Monday, August 8, 2022

अमेरिकी स्वतंत्रता दिवस पर विशेष: अभी भी अमेरिका में गहरी है नस्लवादी मानसिकता

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अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा पर बोस्टन, फिलाडेल्फिया, मैसाचुसेट्स आदि स्थानों पर लोग तोप और बंदूक दागे जा रहे थे। गिरजाघर में घंटियां बजाने के लिए लोग एकत्रित हुए, कुछ ऐसे भी लोग थे जो खुश नहीं थे।
वे लोग कौन थे जो दुखी थे जिन्हें लग रहा था की यह आजादी झूठी है। वे अमेरिका के दास थे, मूलनिवासी थे, अश्वेत थे और महिलाएं थीं। अमेरिकी संविधान की मूल प्रति में क्या अमेरिका के मूल निवासी और गुलाम लोगों को अधिकार मिले यहाँ तक की महिलाओं को भी मतदान का अधिकार 1920 में मिला। क्या यह नहीं कहा जा सकता कि अमेरिकी संविधान गोरे और कुलीन वर्ग के लोगों का ही है।

परंतु बौद्धिक वर्ग ने अमेरिका की शान में कसीदे पढ़े जैसे आप देखिये एलेक्सि डी टाकविले ने 1834 में ‘अमेरिकी विशिष्टतावाद’ शब्द का प्रयोग किया इससे यह बताने की कोशिश की गई कि अमेरिका में वह सभी तत्व मौजूद है जो किसी भी राष्ट्र को सामाजिक आंदोलन, विद्रोह, प्रबोधन से प्राप्त होते हैं। और बहुत से इतिहासकारों और चिंतकों ने इस बात को सही भी माना।
अमेरिकी संविधान में सत्ता के पृथक्करण का सिद्धांत है। जिसके अनुसार कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को संप्रभु बनाया गया है जिन पर किसी का हस्तक्षेप नहीं होगा और इसके माध्यम से व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी सुनिश्चित किया गया है।

लेकिन कई उदाहरण ऐसे हैं जहां संप्रभुता नहीं बनी रह पाई जैसे फ्रेंकलिन डी रुजवेल्ट के समय में अमेरिका ने महामंदी का सामना किया तो रुजवेल्ट ने कई आर्थिक सुधार किये जो कि काफी सराहे जाते रहे, एक सच यह भी है कि उन्होंने न्यायपालिका को घुटनों पर ला दिया था।
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने 1857 के ड्रेड स्कॉट मुकदमे में कहा कि ‘दास अधिकार विहीन संपत्ति’ है।
इससे यह पता चलता है कि वहां के गुलामों और महिलाओं को लेकर संवैधानिक संस्थाओं में तक हीनभावना रही है। अगर हम लिंचिंग की बात करें जो आज भारत जैसे देश में भी चर्चित है इस शब्द का उद्भव भी अमेरिका में हुआ और वह हिंसा आगे चलकर संस्थानिक हो गई जिसका शिकार जॉर्ज फ्लोयड जैसे अश्वेत लोग होते रहे हैं। और अमेरिका में अश्वेतों को निम्न दर्जे का नागरिक बना दिया गया है।

प्रोफेसर महमूद ममदानी ने अपनी किताबों में बताया है कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भले ही यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों से आजाद हो गए हों परंतु आज भी यहाँ औपनिवेशिक मानसिकता बची हुई है। जैसे अमेरिका में मूल नागरिकों को इंडियन्स कहना और उनके प्रति बाहरी होने का भाव रखना आम है।
इससे यह बात सही साबित होती है कि वहां के मूल नागरिकों को आजादी नहीं मिल पाई है।1865 में जाकर वहाँ के अश्वेत नागरिकों ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। अमेरिका ने दुनिया के दूसरे देशों में लोकतंत्र का संरक्षक बन कर प्रवेश किया जबकि हुआ सब इसका उल्टा। दुनिया के बहुत से तानाशाह अमेरिका की छत्रछाया में पले और फिर अमेरिका ने ही उन्हें तबाह किया इसके बहुत से उदाहरण हैं। यहाँ तक अपने आप को उपनिवेशीकरण का विरोधी बताकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद में एक नये तरीके के उपनिवेशीकरण को बढ़ावा दिया और दुनिया में नए  तरीके से खेमेबंदी की।

1991 में जब सोवियत संघ का विघटन हो गया जब अधिकांश देश उदारवादी नीतियों को अपना रहे थे तब फ्रांसिस फुकुयामा ने कहा की ‘यह इतिहास का अंत है’ क्योंकि दुनिया के इतिहास में अब तक हमेशा दो सभ्यताओं और विचारों के बीच में जंग रही है। जब कोई विचार रहा ही नहीं तो यह इतिहास का अंत है। दुनिया के और भी विद्वानों ने इस विचार को मान लिया परंतु 2008 में स्वयं अमेरिका ने मंदी देखी और वहाँ दक्षिण पंथी विचार को आधार मिला ट्रंप जैसे लोग सत्ता में आये और न सिर्फ अमेरिका में बल्कि समकालीन विश्व में सभी जगह यह घटनाएं घटी।

ट्रंप के चुनाव में हार के बाद अमेरिका में एक समूह ने कैपिटल हिल पर हमला किया उस समूह की समझ थी की ‘सफेद चमड़ी के लोग ही श्रेष्ठ लोग होते’ हैं यह सब उस देश में हो रहा था जिस देश को आधुनिक दुनिया का पहला लोकतंत्र, मानवाधिकारों का झंडाबरदार है, लोकतंत्र का संरक्षक, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सबसे बड़ा समर्थक जाने कितनी बातें हैं जो वैश्विक मंचों पर अमेरिका के सम्मान में कही जाती है।

(दीपक चारण हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में छात्र हैं।) 

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