Fri. Apr 10th, 2020

नड्डा पता नहीं इस प्राणहीन जीव के बोझ को कैसे ढोयेंगे !

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जेपी नड्डा और अमित शाह।

बीजेपी में नये अध्यक्ष आ गये हैं — अमित शाह की जगह जे पी नड्डा । 

बीजेपी में यह परिवर्तन एक ऐसे समय में हुआ है, जब वह एक बहुत ही बुरे दौर से गुजर रही है । एक ऐसे दौर से जब चंद महीनों पहले की 2019 के चुनावों की भारी सफलता के ठीक बाद ही चरम अहंकार में उसका ब्लड प्रेसर तेजी से बढ़ता हुआ ऐसी जगह पहुंच गया जब आदमी की जिंदगी पर खतरा छा जाता है । बीजेपी को भी सचमुच इससे लकवा मार गया है और वह लगभग एक संवेदनशून्य प्राणी में तब्दील हो चुकी है । 

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नड्डा को सभापति पद सौंपने के वक्त मोदी ने उन्हें एक ही सलाह दी कि वे इस ‘टोली’ पर ज्यादा समय जाया न करें । 

‘टोली’ से मोदी का क्या तात्पर्य था ? उनका इशारा उस जनता की ओर था जो अभी लाखों की संख्या में देश के हर शहर, कस्बे और गांव में सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरी हुई है । 

जनतंत्र में जिस जनता को ही माई-बाप माना जाता है, मोदी-शाह कंपनी अपने नए अध्यक्ष से कहते हैं — उसी की परवाह मत करो ! 

मोदी-शाह का यह नजरिया ही उनकी जुनूनी विक्षिप्तता और बीजेपी को उनके द्वारा एक डरावनी लाश में तब्दील कर देने का सबसे ज्वलंत प्रमाण है । 

देश के कोने-कोने में इतने भारी विरोध प्रदर्शनों से लगभग निष्फिक्र हो कर अभी दिल्ली में अमित शाह आदि जिस प्रकार ढर्रेवर रूप में अपना चुनाव प्रचार कर रहे हैं, जिस प्रकार इन चुनावों में भी शुद्ध  सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अपने हमेशा के काम में लगे हुए हैं, उससे ही इनकी जुनूनी विक्षिप्तता नग्न रूप में सामने आ जाता है । 

सिगमंड फ्रायड कहते है कि ऐसी विक्षिप्तता में फंसा हुआ आदमी सबसे पहले अपने ऊपर नजरदारी रखने वाले पिता को मृत मान कर चलता है । वह अपने मालिक की मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि उसे पहले ही मृत मान लेता है । 

ऐसा व्यक्ति एक प्रकार से निश्चेष्ट सोया पड़ा हुआ अपने को दिलासा दिया करता है कि मैं अपने नित्य कर्मों का, पूजा-अर्चना के सारे कामों का पूरी निष्ठा से पालन करता हूं,  दूसरे सभी कामुक पचड़ों से दूर हूं ! उसकी दशा उस सैनिक की तरह की होती है जो वास्तविक मृत्यु से बचने के लिए युद्ध के मैदान में मृत पड़े होने का अभिनय किया करता है । 

मृत्यु से इस प्रकार के धोखे का मतलब ही है खुद जड़ीभूत हो जाना, जिंदा रहते हुए मर जाना । जुनून में यह जड़ता एक आम लक्षण है । आज की बीजेपी में ये सारे लक्षण बिल्कुल साफ दिखाई दे रहे हैं । 

ऐसे समय में ही इस जोड़ी ने पार्टी के प्रति अपने एक और कर्त्तव्य का पालन करके, उसे एक नया अध्यक्ष दे कर, जैसे अपने एक और महान दायित्व का निर्वाह कर लिया है ! 

नड्डा यह पद पा कर खुश है क्योंकि जो भी है, मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है ! 

लेकिन, कहना न होगा, ऐसी सारी कवायदें अब बीजेपी को जिंदा रखने में कामयाब नहीं हो सकती हैं । वह अब किसी के लिये भी सिर्फ एक डरने-डराने की मुर्दा चीज रह गई है, आशा देने वाली कोई जीवित वस्तु नहीं है । श्मशान के कुछ कापालिक ही, जिन्हें यहां आरएसएस के घुटे हुए स्वयंसेवक भी कहा जा सकता है, अब इसके चारों ओर नाचेंगे, कूदेंगे । विवेकवान सामान्यजन तो इस डरावनी मुर्दानगी से दूरी रखना ही बेहतर समझेगा ।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं। आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)   

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