Wednesday, December 7, 2022

झारखंड में 1932 की खतियान आधारित स्थानीयता की सार्थकता

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झारखंड सरकार ने स्थानीयता को 1932 के खतियान का आधार और पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण पर कैबिनेट की मुहर के बाद जहां राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण चर्चा के केंद्र में रहा वहीं झारखंड में 1932 पर चर्चा जोर पकड़ता जा रहा है।

कैबिनेट ने स्थानीय निवासी की परिभाषा, पहचान और झारखंड के स्थानीय व्यक्तियों के सामाजिक एवं अन्य लाभों के लिए विधेयक-2022 लाने का निर्णय लिया है। यह विधेयक विधानसभा में रखा जायेगा। जबकि 1932 के आधार पर स्थानीयता को लागू करने के मामले में कई सवाल उठ रहे हैं। क्योंकि राज्य के अलग-अलग इलाकों में सर्वे का अलग-अलग साल रहा है।

झारखंड के मूलनिवासी व आदिवासी 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाए जाने को लेकर उत्साहित दिख रहे हैं वहीं राजनीतिक गलियारे में इसके साइड इफेक्ट पर चर्चा जोरों पर है।

दूसरी तरफ हम देखें तो झारखंड अलग राज्य गठन के बाद रघुवर दास को छोड़कर 10 मुख्यमंत्री आदिवासी हुए हैं बावजूद इसके 22 वर्षों में आदिवासियों जन जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया है। जिसे हम राज्य के गढ़वा जिला अंतर्गत रमना प्रखण्ड के मानदोहर गांव की विलुप्तप्राय आदिम जनजाति 65 वर्षीया जगीया परहिया व 70 वर्षीय पति हलकन परहिया इस संतान विहीन दम्पति जगीया परहिया का बायां हाथ लकवाग्रस्त है वहीं हलकन परहिया की आंखों से दिखाई नहीं देता है। उन्हें चावल तो मिल जाता है लेकिन उसके साथ दाल व साग सब्जी का कोई व्वस्था नहीं है। उनसे यह पूछे जाने पर कि वे लोग साग—सब्जी कहां से लाते हैं? जगीया परहिया कहती है — पैसा कहां है कि साग—सब्जी लाएंगे, माड़—भात खाकर ही रहना पड़ता है।

कभी-कभी जंगल तरफ जाकर कोई साग लाते हैं तो उस दिन साग—भात खा लेते हैं। माड़ या साग में नमक मिलाने के लिए किसी न किसी से नमक मांगना पड़ता है।

यह है 22 साल की तस्वीर।

तब सवाल उठता है जगिया जैसों को 1932 का कितना लाभ मिलेगा? शायद यह अनुत्तरित सवाल है।

कहना ना होगा कि 1932 का खतियान आधारित स्थानीयता पर झारखंडी जन-मानस का उत्साह यह संकेत दे रहा है कि उनको लग रहा है कि उनकी बेरोजगारी का असली कारण स्थानीयता का न होना है। उन्हें लग रहा है कि इसकी वजह से उनकी हकमारी हो रही है।

बताते चलें कि 1912 में जब बंगाल से बिहार को अलग किया गया। उसके बाद 1920 में बिहार के पठारी इलाकों के आदिवासियों द्वारा आदिवासी समूहों को मिलाकर ‘‘छोटानागपुर उन्नति समाज’’ का गठन किया गया।

उसी वक्त बंदी उरांव एवं यूएल लकड़ा के नेतृत्व में गठित उक्त संगठन के बहाने आदिवासियों की एक अलग पहचान कायम करने की कवायद शुरू की गई। यह एक तरह से आदिवासियों के लिए अलग राज्य की परिकल्पना की प्रारंभिक कड़ी थी, जिसे 1938 में जयपाल सिंह मुंडा ने संताल परगना के आदिवासियों को जोड़ते हुये ‘‘आदिवासी महासभा’’ का गठन करके इसे एक विस्तृत रूप दिया। इस सामाजिक संगठन के माध्यम से अलग राज्य की परिकल्पना को राजनीतिक जामा आजादी के बाद 1950 में जयपाल सिंह मुंडा ने ‘‘झारखंड पार्टी’’ के रूप में पहनाया। यहीं से शुरू हुई आदिवासी समाज में अपनी राजनीतिक भागीदारी व पहचान की लड़ाई। 1951 में देश में जब वयस्क मतदान पर आधारित लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ तो बिहार के छोटानागपुर क्षेत्र में झारखंड पार्टी एक सबल राजनीतिक पार्टी के रूप में विकसित हुई। 1952 के पहले आम चुनाव में छोटानागपुर व संताल परगना को मिलाकर 32 सीटें आदिवासियों के लिये आरक्षित की गईं, अत: सभी 32 सीटों पर झारखंड पार्टी का ही कब्जा रहा। बिहार में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में झारखंड पार्टी उभरी।

1955 में झारखंड पार्टी ने राज्य पुर्नगठन आयोग के सामने झारखंड अलग राज्य की मांग रखी। 1957 के आम चुनाव में झारखंड पार्टी ने चार सीटें गवां दी। 1962 के आम चुनाव में पार्टी 20 सीटों पर सिमट कर रह गई। 1963 में झारखंड पार्टी के सुप्रीमो जयपाल सिंह मुंडा अपने तमाम विधायकों सहित कांग्रेस में जा मिले। एक तरह से झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया और उस वक्त झारखंड अलग राज्य का आंदोलन यहीं पर दम तोड़ दिया।

उसके तीन साल बाद 1966 में अलग राज्य की अवधारणा पुनः जागृत हुई। ‘‘अखिल भारतीय अदिवासी विकास परिषद’’ तथा ‘‘सिद्धू-कान्हू बैसी’’ का गठन किया गया। 1967 के आम चुनाव में ‘‘अखिल भारतीय झारखंड पार्टी’’ का गठन हुआ। मगर चुनाव में कोई सफलता हाथ नहीं लगी। 1968 में ‘‘हुल झारखंड पार्टी’’ का गठन हुआ। इन तमाम गतिविधियों में अलग राज्य का सपना समाहित था। जिसे तत्कालीन शासन तंत्र ने कुचलने के कई तरकीब आजमाए। 1969 में ‘बिहार अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम 1969’ बना। 1970 में ईएन होरो द्वारा पुनः झारखंड पार्टी का गठन किया गया। 1971 में जयराम हेम्ब्रम द्वारा सोनोत संथाल समाज का गठन किया गया। वहीं 1972 में आदिवासियों के लिये आरक्षित 32 सीटों को घटाकर 28 कर दिया गया। इस राजनीति का सबसे दुखद पहलू यह है कि झारखंड अलग राज्य गठन के बाद भी आदिवासियों के लिये आरक्षित सीट की संख्या आज भी वही 28 की 28 ही रह गई है।

इसी बीच शिबू सोरेन आदिवासियों के बीच एक मसीहा के रूप में उभरे। महाजनी प्रथा के खिलाफ उभरा आन्दोलन तत्कालीन सरकार को हिला कर रख दिया। शिबू आदिवासियों के भगवान बन गये। शिबू की आदिवासियों के बीच बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए वामपंथी चिंतक और मार्क्सवादी समन्वय समिति के संस्थापक कामरेड एके राय और झारखंड अलग राज्य के प्रबल समर्थक बिनोद बिहारी महतो द्वारा 4 फरवरी 1973 को झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ और मोर्चा का कमान शिबू सोरेन को थमा दिया गया।

महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन अब झारखंड अलग राज्य की मांग में परिणत हो गया। 1977 में शिबू लोकसभा के लिए खड़े हुए लेकिन हार गए। मगर 1980 में लोकसभा का चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंच गए। अलग राज्य की मांग पर सरकार के नकारात्मक रवैये को देखते 1985 में कतिपय बुद्धिजीवियों ने केन्द्र शासित राज्य की मांग रखी। झामुमो द्वारा अलग राज्य के आंदोलन में बढ़ते बिखराव को देखते हुए 1986 में ”आल झारखंड स्टूडेंटस् यूनियन” (आजसू) का तथा 1987 में ”झारखंड समन्वय समिति” का गठन हुआ। इन संगठनों के बैनर तले इतना जोरदार आंदोलन चला कि एक बारगी लगा कि मंजिल काफी नजदीक है। मगर ऐसा नहीं था। शासन तंत्र ने इन आंदोलनों को किसी प्रकार की तवज्जो नहीं दी।

भाजपा ने भी 1988 में वनांचल अलग राज्य की मांग रखी। 1994 में तत्कालीन लालू सरकार में ”झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद विधेयक” पारित किया गया। जिसका अध्यक्ष शिबू सोरेन को बनाया गया। 1998 में केन्द्र की भाजपा सरकार ने वनांचल अलग राज्य की घोषणा की। शब्द को लेकर एक नया आंदोलन शुरू हो गया। अंततः वाजपेई सरकार में 2 अगस्त 2000 को लोक सभा में झारखंड अलग राज्य का बिल पारित हो गया। 15 नवम्बर 2000 को देश के और दो राज्यों छत्तीसगढ़ व उत्तरांचल अब उत्तराखंड सहित झारखंड अलग राज्य का गठन हो गया। तब से लेकर अब तक झारखंड में 11 मुख्यमंत्री हुये और एक रघुवर दास को छोड़कर सभी के सभी आदिवासी समुदाय से हुये हैं।

तमाम घटनाक्रम और अलग राज्य गठन के 22 वर्षों बाद भी इस राज्य का दुर्भाग्य है कि अभी तक डोमिसाइल नीति के अलावा सीएनटी एक्ट, विस्थापन नीति और पुनर्वास नीति नहीं बन पायी है।

इस 22 साल में एक नई पीढ़ी सामने उभर कर आई है जिसके जेहन में बार बार यह सवाल उठता है कि झारखंड किसका? बता दें कि 1971 में हुए कोयले के राष्ट्रीयकरण के पहले यहां खदानों के निजी मालिक हुआ करते थे। जिन्होंने यूपी और तत्कालीन बिहार से खदानों में काम करने के लिए लोगों को बुलाया, जो यहां बसते चले गए। 50 के दशक में सिंदरी उर्वरक कारखाना और 60 के दशक में बोकारो में बीएसएल शुरू होने के बाद यहां काम करने के लिए बाहरी लोग आए और यहीं बस गए।

पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मधु कोड़ा ने राज्य सरकार के 27 प्रतिशत आरक्षण के प्रस्ताव का समर्थन जहां किया है, वहीं 32 की स्थानीयता का खुलकर विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि ओबीसी को नौकरी में आरक्षण का कोटा बढ़ाने का प्रस्ताव कैबिनेट में लाया गया है, वह सराहनीय निर्णय है। लेकिन 1932 खतियान पर स्थानीयता का प्रस्ताव लाया गया तो सिर्फ कोल्हान में 45 लाख लोग रिफ्यूजी हो जाएंगे। 1932 का आधार मानकर फैसला लिया जाना गलत है। इससे लाखों लोग परेशानी में पड़ जाएंगे। कोल्हान का सर्वे सेटलमेंट 1964, 1965 व 1970 में हुआ था, जिसे राज्य सरकार नहीं मान रही है। सरकार को प्रस्ताव पर पुनर्विचार करना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो विरोध में वृहद आंदोलन किया जाएगा।

भतखोरिया कॉलेज साहिबगंज (झारखंड) के अर्थशास्त्र विभाग के व्याख्याता सुबोध कुमार झा कहते हैं कि जो विशुद्ध झारखंडी है उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण निर्णय है जो स्वागत योग्य है। परंतु सियासत के दृष्टिकोण से यह एक ऐसा मुद्दा था जैसा जम्मू-कश्मीर से धारा 370, 35 A का हटना। भूल कर भी मुस्लिम वोट भाजपा को नहीं मिलता है। उसी प्रकार झारखंड में लगभग 40% वोटर बाहरी हैं और अन्य राज्यों से आकर यहाँ बसे हैं जो भूलकर भी हेमंत सोरेन को वोट नहीं करेंगे। इसलिए निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि जो गति बाबूलाल मरांडी की हुई थी बस उसी की पुनरावृत्ति अवश्यंभावी है।

लातेहार के एक स्थानीय पत्रकार वसीम कहते हैं कि यह ऐतिहासिक निर्णय है, स्वागत योग्य है…यह प्रस्ताव भी नौवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए केंद्र को भेजा जाएगा। यह मांग काफ़ी पुरानी थी। लेकिन 1932 की स्थानीयता हो या 27 प्रतिशत आरक्षण अंतिम सत्य ये है, कि केंद्र पर पूरा मामला फेंक दिया गया है, नौवीं अनुसूची में प्रावधान शामिल होंगे तभी प्रभावी होगी,  राजनीति में परशेप्सन मेकिंग की अहम भूमिका है, इसमे हेमंत सोरेन बाजी मारते दिख रहे हैं…

आदिवासी जन परिषद के अध्यक्ष प्रेम शाही मुंडा ने कहा कि 1932 का खतियान के आधार पर स्थानीय नीति का प्रस्ताव कैबिनेट पर पास किए जाने का ऐतिहासिक फैसला है और इसका आदिवासी जन परिषद स्वागत करती है यह जीत हर स्थानीय नीति आंदोलन आंदोलनकारियों नेताओं एवं झारखंड की आम जनता की जीत है अविलंब इस फैसले को झारखंड विधानसभा में विशेष सत्र बुलाकर पास किया जाए और 1932 के खतियान का आधार लेते हुए,आंध्र प्रदेश की तर्ज पर संविधान के अनुच्छेद 371 के आधार पर स्थानीय नीति एवं नियोजन नीति अविलंब बनाया जाए ताकि आदिवासी मूलवासी के छात्र नौजवान की नौकरियों के लिए मार्ग प्रशस्त हो और नौकरी के साथ-साथ ठेकेदारी सप्लाई का काम भी स्थानीय लोगों को मिले।

बिरहोर पर रिसर्च कर रहे एवं बिरहोर भाषा का शब्दकोश लिखने वाले देवकुमार महतो कहते हैं -काफी लंबे समय से 1932 के खतियान आधारित नीति की माँग की जा रही थी जिसे झारखंड विधानसभा में विधेयक के रूप में पेश किया जायेगा इससे झारखंड के विभिन्न स्थानों में खुशी के जश्न मनाये जा रहे हैं। हालांकि यह विधेयक पास होना चुनौती पूर्ण हो सकता है क्योंकि पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा भी कैबिनेट में इसे पारित कराया था जिसे मुँह की खानी पड़ी थी। माननीय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी कुछ माह पूर्व विधानसभा में संबोधन में कहा था कि 1932 खतियान आधारित नीति बनाने हेतु कानूनी पहलुओं को देखा जा रहा है लेकिन झारखंड के सभी हिस्सों में एक साथ सर्वे नहीं होने के कारण मुश्किल प्रतीत होता है।

खोरठा साहित्यकार व व्याख्याता दिनेश दिनमणी का मानना है कि अगर इस प्रस्ताव में राजनीतिक प्रपंच नहीं है तो निश्चय ही यह एक ऐतिहासिक फैसला है। इसका हम स्वागत करते हैं।

1932 एक भावनात्मक अंक है जो झारखंड के बड़े क्षेत्र से उभर कर स्थानीयता के आधार का पर्याय बन कर उभरा है। पर व्यावहारिक रूप से क्षेत्र वार अंतिम सर्वे को स्थानीयता का आधार बनाया जाना चाहिए। इससे झारखंड के सभी क्षेत्र समाहित हो जाएंगे। कानूनी अड़चन की गुंजाइश भी कम होगी।

नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के आंदोलनकारी जेरोम कुजूर कहते हैं कि 1932 के आधार पर स्थानीय नीति बनाने के प्रस्ताव पर मंजूरी के लिए झारखंड सरकार को आभार। जल्द विधान सभा में पारित कर इसे मजबूती प्रदान करे। लास्ट सर्वे सेटलमेंट ही स्थानीयता का आधार होना चाहिए। एकीकृत बिहार के समय यही लागू था। अभी भी बिहार में यही लागू है। पहले नीति तो आने दीजिए। आगे भी लड़ा जाएगा।

बिहार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शिवाशीष चौबे कहते हैं कि यह अति दुखद है की, राज्य की इस स्थानीय नीति की परिभाषा में लगभग 22 साल लग गए, जबकि बिहार में पहले से ही समान मानदंड लागू हैं। राज्य में अधिकतम समय तक भाजपा और सहयोगी दलों का शासन रहा, इसके बावजूद स्थानीय नीति का नहीं लागू होना राज्य के मूलवासियों के विकास और कल्याण के प्रति इनकी रुचि और मंशा को जाहिर करता है।

ग्रामीण विद्वानों और बुद्धिजीवियों के शोध से पता चलता है कि 1932 वर्ष में किए गए सर्वेक्षण के बाद तैयार हुए खेवट-खतियान में अनुचित और अव्यवहारिक कार्यप्रणाली के कारण कई विसंगतियां हैं, जिनको 1908 के सर्वेक्षण के संदर्भ में गहन मूल्यांकन एवं तत्काल सुधार के साथ लागू किया जाना आवश्यक है।

उदाहरण के लिए, जरपेशगीदारों और लीजधारकों जिसमें ब्रिटिश मूल के लोग भी थे, उनके नाम खेवट-खतियान में खेवटदार/भूस्वामी के रूप में पंजीकृत किए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप लागू कानून के अनुसार उन ब्रिटिश बागान मालिकों के वंशज भी आज राज्य में मूलवासी के रूप में मान्यता के लिए आवेदन कर सकते हैं।

अतः, पार्टी को शहरी शिक्षाविदों एवं विद्वानों को तरजीह देने के बजाय इस विषय के संबंध में गहन अध्ययन और समझ रखने वाले ग्रामीण बुद्धिजीवियों और विद्वानों की उचित टीम के चयन में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

पूर्व सांसद सालखन मुर्मू का मानना है कि हेमंत सरकार के कैबिनेट का डोमिसाइल पर फैसला और एक छलावा है,झुनझुना है। यह राजनीतिक ज्यादा है, वास्तविक कम। इसके लागू होने की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि प्रस्तावित बिल केंद्र को भेजने और 9वीं अनुसूची आदि में शामिल करने की कवायद अर्थात इसको अंधी गलियारे में धकेलने जैसा है। आदिवासी- मूलवासी जनता को निकट भविष्य में इससे कोई फायदा नहीं मिलेगा। चूँकि यह एक राजनीतिक खेल मात्र है, इसको जनता के हितार्थ ईमानदार प्रयास नहीं कहा जा सकता है। यह राजनीति प्रेरित ब्लेम गेम मात्र है।

मुख्यमंत्री सचिवालय, रांची द्वारा जारी विज्ञप्ति संख्या 338/ 2022, 14 सितम्बर 2022, झारखंड मंत्रालय, रांची में भी 1932 के खतियान का कोई जिक्र नहीं है। यह जनता के साथ एक फ्रॉड की तरह है।

लिहाजा इस समय झारखंडी जनता को झारखंड में नया जन आंदोलन खड़ा करना चाहिए। अतः हमारी मांग है कि झारखंड में जितनी भी सरकारी- गैर सरकारी नौकरियां हैं, उसका 90% हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आवंटित किया जाए और उन नौकरियों को प्रखंडवार कोटा बनाकर केवल प्रखंड के आवेदकों से भरा जाए। अन्यथा प्रस्तावित डोमिसाइल नीति कब लागू होगी का पता नहीं है, तो सारी नौकरियां स्थानीय की जगह गैर- स्थानीय हड़प सकते हैं।

आदिवासी मूलवासी आंदोलनकारी लक्ष्मी नारायण मुंडा कहते हैं कि झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार द्वारा 1932 ई0 का खतियान आधारित स्थानीयता नीति और पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण नीति को कैबिनेट से पास कराना स्वागत योग्य है। लेकिन 1932 ई0 को आधार बनाकर स्थानीयता नीति बनाना झारखंड की आदिवासी-मूलवासी जनता को भ्रमित करने और छल करने जैसा प्रतीत होता है।

हेमंत सोरेन सरकार निःसंदेह इसको विधान सभा से पास भी करा लेगी। लेकिन इसमें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कितना ईमानदार हैं यह तो भविष्य ही बताएगा। ज्ञात हो कि 1932 ई0 के खतियान आधारित स्थानीयता नीति को झारखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2002 ई0 में खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ अब तक झारखंड सरकार द्वारा न तो पुर्नयाचिका दायर की गई है और न सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है। इस परिस्थिति में 1932 ई0 के खतियान आधारित स्थानीयता नीति न्यायापालिका की नजर से कितना उचित होगा यही शंका है। बेशक झारखंड सरकार को आदिवासी मूलवासी जनता के हितों में स्थानीयता नीति बनाना ही चाहिए। लेकिन इसकी मापदंड क्या क्या हो सकता है इस पर विचार करना चाहिए।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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