Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

चुनाव आयोग शायद भूल गया, कभी शेषनादेश ही होता था शासनादेश!

नंदीग्राम में ममता बनर्जी पर हमला हुआ या वह दुर्घटना में घायल हुयीं या यह कोई राजनीतिक ड्रामा था, इस पर सबकी अलग-अलग राय हो सकती है, पर चुनाव की घोषणा के बाद जब तक चुनाव परिणाम घोषित न हो जाएं, तब तक राज्य की सारी प्रशासनिक मशीनरी चुनाव आयोग के अधीन रहती है और आयोग सरकार के रूप में अपने दायित्वों और कर्तव्यों का पालन कराता है। चुनाव आयोग संविधान के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है जो देश में राज्य और केंद्र की विधायिकाओं के लिये पक्षपात रहित और शांतिपूर्ण चुनाव सम्पन्न कराने के लिये, प्राविधित है। पहले चुनाव की शुरुआत चुनावी अधिसूचना के लागू होने से मानी जाती थी, और अधिसूचना के बाद ही, आदर्श चुनाव संहिता लागू हो जाती थी, पर बाद में आयोग ने आदर्श चुनाव संहिता को, मतदान की तारीखों की घोषणा के समय से ही लागू करने का नियम बना दिया। आयोग, चुनाव की घोषणा के बाद, में इतना अधिक स्वायत्त और शक्तिशाली हो जाता है कि जब तक चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है, तब तक सरकार को तो छोड़ दीजिए, सुप्रीम कोर्ट भी कोई दखल नहीं दे सकता है।

आदर्श चुनाव आचार संहिता, के बारे में कुछ सवालात स्वतः उठ जाते हैं। जैसे,  ‘आदर्श चुनाव आचार संहिता’ मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट है क्या? इसे कौन लागू करता है? इसके प्रावधान क्या क्या हैं? इसे लागू करने का उद्देश्य क्या है? इनके अतिरिक्त इस सन्दर्भ से जुड़ी कई और जिज्ञासाएँ भी जन्म लेती हैं, जिनके बारे में हर जागरूक मतदाता को तथ्य और सम्बंधित कानूनों की जानकारी होनी चाहिये।

किसी समय चुनावों के दौरान दीवारें पोस्टरों से पट जाया करती थीं। लाउडस्पीकर्स का कानफोड़ू शोर थमने का नाम ही नहीं लेते थे। दबंग उम्मीदवार धन-बल के ज़ोर पर चुनाव जीतने के लिये कुछ भी करने को तैयार रहते थे। चुनाव जीतने  के लिये धन और बाहुबल की कोई सीमा ही नहीं थी। बूथ कैप्चरिंग और बैलट बॉक्स लूट लेने जैसी घटनाएँ होती रहती थीं। चुनावी हिंसा के दौरान लोग मरते और घायल भी होते रहते थे। चुनावों में शराब और रुपए बाँटने का खुला खेल चलता था, जो अब भी जारी है।  ऐसे हालातों में आदर्श आचार संहिता इन सब व्याधियों के लिये अचूक इलाज तो नहीं सिध्द हुयी, लेकिन अपेक्षाकृत स्वच्छ चुनाव की ओर बढ़ता हुआ एक कदम तो है ही।

यह संहिता, वास्तव में, वे दिशा-निर्देश हैं, जिन्हें सभी राजनीतिक पार्टियों को मानना पड़ता है। इनका उद्देश्य, चुनाव प्रचार अभियान को निष्पक्ष एवं साफ सुथरा बनाना और सत्ताधारी राजनीतिक दलों को चुनाव में उनके गलत हस्तक्षेप को बाधित करना है। साथ ही सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग रोकना भी आदर्श आचार संहिता के मूल उद्देश्यों में से एक है। आदर्श आचार संहिता, राजनीतिक दलों और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिये आचरण एवं व्यवहार का एक माप दंड भी है। रोचक तथ्य यह भी है कि आदर्श आचार संहिता किसी विधायिका द्वारा पारित, किसी कानून के अंतर्गत नहीं बनी है बल्कि, यह सभी राजनीतिक दलों की सहमति से आयोग ने ड्राफ्ट की है और वही राजनीतिक दलों की सहमति से इसे संशोधित और परिवर्धित भी करता रहता है।

सबसे पहले आचार संहिता, 1960 के केरल विधानसभा चुनाव के दौरान अस्तित्व में आयी और आयोग ने यह दिशा निर्देश दिए कि, राजनीतिक दल क्या करें और क्या न करें। इसके बाद 1962 के आम लोकसभा चुनाव में पहली बार चुनाव आयोग ने इस संहिता को सर्वमान्य बनाने के लिये, सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में वितरित किया और उनसे उनकी राय मांगी। इसके बाद 1967 के लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में पहली बार राज्य सरकारों से आग्रह किया गया कि वे राजनीतिक दलों से इसका अनुपालन करने को कहें और कमोबेश ऐसा हुआ भी। इसके बाद से लगभग सभी चुनावों में आदर्श आचार संहिता का पालन कमोबेश होता रहा है। समय के अनुसार आचार संहिता में नए नए बिंदु भी जुड़ते रहे हैं।

1967 तक मध्यावधि चुनाव बहुत कम होते थे। पर 1967 के बाद मिली जुली सरकारों का दौर जब शुरू हुआ तो, समय से पहले विधान सभाओं  का विघटन भी होने लगा। ऐसा होने पर आदर्श आचार संहिता को भी इस दृष्टिकोण से संशोधित किया गया, जैसे लोकसभा या विधानसभा के  भंग हो जाने के बाद कामचलाऊ राज्य सरकार और केंद्र सरकार राज्य किसी नई योजना या परियोजना का ऐलान नहीं कर सकती हैं। चुनाव आयोग को यह अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के एस.आर. बोम्मई मामले में दिये गए ऐतिहासिक फैसले से मिला है। साल 1994 में आए इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि कामचलाऊ सरकार को केवल रोज़ाना का काम करना चाहिये और कोई भी बड़ा नीतिगत निर्णय लेने से बचना चाहिये।

चुनावों में अपनी बात जनता तक पहुँचाने के लिये सभाओं, जुलूसों, भाषणों, नारेबाजी और पोस्टरों आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए, आदर्श आचार संहिता के अन्तर्गत क्या करें और क्या न करें की एक लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है, जिसमें कुछ महत्वपूर्ण, मुद्दे हैं, जो आदर्श आचार संहिता को महत्वपूर्ण बना देते हैं। जैसे,

● सबसे पहले तो आदर्श आचार संहिता लागू होते ही राज्य सरकारों और प्रशासन पर कई तरह के अंकुश लग जाते हैं।

● सरकारी कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक निर्वाचन आयोग के तहत आ जाते हैं।

● आदर्श आचार संहिता में सत्तारूढ़ दल के लिये कुछ विशेष दिशानिर्देश दिए गए हैं। इनमें सरकारी मशीनरी और सुविधाओं का उपयोग चुनाव के लिये न करने और मंत्रियों तथा अन्य अधिकारियों द्वारा अनुदानों, नई योजनाओं आदि की घोषणा न करने की मनाही है।

● मंत्रियों तथा सरकारी पदों पर तैनात लोगों को सरकारी दौरे में चुनाव प्रचार करने की इजाजत भी नहीं होती।

● सरकारी पैसे का इस्तेमाल कर विज्ञापन जारी नहीं किये जा सकते हैं।

● चुनाव प्रचार के दौरान किसी के निजी जीवन का उल्लेख करने और सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काने वाली कोई अपील करने पर भी पाबंदी लगाई गई है।

● यदि कोई सरकारी अधिकारी या पुलिस अधिकारी किसी राजनीतिक दल का पक्ष लेता है तो चुनाव आयोग को उसके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है।

● चुनाव सभाओं में अनुशासन और शिष्टाचार कायम रखने तथा जुलूस निकालने के लिये भी दिशा निर्देश जारी किये गए हैं।

● किसी उम्मीदवार या पार्टी को जुलूस निकालने या रैली और बैठक करने के लिये चुनाव आयोग से अनुमति लेनी पड़ती है और इसकी जानकारी निकटतम थाने में देनी होती है।

● हेलीपैड, सभास्थल, सरकारी बंगले, सरकारी गेस्ट हाउस, सर्किट हाउस जैसी सार्वजनिक जगहों पर कुछ उम्मीदवारों का कब्ज़ा नहीं होना चाहिये। इन्हें सभी उम्मीदवारों को समान रूप से मुहैया कराना चाहिये।

● इस उल्लंघन से जुड़े आपराधिक मामले रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट 1951 और आईपीसी की विभिन्न धाराओं जो निर्वाचन सम्बंधित अपराधों के लिये बने हैं में दर्ज किये जाते हैं।

इन सारे दिशा निर्देशों का उद्देश्य, सत्ता का चुनाव के दौरान गलत इस्तेमाल पर रोक लगाकर सभी उम्मीदवारों को बराबरी का मौका देना है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मुहर लगा दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2001 में दिये गए अपने एक फैसले में कहा है कि चुनाव आयोग का नोटिफिकेशन जारी होने की तारीख से आदर्श आचार संहिता को लागू माना जाएगा। जहाँ चुनाव होने हैं, वहाँ आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है। यह सभी उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों तथा संबंधित राज्य सरकारों पर तो लागू होती ही है, साथ ही संबंधित राज्य के लिये केंद्र सरकार पर भी लागू होती है।

आदर्श आचार संहिता को और यूज़र-फ्रेंडली बनाने के लिये कुछ समय पहले चुनाव आयोग ने सी विजिल ‘cVIGIL’ एप लॉन्च किया है। cVIGIL के ज़रिये चुनाव वाले राज्यों में कोई भी व्यक्ति आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की रिपोर्ट कर सकता है। इसके लिये उल्लंघन के दृश्य वाली केवल एक फोटो या अधिकतम दो मिनट की अवधि का वीडियो रिकॉर्ड करके अपलोड करना होता है। उल्लंघन कहाँ हुआ है, इसकी जानकारी GPS के ज़रिये स्वतः संबंधित अधिकारियों को मिल जाती है। शिकायतकर्त्ता की पहचान गोपनीय रखते हुए रिपोर्ट के लिये यूनीक आईडी दी जाती है। यदि शिकायत सही पाई जाती है तो एक निश्चित समय के भीतर कार्रवाई की जाती है। इस एप के दुरुपयोग को रोकने की भी व्यवस्था की गयी हैं। सी विजिल cVIGIL एप के अलावा चुनाव आयोग ने और कई एडवांस तकनीकों को भी अपनाया है। इनमें नेशनल कंप्लेंट सर्विस, इंटीग्रेटेड कॉन्टैक्ट सेंटर, सुविधा, सुगम, इलेक्शन मॉनिटरिंग डैशबोर्ड और वन वे इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलट आदि शामिल हैं।

1999 में विधि आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में देशभर में एक साथ चुनाव करने की सिफारिश की थी। अभी कुछ समय पहले भी विधि आयोग देश भर में एक साथ चुनाव कराए जाने को लेकर ड्राफ्ट पेश कर चुका है। लेकिन यह भी सच है कि चुनावों के दौरान लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने की कोशिश सरकार किसी-न-किसी तरीके से ज़रूर करती है। यदि चुनाव आयोग कड़ी निगाह न रखे तो वह इस कोशिश में कामयाब भी हो जाती है। ऐसे में आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन होने पर चुनाव आयोग के पास कार्रवाई करने के अधिकार भी होते हैं। इसके लिये चुनाव आयोग थाने में मुकदमा दर्ज करा सकता है या उम्मीदवारी पर रोक तक लगा सकता है।

ममता बनर्जी पर हमले के संदर्भ में आयोग ने कहा है कि उसने स्थानीय डीएम, एसपी से रिपोर्ट मांगी है और आज की खबर है कि, पर्यवेक्षक भी घटनास्थल का दौरा कर के वस्तुस्थिति से अवगत कराएंगे। घटना क्या है, इस पर जब तक पूरी जांच न हो जाय, कुछ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन चुनाव आयोग के प्रति अविश्वास की बात जरूर  बंगाल के संदर्भ में कही जा रही है। चुनाव की घोषणा होते ही चुनाव आचार संहिता लागू हो जाती है और समस्त डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक तथा जहां पुलिस कमिश्नर हैं, वहां वह, यह सब आयोग के सीधे पर्यवेक्षण में आ जाते हैं। सरकार का कोई भी प्रशासनिक नियंत्रण नहीं रहता है। स्थानांतरण, नियुक्ति, और दंड आदि सभी मुख्य चुनाव अधिकारी के माध्यम से आयोग करता है। हर चुनाव क्षेत्र में आयोग का एक प्रशासनिक पर्यवेक्षक होता है जो संयुक्त सचिव के रैंक का आईएएस अफसर होता है। खर्च के पर्यवेक्षण के लिये अलग से एक और भारतीय राजस्व सेवा का अधिकारी (आईआरएस) होता है।

नंदीग्राम की घटना यह बताती है कि बंगाल के चुनाव में हिंसा हो सकती है। केंद्रीय निर्वाचन आयोग कितनी गम्भीरता से शांति व्यवस्था बनाये रखने में सफल होगा, यह तो बाद में ही पता चलेगा। पर आयोग ने जिस प्रकार से सत्तारूढ़ दल भाजपा के हित में अपना रुझान, पिछले चुनाव में दिखाया है और जैसे आरोप लगे हैं, उससे आयोग की पक्षपात रहित छवि पर सवाल उठते रहे हैं। ‘आज तक’ के अनुसार, ममता बनर्जी के पैर की चोट गंभीर बताई जा रही है। उनके सभी कार्यक्रम फिलहाल रद्द कर दिए गए हैं। उन्हें एसएसकेएम हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। ममता ने आरोप लगाते हुए कहा, ‘नंदीग्राम में मुझ पर हमला किया गया है। मेरे पैर में चोट लगी है। मेरे पैरों में सूजन है। मेरे पैर को गाड़ी से कुचलने की कोशिश की गई।’  ममता के चोटिल होने से उनके चुनावी अभियान पर असर पड़ा है और कई कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया है। कहा जा रहा है कि कार का दरवाजा खोलते हुए कुछ लोगों ने ममता के साथ बदसलूकी की। इस घटना के विरोध में टीएमसी  के एक संसदीय प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में चुनाव आयोग के अधिकारियों से मुलाकात की और आरोप लगाया कि नंदीग्राम में सीएम ममता बनर्जी पर साजिश के तहत हमला हुआ था। यह कोई दुर्घटना नहीं थी, वरन साजिश के तहत हमला हुआ है।

बंगाल एक भावुक प्रान्त है और वहां जिस तरह से ममता बनर्जी की लोकप्रियता और उनकी अदम्य संघर्षशीलता के प्रति लोगों के मन में आदर का भाव है, उसे देखते हुए इस हमले की व्यापक प्रतिक्रिया हो सकती है। कल ही आयोग ने पश्चिम बंगाल के डीजी पुलिस को बदला है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। पहले भी आयोग ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के तबादले किये हैं। हो सकता है और भी तबादले हों। पर इन सब तबादलों का एक ही उद्देश्य रहता है कि चुनाव बिना किसी पक्षपात और राजनीतिक दबाव के शांतिपूर्ण तरीके से निपट जाय।

चुनाव आयोग के बारे में अब तक के सबसे महत्वपूर्ण और आयोग को चुनाव के समय सरकार से भी अधिक शक्तिशाली बना देने वाले मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन कहते थे, कि उनकी भूमिका एक रेफरी की तरह है। एक रेफरी जैसे ही खेल के नियम टूटता है वैसे ही सीटी बजा देता है और नियमों के उल्लंघन की गम्भीरता के अनुसार, लाल कार्ड दिखा देता है। वह खिलाड़ी को भी मैदान से बाहर कर देता है। शेषन एक सख्त और नियमपालक रेफरी की तरह ही जब तक आयोग के प्रमुख रहे, बने रहे। उनकी सख्ती राजनीतिक दलों को अखर तो जाती थी, पर राजनीतिक दलों को आयोग के दिशानिर्देश मानने के अतिरिक्त और कोई विकल्प भी नहीं था। टीएन शेषन पर एक प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका ने एक लंबा लेख छापा और उसके कवर पेज पर टीएन शेषन की तस्वीर के साथ, एक कैप्शन लिखा था खलनायक। शेषन ने एक बयान में कहा था कि वे नाश्ते में राजनेता खाते हैं। यह सब मज़ाक़ की बातें हो सकती हैं, पर चुनाव व्यवस्था को व्यवस्थित और साफ सुथरा बनाने की शुरुआत उनके ही समय से शुरू हुयी और यह भी एक अच्छी बात थी कि, उनके उत्तराधिकारी जेएम लिंगदोह हुए जो शेषन के ही कदमों पर चले।

सबसे उल्लेखनीय बात यह रही है कि यह सब सुधार, सख्ती और निष्पक्षता के लिये न तो संसद ने कोई कानून बनाये और न ही सरकार ने कोई अध्यादेश जारी किया। यह सब संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत प्रदत अधिकारों के अनुसार किया गया है। चुनाव से सरकार बनती बिगड़ती है और सत्ता में आने की ललक, लोभ और इच्छा अनेक अनैतिक मार्गों की ओर स्वतः ले जाने लगती है। वैसे भी साम, दाम, दंड, भेद, राजनीति के चिर परिचित नियम माने गए हैं। ऐसी परिस्थिति में आयोग का काम बेहद चुनौतीपूर्ण और हर दशा में अपनी साख को बचा कर आगे बढ़ने का होता है। आयोग के पास कोई स्थायी प्रशासनिक मशीनरी नहीं होती है बल्कि उसके पास उसी राज्य का  प्रशासनिक तंत्र होता है, जिससे उसे चुनाव प्रबंधन करना होता है। ऐसी स्थिति में आयोग को सभी राजनीतिक दलों को यह विश्वास दिलाना पड़ता है कि वह नियम और कायदे के विपरीत कुछ भी नहीं देगा। शेषन ने उसी भरोसे को जनता में और प्रशासनिक हलके में स्थापित किया। आयोग के आदेश, शेषनादेश के रूप में मज़ाक़ में कहे जाने लगे।

कानून और व्यवस्था किसी भी चुनाव को शांतिपूर्ण और पक्षपात रहित रूप से सम्पन्न कराने के लिये सबसे महत्वपूर्ण अंग है। इसीलिए व्यापक तौर पर केंद्रीय बल नियुक्त होते हैं, पर्यवेक्षक भेजे जाते हैं, और एक-एक घटना की खबर रखी जाती है। हर अफसर आयोग के आधीन आ जाता है। ऐसे में आज बंगाल में जो होगा, उसकी जिम्मेदारी से आयोग बच नहीं सकता है। बंगाल ही नहीं देश में अन्य राज्यों, असम, तमिलनाडु, पुदुचेरी और केरल में भी चुनाव हो रहे हैं। चूंकि सत्तारूढ़ दल भाजपा की निगाह बंगाल पर लगी हुयी है और जिस तरह से 8 चरणों मे चुनाव बंगाल में कराया जाना है, उसी से यह स्पष्ट है कि बंगाल का चुनाव निरापद कराया जाना आसान नहीं है। आयोग के पास निश्चय ही कोई न कोई सूचना होगी। इसीलिए आयोग ने 8 चरणों में, ताकि, प्रबन्धन त्रुटिरहित हो सके, चुनाव कराने का निर्णय लिया। हालांकि इस निर्णय की भी आलोचना हुयी। आलोचनायें तो होती रहती हैं पर आयोग को चुनाव के दौरान साफ सुथरा और निष्पक्ष दिखने का एक नैतिक और वैधानिक दायित्व दोनों है। अब यह भविष्य ही बता पायेगा कि आयोग शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव कराने के अपने उद्देश्य और दायित्व में कितना सफल रहा है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on March 12, 2021 8:27 pm

Share