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Thursday, September 23, 2021

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अब हिंदुत्व के सहारे चलेगी अरविंद के सत्ता की नांव!

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दिल्ली के इतिहास में पहली बार राज्य सरकार ने सरकारी तामझाम और टीवी समेत तमाम विज्ञापनों के जरिए इस साल दीपावली के अवसर पर शुभ मुहुर्त निकलवा कर दो करोड़ लोगों को सामूहिक पूजा में भाग लेने की अपील की। अक्षरधाम मंदिर पर इसका आयोजन किया गया और लाइव टीवी पर देश ने मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री और उनके परिवार को आरती पूजन और मंत्रोच्चार से दिल्ली के कष्टों को हरने और धन धान्य से संपन्न करने की कामनाओं के साथ देखा। आज से सात साल पहले देश बदलने, व्यवस्था बदलने की बात करने वाले अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम का यह बदला-बदला मिजाज इस कदर बदल जाएगा, इसकी कल्पना शायद खुद केजरीवाल ने भी नहीं की होगी, लेकिन वक्त कितना बेरहम हो सकता है, यह एक-दो बार के भारी बहुमत से सरकार बनाए हुए आदमी से देखने को मिल रहा है।

दिल्ली पिछले 10 दिनों से कोरोना वायरस के सबसे बड़ी मार से गुजर रहा है। 5000 के आंकड़े से इस बार कई महीनों के बाद जिस ऊंचाई को दिल्ली ने छुआ, वह अब 8000 से भी उपर जा पहुंचा था, जिसमें इन दो दिनों में कुछ कमी आई है। स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कुछ दिनों पहले इसे कोरोना की तीसरी लहर की संज्ञा दी थी, और आज उनका नया जुमला आया है कि दिल्ली में अब कोरोना लगातार घटाव की ओर उन्मुख है, और इस पर काबू पा लिया गया है।

आखिर ये जुमले सीखे कहां से जा रहे हैं? या ये सरकार चलाने और आम जन को जुमलों के भरोसे टिका देने के गुर में अब जाकर पारंगत हुए हैं? क्या अब दिल्ली की उस आम जनता को यह मान लेना चाहिए कि जिस प्रकार से आम आदमी पार्टी ने भारी बहुमत से चुनाव जीतने के बाद भी अपने मजबूत आधार (मुस्लिम समुदाय) से एक झटके में ही किनारा कर लिया था, उसने गरीबों और असंगठित क्षेत्र के आम लोगों से भी एक निश्चित दूरी बना ली है? पिछले कुछ दिनों में दीपावाली से पूर्व कई झुग्गी झोपड़ियों को सरकारी/न्यायालय के आदेश पर जिस त्वरित गति से तोड़ डाला गया, उन हजारों गरीबों के लिए कोरोना, बेरोजगारी के साथ-साथ बेघरबार होने की नियामत बख्शते हुए दीपावली में स्वास्थ्य और धन-धान्य की थोथी कामना से आखिर क्या हासिल होना है?

कुछ लोगों का मानना है कि आप सरकार ने यह कदम यह ध्यान में रखते हुए उठाया हो सकता है, क्योंकि उसने दिल्ली में प्रदूषण के स्तर को देखते हुए दीवाली और उसके बाद भी पटाखों पर पूर्ण रूप से पाबंदी की घोषणा कर डाली थी। इससे रुष्ट हुए तबकों के बीच में राहत के तौर पर इस कार्यक्रम को अंजाम दिया गया है। जबकि वहीं कुछ का मानना है कि विशुद्ध तौर पर आप के चरित्र में आए बदलाव का सूचक है।

आरएसएस के व्यापक अजेंडे में शामिल होता भारतीय राजनीतिक परिदृश्य
मामला सिर्फ कुछ चीजों को सेटल करना ही होता तो बात फिर भी कुछ समझ में आ सकती थी, लेकिन वस्तुतः चीजें लगातार एक विशिष्ट वैचारिक ताने-बाने के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही हैं। वैचारिक तौर पर वाम एवं सतत लोकतंत्र की जागरूक शक्तियों के अलावा शायद ही अब कोई राजनीतिक शक्ति बची हो, जो वास्तविक धरातल पर लोकतांत्रिक मूल्यों, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक सामाजिक विकास को लेकर अडिग बना हुआ हो। वो चाहे कथित समाजवादी धारा से निकले क्षेत्रीय दल हों, अथवा अन्य राजनीतिक समूह।

हिंदुत्व एवं बहुमत के वर्चस्ववादी स्वरूप की निरंकुशता के खिलाफ बोलने से हर कोई बचने की फिराक में रहता है, यहां तक कि कांग्रेस भी एक ही समय में कई सुरों में बोलती नजर आई है पिछले कई दशकों से। उसी ख़ास किस्म के बदरंग धर्मनिरपेक्षता (सभी धर्मों को समान भाव से सम्मान और हर रंग की टोपी और दुशाले को ओढ़-ओढ़कर नुमाइश करने की कला) जो कि विभिन्न स्थानों पर धर्म-सापेक्षता में कब तब्दील हो जाती है, यह ठोस राजनीतिक नफा नुकसान से ही तय होता आया है। इसी कमजोरी को हिंदुत्व की शक्तियों ने लगातार निशाने पर रखकर एक बड़ा गड्ढा निर्मित करने में सफलता पाई।

ऐसे में यह आशा तो पहले भी नहीं की थी किसी ने कि केजरीवाल एंड कंपनी कोई बेहद उच्च मिसाल पेश कर सकती है, लेकिन पानी और बिजली के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के जिन मुद्दों को उसने गहराई से पकड़ रखा था, उससे यह यकीन बना हुआ था कि 40% साधारण गरीब दिल्ल्ली के लोगों में उसका जनाधार कमजोर नहीं होगा। यही वजह भी थी कि अमित शाह के नेतृत्व में जिस तैयारी के साथ दिल्ली में सीएए विरोधियों के खिलाफ माहौल और संचार के सभी माध्यमों को तूफानी गति से स्पिन दिया गया था, उसने पूरे माहौल को इतना दूषित कर दिया था कि उदार हिंदुत्व और केजरीवाल से निराश लोगों और कांग्रेस के समर्थन में नगर निगम और लोकसभा में जा चुके लोगों तक ने केजरीवाल को ही राज्य की कमान सौंपने का मन बनाकर एक बार फिर से बीजेपी के मंसूबों को धरातल पर ला पटका था।

जीत के भी इस बार केजरीवाल का मनोबल पहले वाला नहीं रह गया है। गृह मंत्री से जीत की बधाई स्वीकारने के बाद से ही केजरीवाल में एक स्पष्ट बदलाव दिल्ली ने साफ महसूस किया था। दिल्ली दंगों में इस भूमिका ने स्पष्ट आकार ले लिया था, लेकिन कोरोना काल में देश में सबसे पहले दारु की बिक्री शुरू करने से लेकर एक बार फिर से कामकाज को शुरू करने के लिए जिस प्रकार से केजरीवाल सरकार ने बढ़चढ़ कर अपनी भूमिका निभाई, उसमें बीजेपी की राज्य सरकारों को कुछ भी अपने लिए अपयश इकट्ठा करने की नौबत ही नहीं आने दी।

आज देश में छोटा सा राज्य होने के बावजूद कोरोना मामलों में दिल्ली टॉप पर बना हुआ है। यूरोप में कोरोना की दूसरी लहर से घबराकर ब्रिटेन समेत कई देशों में दोबारा से लॉकडाउन जारी है, लेकिन दिल्ली सहित देश में कुलमिलाकर माहौल कुछ इस प्रकार का बनाया जा रहा है, मानो कोरोना की वैक्सीन में यदि कोई देश अग्रणी है तो वह भारत ही है। जिस अरविंद केजरीवाल से देश यह अपेक्षा करता था कि वे देश की आर्थिक दुश्वारी की हर घटना, केंद्र राज्य संबंधों में आर्थिक जकड़न को स्वर देकर अन्य फंसे हुए राज्यों की आवाज को स्वर दे सकते हैं।

दिल्ली में जो बोला जाता है, वह टीवी अखबार के केंद्र होने की वजह से देश में सुना जाता है, वह सरकार जब पूर्ण बहुमत के बावजूद इस प्रकार से घुटने टेकती नजर आती है तो राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, उड़ीसा, बंगाल या महाराष्ट्र सरकारों से किस हद तक उम्मीद की जा सकती है, जिनमें से खुद कई तरह की बैसाखियों पर टिके हैं?

बिहार का जनमत कुछ कहता है
इन सबके बीच में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में भले ही कड़ी टक्कर में एनडीए गठबंधन बाजी मारता और नीतीश कुमार आज एक बार फिर मुख्यमंत्री की शपथ लेते दिख रहे हैं, लेकिन उसकी दीवारें बुरी तरह से दरकी हुई हैं। चुनावी अभियान की शुरुआत से ही जिस तरह से बिहार की आम जनता ने जगह-जगह पर एनडीए से जुड़े विधायकों, मंत्रियों और यहां तक कि केंद्र सरकार के मंत्रियों तक के काफिले को बीच रस्ते या गांवों में प्रवेश से रोक दिया था, और उसके बाद जबसे महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी ने जनता के मूड को देखते हुए दस लाख रोजगार की बात को मुखरता देना शुरू किया था, बिहार के युवाओं बेरोजगारों और प्रवासी मजदूरों ने जिस लहर और उत्साह को दर्शाया, वह हाल के दशकों में कहीं भी देखने को नहीं मिला है।

भले ही सवर्ण तबके ने एक बार फिर से वोट बीजेपी को दिया या अति पिछड़े समुदाय ने एक बार फिर से भरोसा नीतीश पर ही जताया हो, लेकिन एक बात जो मुखर तौर पर देखने में आई है वो यह थी कि हर तरफ चर्चा मंदिर, धारा 370 नहीं बल्कि रोजगार और बिहार के मुस्तकबिल को लेकर ही चली थी। इसने इस बात को रेखांकित करने का काम किया है कि यदि वाम के प्रभाव क्षेत्रों के अलावा भी राजद और कांग्रेस का कोई सांगठनिक ढांचा भी होता तो ऐसे बहुत से सवर्ण और अति पिछड़े समुदाय के मतदाता थे, जिनकी बदौलत पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना महागठबंधन के लिए बाएं हाथ का खेल होता।

जो बिहार के मन में है, कमोबेश वही बात देश के जन-मन में रचा-बसा है। हिंदुत्व, हिंदुस्तान-पाकिस्तान से कई गुना इस समय लोगबाग अपने टूटे आशियाने, बच्चों के भविष्य और अपनी जिंदगी की टूटी कड़ी को किसी भी तरह जोड़ने के लिए इस कोरोना से आकंठ डूबे देश में शेष दुनिया से तीन गुना महंगे पेट्रोल, डीजल के सहारे आधी-अधूरी तनख्वाह के लिए और मजदूरी के लिए रोज-बरोज सड़कों पर निकलने के लिए मजबूर हैं। उनके अंदर इस पूरे मकड़जाल से निकल बाहर होने की पूरी स्थितियां मौजूद हैं, लेकिन देश को एक अदद ठोस वैकल्पिक राजनीतिक आंदोलन की दरकार अभी भी बनी हुई है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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