20 लाख करोड़ के पैकेज की हक़ीक़त

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जब 12 मई की रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया तब सबकी निगाहें इस इंतजार में थीं कि वे लॉकडाउन के संबंध में आगे की योजना के बारे में कुछ बोलेंगे, दुनिया के इतिहास में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हो रहे मजदूरों के पलायन, उनकी दुर्दशा और दुश्वारियों के बारे में दो बूंद आंसू गिराएंगे और क्षमा मांगेंगे, किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ।

प्रधानमंत्री जी अपने लंबे भाषण के बड़े हिस्से में अपने चिर-परिचित अंदाज में, काफी आलंकारिक शैली में भारत की उपलब्धियों की चर्चा करते रहे। वे बताते रहे कि भारत पहले भी दुनिया को रास्ता दिखाता रहा है, आगे भी दिखाएगा। उनकी बातों से लग रहा था कि सारी दुनिया हाथ पर हाथ धरे इंतजार कर रही है कि भारत रास्ता दिखाये ताकि वे भी पीछे-पीछे चल सकें।

प्रधानमंत्री जी ने भारत की उपलब्धियों के बारे में यह भी बताया कि अब से पहले देश में एक भी पीपीई किट का निर्माण नहीं हो रहा था और अब हम यह किट बड़ी संख्या में बनाने लगे हैं। यह बात अलग है कि पत्र-पत्रिकाओं में छपी हुई तमाम रिपोर्टों के अनुसार हम लगभग 25 मार्च तक न केवल पीपीई किट का निर्माण करते रहे हैं, बल्कि उसका निर्यात भी करते रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी ने अपने संबोधन में यह भी बता दिया कि जब दुनिया Y2K संकट में थी तब भी भारत ने ही दुनिया को इससे उबारा था। हालांकि ऐसी व्हाट्सप विश्वविद्यालय टाइप शेखी बघारने वाली खबरों की पहले भी धज्जियां उड़ाई जा चुकी हैं। दरअसल उस समय भी ये अफवाहें अनधिकृत स्रोतों से फैलाई गई थीं और इसे हल करने और धरती को बचाने के लिए किसी भी सुपरमैन की जरूरत नहीं पड़ी थी, और दुनिया अपने आप अगली सहस्राब्दी में खिसक गई थी। लेकिन बाद में धीरे-धीरे भारत द्वारा इसके हल करने की डींग हांकने वाली खबरें सोशल मीडिया की शोभा बनने लगी थीं। बौद्धिक जगत में ऐसी डींगों को सामुदायिक रूप से हीन भावना से बचने के लिए ली गई अफीम की खुराकों जैसा माना गया।

लेकिन प्रधानमंत्री जी के मुखारविंद से ऐसी तमाम काल्पनिक उपलब्धियां पहले भी वैधता पाती रही हैं, इसलिए अब उतना आश्चर्य नहीं होता। यों भी प्रधानमंत्री जी का हर संबोधन हमेशा अपने वोटर के लिए होता है और वे चुनाव जीतने के अगले दिन भी पांच साल बाद होने वाले चुनाव की तैयारी में लग जाते हैं। उनकी सफलता के रहस्यों में से एक रहस्य यह भी है।

इस संबोधन की वह बात जो उन्होंने काफी बाद में कही, लेकिन उस पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वह थी अर्थव्यवस्था के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा। उन्होंने बताया कि इसका विस्तृत विवरण वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण अगले कुछ दिनों तक देती रहेंगी।

20 लाख करोड़ के पैकेज के बारे में बताया गया कि पिछले दो महीनों के दौरान घोषित पैकेज भी इसमें शामिल हैं। उन्होंने यह भी बताया कि यह रक़म जीडीपी का 10 फीसदी है। लेकिन अर्थशास्त्रियों के अनुसार 20 लाख करोड़ रुपये की यह राशि वास्तविक तौर पर इतनी बड़ी नहीं है जितनी प्रतीत हो रही है। इस 20 लाख करोड़ में से बड़ा हिस्सा, यानि 8 लाख 4 हजार करोड़ रुपये तो वही राशि गिनी जानी है जिसे रिजर्व बैंक ने फरवरी, मार्च और अप्रैल में समय-समय पर बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी के रूप में उपलब्ध कराया है।

लिक्विडिटी रिजर्व बैंक के नियंत्रण के तहत बैंकों को उपलब्ध करायी गई वह ढील होती है जिसके तहत बैंक अपने ग्राहकों को ऋण दे सकते हैं। नियमतः लिक्विडिटी को आर्थिक पैकेज माना ही नहीं जाना चाहिए, क्योंकि यह नगदी हस्तांतरण नहीं होता। यों भी रिपोर्टों के अनुसार बाजार की वर्तमान हालत की वजह से इस लिक्विडिटी के आधार पर बैंकों से ऋण उठा ही नहीं है। बैंक ऋण भी तो उसे ही देंगे जो चुका सके! और मौजूदा हालत में कोई कंपनी लोन लेकर निवेश कहां करेगी?

इसी तरह से 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 27 मार्च को ही किया था, वह भी इसमें जोड़ा जाएगा। इसका भी काफी बड़ा हिस्सा अभी खर्च ही नहीं हुआ है। इस घोषणा में से भी अगले तीन महीनों में कुल मिला कर मात्र 61380 करोड़ ही खर्च होने हैं। इनमें से 10000 करोड़ महिला जन धन खातों में, 3000 करोड़ विधवा, वृद्ध तथा दिव्यांगों के खातों में 17380 करोड़ किसानों तथा 31000 करोड़ भवन एवं निर्माण क्षेत्र के मजदूरों के खातों में। शेष राशि के खर्च की अभी कोई योजना नहीं है।

उपरोक्त दोनों को जोड़ लें तो 9 लाख 74 हजार रुपये होते हैं। अतः 20 लाख करोड़ रुपये में से शेष 10 लाख 26 हजार करोड़ रुपये अगर मिलें भी तो वह जीडीपी का मात्र 5 फीसदी होगा। लेकिन कुछ रिपोर्टों और बैंकिंग क्षेत्र के सूत्रों के मुताबिक अभी रिजर्व बैंक से और 5 लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी की घोषणा की योजना है। अगर ऐसा हुआ तो वास्तविक संभावित नगदी की संभावना घट कर 2.5 फीसदी ही रह जाएगी। हम प्रार्थना करें कि ऐसा न हो।

सरकारें राहत पैकेज के तौर पर कई बार ऐसी घोषणाएं करती हैं जो देखने में भले बड़ी लगें किंतु वास्तव में मदद नहीं होतीं और वे सचमुच का व्यय नाममात्र का ही करती हैं। कभी-कभी सरकार किसी सेक्टर के लिए जो घोषणा करती है, उसके लिए बजटीय आवंटन नहीं करती हैं बल्कि केवल उस मद में बैंकों द्वारा दिए गए ऋण की गारंटी शामिल होती है। अतः वास्तविक खर्च घोषित राशि का एक छोटा हिस्सा ही होता है, बैंकों को न चुकाई गई राशि के रूप में।

सरकार रिकैपिटलाइजेशन बॉण्ड के रूप में भी कोई ऋण दिलवा कर बैंकों को मात्र उसके ब्याज के तौर पर भी रक़म भुगतान करती रहती है। इसमें भी दिया गया ऋण तो घोषित पैकेज में जोड़ दिया जाता है, किन्तु वास्तविक खर्च ब्याज के रूप में उस घोषणा का छोटा हिस्सा ही होता है।

दरअसल सरकार अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में पैसे झोंकने की स्थिति में है ही नहीं। उसकी कोशिश अर्थव्यवस्था को केवल आईसीयू से बाहर लाने की है। निवेश के तौर पर ज्यादा खर्च का तो स्कोप भी मौजूद नहीं है। जो भारी पैमाने पर तबाही हुई है और जिस तरह की तकलीफें ग़रीब और मजदूर झेल रहे हैं, उसे हल करने के लिए लिक्विडिटी जैसी आंकड़ों की बाजीगरी की नहीं, बल्कि लोगों को राशन, आवास, दवाई और उनके हाथों में सीधे नगदी देने की जरूरत है, ताकि अर्थव्यवस्था जब पटरी पर आने की कोशिश करे तो बाजार में मांग पहले से मौजूद हो।

लेकिन सरकारी नीतियां पहले से ही मांग बढ़ाने की जगह निवेश बढ़ाने पर केंद्रित रही हैं। अर्थात कॉरपोरेट संचालित सरकारी नीतियों के हिसाब से अर्थव्यवस्था की बैलगाड़ी में बैल आगे से जोतने की जगह पीछे से जोते जा रहे हैं, और बार-बार असफलता के बावजूद यही जोर-जोर से चिल्लाया जा रहा है कि हमारा यह ‘रथ’ बहुत तेजी से दौड़ रहा है, दुनिया हमारी रफ्तार को मुग्ध भाव से निहार रही है। जब अर्थशास्त्री और बौद्धिक समुदाय का एक हिस्सा बताना चाहता है कि राजा तो नंगा है तो जरखरीद भांड़ों और वादकों द्वारा जोर-जोर से ढोल-नगाड़े बजवा कर उस आवाज को नक्कारखाने में तूती की आवाज बना दिया जाता है और जनता में इस वहम को और गहराई तक धंसा दिया जाता है कि ‘सब चंगा सै’, ‘बागों में बहार है’।

(लेख शैलेश ने लिखा है।)

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