विरोधी नहीं, एक दूसरे के पूरक हैं जस्टिस कर्णन और प्रशांत

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प्रशांत भूषण अवमानना मामले की कोर्ट में सुनवाई के समानांतर रिटायर्ड जस्टिस सीएस कर्णन का भी मामला चलता रहा और वो लगातार चर्चे में बने रहे। इसके फिर से प्रासंगिक होने के पीछे उनके खुद की अवमानना में सजा से ज्यादा उस पर तत्कालीन समय में प्रशांत भूषण द्वारा लिया गया स्टैंड था। गौरतलब है कि प्रशांत भूषण ने अवमानना मामले में हुई जस्टिस कर्णन की सजा का स्वागत किया था।

अब इसी बात को लेकर दलितों, सामाजिक न्याय से जुड़े बुद्धिजीवियों के एक हिस्से में प्रशांत से नाराज़गी थी। और उसका एक हिस्सा अवमानना मामले में उनको समर्थन दिए जाने के खिलाफ था। बहरहाल शायद ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि लोग या तो अपनी जगह पर खड़ा होकर चीजों को देख रहे थे या फिर दूसरों की स्थिति को समझने के लिए तैयार नहीं थे।

दरअसल जस्टिस सीएस कर्णन का केस जब आया तो बहुत सारे लोग पहले समझ ही नहीं पाए कि आखिर मामला है क्या। उस समय उनके द्वारा जजों के खिलाफ लगाए गए आरोप ठीक-ठीक न तो सामने आ पाए थे और न ही इस बात की ज्यादातर लोगों को जानकारी मिल पायी थी कि उन्होंने पीएम को चिट्ठी लिखी है। और कुछ लोगों को अगर चिट्ठी की जानकारी थी भी तो उन्हें यह नहीं पता था कि उसमें लिखा क्या है। बल्कि एक हिस्सा तो ऐसा भी था जो मोदी के खिलाफ रहने के चलते जस्टिस कर्णन से इस बात को लेकर नाराज था कि वह किसी इस तरह के मामले में मोदी से कैसे उम्मीद कर सकते हैं।

और यह मामला उस समय मीडिया की सुर्खियां बनने लगा जब उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू हुई। और उसी दौरान उनके ढेर सारे ऊल जुलूल बयान और हरकतें भी सामने आने लगीं। जिसमें वह कभी सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ फैसले पारित कर रहे थे। और कभी जजों की गिरफ्तारी के आदेश दे रहे थे।

अब इसमें दो बातें और दो पक्ष हैं। और दोनों के बीच अंर्तसंबंध है। बुनियादी बात यह थी कि जस्टिस कर्णन न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार के सवाल को उठा रहे थे। और इस मसले पर वह कोई भी समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे। यह अपने आप में बहुत रेडिकल बात थी और कोई भी शख्स जो ज्यूडिशियरी में सुधार का पक्षधर है वह उनके साथ खड़ा होगा और उसे होना भी चाहिए। एक दलित होने के नाते न्यायपालिका में भी उन्हें जिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा होगा वह किसी के लिए भी अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

क्योंकि भारतीय समाज में ब्राह्मणवादी संस्कृति और उसका वर्चस्व सिर्फ समाज तक सीमित नहीं है बल्कि वह संस्थाओं की नस-नस में दौड़ता है। और उसकी मार अक्सर नहीं बल्कि सतत रूप से समाज के निचले पायदान वाली जातियों से आये लोगों को सहनी पड़ती है। और इस मामले में सत्ता के सर्वोच्च प्रतीक पुरुष तक नहीं बख्शे गए। यही सच्चाई है। अभी चंद दिनों पहले ही अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के दौरान राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की जिस तरीके से उपेक्षा की गयी। वह बात किसी से छुपी नहीं है। क्या कोई नहीं जानता कि उसके पीछे क्या कारण थे?

लिहाजा जस्टिस कर्णन के बुनियादी मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए सिस्टम में सुधार की चाहत रखने वाले हर शख्स को उनके साथ खड़ा होना चाहिए। इस बात में कोई शक नहीं है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि फार्म हावी हो जाता है और कंटेट पीछे रह जाता है या फिर बिल्कुल गायब ही हो जाता है। या कहिए फार्म प्राथमिक बन जाता है और मुद्दा सेकेंड्री। जस्टिस कर्णन के मामले में भी यही हुआ। उन्होंने मुद्दा बिल्कुल वाजिब उठाया था। लेकिन उसको उठाने के उनके तरीके और उसको हल करवाने के उनके रास्ते ने संदेह के लिए अलग से जगह बना दी थी।

बाद में अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान लगातार एक जज के बतौर उनका व्यवहार हर किसी के लिए परेशानी में डालने वाला था। ऐसी स्थिति में एक ऐसे शख्स के लिए जो इस सिस्टम के भीतर सुधार की गुंजाइश के तो पक्ष में है लेकिन इस सिस्टम को वह तोड़ना नहीं चाहता है। लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा में वह रेडकिल दायरे तक चला जा सकता है लेकिन संविधान उसके लिए लक्ष्मण रेखा है। वह शख्स इस तरह की किसी भी चीज का समर्थन नहीं करेगा। और जस्टिस कर्णन कम से कम उस समय अपनी हरकतों से बार-बार वह रेखा तोड़ रहे थे। लिहाजा प्रशांत भूषण उन्हीं तात्कालिक परिस्थितियों में जस्टिस कर्णन की सजा का स्वागत करने लगे।

ऐसा किस लिए हुआ यह भी जानना जरूरी है। जैसा कि मैंने ऊपर बताया है कि प्रशांत एक रेडिकल डेमोक्रैट हैं। क्रांति उनका कोई लक्ष्य नहीं है। वह इसी सिस्टम के भीतर रहते हुए उसकी कमियों और बुराइयों को दूर करने के पक्षधर रहे हैं। इस लिहाज से जस्टिस कर्णन के बुनियादी मुद्दे के साथ रहते हुए भी जिसे वह खुद बार-बार उठा रहे हैं, कर्णन के उठाने के तरीके से वह सहमत नहीं हो सकते थे। और पूरे मामले में उस दौरान जस्टिस कर्णन का वह व्यवहार और तरीका ही सबसे बड़ा मुद्दा बन गया था। प्रशांत के इस स्टैंड को उनके खिलाफ अवमानना मामले में चले मुकदमे से भी कोई समझ सकता है।

जब किसी भी मोड़ और मौके पर एक संस्था के तौर पर वह न्यायपालिका की मुखालफत करते नहीं दिखे। लेकिन उसमें व्याप्त बुराइयों और गड़बड़ियों पर अंगुली उठाने से भी वह पीछे नहीं हटे। यह बात सही है कि अगर समग्रता में चीजों को लिया जाए और जस्टिस कर्णन के बुनियादी मुद्दे को ध्यान में रखा जाए तो तमाम व्यवहार संबंधी दिक्कतों के बावजूद न्यायपालिका में सुधार का पक्षधर किसी को भी उनके पक्ष में खड़ा होना चाहिए था। लेकिन इसके साथ ही यह बात भी सही है कि कई बार बुनियादी मुद्दा गायब हो जाता है और उसका फार्म ही बचता है। लिहाजा जब भी कोई किसी तरह के बड़े काम में लगा हो तो उसे हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि व्यवहार और अपने उठाए गए कदमों के चलते किसी खास परिस्थिति में वह बाहर न फेंक दिया जाए। क्योंकि इससे उसके व्यक्तिगत नुकसान से ज्यादा वह पूरा मुद्दा सफर करता है।

इस बात में कोई शक नहीं कि जस्टिस कर्णन की पृष्ठभूमि और उनके द्वारा उठाए गए सवालों को देखते हुए फार्म हावी होने के बावजूद किसी को भी उनको खारिज नहीं करना चाहिए था। और ऐसे लोगों के लिए जो किसी काज से सहमत हैं और उसको उठाने वाला शख्स उसे ठीक से आगे नहीं बढ़ा पा रहा है तो ऐसे मौके पर सहमत न होने वालों के लिए भी चुप्पी का विकल्प हमेशा मौजूद रहता है। और प्रशांत भूषण के पास भी यह विकल्प मौजूद था।

इसलिए जस्टिस कर्णन और प्रशांत भूषण को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की जगह बड़े सार्वजनिक हित के हिसाब से किसी को स्टैंड लेना चाहिए। जैसा कि इस पूरे मौके पर दिखा। जस्टिस कर्णन ने बेहद जिम्मेदारी भरा परिचय दिया और किसी संकुचित दायरे में सोचने और बदला लेने की किसी क्षुद्र मानसिकता से ग्रसित होने की जगह वह मुद्दे के साथ खड़े हुए। उन्होंने खुलकर प्रशांत भूषण का साथ दिया। और पूरे मामले को इस रूप में पेश किया कि यह तो उनके द्वारा ही उठाया गया मुद्दा है और इस मामले में वह प्रशांत भूषण के साथ हैं।

आज अगर न्यायपालिका को प्रशांत भूषण के सामने झुकना पड़ा है तो उसके पीछे सालों-साल से लोगों के अधिकारों को लेकर लड़ी जा रही उनकी लड़ाइयां और लोकतंत्र और मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता तथा संवैधानिक व्यवस्था के प्रति अपने कर्तव्यों को लेकर उनकी दृढ़ता प्रमुख वजहें रही हैं। और इसमें किसी भी तरह का कोई गैर जिम्मेदाराना व्यवहार या फिर थोड़ी भी फिसलन या रत्ती भर भी चूक पूरे मामले को पटरी से उतार सकती थी।

और एक आखिरी बात जो लोग जस्टिस कर्णन के मामले के बहाने प्रशांत भूषण की मुखालफत कर रहे थे वह खुद अपने तरीके से जस्टिस कर्णन और उनके द्वारा उठाए गए सवालों के ही खिलाफ खड़े हो गए थे। क्योंकि प्रशांत भूषण की जीत का मतलब है जस्टिस कर्णन की ही दूसरे चरण में जीत। और प्रशांत की हार का मतलब था जस्टिस कर्णन की एक और हार।  

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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