्रिक अधर्म के बीच है। कांग्रेस का यह संघर्ष उस आजादी को बचाने के लिए जिसे उसने 62 साल के कठिन संघर्ष के माध्यम से हासिल किया था। कांग्रेस का यह संघर्ष वास्तविक भारतीयता और नकली भारतीयता के बीच है। भारत में धर्म और राजनीति का जो बारीक अंतर है हमें उसे समझना होगा। हम यहां धर्म को अफीम मानकर उसे ठुकरा नहीं सकते और न ही राजनीति को अमृत मानकर उसका सदैव पान कर सकते हैं। आज की लोकतांत्रिक राजनीति ही सच्चा धर्म है।

और अलोकतांत्रिक राजनीति ही वास्तविक अधर्म है। जो नेता और पार्टी लोकतांत्रिक खेल के नियमों का उल्लंघन करके चुनी हुई सरकारों को गिरा रहे हैं, नागरिक अधिकारों का हनन कर रहे हैं और लोगों के मन में न्याय और अन्याय का अंतर मिटाने के लिए धर्म के वाह्य आवरण का इस्तेमाल कर रहे हैं वे वास्तव में अधर्म कर रहे हैं। माना कि यह सब काम कांग्रेस के दौर में भी होता था लेकिन यह भी याद रखने की जरूरत है कि कांग्रेस के ही दौर में नागभूषण पटनायक जैसे क्रांतिकारी को रिहा किया जाता था और अगर गृहमंत्री पी चिदंबरम आपरेशन ग्रीन हंट की बात करते थे तो दिग्विजय सिंह जैसे लोग उसका विरोध भी करते थे।

यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि अधर्म की विराट सत्ता से टकराने का काम उस नैतिक बल से होगा जो राम के पास था और जो गांधी के पास था। वह नैतिक बल अपने को शासक दल का समझने और एलीट मानने से नहीं आएगा। वह त्याग तपस्या से ही आएगा। वह आम जन से मिलने से आएगा। उसे नेतृत्व के साथ कार्यकर्ताओं को साधना होगा। उस युद्ध को सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों से और प्रतीकों के माध्यम से विरोध जताने से नहीं जीता जा सकेगा।

उसे अकेले ही लड़ना नामसझी है। उसके लिए बहुत सारी शक्तियों को एकजुट करना होगा। यूआर अनंतमूर्ति ने अपने निधन से कुछ दिन पहले अपने लंबे लेख `हिंदुत्व आर हिंद स्वराज’ में साफ लिखा है कि यह संघर्ष गांधी और सावरकर के बीच है। देखना है इसमें गांधी के सत्य की विजय कैसे होती है? उस पुस्तक को नई सभ्यता का घोषणापत्र कहा जाता है। इसलिए कांग्रेस अगर गांधी के सत्य को समझती है और उसे साधना शुरू करती है तो उसे विजय से कोई रोक नहीं सकता। गांधी के मार्ग पर चल कर कांग्रेस की विजय इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर गांधी की कांग्रेस मरेगी तो फिर दुनिया में न तो इंसानियत बचेगी और न ही लोकतंत्र।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on July 14, 2020 4:36 pm

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