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कांग्रेस समाजवादी पार्टी के स्थापना दिवस पर विशेष: अतीत के संघर्षों से ही रोशनी मिलेगी!

‘किसी कारण वश लोगों की क्रयशक्ति लुप्त हो गई है और करोड़ों कामगार और किसान बर्बाद हो गए हैं। करोड़ों कामगार बेरोजगार हो गए हैं और जो काम पर हैं भी, उनकी मजदूरी घट गई है और अन्य सामाजिक लाभ उनसे छीन लिए गए हैं। ‘‘आर्थिक संकट के गहरेपन के साथ-साथ राजनीतिक संकट तीव्र होता जा रहा है।……सभी तरफ प्रतिनिधि संस्थाएं टूट रही हैं।….कुछ राज्यों में लोकतंत्र का दिखावा भी साफ रूप में खत्म कर दिया गया है और उसकी जगह फासिज्म की नंगी निरंकुशता स्थापित कर दी गई है।‘‘ आज से 86 साल पहले समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव ने ये बातें कही थी। पटना के अंजुमन-ए-इस्लामिया हाल में 17  मई, 1934 को आयोजित कांग्रेस समाजवादी पार्टी के स्थापना सम्मेलन के अपने अघ्यक्षीय भाषण में आचार्य जी ने भी यह भी कहा था कि समाजवाद ही सभ्यता के संकट का मुकाबला कर सकता है।

दशकों पहले दिए गए इस बयान का आज की स्थिति से कितनी समानता है! फर्क सिर्फ इतना है कि इससे जूझने के जो रास्ते बताए जा रहे हैं, उस सूची में समाजवाद का नाम नहीं है। कोरोना महामारी की वजह से सभ्यता के इतिहास के सामने आए भयानक संकट के मुकाबले के लिए उन्हीं घिसे-पिटे विचारों को अमल में लाया जा रहा है जिन्होंने कोरोना जैसे संकट के उभारने में अहम भूमिका अदा की है। उन्हीं नीतियों की फिर से घोषणा की जा रही है जो बडे़ संकटों से लड़ने में मानवता को लाचार बनाती रही हैं।

भारत के महामार्गों पर गरीब लोगों की पैदल चलती भीड़ और संपन्न देशों में गरीब, कमजोर और बूढों की मौत के आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि विषमता पर आधारित विश्व-अर्थव्यवस्था मानवता के समक्ष आने वाली बड़ी चुनौतियों  का सामना करने में असक्षम है। अपनी चुनौतियों से लड़ने में असमर्थ प्रकृति की लूट और आम लोगों के भयंकर शोषण पर आधारित यह व्यवस्था दुनिया की बड़ी आबादी को बेरोजगारी, भुखमरी और गुलामी के एक नए दौर में भेजने की अपनी जिद पर अड़ा है। प्रचार-तंत्रों और फैसले लेने वाली संस्थाओं पर कब्जा जमाए बैठा कारपोरेट किसी भी विेकल्प को सामने आने नहीं दे रहा है। ऐसे में, मानवता की आजादी तथा बराबरी वाली व्यवस्था के लिए अतीत के संघर्षों को याद करना जरूरी है। ऐसे ही संघर्षों में एक संघर्ष कांग्रेस समाजवादी पार्टी का था।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के एक दिन पहले हुए कांग्रेस समाजवादी पार्टी के स्थापना सम्मेलन के बारे में आचार्य नरेंद्र देव लिखते हैं, ‘‘सम्मेलन में यह निश्चय किया गया कि कि कांग्रेस के भीतर जो समाजवादी हैं उनकी एक अखिल भारतीय-संस्था स्थापित करने का समय आ गया है। सन् 1930 और 1932-33 के राष्ट्रीय आंदोलन के अनुभवों का यह परिणाम था। 32-33 के सत्याग्रह के बाद पार्टी को ऐसे कांग्रेस जनों ने जन्म दिया जिनको यह विश्वास हो गया था कि राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा में ले चलने की जरूरत है और लक्ष्य को फिर से तय करने तथा लक्ष्य पाने के तरीके में परिवर्तन की जरूरत है।’’

उन्होंने लिखा, ‘‘जाहिर है ये कांग्रेस जन वही थे जिन पर वैज्ञानिक समाजवाद (मार्क्सवाद) का प्रभाव पड़ चुका था और जो उसके सिद्धांतों और कार्य करने की प्रणाली को स्वीकार कर चुके थे,’’ नरेंद्र देव ने कहा है।

‘‘सन् 1917 की रूस की क्रांति और सोवियत समाज की आर्थिक पद्धति ने शिक्षित वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है,’’ वह कहते हैं।

उन्होंने लिखा है कि 32-33 के सत्याग्रह आंदोलन की विफलता और 1934 में स्वराज पार्टी के संवैधानिकतावाद को फिर से जीवित करने के प्रयासों के कारण कांग्रेस के कुछ उग्र विचार के नवयुवकों को एक समाजवादी पार्टी का गठन करना अत्यंत जरूरी लगा।

यह किस तरह हुआ, इस पर नरेंद्र देव अपने लेख में प्रकाश डालते हैं, ‘‘यह कहना अनुचित होगा कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनने के पूर्व भारतीय राजनीति में समाजवाद का स्थान नहीं के बराबर था। इसमें संदेह नहीं कि पंडित जवाहर लाल  नेहरू के यूरोप से लौटने के बाद सन् 1927 में कांग्रेस के निश्चयों का रूप बदलने लगा।’’ नेहरू जी 1926 में यूरोप गए थे और सन् 1927 में मद्रास कांग्रेस के समय भारत लौटे थे।

नरेंद्र देव आगे कहते हैं ‘‘जवाहरलाल जी ने कांग्रेस से किसानों के लिए एक आर्थिक कार्यक्रम भी पास कराया। इसके पूर्व करांची कांग्रेस से उन्होंने मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव पास कराया था। वह मजदूर आंदोलन में रस लेते थे और कांग्रेस के द्वारा मजदूरों की हड़तालों को सहायता भी प्रदान करते थे। यह उनकी चेष्टा का फल था कि लाहौर कांग्रेस में पूर्ण स्वाधीनता का ध्येय  स्वीकृत किया गया।’’

‘‘जवहरलाल जी ने निस्संदेह कांगेस में समाजवादी विचारधारा को प्रोत्साहन दिया और कांग्रेस की दिशा बदलने में प्रयत्न किया तथा प्रयत्न में आंशिक रूप से सफल भी हुए। यह कहना अत्युक्ति नहीं होगा कि सन् 1934 में वह समाजवादी तथा क्रांतिकारी शक्तियों के एक प्रकार से प्रतिनिधि थे,’’ नरेंद्र देव कहते हैं।

उन्होंने कांग्रेस समाजवादी पार्टीं के गठन से पहले बिहार मध्य प्रांत तथा मुंबई में हुए सांगठनिक प्रयासों के अलावा नासिक जेल में बंद जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, युसूफ मेहरअली, अशोक मेहता और एम आर मसानी के बीच हुई चर्चा का भी जिक्र किया है।

समाजवादियों का मंतव्य था कि कांग्रेस को एक आर्थिक कार्यक्रम स्वीकार करना चाहिए और उसे कौंसिल में प्रवेश के मार्ग पर जाने से रोकना चाहिए।

कांग्रेस समाजवादी पार्टी में शामिल होने वाले लोग आजादी के आंदोलन की अगली पंक्ति में शामिल लोग थे और उनका मानना था कि देश को आजादी दिलाने की लड़ाई कांग्रेस ही लड़ सकती है और इसका नेतृत्व गांधी जी ही कर सकते हैं। वे अंग्रेजों से किसी तरह के सहयोग या समझौते के खिलाफ थे और कांग्रेस को भी इसी राह पर ले जाना चाहते थे। कांग्रेस और गांधी जी की भूमिका को अहम मानने के कारण उन्होंने तय कर रखा था कि वे कांग्रेस में सांगठनिक पद लेने से दूर रहेंगे और इसकी एकता को नुकसान पहुंचाने वाला कोई कदम नहीं उठाएंगे। उन्होंने अपने इस फैसले का पालन उन्होंने पूरी नैतिकता से किया। नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डाक्टर राम मनोहर लोहिया ने कांग्रेस में पद दिए जाने की पेशकश को हर बार ठुकराया। आजादी के बाद भी इसके शीर्ष के नेताओं ने मंत्री, गर्वनर या राजदूत के पद लेने से मना कर दिया। इसके विपरीत, हिंदू महासभा के श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे नेता जो आजादी के आंदेालन में कभी जेल नहीं गए, वे नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल हो गए।

समाजवादी आजादी के आंदोलन की एकता को अत्यंत जरूरी मानते थे। यही वजह है कि विरोध और अपमान को झेलते हुए भी आजादी मिलने तक वे कांग्रेस में बने रहे। जब भी कांग्रेस में अंदरूनी संघर्ष हुआ, उन्होंने इसमें हिस्सा नहीं लिया। जब सुभाषचंद्र बोस का टकराव गांधी जी के समर्थकों से हुआ तो समाजवादियों ने एकता का प्रयास किया। लेकिन सुभाष बाबू से निकटता के बावजूद कांग्रेस छोड़ने तथा फारवर्ड ब्लाक बनाने के उनके फैसले के साथ नहीं गए।

अंग्रेज़ों से समझौता नहीं करने की अपनी नीति पर वे इतनी मजबूती से डटे रहे कि विश्वयुद्ध में फासीवाद के खिलाफ अंग्रेजी हुकूमत को साथ देने की नीति का उन्होंने तीव्र विरोध किया और जब 1942 में कांग्रेस ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग का प्रस्ताव पारित किया तो समाजवादियों ने इस ऐतिहासिक आंदोलन को नेतृत्व दिया क्योंकि कांग्रेस के ज्यादातर नेता जेल चले गए थे। जयप्रकाश नारायण हजारीबाग जेल में थे। वह अपने कुछ साथियोें के साथ जेल से भाग निकले और उन्होंने डॉ. लोहिया, अच्युत पटवर्धन और अरूणा आसफ अली ने भूमिगत रह कर अगस्त क्रांति का नेतृत्व किया। जयप्रकाश तथा लोहिया को पुलिस ने गिरफ्तार किया और उन्होंने असीम यातनाएं दीं । कांग्रेस के बाकी नेताओं की रिहाई के लगभग साल भर बाद उन्हें अप्रैल 1946 में रिहा किया गया। देश की जनता ने उन्हें लाखों की भीड़ में जमा होकर जगह-जगह उनका स्वागत किया।

इसके विपरीत हिंदू महासभा नेता वीर सावरकर अंग्रेजों के लिए लोगों को भर्ती कराने वाले अभियान के साथ थे और हिंदू महासभा के ही बड़े नेताओं में गिने जाने वाले डॉ. बीएस मुंजे एक सैनिक स्कूल चला रहे थे ताकि अंग्रेजों की मदद की जा सके।

कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया भी अपने वैचारिक भटकाव के कारण फासिज्म विरोधी मोर्चा बना कर युद्ध में अंग्रेजों का साथ दे रही थी।

जब अंग्रेजों ने धर्म के आधार पर भारत के दो टुकड़े कर दिए तो समाजवादी गांधी जी के साथ देश में दंगों की आग बुझाने में लग गए। जयप्रकाश, लोहिया, अच्युत पटवर्धन, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, अरूणा आसफ अली समेत कई समाजवादी नेताओं ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी।

समाजवादी जिन्ना और सावरकर के इस सिद्धांत के खिलाफ थे कि हिंदू तथा मुस्लिम दो राष्ट्र हैं। उन्होंने भारत-पाकिस्तान बंटवारे को कभी नहीं माना और आजादी के बाद भी हिंद-पाक महासंघ यानि भारत से अलग हुए टुकड़ों को एक फेडरेशन में लाने को अपने एजेंडे पर कायम रहे। डॉ लोहिया इसके सबसे बड़े हिमायती थे।

मार्क्सवादी विचारों से शुरू हुई समाजवादियों की राजनीति आजादी के आंदोलन और गांधी जी से सीख ले कर परिपक्व हुई। इसने लोकतंत्र और बराबरी को अपना लक्ष्य बनाया। जयप्रकाश नारायण के रचनात्मक कार्यक्रमों तथा डॉ. लोहिया के संसदीय संघर्षों ने देश की राजनीति को काफी संपन्न किया है। इसने 1974 में आपातकाल के विरोध के जरिए लोकतंत्र को फिर से स्थापित किया तथा डॉ. लोहिया के विशेष अवसर के सिद्धांत पर चल कर पिछडों को आरक्षण तथा सामाजिक बराबरी दिलाई। संसदीय भटकावों ने कई समाजवादियोें को जातिवादी तथा सांप्रदायिक राजनीति का हिस्सा बना दिया, लेकिन जेपी तथा लोहिया की राह पर चलने वाले किशन पटनायक जैसे लोगों ने समाजवाद की रोशनी जलाए रखी। इस रोशनी को लेकर कई संगठन तथा व्यक्ति देश भर में पर्यावरण बचाने, सांप्रदायिक एकता बनाने, वंचितों को अधिकार दिलाने और मानवाधिकारों तथा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष में लगे हैं।

क्या लोकतंत्र, बराबरी और जरूरत भर उपयोग वाला समाज बनाने का सपना आज अत्यंत प्रासंगिक नहीं है? क्या कोरोना महामारी ने हमें यह नहीं सिखा दिया कि मुनाफा, प्रतिद्वंदिता तथा मजे वाली अर्थव्यवस्था की जगह वैज्ञानिक सोच, सहकार, प्रकृति से मेल तथा सादगी पर आधारित विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था ही मानवता को बचा सकती है ?

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on May 17, 2020 10:46 pm

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