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Categories: बीच बहस

गुप्त एजेंडे वाले गुप्तेश्वरों को सियासत में आने से रोकने की जरूरत

आंखों में आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस बनने का सपना लाखों युवक भारत में हर साल देखते हैं और इनमें कुछ सौ अपनी मंजिल तक पहुंच भी जाते हैं, लेकिन सिविल सेवा में आने वाले यही युवा अगर पहले से यह तय कर लें कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें इस पार्टी की राजनीति करनी है और उसी के अनुसार अपनी पूरी सर्विस में जमीन तैयार करते रहें तो क्या होगा…!

नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) में राजनीति कोई नई बात नहीं है, लेकिन नौकरशाही पूरी तरह राजनीतिक हो जाए, यह गंभीर बात है। देश की सेहत के लिए इससे नए तरह के खतरे पैदा हो रहे हैं। बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे का पुलिस सेवा से वीआरएस लेकर राजनीति में आने की कोशिश इस खतरे का ताजा उदाहरण है।

3 जुलाई को यूपी के कानपुर देहात में मोस्ट वॉन्टेड विकास दुबे का जब पुलिस एनकाउंटर करने गई तो उल्टा उसके गैंग ने आठ पुलिस वालों की हत्या कर दी और सभी आरोपी फरार हो गए। विकास दुबे की फरारी को लेकर हर राज्य को अलर्ट जारी किया गया था, लेकिन सिर्फ बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे ने बयान दिया कि विकास दुबे में हिम्मत है तो बिहार में घुसकर दिखाएं। इस बयान को मीडिया खासकर बिहार के अखबारों और चैनलों ने काफी महत्व दिया।

तमाम राजनीतिक विश्लेषकों के कान उस वक्त खड़े हुए, लेकिन उन्होंने इसे गुप्तेश्वर का बड़बोलापन मानकर चुप्पी साध ली। तब तक कोई नहीं जानता था कि गुप्तेश्वर अपनी राजनीतिक मंजिल की तरफ बढ़ रहे हैं। उस दौरान देश में जहां कहीं भी घटनाएं हो रही थीं, उस पर गुप्तेश्वर के निजी विचार सामने आ ही जाते थे। बिहार का मीडिया धीरे-धीरे उनको राबिनहुड बनाकर पेश करने लगा।

इससे पहले 14 जून को बॉलिवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत खुदकुशी कर चुके थे, लेकिन जुलाई में चूंकि विकास दुबे का मामला गरम था तो गुप्तेश्वर पांडे का कोई बयान सुशांत की मौत पर नहीं आया, लेकिन 2 अगस्त को गुप्तेश्वर अचानक नींद से जागे और कहा कि सुशांत की रहस्यमय मौत की जांच बिहार पुलिस करेगी। इसके बाद उन्होंने कुछ पुलिस अफसरों को मुंबई भेज दिया। धीरे-धीरे पूरा मामला राजनीतिक रंग लेता गया और गुप्तेश्वर सुशांत की मौत पर राजनीति करते रहे। इसके बाद रिया चक्रवर्ती जब मामले में सामने आईं तो रिया के खिलाफ भी गुप्तेश्वर ने नेताओं के अंदाज में बयान दिए। रिया ने बिहार के सीएम के बारे में कोई बयान नहीं दिया, लेकिन गुप्तेश्वर पांडे का यह बयान टीवी पर आया कि रिया की इतनी औकात नहीं है कि वो बिहार के सीएम पर बोलें।

इसके बाद रिया को जब नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने गिरफ्तार कर लिया तो गुप्तेश्वर पांडे ने सबसे पहले खुशी जताई और बयान दिया। अभी जब उन्होंने पुलिस सेवा से वीआरएस लेने की घोषणा की तो मात्र दस घंटे बाद सोशल मीडिया पर एक गाना सामने आया, जिसमें उन्हें बिहार का राबिनहुड बताया गया। यह आदमी कितना धूर्त है, उसके ताजा बयानों से उसकी धूर्तता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वीआरएस लेने के अगले दिन कहा कि राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है। फिर सोशल मीडिया पर अपनी कहानी सुनाते हुए कहा कि बिहार की माटी के लोग तय करेंगे कि मुझे राजनीति में आना है या नहीं, लेकिन मैं सोचता हूं कि अब मैं राजनीति में आ ही जाऊं। सबसे ताजा बयान में गुप्तेश्वर ने कहा है कि मुझे 12 सीटों से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव मिला है। मैं कहीं से भी जीत सकता हूं।

गुप्तेश्वर का पूरा घटनाक्रम बताता है कि वो योजनाबद्ध ढंग से काम कर रहे थे। उनके रिटायरमेंट में सिर्फ पांच महीने बाकी थे, तभी उन्होंने पैंतरा बदलना शुरू किया था, लेकिन उनके बयानों और एक्शन से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू और भाजपा को सीधा फायदा पहुंच रहा था। अब जबकि वह वीआरएस ले चुके हैं तो उन्हें जेडीयू और भाजपा दोनों से टिकट का प्रस्ताव है। पहले भी आईएएस और आईपीएस अधिकारी राजनीति में आते रहे हैं, उसमें कोई उतनी बुरी बात भी नहीं है, लेकिन गुप्तेश्वर ने अब आने वाले तमाम आईएएस-आईपीएस को नया रास्ता दिखा दिया है। रिटायरमेंट से पहले अपनी राजनीति प्लान कर लो।

यहां पूर्व आईपीएस और विवादास्पद व्यक्तित्व की मालकिन किरण बेदी का उल्लेख जरूरी है। पूरी ईमानदारी से कहना पड़ेगा कि बतौर आईपीएस जब किरण बेदी के तेज तर्रार होने वाले किस्से मशहूर हो रहे थे, तब तक उनके किसी एक्शन से नहीं लगता था कि वो आगे चलकर राजनीति में आ सकती हैं। उन्होंने ऐसा कोई संकेत भी भारतीय पुलिस सेवा में रहते हुए नहीं दिया था।

रिटायर होने के बाद किरण बेदी एनजीओ वगैरह से जुड़ी रहीं। इसके बाद जब अन्ना हजारे का आंदोलन शुरू हुआ तो वो भी आईआरएस अरविंद केजरीवाल, पत्रकार मनीष सिसोदिया के साथ आंदोलन में शामिल हो गईं। फिर अपने दक्षिणपंथी झुकाव की वजह से उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने उन्हें अब पुड्डुचेरी का उपराज्यपाल बना रखा है, लेकिन राजनीति में कदम रखने के बाद उनका वह तेज तर्रारपन हवा हो गया, जिसके लिए वो मशहूर हुई थीं। बाद में तो उनके समझौतावादी बयानों और मोदी समर्थक बयानों से उनकी बची-खुची छवि भी तार-तार हो गई।  

अपने समय के तेज तर्रार नौकरशाहों के नेता बनने के अनेक किस्से हैं, लेकिन गुप्तेश्वर की तरह किसी ने प्लान नहीं किया। यूपी के कई ऐसे आईपीएस-आईएएस अफसरों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं, जो राजनीतिक पृष्ठभूमि से होने के बावजूद राजनीति से तौबा करते रहे हैं। यहां यूपी के पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह का उल्लेख करना चाहूंगा। अपने कार्यकाल में सूर्य प्रताप भी काफी तेज तर्रार रहे। रिटायर होने के बाद उन्होंने यूपी के मसलों पर ध्यान देना शुरू किया, उन्होंने खुलकर यूपी की भाजपा सरकार की आलोचना की।

नतीजा यह निकला की फासिस्ट योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज करा दीं, लेकिन बंदा झुका नहीं। अडिग है। हर मुद्दे पर उनकी राय बहुत स्पष्ट रहती है। अब जैसे किसान आंदोलन के साथ वह खुलकर खड़े हैं। सूर्य प्रताप के लिए बहुत आसान था कि वो योगी का गुणगान करते और भाजपा में समाहित हो जाते, लेकिन उन्होंने वह रास्ता नहीं चुना। इस तरह सूर्य प्रताप सिंह इस समय राजनीति में न होकर भी राजनीति में हैं।

हो सकता है कि कल को यूपी में कांग्रेस सत्ता में आए और वो कांग्रेस से जुड़ जाएं लेकिन अभी उनके बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि वो किस पार्टी का दामन थाम सकते हैं। सूर्य प्रताप जब तक आईएएस रहे, उन्होंने एक बार भी ऐसा संकेत नहीं दिया कि रिटायरमेंट के बाद वो राजनीति में आ सकते हैं।

यूपी-बिहार में ऐसे पूर्व आईएएस-आईपीएस भरे पड़े हैं, जो अपने कार्यकाल में मशहूर रहे हैं, लेकिन उन्होंने कभी राजनीति की तरफ रुख नहीं किया। बागपत से भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह भाजपा में आने से पहले मुंबई के पुलिस कमिश्नर थे। मुंबई जैसे शहर का पुलिस कमिश्नर रहते हुए उन्होंने कभी भाजपा के समर्थन में कोई बयान नहीं दिया और न ही उनका राजनीति में आने का कोई प्लान था। 2014 में जब भाजपा ने उन्हें टिकट का प्रस्ताव दिया तो वह मना नहीं कर सके, लेकिन मुंबई का पुलिस कमिश्नर रहने तक उन्होंने पद की गरिमा बनाए रखी।

अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दल नौकरशाही की इस बढ़ती महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाने के लिए कुछ कानून-कायदा बनाएं। ऐसा जो भी शख्स सिविल सर्विस से रिटायर हो, उसे कम से कम तीन साल तक चुनाव लड़ने या राजनीति में आने का अधिकार न हो। अगर कोई वीआरएस लेता है तो उस पर ऐसी रोक पांच साल तक रहनी चाहिए।

अगर इस तरह के नियम नहीं बने तो धीरे-धीरे तमाम आईएएस-आईपीएस नौकरी में रहने के दौरान ही अपनी आगामी राजनीति प्लान कर लेंगे। अच्छे लोगों के आने से राजनीति साफ सुथरी रहती है, लेकिन जब लोग सर्विस के दौरान प्लान करके राजनीति में आने लगेंगे तो यहां भी वो गलाजत नहीं मचाएंगे, इसकी गारंटी कौन दे सकता है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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This post was last modified on September 25, 2020 1:13 pm

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