Friday, December 2, 2022

गौर कीजिए भारत के वर्तमान के इस पहलू पर

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कुछ पहले आई इस खबर ने भारत में जश्नभरा माहौल बना दिया कि भारत अब दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। इसके साथ ही ये खबर भी आई कि इस दशक के अंत तक अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल कर लेगा। चूंकि भारत ने पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए हासिल किया, तो इस पहलू का खास तौर पर उल्लेख किया गया है कि भारत जिस देश का दो सौ साल से अधिक समय तक गुलाम रहा, आखिर अब वह उससे आगे निकल गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी ने अपने जाने-पहचाने अंदाज में इसे अपनी बड़ी कामयाबी के रूप में पेश किया है।

लेकिन विशेषज्ञों ने जल्द ही इस आंकड़े का यथार्थवादी विश्लेषण पेश करते हुए समाज के एक बड़े तबके में फैले सुखबोध पर पानी फेर दिया। मसलन, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके अर्थशास्त्री रतिन रॉय की एक अखबार में टिप्पणी इस शीर्षक के साथ छपी- 2022 में भारत: बड़ा हो रहा है, धनी नहीं। भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा ट्रेंड के बारे में अनेक दूसरे विश्लेषणों की तरह इस टिप्पणी का भी सार यही रहा कि K आकार की अर्थव्यवस्था में पैदा होने वाले धन से आम लोगों की जिंदगी खुशहाल नहीं होती। हकीकत यह है कि आम भारतीयों की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।

दरअसल, इंडिया रेटिंग्स नाम की एक एजेंसी ने सितंबर के पहले हफ्ते में जारी अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि लोगों की गिरती कमाई भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्या बन गई है। इसके परिणामस्वरूप बाजार में मांग घटती गई है, जिसकी वजह से कंपनियों की उत्पादन क्षमता का एक बड़ा हिस्सा बेकार पड़ा हुआ है। इस रिपोर्ट में बताया गया कि 2016-17 से 2020-21 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में सकल मूल्य वृद्धि (जीवीए) के लिहाज से 44-45 प्रतिशत योगदान करने वाले हाउसहोल्ड्स (परिवारों) की आय वृद्धि की दर बमुश्किल एक फीसदी रही। कुल मिला कर जून 2022 में शहरी और ग्रामीण इलाकों में वास्तविक वेतन में क्रमशः 3.7 प्रतिशत और 1.6 प्रतिशत की गिरावट आई। जब यह रुझान हो, तो वास्तविक अर्थ में आर्थिक विकास की तमाम बातें बेमतलब हो जाती हैं।

इस चिंताजनक स्थिति के बावजूद वित्तीय बाजार से जुड़े लोगों की कमाई में भारी बढ़ोत्तरी और उसकी वजह से अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ना असल में एक बीमारी का लक्षण है। इससे देश की आम अर्थव्यवस्था में कोई मूल्य नहीं जुड़ता। सरकार की वित्तीय और इजारेदार पूंजी समर्थक नीतियों के कारण आम लोगों की जेब से धन का धनी तबकों को ट्रांसफर होने का सिलसिला हाल के वर्षों में तेज हुआ है। इस कारण कुछ लोग जरूर धनी होते चले जाते हैं। स्टॉक एक्सचेंज, बॉन्ड और ऋण बाजार में निवेश कर पैसा से पैसा बनाने वाले लोगों की संपत्ति बढ़ती है। यह रेंट अर्थव्यवस्था की वापसी है, जो भारत में हाल के वर्षों में तेजी से मजबूत हुई है।

बेशक ये सारा ट्रेंड नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में तेजी से आगे बढ़ा है। इसे गति देने में सरकार की औचक नोटबंदी, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लागू करने, और कोरोना महामारी के दौरान बिना पूर्व सूचना के अचानक लॉकडाउन करने के फैसलों का काफी योगदान है। इन तीन कदमों ने कृषि और कारोबार जगत क्षेत्र के छोटे उत्पादकों की कमर तोड़ दी। परिणामस्वरूप सारे संसाधनों का कुछ हाथों में संग्रह होने की प्रवृत्ति तेज हो गई। इसी पृष्ठभूमि में कोरोना काल के बाद जब आर्थिक गतिविधियां फिर चालू हुईं, तो अर्थव्यवस्था में सुधार के संदर्भ में K shape की बात सामने आई। यानी ये रिकवरी K अक्षर की तरह रही है, जिसमें ऊपर और नीचे की रेखाएं और लंबी हुईं। अर्थात धनी और धनी तथा गरीब और गरीब हुए हैं। ये रुझान इतना मजबूत हुआ है कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था को ही K आकार का कहा जाने लगा है। इसके परिणाम सबके सामने हैं:

  • जिस समय एक भरतीय उद्योगपति दुनिया का तीसरा सबसे धनी व्यक्ति बना, उसी समय जारी हुए संयुक्त राष्ट्र के ताजा मानव विकास सूचकांक में भारत का दर्जा और गिर गया। अब 191 देशों की इस सूची में भारत 132वें नंबर है।
  • इसी तरह पिछले साल वर्ल्ड हंगर इंडेक्स में भारत का दर्जा और गिरा था।
  • पिछले साल प्रति व्यक्ति आय के मामले में बांग्लादेश ने भारत को पीछे छोड़ दिया, जबकि भारत की कुल अर्थव्यवस्था का आकार उससे सात गुना से भी ज्यादा बड़ा है।
  • अपनी अर्थव्यवस्था के आकार के कारण भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के समूह जी-20 का सदस्य है, लेकिन उसके आम नागरिक औसतन बांग्लादेश या इंडोनेशिया से भी अधिक गरीब हैं।
  • चूंकि आम भारतीय नागरिक गरीब हैं, तो जैसा कि रतिन रॉय ने ध्यान दिलाया है, भारत सरकार के टैक्स संग्रहण की क्षमता कमजोर है, जिसकी वजह से वह स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के अन्य उपायों पर पर्याप्त खर्च नहीं कर पाती।
  • ऐसी स्थिति में उपाय धनी तबकों पर आय कर, धन कर और उत्तराधिकार कर आदि को बढ़ाना और लगाना हो सकता है, लेकिन सरकार की नीतियां K shape अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली हैं।
  • अभी हाल में सरकारी आंकड़ों से यह सामने आया कि भारत में स्वास्थ्य पर सरकार का कुल खर्च जीडीपी की तुलना में महज 1.28 प्रतिशत है, जबकि खुद भारत सरकार के आर्थिक सर्वे में कहा गया था कि ये खर्च कम से कम 3 प्रतिशत होना चाहिए। दरअसल, 15 साल में ऐसा पहली बार हुआ है, जब देश में  स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में गिरावट आई है। 
  • दरअसल, पहली बार ऐसा कुछ होने की यह पहली मिसाल नहीं है। 2020 में जब राष्ट्रीय फैमिली हेल्थ सर्वे-5 की पहली रिपोर्ट जारी हुई थी, तो उससे जाहिर हुआ कि देश में आजादी के बाद पहली बार बाल कुपोषण में वृद्धि है। तब सर्वे से सामने आए आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए नरेंद्र मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने इसे मोदी सरकार की नई कल्याण नीति का परिणाम बताया, जिसे उन्होंने New Welfarism  नाम दिया है।
  • New Welfarism से तात्पर्य ऐसी नीतियों से है, जिसमें सामाजिक और मानव विकास के दूरगामी कार्यक्रमों से बजट वापस लेकर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को प्राथमिकता दी जा रही है। यानी शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे का प्रसार और ऐसे नए ढांचे का निर्माण सरकार की प्राथमिकता से हट गया है, जबकि पीएम किसान निधि, पीएम आवास, उज्ज्वला आदि जैसी प्रत्यक्ष लाभ वाली योजनाओं को महत्त्व दिया गया है। अरविंद सुब्रह्मण्यम ने कहा कि दीर्घकालिक निवेश से सत्ताधारी दल को कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि उसके लाभ बाद में जाकर समाज को मिलते हैं। साथ ही किसी व्यक्ति को उससे सीधा फायदा महसूस नहीं होता। जबकि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से व्यक्ति सत्ताधारी नेता के प्रति खुद को आभारी महसूस करता है, और उसका फायदा उस नेता या पार्टी को अगले ही चुनाव में मिल जाता है। लेकिन ऐसी कल्याण नीति का परिणाम सामाजिक जड़ों के कमजोर होने के रूप में सामने आता है, क्योंकि प्रत्यक्ष लाभ रोजमर्रा के उपभोग में खर्च हो जाता है- उससे किसी सामाजिक संपत्ति या धन का निर्माण नहीं होता।

तो ये नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान अपनाई गई आर्थिक नीतियों और उसके परिणामों की कहानी है। लेकिन असल में यह इस पूरी कहानी का सिर्फ ताजा और अभी जारी अध्याय ही है। इस कथा को लिखने की शुरुआत करने में मोदी या उनकी पार्टी का प्रमुख योगदान नहीं है। बल्कि इसे श्रेय कहें या जिम्मेदारी- वह पीवी नरसिंह राव- मनमोहन सिंह सरकार पर जाती है। हालांकि यह भी सच है कि उसके बाद देश में बनी तमाम सरकारों ने नव-उदारवाद नाम से जानी जाने वाली इस नीति पर पूरी आस्था के साथ अमल किया है। बीते सवा तीन दशक से मोटे तौर पर देश में यह राजनीतिक सहमति रही है कि इन नीतियों का कोई विकल्प नहीं है। मोदी सरकार के साथ बात बस इतनी है कि उसने इन नीतियों पर अमल की रफ्तार बहुत तेज कर रखी है।

(क्रमशः)

(वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र रंजन आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)

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