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Categories: बीच बहस

मशीन और पूंजी के नहीं श्रम के पक्षधर थे गांधी

अहिंसा महात्मा को सिर्फ बीती सदी तक ही सीमित करना, उनके साथ न्याय करना नहीं होगा। यह सही है, उनका कर्म रंग मंच 19वीं और 20वीं सदी रही हैं। लेकिन वे किसी राष्ट्र या भूभाग या नस्ल के बारे में तो स्वयं को सीमित नहीं रखते हैं। उनकी प्रासंगिकता कल-आज-कल के फलक पर समानरूप से फैली हुयी है। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि गांधी जी ने सिर्फ राजनीतिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक पक्षों को ही नहीं छुआ है बल्कि मानवता के सम्पूर्ण कर्म-ब्रह्माण्ड को अपनी दृष्टि में समेटा है। सर्वप्रथम, जब वे मशीन के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हैं तो वे इसका समूल नाश या तिरस्कार के पक्ष में नहीं हैं। मानव और मशीन के पारस्परिक सम्बन्ध और अवलंबन को किस प्रकार से परिभाषित किया जाए, इसे लेकर चिंतित रहे हैं। यदि मशीन का आवश्यकता से अधिक प्रयोग व उसपर निर्भरता से प्रकारांतर में मानव के अस्तित्व के लिए ही संकट पैदा हो जायेगा। गांधी जी कहते हैं, “ मेरा उद्देश्य तमाम यंत्रों का नाश करने का नहीं है, बल्कि उनकी हद बांधने का है।” ‘ हद बांधने का है’ में मानव-मशीन के पारस्परिक संबंधों को लेकर उनका दर्शन निहित है। (हिन्द स्वराज्य ,पृष्ठ 14) इससे पहलेवे कह चुके हैं कि “ आज तो करोड़ों की गरदन पर कुछ लोगों के सवार हो जाने में यंत्र मददगार हो रहे हैं। यंत्रों के उपयोग के पीछे जो प्रेरक कारण हैं, वह श्रम की बचत नहीं है, बल्कि धन का लोभ है। आज की इस चालू अर्थव्यवस्था के खिलाफ मैं अपनी ताक़त लगा कर युद्ध चला रहा हूं।“ ( हिन्द स्वराज्य, पृष्ठ 14 )
21वीं सदी आर्टिफिसियल इंटेलिजेन्स (कृत्रिम बुद्धि) की सदी है। हालांकि, बीती सदी में ही ऑटोमेशन का युग शुरू हो चुका था। कंप्यूटर आ चुका था। ऑटोमेशन के कारण श्रमिक बेकार भी हुए थे, छटनियां की गयीं थीं। लेकिन आईइन (आर्टिफीसियल इंटेलिजेन्स) ने तो आज ज्ञान, सूचना,श्रम, पूंजी और भविष्य के समूचे सन्दर्भ को ही बदल दिया है; रोबोट-सेना का निर्माण किया जा रहा है; रोबोट ऑपरेशन-सर्जेरी कर रहा है; टेलीविज़न पर समाचार वाचक बना हुआ है; अब चालक विहीन कार-मेट्रों चलने वाली हैं; आई इन से निर्मित उत्पादों को इस सदी के ‘रोबोट जिन्न’ कहा जा सकता है। अब रोबोट या इस जिन्न में संवेदनशीलता को पैदा करने के प्रयोग ज़ारी हैं। इसमें मनुष्य के नव रसों का भी समान रूप से संचार हो सके, वैज्ञानिक इसकी खोज में सक्रिय हैं। यदि रोबोट समांतर मानव का रूप ले लेता है तो रक्त -मांस या पंच तत्व से बने मूल मनुष्य की ज़रूरत ही नहीं रह जायेगी। मानव द्वारा निर्मित मशीन ही अपने मूल निर्माता को अपदस्थ कर देगी। मनुष्य का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही सृष्टि पर ही सवालिया निशान लग जाएगा। यहां मैं ईश्वर की बात नहीं कर रहा हूं वह तो बहुत पहले ही सवालों के घेरे में हैं। मैं दृश्यमान सृष्टि की बात कर रहा हूं। यदि आईइन से ही मनुष्य जन्म लेने लगेंगे तो स्त्री -पुरुष के सम्बन्ध भी बदलेंगे। राज्य का चरित्र बदलेगा। शासन शैली में परिवर्तन होगा। एक नितांत नए प्रकार के ‘राजनीतिक आर्थिकी‘ को गढ़ा जाएगा। तब यह सवाल उठेगा ‘हमें मानव चाहिए या नहीं ?‘
पिछले दिनों जेरुसलम विश्विद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर युवल नोह् हरारी की तीन पुस्तकों- मानवजाति का संक्षिप्त इतिहास, कल का संक्षिप्त इतिहास और 21वीं सदी के लिए 21 सबक़- को पढ़ा। तीनों में मानव सभ्यता के भविष्य को लेकर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। लेखक ने सवाल उठाये हैं: डोनाल्ड ट्रम्प के उदय का महत्व क्या है? फ़र्ज़ी समाचारों की महामारी के साथ क्या किया जा सकता है? आज उदार लोकतंत्र संकट में क्यों है ? क्या ईश्वर वापस आ गया ? क्या नया विश्व युद्ध होने जा रहा है? कौन सी सभ्यता विश्व पर शासन करती है- पश्चिम, चीन, इस्लाम ? क्या राष्ट्रवाद, असमानता, और जलवायु परिवर्तन की समस्याओं का समाधान कर सकता है? आतंकवाद के सम्बन्ध में क्या करना चाहिए ? इन पुस्तकों, विशेष रूप से अंतिम पुस्तक में कृत्रिम बुद्धि के सम्बन्ध में विस्तार से चर्चा की गयी है। एक गंभीर विमर्श खड़ा किया गया है। हरारी पूछते हैं, “ एक दफा हमसे बेहतर कृत्रिम बुद्धि हमारे करियर, भविष्य और संबंधों के बारे में निर्णय लेने लगी तो मानवता और जीवन की अवधारणा के सम्बन्ध में नए सिरे से सोचना पड़ेगा। हम मानव अपने जीवन को एक निर्णय प्रक्रिया के ड्रामा के रूप में देखने के अभ्यस्त हैं। सारांश यह है कि लेखक ने कृत्रिम बुद्ध या मेधा और मानव के संबंधों की डरावनी तस्वीर पेश की है। ऐसे यंत्र से आतंकित थे महात्मा गांधी।
हिन्द स्वराज में गांधी भविष्य में यंत्रों परमानव की अतिशय निर्भरता से उसके अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो जायेगा। उनका मानना था कि मशीने मुठी भर पूजीपतियों की ही पूजी का विस्तार करेगी, न कि श्रम का। हरारी ने भी इसी सच्चाई को बार-बार रेखांकित किया है। हरारी का मत है कि कृत्रिम मेधा से बेरोज़गारी बढ़ेगी, फ़िज़ूल का नया वर्ग पैदा होगा और कुशल-दक्ष श्रमिकों का अभाव हो जाएगा। अमीर अधिक अमीर होंगे, सिर्फ 100 अमीरतम लोग 4 अरब निर्धन लोगों के मालिक बन जाएंगे। लेखक की भविष्यवाणी है, “2100 तक संसार के एक प्रतिशत अमीरतम लोगों का विश्व की अधिकांश सम्पति, विश्व की सुंदरता, सृजनात्मकता और स्वास्थ्य पर अधिकार होगा। “(21वीं सदी के लिए 21 सबक़, पृष्ठ 74 -75)। इसीलिये गांधी जी कहते हैं की मशीनों से “कुछ गिने -गिनाये लोगों के पास सम्पति जमा हो ऐसा नहीं, बल्कि सबके पास जमा हो ऐसा मैं चाहता हूं। …… धन के पीछे आज जो पागल दौड़ चल रही है वह रुकनी चाहिए। ” (हिन्द स्वराज ,(14 -15 )
और अंत में, ‘दो-दो विश्व युद्ध हो चुके हैं। तीसरे युद्ध की आशंकाएं भी विश्व-फलक पर छाई हुयी हैं। लेकिन, 945 में दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति और शीत युद्ध काल के उदय और 1991 में इस काल के अंत से लेकर इस समय तक युद्ध के क्षेत्रीय संस्करण सामने आ चुके हैं। `पूरा मुस्लिम विश्व एक तरह से युद्ध या अशांति की गिरफ्त में है। लेकिन तीसरा युद्ध की कल्पना की जा सकती है कि वह कितना भयानक होगा क्योंकि आज कई देश परमाणु बम संपन्न राष्ट्र बन चुके हैं जिसमें भारत व पाकिस्तान भी शामिल हैं। 1945 में जापान के दो शहरों पर अमेरिका ने जिन दो परमाणु बमों को गिराया था उनसे कई हज़ार गुना शक्तिशाली बम दुनिया में मौजूद हैं। अमेरिका और रूस के पास हज़ारों बम हैं। सात दफे दुनिया तबाह की जा सकती है, इतनी बड़ी शक्ति मनुष्य ने अब जुटाली है। अब तो सिर्फ पत्थरों-कीच-कादे-शवों के साथ ही युद्ध होगा। रोबोट जिन्न ही लड़ सकेंगे। मानव तो अपने विनाश का मंजर देखने के लिए भी नहीं रहेगा।
फिर इस पृष्ठभूमि में भी हमें गांधी जी याद आते है। यद्यपि युद्ध के सम्बन्ध में उनके विचार बदलते रहे हैं, दक्षिण अफ्रिका से लेकर 1945 के दूसरे महायुद्ध तक उनके विचारों में उतार-चढ़ाव आता रहा है। लेकिन, एक बिंदु पर वे निरंतर अडिग रहे थे और वह है ‘अहिंसा’ व ‘शांति ‘। इस पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। किसी भी समस्या का समाधान हिंसा और युद्ध से संभव नहीं है। हिंसा व युद्ध, प्रतिक्रिया में स्वयं को दोहराते हैं। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि कायरता का नाम अहिंसा नहीं है, बल्कि आत्मबल का दूसरा नाम है ‘ अहिंसा‘। हिंसा और अहिंसा के सम्बन्ध में गांधी जी के क्या विचार थे, इसे हम सभी जानते हैं। इसे दोहराने की ज़रूरत यहां नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि आने वाले कल की सुरक्षा यानि मानव जाति की हिफाज़त के लिए गांधी की अहिंसा व शांति कितनी अपरिहार्य है। यदि तीसरा विश्वयुद्ध होता है तो किस विचारधारा की विजय या पराजय होगी, इस पर चिंतन की ज़रूरत है।
भविष्य में आर्टिफीसियल इंटेलिजेन्स के कैसे कैसे सम्भावी परिणाम व प्रभाव होंगे, इस सम्बन्ध में इतिहासकार हरारी कहते हैं कि कार्ल मार्क्स के अध्ययन से इसे अच्छे ढंग से समझा जा सकता है। (21वीं सदी के लिए 21 सबक़, 246 )। इस स्थल पर कृत्रिम बुद्धि या मेधा का उल्लेख इसलिए किया कि पूंजी का चंद हाथों या राष्ट्रों में एकत्रीकरण, विषमता का फैलाव, और निर्धनता का ज्वार हिंसा को जन्म देता है। पहले समाज के आंतरिक वर्गों में, और फिर राष्ट्र राज्यों के मध्य हिंसा भड़कती है जिसकी परिणीति युद्ध में होती है। इसलिए पूंजी के मूलभूत चरित्र को समझने और शोषण-उत्पीड़न में यंत्र व कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल के गतिविज्ञान या डायनामिक्स को जानने के लिए दोनों में (मार्क्स और गांधी) का योग मैं आज व कल के लिए प्रासंगिक समझता हूं। इसलिए स्वयं की रक्षा के लिए गांधी की ओर लौटना होगा। यह तभी मुमकिन है जब हम और राष्ट्र या सम्पूर्ण मानवजाति सभी प्रकार के चरमवादों-कट्टरताओं-संकीर्णताओं से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर स्वयं को ‘विश्व समुदाय‘ में रूपांतरित कर दे। मेरे मत में इस दृष्टि से आने वाले कल में गांधीजी पहले से अधिक व्यवहारिक रूप से प्रासंगिक होंगे। मैं आशावादी हूं और आप …?
(समाप्त)

This post was last modified on October 12, 2019 11:30 am

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