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Categories: बीच बहस

कर्ज़ों वाले पैकेज़ से नहीं बल्कि सरकारी ख़र्चों से ही बचेगी अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था अलग आकारों वाले चार पहियों की सवारी है। यही पहिये ‘ग्रोथ-इंज़न’ भी कहलाते हैं। इन पहियों पर होने वाला खर्च ही GDP (सकल घरेलू उत्पाद) का ईंधन है। खर्च तीन तरह के होते हैं – सरकारी, कारोबारी और व्यक्तिगत। चौथा पहिया है – आयात-निर्यात। आर्थिक गतिविधियों के मूल्य का मतलब है – देश के उत्पादित कुल वस्तुओं और सेवाओं का बाज़ार भाव। इसे ही GDP (सकल घरेलू उत्पाद) कहते हैं। ज़ाहिर है, बीते वित्त वर्ष के मुक़ाबले मौजूदा वित्त वर्ष में देश की GDP बहुत कम रहेगी। इसी वजह से खेती, उद्योग और सेवा क्षेत्र सभी में सकल मूल्य वर्धित (GVA-Gross Value Added) में गिरावट आएगी। GVA को आमदनी नापने का ज़रिया भी माना जाता है। ये GDP में से कुल करों को घटाकर प्राप्त होता है।

लॉकडाउन के दो महीनों में देश की आर्थिक गतिविधियाँ दम तोड़ चुकी हैं। इनका मूल्य लगभग शून्य हो चुका है। भविष्य को लेकर बेहद अनिश्चितता है। साफ़ दिख रहा है कि आर्थिक गतिविधियों को सामान्य होने में लम्बा वक़्त लगेगा। 21 लाख करोड़ रुपये के ‘आत्म-निर्भर भारत मिशन’ के ऐलान का 90 फ़ीसदी यानी 19 लाख करोड़ रुपये महज फंड या आवंटन का इरादा है। ये फंड भले ही काफ़ी बड़ा दिखे लेकिन इसमें सरकारी खर्चों का कोई खाका नहीं है। इसीलिए मौजूदा वित्त वर्ष के बाक़ी बचे दस महीनों में हमें इस फंड का बेहद मामूली असर भी तभी दिखायी देगा जबकि अर्थव्यवस्था आईसीयू (सघन चिकित्सा इकाई) से बाहर आएगी।

अब सवाल ये कि आख़िर कब और कैसे अर्थव्यवस्था के दिन फिरेंगे? इसे समझना भी ज़्यादा मुश्किल नहीं है। अभी असली दारोमदार सरकारी खर्चों पर है, क्योंकि सिर्फ़ सरकार ही गाँठ में पैसा नहीं होने के बावजूद खर्च कर सकती है। दरअसल, GVA की गिरावट का सीधा मतलब है कि जनता की आमदनी का गिरना। आमदनी गिरने का तीन असर होगा। पहला, हमारे-आपके जैसे लोग अपने खर्चों में भारी कटौती करेंगे। ख़ासतौर पर ऐसे खर्च जिनके बग़ैर हमारा काम चलता रहे। जैसे हम नयी कार या घर ख़रीदने से परहेज़ करेंगे। सैर-सपाटा, पर्यटन और मनोरंजन जैसी चीज़ों पर खर्च करना या तो बन्द कर देंगे या बेहद कम कर देंगे। यहाँ तक कि हम खाने-कपड़े के खर्चों में भी कटौती करने लगेंगे।

दूसरा, जनता के खर्चों में कटौती से अर्थव्यवस्था में सकल-माँग गिरेगी। माँग-पक्ष की गिरावट के चलते उद्योग-धन्धों में नया निवेश नहीं होगा। वो निवेश को टालते रहेंगे। माँग गिरने और निवेश के नहीं होने से बेरोज़गारी और बढ़ेगी। छँटनियाँ होंगी। मज़दूरी या आमदनी गिरेगी। ग़रीबी बढ़ेगी। अपराध बढ़ेंगे। अपराध बढ़ेंगे तो निवेशक और कतराएँगे। अन्ततः अर्थव्यवस्था और कमज़ोर होगी। यही कुचक्र, लोगों पर लगातार अपने खर्चों को और घटाने का दबाव बनाता रहेगा।

तीसरा, कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था में सरकारी राजस्व भी गिरता जाएगा। सरकार के पास सामाजिक और औद्योगिक योजनाओं के लिए संसाधन घटते जाएँगे। उस पर राजस्व से अधिक खर्च करने का दबाव रहेगा। उसका वित्तीय घाटा यानी आमदनी और खर्च का अन्तर बढ़ेगा। ऐसे अन्तर को पाटने के लिए या तो सरकार टैक्स की दरें बढ़ाएगी या भारी कर्ज़ लेगी या फिर और रुपये छापकर अर्थव्यवस्था में डालने के लिए मज़बूर होगी। इससे महँगाई, टैक्स की चोरी और भ्रष्टाचार बढ़ेगा। बढ़ती महँगाई और घटती आमदनी से समाज का सबसे कमज़ोर तबका और तबाह होगा।

लेकिन अर्थव्यवस्था के चारों पहियों में सरकारी खर्च वाला पहिया सुपर-पॉवर कहलाता है। क्योंकि यही पहिया तब भी पैदा खर्च कर सकता है, जब इसकी ख़ुद की जेब खाली हो। इसीलिए जितना पैसा सरकार खर्च करती है, उससे कहीं ज़्यादा उसका असर ज़मीन पर दिखायी देता है। मसलन, यदि सरकार एक लाख रुपये खर्च करेगी तो अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव इससे भी कहीं ज़्यादा का होगा। लॉकडाउन से चरमराई अर्थव्यवस्था के लिए 21 लाख करोड़ रुपये के कुल ऐलान में से राहत पर खर्च हुई महज दो लाख करोड़ रुपये ही है। 130 करोड़ की आबादी के लिए ये रक़म क़रीब 1,538 रुपये बैठती है। इसे पाँच-छह महीने के संकट काल में बाँटा जाए तो बात  300 रुपये महीना या रोज़ाना दस रुपये से ज़्यादा नहीं बैठेगी। इसीलिए 2 लाख करोड़ रुपये का असली पैकेज़ बेहद मामूली है। GDP का महज एक प्रतिशत। इससे माँग-पक्ष में हिलने-डुलने लायक हरक़त भी नहीं हो सकती। मछली मारने वाले काँटे और उसकी डोरी से पानी में डूबे हाथी को नहीं निकाला जा सकता।

नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ पब्लिक फ़ाइनेंस एंड पॉलिसी (NIPFP) और नेशनल काउन्सिल ऑफ़ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) का आकलन है कि मौजूदा दौर की वजह से अर्थव्यवस्था की GVA में इस साल 13% की भारी गिरावट दर्ज़ होगी। ये अनुमान इस आधार पर है कि यदि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने वित्तीय घाटे को बजटीय दायरे में ही रखने के लिए अपने खर्चों को उतना कम कर दें जितना उनका राजस्व हो। इसका मतलब ये है कि यदि सरकारें वित्तीय घाटे की सीमाओं को तोड़कर अपना खर्च नहीं बढ़ाएँगी तो देश की GDP में 12.5% की गिरावट दर्ज़ होगी। इसी गिरावट को थामने के लिए सरकार से भारी खर्च वाले राहत पैकेज़ की अपेक्षा थी।

इसी अध्ययन में बताया गया है कि ‘यदि सरकार मौजूदा वित्त वर्ष के केन्द्रीय बजट की सारी रक़म के अलावा GDP का 3% और खर्च करके दिखा दे तो आर्थिक वृद्धि दर को धनात्मक क्षेत्र (positive territory) में रखा जा सकता है।’ इसका मतलब ये हुआ कि अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी ज़रूर, लेकिन यदि सरकारी खर्च खूब बढ़ा दिया जाए तभी विकास-दर को शून्य से नीचे जाकर ऋणात्मक बनने से रोका जा सकता है। ये भी दीगर है कि यदि सरकार अपनी आमदनी से कहीं अधिक खर्च करेगी तो वित्तीय घाटा बहुत तगड़ा हो जाएगा और महँगाई बहुत बढ़ जाएगी। लेकिन आर्थिक वृद्धि का ऋणात्मक होना तो इससे भी कहीं ज़्यादा भयंकर होगा। क्योंकि इसका मतलब होगा व्यापक पैमाने पर आर्थिक तबाही, बेरोज़गारी और यहाँ तक कि ग़रीबी और भुखमरी से होने वाली मौतें भी।

फ़िलहाल, कोई नहीं जानता कि मौजूदा वित्त वर्ष के समापन तक कुल कितनी रकम सरकार खर्च करने में सफल होगी? लेकिन ज़्यादातर आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ के तहत जो 21 लाख करोड़ रुपये खर्च होने की पेशकश की गयी है उसे भले ही GDP का 10% बताया गया, लेकिन इसमें से सरकारी खर्च तो GDP का सिर्फ़ एक फ़ीसदी ही है। बाक़ी, 19 लाख करोड़ रुपये की योजनाएँ या तो कर्ज़ हैं या प्रस्तावित आर्थिक सुधारों का अनुमानित मौद्रिक प्रभाव (projected monetary impact of proposed economic reforms). अभी तो हमें ये भी नहीं पता कि अब तक 2 लाख करोड़ रुपये की जो राहत दी गयी है वो मौजूदा बजटीय खर्चों के अलावा है या फिर इसे अन्य मदों के खर्चों में कटौती करके बनाया जाएगा।

रहा सवाल ये कि आख़िर 21 लाख करोड़ रुपये की जो घोषणाएँ हुई हैं, उसके लिए पैसा कहाँ से आएगा? वित्त मंत्री बता चुकी हैं कि रुपये कर्ज़ से जुटाये जाएँगे। फिर भी इतना तो साफ़ दिख रहा है कि आत्म-निर्भर पैकेज़ का ज़मीनी फ़ायदा दिखने में महीनों ही नहीं बल्कि सालों लगेंगे। फंड चाहे जितना बड़ा हो, उसके इस्तेमाल के बग़ैर कोई राहत नहीं मिलने वाली। घोषित पैकेज़ में सरकारी खर्चों का इरादा नदारद है। सरकार चाहती है कि ग़ैर-सरकारी क्षेत्र उससे कर्ज़ लेकर अर्थव्यवस्था में जान फूँके। ये रास्ता बहुत लम्बा वक़्त लेगा और जितना फ़ायदा पहुँचाएगा, उससे कहीं ज़्यादा नुकसान करवा देगा।

लॉकडाउन से पहले भी बैंकों को कर्ज़दार नहीं मिल रहे थे। अब तो और भी कठिन है डगर पनघट की। क्योंकि कर्ज़ पाना उतना मुश्किल नहीं होता, जितना उसे पाटने के लिए आमदनी का बेहतर बनाना होता है। आमदनी हो तो माँग की भरपाई तस्करी से भी हो जाती है और नहीं हो तो कौड़ियों के मोल बिक रहे सामान को भी खरीदार नहीं मिलते। अर्थव्यवस्था में एक के खर्च से ही दूसरे की आमदनी पैदा होती है। इसीलिए इत्मिनान रखिए, अगले कई सालों तक ज़िन्दगी मुश्किलों भरी ही रहने वाली है। फ़िलहाल तो सरकार ‘आत्म-निर्भर भारत अभियान’ के पैकेज़ की आड़ में आर्थिक सुधारों वाला ‘अच्छे दिन’ का सपना ही बेच रही है।

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on May 21, 2020 11:50 am

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