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Categories: बीच बहस

भारत में चल रहे कानून के वास्तविक चरित्र को परिभाषित करेगा बाबरी मस्जिद-राममंदिर मामला

सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद विवाद पर अभी लगातार सुनवाई चल रही है। इस देश में एनआरसी की जंग को छेड़ने वाले अभी के मुख्य न्यायाधीश की अगुआई की पांच सदस्यों की संविधान पीठ इसमें लगी हुई है।

मुख्य न्यायाधीश नवंबर महीने में सेवा-निवृत्त होने वाले हैं । वे इसके पहले ही इस मामले को निपटा देना चाहते हैं । इस मामले की सुनवाई में जिस प्रकार रात-दिन एक किया जा रहा है, उससे लगता है जैसे अब मामला न्याय से कहीं ज्यादा मुख्य न्यायाधीश की सेवा-निवृत्ति की तारीख से होड़ का हो गया है । वे चाहते हैं कि अक्तूबर तक सुनवाई पूरी हो जाए ताकि सुप्रीम कोर्ट छोड़ने और केंद्र सरकार की दी हुई कोई दूसरी चाकरी में लगने के पहले वे इस अभागे भारत पर अपनी कीर्ति की कोई महान छाप छोड़ जाएं !

यह मामला जिस प्रकार अभी चलता दिखाई दे रहा है, और भाजपा के नेता सुप्रीम कोर्ट को लेकर जिस प्रकार के अश्लील उत्साह से भरे हुए हैं, उनके एक सांसद ने तो साफ शब्दों में कहा भी है कि अभी सुप्रीम मोदी सरकार की मुट्ठी में है, इसे देखते हुए हमें अनायास ही रोमन साम्राज्य के कानून की बातें याद आती हैं ।

कार्ल मार्क्स के कानून के इतिहास के गुरू कार्ल वॉन सेविनी ने रोमन कानून में ‘अधिकार/कब्जे के कानून’ (लॉ आफ पोसेसन) पर एक महत्वपूर्ण किताब लिखी थी । इसमें रोमन कानून के इस पहलू के बारे में कहते हैं कि रोमन कानून किसी संपत्ति पर अधिकार को उस पर कब्जे का सिर्फ परिणाम नहीं मानता, बल्कि कब्जे को ही किसी अधिकार की आधारशिला मानता है। इस प्रकार, वे कानून की सारी नैतिकतावादी और आदर्शवादी अवधारणा को खारिज कर देते हैं । वे साफ बताते हैं कि कानून, खास तौर पर निजी संपत्ति की पूरी धारणा तर्क से पैदा नहीं होते हैं । यह इतिहास में खास विशेषाधिकार-प्राप्त लोगों के आचार और दस्तावेजों/भाषाओं अर्थात् विचारों में निहित ‘कब्जे के भाव’ से पैदा होती है ।

“सभी कानून जीवन की बदलती हुई जरूरतों और इन लोगों (विशेषाधिकार-प्राप्त लोगों) के बदलते हुए अभिमतों (मिजाज) पर निर्भर होते हैं, जिनके आदेशों को ही कानून मान कर लोग उनका पालन किया करते हैं।”

इस प्रकार, सिद्धांत रूप में सेविनी कह रहे थे कि कानून बनाये नहीं जाते, कानून पाए जाते हैं । विवेक का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है, जब तक वह भाषा और व्यवहार से नहीं जुड़ा होता है । देशकाल से स्वतंत्र विवेक का कोई अस्तित्व नहीं है । विवेक का इतिहास भाषा और संस्कृति से जुड़ा होता है और भाषा और संस्कृति समय के साथ अलग-अलग स्थान पर बदलते रहते हैं । इसीलिये न्याय के किसी भी औपचारिक मानदंड में विवेक को शामिल नहीं किया जा सकता है । (देखें, अरुण माहेश्वरी, बनना कार्ल मार्क्स का, पृष्ठ 63-64)

हमने अपनी उपरोक्त किताब में कार्ल मार्क्स के कानून का दर्शन संबंधी विचारों की पृष्ठभूमि को प्रकाशित करने के लिये इस विषय को थोड़ा विस्तार से रखा है । रोमन कानून एक साम्राज्य का कानून था, राजा और विशेषाधिकार-प्राप्त लोगों की इच्छा और स्वार्थों पर चलने वाले साम्राज्य का कानून । इसके विपरीत, जनतंत्र को जनता के कानून का शासन कहा जाता है, अर्थात् इसमें किसी तबके विशेष की इच्छा नहीं, कानून के अपने घोषित विवेक की भूमिका को प्रमुख माना जाता है । जिसकी लाठी उसकी भैंस जनतांत्रिक कानून की धारणा का एक प्रत्यक्ष निषेध है ।

तथापि, अभी हमारे यहां जनतंत्र पर ही राजशाही किस्म के शासन की जिस प्रणाली को लादने की कोशिशें चल रही हैं और एक के बाद एक सभी जनतांत्रिक और स्वायत्त संस्थाओं को इससे दूषित किया जा चुका है, उसे देखते हुए यह बाबरी मस्जिद से जुड़ा विवाद भारत के सुप्रीम कोर्ट के लिये किसी अम्ल परीक्षा से कम महत्वपूर्ण नहीं है । इससे पता चलेगा कि हमारे देश पर साम्राज्य के दिनों का कानून पूरी तरह से लौट चुका है, या ‘वी द पिपुल’ के द्वारा अंगीकृत समाजवादी, जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और संघीय राज्य का कानून।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं। आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

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