Sunday, October 17, 2021

Add News

कोविड-19 से जुड़े कानून व उनके मायने

Janchowkhttps://janchowk.com/
Janchowk Official Journalists in Delhi

ज़रूर पढ़े

आज हम मानव सभ्यता के जिस दौर में रह रहे हैं वहां जीवन का कोई भी पहलू ऐसा नहीं है,जिसमें कानून शामिल न हो। एक अंग्रेजी कहावत है : “लॉ इज एव्रीव्हेयर फ्रॉम क्रैडल टू ग्रेव” अर्थात कानून मानव जीवन के पालने या जन्म से लेकर मृत्यु तक ही नहीं बल्कि उसके बाद भी शामिल रहता है। इस आलोक में हम देखते हैं कि वर्तमान विश्व को अपनी जद में लेकर त्राहि-त्राहि मचाने वाला कोरोना वायरस जिसे वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) ने कोविड-19 की संज्ञा से निरूपित किया है, से निपटने के लिए भारत में क्या कुछ कानून, नियम एवं सांविधिक उपाय उपलब्ध हैं? उल्लेखनीय है कि भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में सरकारें/स्टेट कम से कम सैद्धांतिक रूप से ‘रूल ऑफ़ लॉ’ के अनुसार ही हर चुनौतियों व संकट का मुकाबला करने के उपाय करती हैं, आदेश जारी करती हैं।

कोरॉना के प्रकोप से देश-समाज को बचाने के अनुक्रम में कुछ शब्दावली यथा- धारा 144, लॉक डाउन, कर्फ्यू क्वॉरेंटाइन, पानेडेमिक, एपैडमिक त्था फाइनेंशियल इमरजेंसी आदि आदि खूब चर्चा में हैं जिनके विधिक आशय को समझा जाना चाहिए। सबसे पहले “वित्तीय आपातकाल” के बारे में जानना प्रासंगिक होगा,  ग़ौरतलब है कि पिछले कुछ सालों से भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की शिकार है जिसे स्लोडाउन कहा जा रहा है और अब लॉक डाउन के चलते सारी आर्थिक गतिविधियां ठप सी पड़ गई हैं। जिसका अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ना लाजमी है, इसीलिए तमाम लोगों का मानना है कि भारत को कहीं वित्तीय आपातकाल न लगाना पड़ जाए।

वित्तीय आपातकाल का उपबंध भारतीय संविधान के भाग 18 में किया गया है जिसमें तीन तरह के आपातकाल- राष्ट्रीय आपातकाल, प्रांतीय आपातकाल और वित्तीय आपातकाल का उल्लेख किया गया है। वित्तीय आपातकाल अनुच्छेद 360 के तहत राष्ट्रपति के द्वारा लागू किया जाता है और इसके लागू होने का प्रभाव यह होता है कि राज्यों के मनी बिल आदि राष्ट्रपति के लिए आरक्षित किए जाते हैं तथा केंद्र सरकार समय-समय पर वित्तीय गतिविधियों के संचालन हेतु आदेशित कर सकती है कि कर्मचारियों से लेकर न्यायाधीशों तक के वेतन में कटौती की जाए ताकि वित्तीय आस्थिरता को रोका जा सके।

भारत के संविधान में लोक स्वास्थ्य/पब्लिक हेल्थ राज्य सूची का विषय है जिसका उल्लेख संविधान के अनुसूची सप्तम के राज्य सूची आइटम नंबर 6 में किया गया है परंतु अनुसूची सात के समवर्ती सूची के आइटम नंबर 29 में मानव, जीव जंतुओं व पौधों को को प्रभावित करने वाले संक्रामक रोगों का निवारण विषय वर्णित है इसके अलावा इसी सूची के आइटम नंबर 26 में मेडिकल प्रोफेशन का उल्लेख है। संघीय सूची के आइटम नं 28 में क्वॉरेंटाइन का विवरण है। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 14,15 एवं 21 तथा अनुच्छेद 39 ए को एक साथ पढ़ने से यह निष्कर्ष निकलता है कि “लोक स्वास्थ्य” की संपूर्ण जिम्मेदारी स्टेट पर है जिसमें केंद्र और प्रांतों की समान जवाबदेही है।

इसके अलावा ‘यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स’ के अन्तर्गत स्वास्थ्य के अधिकार को परगनित किया तथा ‘कंज्यूमर राइट्स सेंटर्स,2009 के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘राइट टू हेल्थ को ‘ आर्टिकल 21 के तहत मूलाधिकार घोषित किया है। इसी के मद्देनजर भारत में केंद्र तथा राज्यों ने लोक स्वास्थ्य की उत्तम अवस्था प्राप्त करने तथा किसी महामारी आदि के प्रसार को रोकने वह उससे उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए व्यापक कानूनी ढांचा निर्मित किया गया है। वर्तमान में, कोविड-19 से उत्पन्न चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए भारतीय दंड संहिता के कतिपय प्रावधानों, एपैडमिक डिजीज एक्ट,1987, पशुधन आयात अधिनियम1898, भारतीय बंदरगाह अधिनियम 1908 , औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940, विमान नियम- 1954 तथा नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 आदि कानूनों का सहारा लिया जा रहा है। अतः इन कानूनों की सामान्य समझदारी हर भारतीय नागरिक व गैर नागरिकों को होनी चाहिए, अन्यथा वह जाने- अनजाने में इन लागू कानूनों के उल्लंघन हेतु दंड के भागी होंगे।

सबसे चर्चित धारा 144 जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा है और राज्य को महामारी जैसी आपदा के समय व्यापक शक्ति प्रदान करती है। गौरतलब है कि धारा 144 में प्रावधान है कि जब राज्य या प्रशासन को ऐसा लगता है कि ऐसी अर्जेंट परिस्थितियां उत्पन्न होने की आशंका है जिससे समाज या समुदाय को किसी तरह के सुरक्षा व शांति को खतरा उत्पन्न हो सकता है तो डिविजनल मजिस्ट्रेट उद्घोषणा द्वारा इस धारा को लागू कर देता है। इसके लागू होते ही संबन्धित इलाके में 5 या उससे अधिक व्यक्ति एक साथ जमा नहीं हो सकते और यदि 5 या उससे अधिक लोग जमा होते हैं तो उसे “विधि विरुद्ध जमाव” माना जाएगा जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत दंडनीय है।

उल्लेखनीय है कि जब इस व्यवस्था के लागू होने पर स्थिति नियंत्रित नहीं हो पाती तो संबंधित जिले के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा “लॉकडाउन” लागू कर दिया जाता है। गौरतलब है कि लॉकडाउन में आवश्यक सेवाएं जारी रहती हैं जबकि फ्लाइट, ट्रेन, बस आदि जैसी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज को बाधित करके लोगों के संचालन पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है ताकि लोग एक दूसरे से मुलाकात न कर सकें और संचारी रोगों का प्रसार रुक सके। परंतु यदि महामारी इसके अंतर्गत भी नियंत्रित नहीं होती और ज्यादा खतरनाक स्थितियां उत्पन्न हो जाती है तो प्रशासन कर्फ्यू की घोषणा कर सकता है। उल्लेखनीय है कि कर्फ्यू में प्रशासन के पास लगभग सभी सेवाएं बाधित करने की शक्ति होती है तथा लोगों के घरों से बाहर निकलने पर निश्चित अवधि के लिए पूर्णता प्रतिबंधित कर दिया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि धारा 144, लॉकडाउन एवं कर्फ्यू में डिग्री का फर्क होता है जबकि तीनों को लागू किए जाने का मकसद एक ही अर्थात महामारी से उत्पन्न आपातकालीन परिस्थितियों का मुकाबला करना है।

इन तीनों के तहत इंटरनेट सेवाएं आदि भी बंद की जा सकती हैं। उक्त तीनों निवारक उपायों के लागू किए जाने का पालन न करने पर राज्य अथवा प्रशासन द्वारा अवज्ञा करने वाले व्यक्तियों को समुचित रूप से दंडित किया जा सकता है। यद्यपि, हालिया ताजातरीन मामला “अनुराधा भसीन एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” 2020 SC  के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारित किया था की धारा 144 का इस्तेमाल राज्य, लोगों की जीवन सुरक्षा वह संकट से बचाने हेतु करें तथा इसको लागू करने हेतु आशंका का ठोस आधआर होना चाहिए। न कि परिस्थितियों की कल्पना मात्र करके इसको लागू करने के जरिये नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों में कटौती की जाए।

एपिडेमिक का हिंदी अर्थ- “महामारी” है। जब एक समय में एक ही रोग अथवा बीमारी से बड़ी संख्या में मानव या पशु पीड़ित होते हैं,तो उसे महामारी कहा जाता है जब यही महामारी एक बड़े क्षेत्र जैसे कई देशों, महाद्वीपों अथवा समूचे विश्व को अपनी जद में ले लेती है तो इसे पानेडिमिक कहा जाता है। मानव इतिहास में स्पेनिश फ्लू, चेचक, तपेदिक और अभी हाल ही में 11 मार्च 2020 को घोषित कोविड -19 आदि इसके उपयुक्त उदाहरण हैं। भारत में खतरनाक महामारी रोगों के प्रसार को रोकने हेतु ब्रिटिश भारत में “द एपिडेमिक डिजीज,1897” प्रवर्तन में लाया गया जिसमें कुल 4 धाराएं हैं। धारा 2, राज्य को महामारी से मुकाबला करने के लिए विशेष उपाय किए जाने हेतु सशक्त करती है। वहीं धारा 3, इन उपायों के उल्लंघन को दंडनीय बनाती है। जबकि धारा 4 ,महामारी के निवारण के लिए काम कर रहे क्लीनिकल एवं नान क्लीनिकल स्टॉफ को संरक्षित करती है।

महामारी जैसी आपदा से निपटने हेतु भारतीय दंड संहिता के चैप्टर 14 में धाराएं 269,270 एवं 271 विशेष रूप से प्रभावी होती है। वस्तुत: यह प्रावधान वहां लागू होते हैं जब कोई व्यक्ति जानलेवा संचारी रोगों के फैलाने में भूमिका निभाता हो। धारा 269 में इस बात का प्रावधान है कि ‘विधि विरुद्ध या उपेक्षा से कार्य करने पर कोई भी शख्स 6 महीने के करावास या जुर्माने अथवा दोनों से दंडनीय होगा।’ धारा 270 पूर्वर्ती धारा का गंभीरतम स्वरूप है । इसके अनुसार जब कोई व्यक्ति दुर्भावना वश कोई ऐसा कार्य करता है जिससे संक्रामक रोगों का प्रसार होने की आशंका है तो वह 2 वर्ष के कारावास या जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किया जाएगा। धारा 271 क्वारंटाइन के नियम की अवज्ञा से संबंधित प्रावधान करता है।

गौरतलब है कि दंड संहिता में क्वारंटाइन का नियम बंदरगाहों पर खड़े जलयान आदि पर लागू होता है लेकिन कोविड-19 के संदर्भ में इसका आशय यह है कि राज्य /प्रशासन द्वारा क्वारंटाइन लागू किया गया है और कोई इसका उल्लंघन करता है तो वाह इस धारा के अधीन दंडनीय होगा। वस्तुतः क्वारंटाइन से तात्पर्य यह है कि संक्रामक रोगों की बीमारी वाले व्यक्ति/पशु को दूसरे व्यक्तियों/पशुओं से अलग रखने की अवधि जिसे हिंदी में “संगरोध अवधि” कहा जाता है। यह संक्रमण-संदिग्ध व्यक्ति के लिए 14 दिन और संक्रमित व्यक्ति के लिए जब तक वह पूर्णता स्वस्थ ना हो जाए निर्धारित की गई है। कोराना के संदर्भ में इसका तात्पर्य यह होगा की किसी क्षेत्र को किसी अन्य क्षेत्र से अलग करके रखा गया है जिससे किसी इंफेक्शनल रोग का फैलाव ना हो तो इसे “क्वारंटाइन का नियम ” कहेंगे।

लखनऊ में सेलिब्रेटी कनिका कपूर का मामला इसी श्रेणी का था। इसे एक काल्पनिक उदाहरण से भी समझ सकते हैं-पटना में एक शादीशुदा जोड़ा जो कि सऊदी अरब से लौटा है, होम क्वारंटाइन मापदंडों/नियमों के तहत एक हॉस्पिटल में रखा गया है जिसके कोराना-संक्रमण की आशंका है। वे इस नियम का उल्लंघन करते हुए हॉस्पिटल से बाहर निकलकर मटरगश्ती करते पाए जाते हैं तो इस धारा के तहत दंडित किए जा सकते हैं। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 188 इस बात का प्रावधान करती है कि महामारी के समय सरकार या प्रशासन द्वारा जारी किए गए विधिपूर्ण आदेशों का उल्लंघन किया जाता है तो उसे 1 वर्ष के कारावास जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश व तमिलनाडु सहित तमाम राज्यों ने नॉवेल कोरोना वायरस के प्रकोप को प्राकृतिक आपदा घोषित करके इसके तहत कार्रवाई की बात की है।तमिलनाडु में तो लोगों ने जो शॉप खोले हुए थे जेल भेज दिए गए । हालांकि नेचुरल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 में  “प्राकृतिक आपदा” जिस तरह परिभाषित है, उसकी परिधि में कोरोना महामारी शामिल किया जाना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है।

इस प्रकार, कोरोना जैसी महामारी से निपटने हेतु भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में एक प्रासंगिक कानूनी ढांचा मौजूद है। जिससे संघ और राज्यों के बीच महामारी से निपटने वाले उपाय के मध्य त्वरित व समन्वयकारी कदम उठाए जा सकें। परंतु फिर भी भारत का जो कानूनी ताना-बाना उपलब्ध है। वस्तुतः वह “पुलिसिंग” नेचर का है जिसका उद्देश्य महामारी को नियंत्रित करना है न कि इन रोगों के प्रकोप से निपटने हेतु समन्वित एवं वैज्ञानिक प्रतिक्रियाएं आदि हेतु एक सक्षम इकोसिस्टम उपलब्ध कराना।

अतः कहा जा सकता है कि क्लाइमेट चेंज से भारत सहित दुनिया के समक्ष मौजूदा चुनौतियों में नित्य नयी प्रकार की बीमारियों ,संक्रामक महामारियों से मुकाबला करने हेतु एक मुकम्मल कानूनी ढांचा उपलब्ध कराना वक्त की मांग है ताकि संघ व राज्य के बीच रोगों से निपटने वाले उपाय इनके प्रभावी नियंत्रण हेतु एकीकृत विस्तृत कार्रवाई योग प्रासंगिक कानूनी प्रावधान उपलब्ध हो सके जिसमें जन अधिकार केंद्रित सार्वजनिक स्वास्थ्य उन्मुख तरीकों की अभिव्यक्ति हो तथा जो सरकार के सार्वजनिक स्वास्थ्य दायित्वों को सुनिश्चित करता हो इसके साथ ही सुचारू रूप से कार्यान्वयन व प्रभावी समन्वय हेतु राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर फोरम/मंच उपलब्ध कराता हो। समुदाय आधारित निगरानी एवं शिकायतों का निवारण तंत्र हो ताकि बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित हो सके इस हेतु केरल व क्यूबा के स्वास्थ्य मॉडल हमारे पथ प्रदर्शक हो सकते हैं।

स्मरण रहे कि महामारी जैसी आपातकालीन स्थितियों में कानूनी ढांचे की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । क्योंकि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र, नागरिकों के कर्तव्य व अधिकारों की परिधि में सरकारी प्रक्रिया के दायरे को संवर्धित व व्यवस्थित करते हैं । इस दिशा में केंद्र सरकार द्वारा मॉडल पब्लिक हेल्थ एक्ट 1987 को विकसित करने का प्रयास किया गया था पर राज्यों की असहमति के चलते वह मूर्त रूप नहीं ले सका। इसके अलावा “द नेशनल हेल्थ बिल 2009″का भी उल्लेख किया जा सकता है जिसे बाद की सरकारों द्वारा भुला दिया गया। यही उपयुक्त समय है, जब सरकारों द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर संजीदगी दिखाई जाए और पूरी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ लोक स्वास्थ्य पर, समयानुकूल एक मुकम्मल , प्रभावी कानूनी तंत्र विकसित किया जाए ताकि भारत भावी चुनौतियों के के लिए कमर कस सके।

(रमेश यादव इलाहाबाद हाईकोर्ट में एडवोकेट हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

जन्मशती पर विशेष:साहित्य के आइने में अमृत राय

अमृतराय (15.08.1921-14.08.1996) का जन्‍म शताब्‍दी वर्ष चुपचाप गुजर रहा था और उनके मूल्‍यांकन को लेकर हिंदी जगत में कोई...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.