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पुस्तक समीक्षा: ‘गूँगी रुलाई का कोरस’ यानी संगीत के बहाने समाज की चीर-फाड़

रणेंद्र का ताजा उपन्यास ‘गूंगी रुलाई का कोरस’ चर्चा में है। राजकमल प्रकाशन से आया यह उपन्यास अमेजन पर उपलब्ध है। रणेंद्र ने झारखंड में प्रशासनिक दायित्व निभाते हुए साहित्य की दुनिया में राष्ट्रीय पहचान बनाई। इससे पहले उनके दो उपन्यास- ‘ग्लोबल गांव के देवता’ और ‘गायब होता देश’ भी काफी चर्चित रहे।

ताजा उपन्यास पढ़ते हुए पहले मुझे लगा कि यह संगीत पर केंद्रित है। लेकिन जल्द ही पता चला कि यह उपन्यास सिर्फ संगीत तक सीमित नहीं है। संगीत की पृष्ठभूमि में देशकाल एवं परिस्थिति का अद्भुत चित्रण है। बहुत अच्छा उपन्यास है यह। दिल और दिमाग पर गहरा असर करने वाला, जिसकी अनुगूंज लंबे समय तक सुनाई देगी। इसे पढ़ते हुए ‘गूंगी रुलाई के कोरस’ में अपने आंसुओं को भी शरीक पाया।

लिहाजा, इस महत्वपूर्ण रचना के लिए रणेन्द्र जी के प्रति आभार स्वरूप प्रस्तुत है सोशल मीडिया में आई टिप्पणियों और समीक्षाओं का यह संक्षिप्त संकलन।

प्रेमकुमार मणि: उपन्यास अनेक स्तरों पर हमें झकझोरता है। वह हमारे समय के सबसे बड़े संकट से हमें रुबरु भी कराता है। पत्रकारिता, संस्कृति और राजनीति किस तरह एक दूसरे को प्रभावित करते हैं और फिर इकट्ठे हो क्या-क्या किस अंदाज़ में अंजाम दे सकते हैं, इस उपन्यास में देखा जा सकता है। संस्कृति का शाइनबोर्ड लगाकर वर्चस्व और हिंसा की राजनीति की जा रही है, मानो दूध का शाइनबोर्ड लगा कर ताड़ी बेची जा रही हो। यह आख्यान हमें सभ्यता-विमर्श के लिए उत्तेजित करता है। जिस देश में सांस्कृतिक बहुलता हो, कई तरह की संस्कृतियां हों, वैसे देश में पहचान की राजनीति अंततः एक कोलाहल और गृहयुद्ध को ही जन्म दे सकती है। यह उपन्यास संगीत की महान भारतीय परंपरा के प्रति हमें जिज्ञासु भी बनाता है।

रमेश अनुपम: उपन्यास हमारे सबसे बुरे दौर को न केवल साहस के साथ देखने और दिखाने का प्रयत्न करता है वरन् संगीत की तहजीब वाले इस महादेश की साझी संस्कृति को याद दिलाने की कोशिश भी करता है। रणेन्द्र ने अपने इस उपन्यास में विलक्षण कथा प्रसंगों तथा विभिन्न चरित्रों के माध्यम से हमारे आज के समय को उसकी पूरी कुरूपता और नग्नता के साथ चित्रित किया है। एक ऐसे मुश्किल दौर में जब अपने समय की साम्प्रदायिक शक्तियों से लड़ने और तथाकथित राष्ट्रवाद का मुंहतोड़ जवाब देने की कोई सार्थक पहल राजनीति या साहित्य में कहीं नहीं दिखाई दे रही है, रणेन्द्र का यह उपन्यास भरोसा दिलाता है कि हिंदी उपन्यास ने यह कोशिश प्रारंभ कर दी है।

प्रगतिशील लेखक संघ, उत्तरप्रदेश: ‘गूंगी रुलाई का कोरस’ केवल उस्ताद महताबुद्दीन खान की चार पीढ़ियों के कुल सात सदस्यों की पारिवारिक कथा न होकर, हिंदुस्तान और इस उपमहाद्वीप के साथ विश्व के एक बड़े भूभाग की कथा भी है। यह मौसिक़ी मंज़िल को केवल एक मकान और स्थान के रूप में न देख कर व्यापक अर्थों- संदर्भों में देखता है। हिंदुस्तानी संगीत की विकास-यात्रा, धर्म, सम्प्रदाय, हिंसा की राजनीति, अन्य के प्रति घृणा-विद्वेष, राष्ट्र-राष्ट्रवाद, अख़बार, न्याय-न्यायपालिका, हिंदुत्ववादी ताकतें, पुलिस, ट्रोलर्स, स्पेशल टास्क फोर्स, जाति, धर्म, सोशल मीडिया, अमेरिकी-यूरोपीय नीतियां सब ओर उपन्यासकार की निगाह है। रणेंद्र गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक कंसर्न के उपन्यासकार हैं, उनका ‘स्टैंड’ साफ है, जिसे समझने के लिए इस कथाकृति को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।’

इरफान: मेरे लिए तो इस उपन्यास की पृष्ठभूमि इसलिए भी खास दिलचस्पी जगाती है कि यह संगीत पर केंद्रित है। इसके पात्रों और घटनाक्रम से गुजरते हुए संगीत की दुनिया से जुड़े मेरे विविध अनुभव भी गुत्थमगुत्था होते रहे। पात्रों के सरोकार जितने स्वाभाविक रूप से इस उपन्यास में कथा का हिस्सा बनते चले जाते हैं, उतनी सी सहजता से समय के सवाल भी सामने आते हैं, जिनका जवाब तलाशती संगीत की दुनिया की बेचैनी दिखती है। संगीत को इंसानियत और भाईचारे का माध्यम बनाए रखने का भरोसा ही है, जो इस उपन्यास को मेरे लिए खास बनाता है।

राहुल सिंह: रणेन्द्र ने थाह थाह कर बढ़ते हुए बतौर उपन्यासकार एक विश्वसनीयता अर्जित कर ली है। ऐसी विश्वसनीयता जिसके कारण उनकी अगली रचना को लेकर उत्सुकता और प्रतीक्षा बनी रहती है। अब वे अपने तीसरे उपन्यास ‘गूंगी रुलाई का कोरस’ के साथ उपस्थित हैं। एक महीने के भीतर पहला संस्करण समाप्त हो गया है। रणेन्द्र की किताबों के आवरण के लिए चित्र भारती जी बनाती हैं, जो उनकी धर्मपत्नी हैं। इस आपसी साझेदारी का सबसे खूबसूरत पक्ष यह है कि रणेन्द्र की हर कृति के साथ उनके घर में एक पेंटिंग का भी इजाफा हो जाता है।

मधु कंकरिया: अपने समय के मिजाज को बहुत सतर्कता और खूबसूरती के साथ लिखने वाले लेखक हैं रणेन्द्र। उन्हें जल्दी नहीं है, इसलिए बहुत महीन और धीमी आंच पर पका हुआ होता है उनका लेखन।

कुमार अभिनव स्वरूप: गूँगी रुलाई का कोरस के पात्र एक साझा समाज का निर्माण कर रहे थे, जो अगर विभाजन-प्रेमी ताकतें बीच में न खड़ीं होतीं तो एक विशिष्ट समाज-रचना के रूप में विश्व के सामने आता। हमारे गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों में आज भी इसके अवशेष मिल जाते हैं। परम्परा का एक बड़ा हिस्सा तो उसके ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में हमारे पास है ही।

रणेंद्र।

मुकेश बालयोगी: यह उपन्यास सृजनधर्मिता का महाआख्यान है। राग-रागिनियों के सृजन की बैचैनी शास्त्रीय संगीत को समर्पित चार पीढ़ियों के खानदान को किस मोड़ पर ले जाकर छोड़ देता है, यह अपने आप में विस्मित कर देने वाला है। उपन्यास भारत और भारतीयता के उत्स का वह सांगीतिक उत्सव जो हम सबके अवचेतन में रह-रहकर कहीं न कहीं हिलोरे मारता रहता है। उपन्यास की बनावट और बुनावट में रणेंद्र जी ने बांग्ला संस्कृति को इस तरह पिरोया है कि मन बाग-बाग हो उठता है।

मनीष प्रतिमा: रणेन्द्र अपने उपन्यासों में समकालीनता और नवीनता (विषयवस्तु की) का हमेशा मिश्रण करते हैं। शीर्षक ‘गूँगी रुलाई का कोरस’ ही संगीत की ताकत, उसमें छिपे सांस्कृतिक एकता बचाये रखने की पीड़ा, संगीत के बहाने इतिहास में गतिशील अनेकों संस्मरण, स्मृतियों को संजोने के भावबोध और दायित्व से रूबरू कराता है। आज़ाद भारत में राजनीति और मजहब ने कई बार भारतीयता के मूल ढाँचा विविधता और साझी संस्कृति को लहूलुहान किया है। लेखक समग्रता में हिंसा की राजनीति को समझना चाहते हैं।

पंकज मित्रा: रेणु के जन्मदिन के साथ एक ऐसे हरदिलअज़ीज़ कथाकार का भी जन्मदिन है जिन्हें ग्लोबल गाँव के देवताओं की पहचान है तो गायब होते देश की चिंता भी, अनसुनी आवाज़ों के साथ गूंगी रूलाई का कोरस भी जिन्हें परेशान करता है। हाशिए की आवाज़ को इसी तरह स्वर देते रहने की शुभकामनाएँ भाई रणेन्द्र को…

जितेश्वरी साहू: हिंदुस्तानी मौसीकी के बहाने रणेंद्र ने हिंदुस्तान की अनमोल विरासत को याद किया है। वे इस महादेश के लोगों को अफीम के समान धर्म के नशे में डूबे हुए देखकर जैसे बेहद दुखी हैं। हाल ही में हुए पत्रकारों और अंधविश्वास के खिलाफ अलख जगाने वालों की हत्याओं को लेकर भी एक गंभीर चिंतन दिखाई देता है। इस उपन्यास में हमारे देश के उन धार्मिक कट्टर हिन्दू समर्थक संगठनों का बखूबी चित्रण किया है, जो केवल एक धर्म विशेष से नफरत करता है और उसे अपना शिकार बनाता है। उपन्यास में ऐसे पात्र भी है जिन्होंने संगीत के अलावा प्रेम को तरजीह दी। इस दुनिया से नफरत को मिटाने के लिए जिन्होंने अपने आप को मिटा दिया।

रमेश अनुपम: आज के भारत को समझने के लिए इस उपन्यास से बेहतर और कुछ नहीं है। सन 2002 से सत्ता हथियाने के लिए सांप्रदायिक शक्तियां जिस तरह से पूरे देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने में लगी हुई थी, अंततः सन 2014 में केंद्र में सत्ता हथियाने में उनका सफल होना, इस महादेश को गर्त की ओर ले जाना सिद्ध हुआ। एक विशेष धर्म को टारगेट बनाकर उनके खिलाफ जहर उगलना, दिल्ली में दंगे करवाना, जेएनयू जैसे विश्व के श्रेष्ठ शिक्षा संस्थान को बदनाम करना, इस देश की साझी विरासत को नष्ट करना, पब्लिक सेक्टर को निजी सेक्टर को बेचना इस देश को कहां ले जाएगा इसे हमें सोचना होगा। रणेंद्र का यह उपन्यास बहुत साहस के साथ आज के भारत की भयावह सच्चाइयों से हमें रु ब रू करवाता है।

चंदन तिवारी: संगीत की पृष्ठभूमि पर लिखे गये हालिया चर्चित उपन्यास ‘गूंगी रुलाई का कोरस’ के लेखक और 31 जनवरी को प्रतिष्ठित श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान से सम्मानित होनेवाले रणेन्द्र सर और उनकी जीवनसंगिनी, अपनी प्रिय, पेंटिंग आर्टिस्ट भारती रंजन मैम के साथ आज की खुशनुमा शाम भी यादगार रहेगी।

प्रो. अमरनाथ, कोलकाता: उपन्यास ने मन मस्तिष्क पर धाक जमा लिया है। हिन्दुस्तानी संगीत के बहाने भारत की साझा संस्कृति को बेहद रोचक ढंग से चित्रित करने वाले इस विषय पर मेरी दृष्टि में अकेला यह उपन्यास अपनी प्रासंगिकता की दृष्टि से भी बेजोड़ है। मुझे बराबर लगता रहा है कि सांप्रदायिक ताकतें चाहे देश की जनता में जितना भी जहर घोलें, देश को जितने भी टुकड़ों में बांट दें, किन्तु हिन्दुस्तानी संगीत के इतिहास को सांप्रदायिकता के आधार पर कभी नहीं बांटा जा सकता।  कथा मुख्यतः बंगाल- केन्द्रित है। इसलिए बांग्ला भाषा और उसकी संस्कृति का कथाकार ने जिस तरह चित्र खींचा है, वह अद्भुत है।

राज वर्मा: यह संगीत को समर्पित एक घराने की कथा है जो धर्म-समुदाय आदि से परे बस इन्सानियत और संगीत में लीन है तो दूसरी तरफ सभी जगह माहौल बदल रहा है। लोग उनमें कलाकार नहीं हिन्दू-मुसलमान देख रहे हैं। आग दुहू घर लागी है। कुछ हिन्दू और कट्टर हिन्दू हो रहे तो मुसलमान भी और कट्टर होते जा रहे। उन्हे पसन्द नहीं कि मुसलमान हमारे राम–कृष्ण के गीत गायें, हमारी राग-रागिनियाँ गायें तो मुसलमानों को भी यह नहीं पसन्द, बल्कि कट्टर को तो मुसलमान का गाना-बजाना-नाचना भी गवारा नहीं। किताब शोधपरक है, इतिहास आधारित है किन्तु बोझिल नहीं।

(विष्णु राजगढ़िया वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल झारखंड में रहते हैं।)

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This post was last modified on June 7, 2021 1:20 pm

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