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Categories: बीच बहस

कानून को कटघरे में खड़ा करती है एनकाउंटर के प्रति बढ़ती जन स्वीकृति

पाप से घृणा करो पापी से नहीं, जाने कब से कहा बताया जाता रहा है। आधुनिक समाज में पाप की जगह अपराध और पापी की जगह अपराधी ने ले ली और लोग कहने लगे अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं। हालांकि सनातन से लेकर आज तक कभी किसी ने न तो इसे आत्मसात किया और न ही स्वीकार। एक आदर्श वाक्य या उक्ति की तरह बस पीढ़ी दर पीढ़ी रटाया पढ़ाया जाता रहा। हम तो सदा से ‘समरथ को नहीं दोस गोसांई…’ को मानने वाले रहे हैं।

समर्थ और प्रभावशाली के कुकृत्य भी हमें अपराध नहीं लगते और हम मन ही मन उस व्यक्ति से घृणा करते रहते हैं मगर उसकी खिलाफत करने का साहस नहीं जुटा पाते, एक तारण हार की राह देखते उसके तमाम अत्याचारों को, जिसे पाप कह लें या अपराध, सहन करते रहते हैं। बर्बर समाज में जीते हमारे दिलो दिमाग पर आंख के बदले आंख, हाथ के बदले हाथ और खून का बदला खून इस तरह बिठा दिया गया कि आज भी जब हम इस जंगली कानून को फलीभूत होते देखते हैं तो भीतर से आह्लादित हो उठते हैं। हमारे भीतर का जानवर संतुष्ट होता है।

विकास दुबे प्रकरण कोई पहला नहीं है और न ही विकास दुबे कोई अंतिम नाम है। विकास दुबे हमारे समाज और व्यवस्था की विद्रूपता का ही एक नाम है जो राजनीति, पुलिस, प्रशासन और अपराध के अंतर्संबंधों के फैले मकड़ जाल का एक मोहरा मात्र है । आज इस खूनी खेल में विकास को ख़त्म कर इन संबंधों से परदा उठाने की संभावनाओं को भी खत्म कर दिया गया है । ये हमेशा से होता रहा है और आगे भी जारी रहेगा । सभी जानते रहे हैं विकास दुबे के काले और खौफनाक कारनामों की हकीकत। सभी जानते रहे कि वो पिछले 30 बरसों से पूरे तंत्र के संरक्षण में बेखौफ, बेरोकटोक अपना साम्राज्य चला रहा था। जाने कितने बेगुनाहों की हत्याओं का आरोप था और जाने कितने संगीन अपराधों में संलग्न रहा।

आखिर इतने सालों से वो कैसे बचा रहा और अपना वर्चस्व कायम रख सका? ये सवाल भी अनुत्तरित नहीं है, हर शख्स इसका उत्तर जानता है बल्कि हर शख्स ही इसका उत्तर है। विगत 30 वर्षों में जाने कितने ही मासूम और निरपराध लोगों की हत्या में संलग्न विकास दुबे और उसके जैसे असंख्य दुर्दांत अपराधी किस तरह अपने आप को बचाए रखते हैं यह लगभग सभी जानते हैं। राजनैतिक और पुलिस के संरक्षण और समर्थन के बिना कोई भी अपराधी अपना साम्राज्य नहीं चला सकता। इस मामले में भी यह खबर भी आम है कि विकास दुबे के घर दबिश से पहले उसके गांव में पुलिस के आने की सूचना भी उसे पुलिस में उसके सूत्रों ने ही दी थी जिसके चलते कहा जा रहा है कि इतिहास में पहली बार सरकार ने पूरा थाना निलंबित कर लाइन अटैच कर दिया। यह हमारे लोकतंत्र में पुलिस, अपराधी और राजनीतिक संरक्षण की एक मिसाल है।

आज अपराध, राजनीति, पुलिस और प्रशासन के सम्बन्ध इतने प्रगाढ़ होते गए हैं कि अब तो भेद कर पाना भी काफी मुश्किल होता जा रहा है। अब तो अपराध ही राजनीति का प्रवेशद्वार सा होता जा रहा है। इस खेल में जो सफल होकर राजनीति के किसी ऊंचे मुकाम तक पहुंच जाता है वो अपने ओहदे और प्रभाव का इस्तेमाल कर पीछे अपनी राह के सारे आपराधिक दागों को संविधान की झाड़ू से धो पोंछ डालता है। जिस समाज में दुर्दांत अपराधियों को राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण प्राप्त हो वह समाज एक बीमार और भयाक्रांत समाज होता है।

एक लोकतांत्रिक देश में किसी एनकाउंटर करने वालों का स्वागत फूल माला और मिठाई से किया जाए तो संवेदनशील लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक है। हालांकि इन संवेदनशील लोगों को ट्रोल किया जाना , देशद्रोही तक करार देना भी आज का शगल हो गया है। हम एक ओर तो अमरीका में एक अश्वेत के साथ पुलिस दुर्व्यवहार पर मुखर हो जाते हैं मगर अपने देश में पुलिस की बर्बरता और असंवैधानिक तरीकों पर चुप्पी साध लेते हैं बल्कि विकास दुबे जैसे अनगिनत एनकाउंटरों पर खुलकर समर्थन करते हैं। 

क्या इसका सीधा तात्पर्य यह लगाया जाए कि आम आदमी का कानून, संविधान से विश्वास उठ गया? इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। छोटे-छोटे मामलों के सालों साल खींचने के अदालती प्रक्रिया ने आम जन का कानून पर भरोसा कम किया है। हमेशा से न्याय में देर के चलते लोग अदालत न्याय और कानूनी प्रक्रिया से बहुत निराश होते रहे हैं । हाल ही में निर्भया के दोषियों को फांसी की सजा के मामले में भी देश की जनता कानून के असहाय हो जाने के निम्नतम स्तर का रूप देख चुकी है । यह भी देख चुकी है कि एक वकील किस बेशर्मी से कानूनी दांव पेचों का इस्तेमाल कर आरोपियों को बचाने के लिए कितना नीचे गिर सकता है।

यह बहुत चिंता की बात है कि एक लोकतांत्रिक देश में आज हम न्याय के लिए मध्य युग की बर्बर मान्यताओं की ओर आकर्षित हो रहे हैं। आज भी हमारा मानस लोकतंत्र के अनुरूप नहीं ढल सका है । आज भी हम मध्ययुग के बर्बर रीति रिवाजों को वास्तविक न्याय मान रहे हैं । अपराधी को दंड संविधान के तहत कानूनी तौर पर तय किया जाना ही लोकतंत्र की पहचान है। आखिर हमारी कानूनी प्रक्रिया ऐसी क्यों बना दी गई है कि आम आदमी को न्याय नहीं तारीख ही मिलती है ।

एक बात पर गौर करें कि जब तक कोई भी  अपराधी आम जन को लूटता या बेरहमी से मारता काटता रहता है, उसे कोई भय नहीं रहता । वो बेखौफ अपना साम्राज्य चलाता रहता है और कई बार तो बाकायदा लोकतांत्रिक तरीके से माननीय यानी विधायक और मंत्री तक हो जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जिसे पूरा समाज एक दुर्दांत अपराधी मानता है उसे ही अपना  जनप्रतिनिधि चुन लेता है। मगर यह भी विडंबना ही है कि इस सबके बावजूद हर शख्स ऐसे अपराधियों के एनकाउंटर पर खुश भी होता है।

एक बात और ग़ौरतलब है कि सालों साल पूरी सेटिंग के साथ अपनी दादागिरी और आतंक का साम्राज्य बेखौफ चालाने वाले अपराधी तब अचानक दुर्दांत हो जाते हैं जब वह पुलिस और प्रशासन से पंगा मोल ले लेते हैं ।  क्या कारण है कि  सालों से अपराध की दुनिया का सरगना अपराधी विभिन्न राजनीतिक दलों, सरकारों से, कानून की नजरों से बचता अपना आपराधिक साम्राज्य स्थापित करता है मगर ज्यों ही वह पुलिस से पंगा लेता है पूरे समाज के लिए जो दुर्दांत करार दिया जाता है। उसका खात्मा बहुत ज़रूरी हो जाता है। आश्चर्य तो इस बात का है एक ही दिन में अचानक वह पूरे समाज की नजर में खतरनाक दुर्दांत अपराधी हो जाता है सिर्फ इसलिए कि वह पुलिस से दुश्मनी मोल ले लेता है ।

यह भी सभी जानते हैं कि न तो ये पहला है और न आखिरी एनकाउंटर है। हम सब यह भी जानते हैं कि इस एनकाउंटर के बाद भी ना तो अपराध रुकेंगे और ना ही अपराध, राजनीति, प्रशासन और पुलिस के अंतर्संबंधों पर किसी तरह की आंच आएगी। तमाम काम पहले की तरह बदस्तूर जारी रहेंगे, बल्कि और मजबूत भी हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हम भी नहीं सुधरेंगे और ऐसे ही कुख्यात और दुर्दांत चेहरों में से कई को बाकायदा लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर माननीय जनप्रतिनिधि भी बनाते रहेंगे। जिस देश की जनता तर्क और ज्ञान की बजाय अंधभक्ति में लीन हो उस देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करना ही बेमानी है।

(जीवेश चौबे वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। आप आजकल रायपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on July 11, 2020 4:00 pm

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