Saturday, March 2, 2024

जाति की ‘फॉल्ट लाइन’ में छटपटाता आरएसएस

नई दिल्ली। आरएसएस ने अपने शीर्ष निकाय अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक में जाति के प्रश्न पर 2024 के लोकसभा चुनावों तक की अपनी भावी योजना स्पष्ट कर दी है। यह तीन दिवसीय बैठक 12,13 और 14 मार्च को हरियाणा के समालखा में संपन्न हुई।

आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक सालभर में एक बार होने वाली मीटिंग है, जहां पिछले साल की सभी गतिविधियों की समीक्षा की जाती है और आने वाले साल के लिए योजना तैयार की जाती है। संघ की इस बैठक में देशभर के करीब 1400 प्रतिनिधि शामिल हुए, जिसमें राष्ट्रीय कार्यकारिणी, क्षेत्रीय कार्यकारिणी और प्रांत कार्यकारिणी, प्रतिनिधि सभा के निर्वाचित सदस्य और सभी विभाग प्रचारक शामिल हुए। आरएसएस के आनुषांगिक संगठन के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल होते हैं। इसमें बीजेपी, एबीवीपी, वीएचपी जैसे संगठन भी शामिल हैं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और महासचिव बीएल संतोष शामिल हुए।

अभी तक जो तथ्य सामने आए हैं, उससे स्पष्ट है कि आरएसएस हिंदू समाज में जाति आधारित सामाजिक विभाजन को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। आरएसएस के सहकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले ने इसे रेखांकित करते हुए कहा, “प्रतिनिधि सभा की बैठक में हिंदू समाज को बांटने वाली सामाजिक विभाजक रेखा (जाति) को पाटने पर जोर दिया गया।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत में विपक्षी पार्टियां अपनी राजनीतिक फायदे के लिए इस फॉल्ट लाइन (सामाजिक विभाजक रेखा) का इस्तेमाल कर रही हैं। आरएसएस के शीर्ष निकाय की इस बैठक में विपक्ष के उन नेताओं को टारगेट करने का निर्णय लिया गया, जो जाति रूपी ‘विभाजक रेखा’ का इस्तेमाल भाजपा को घेरने के लिए करते हैं।

विपक्ष इस ‘विभाजक रेखा’ (जाति) का इस्तेमाल न कर पाए इसके लिए आरएसएस ने एक वर्ष तक जातिगत भेदभाव के खिलाफ अभियान चलाने का फैसला किया है। आरएसएस के सहकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले ने कहा, “शाखाओं (आरएसएस की शाखा) को सामाजिक समरता कायम करने, छुआछूत से लड़ने, सभी को मंदिरों में प्रवेश दिलाने, श्मशान घाट तक सभी की पहुंच सुनिश्चित कराने, गांव की शादियों में सभी के साथ मेलजोल बढ़ाने और साथ बैठक भोजन करने के लिए प्रेरित करने के काम में लगाया जाएगा।”

इस समय आरएसएस देश भर में करीब 60,229 शाखाएं लगाता है। प्रतिनिधि सभा की इस बैठक में निर्णय लिया गया है कि एक साल के अंदर इन शाखाओं की संख्या एक लाख तक पहुंचाने की कोशिश होगी।

आरएसएस इस तथ्य से भी उत्साहित है कि आरएसएस के आनुषांगिक संगठन भाजपा को जातिगत विभाजन से ऊपर उठकर वोट दे रहे हैं। इस संदर्भ में प्रतिनिधि सभा ने कहा, “चुनाव दर चुनाव यह साबित हो गया है कि लोग जाति से ऊपर उठ रहे हैं और मोदी सरकार को वोट दे रहे हैं। वे एक संयुक्त हिंदू समाज और राष्ट्रीय गौरव का आख्यान रचने में सफल रहे हैं। विपक्ष की ताकतें सामाजिक दरारों को उजागर कर इसे तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश कर रही हैं।”

जाति का प्रश्न आरएसएस के लिए कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि इस प्रतिनिधि सभा में उसने 2024 के चुनावों तक जिन पांच मोर्चों पर संघर्ष करने का निर्णय लिया है। उसमें पहला मोर्चा जाति है। जिसे उसने सामाजिक समरसता से हल करने का निर्णय लिया। अन्य चार मोर्चों में पारिवारिक मूल्यों का संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी की ओर झुकाव और नागरिक कर्तव्य हैं।

जाति का प्रश्न किस कदर आरएसएस को परेशान कर रहा है इसका अंदाज कुछ दिनों पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा जाति के संदर्भ में दिए गए बयान से भी लगाया जा सकता है। जिसमे उन्होंने कहा कि जाति भगवान ने नहीं बनाई है। उन्होंने यह भी कह दिया कि जाति ‘पंडितों’ ने बनाई है। हालांकि बाद में यह स्पष्टीकरण दिया गया कि पंडित का मतलब विद्वान से था, किसी जाति विशेष से नहीं।

अभी तक की रिपोर्टों के आधार यह कहा जा सकता है कि आरएसएस के शीर्ष निकाय की इस बैठक में जाति सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बनी रही है। जाति का सवाल उसके लिए न केवल दीर्घकालिक संदर्भ में महत्वपूर्ण बना हुआ है, बल्कि 2024 के चुनावों में उसे जाति का भूत भी सता रहा है। जिसके चलते उसने 2024 के लोकसभा चुनावों तक जातिगत भेदभाव के खिलाफ एक साल तक अभियान चलाने का निर्णय लिया है, जिसने उसे ‘सामाजिक समरसता’ नाम दिया है।

आरएसएस ने इसे एक साल के लिए अपने सामने उपस्थित सबसे बड़ी चुनौती माना है। यह एक साल समय वही समय है, जिसके बाद लोकसभा का चुनाव (2024) चुनाव होना है। जिस चुनाव में भाजपा के सहयोगी के रूप में काम करने की खुली घोषणा आरएसएस ने इस बैठक में की है।

आरएसएस के शीर्ष निकाय अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में जाति के प्रश्न पर भाजपा की चिंता और उस संदर्भ में लिए गए प्रस्ताव इस बात के प्रमाण हैं कि आरएसएस के लिए जाति हिंदू राष्ट्र निर्माण के दीर्घकालिक संदर्भ के साथ 2024 के लोकसभा चुनावों के अल्पकालिक संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण चिंता का विषय बन गई है।

सबसे पहले 2024 के लोकसभा चुनावों के संदर्भ में आरएसएस की जाति संबंधी चिंता को समझने की कोशिश करते हैं। भले ही लगातार दो लोकसभा चुनावों (2014और 2019) में भारी बहुमत से जीत और विपक्ष के विखराव और कमजोर दिखने के चलते कुछ विश्लेषकों को लगता हो कि नरेंद्र मोदी आसानी से 2024 का चुनाव जीत जायेंगे।

लेकिन आरएसएस-भाजपा को पता है कि मामला इतनी आसान नहीं है और उसकी सबसे कमजोर कड़ी जाति बन सकती है। इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि भारत में चुनावों के दौरान वोट डालते समय सबसे निर्णायक कारक जाति होती है। 2014 और 2019 के लोकसभा में भाजपा की भारी जीत में सबसे निर्णायक भूमिका जाति ने निभाई थी, भले ही सतह पर हिंदू-मुस्लिम का सवाल सबसे बड़े सवाल के रूप में सामने आया हो।

भारत के जातिगत समूहों में सिर्फ एकमात्र अपरकास्ट एक ऐसा सामाजिक समूह है, जो हर स्तर पर आरएसएस-भाजपा के साथ है। अन्य कोई भी समूह पक्के तौर पर उसके साथ नहीं है। अपरकास्ट को अपने आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक हित आरएसएस-भाजपा के हाथों में पूरी तरह सुरक्षित लगते हैं और वह चुनाव-दर-चुनाव उसके साथ मजबूती से खड़ा है।

जहां तक भारत के बहुसंख्य पिछड़े, दलित और आदिवासी मतदाताओं का प्रश्न है, वे भाजपा को मुख्यत: तीन कारणों से 2014 के बाद वोट कर रहे हैं। इन समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को भाजपा सबसे आक्रामक तरीके से पूरा करते हुए दिखी। भले ही यह कितना ही प्रतीकात्मक क्यों न रहा हो। इस प्रतीकात्मक प्रतिनिधत्व ने भी उन्हें बड़े पैमाने पर आकर्षित भी किया। दूसरा, भाजपा ने इन समुदायों की विभिन्न जातीय समूहों के बीच की राजनीतिक प्रतियोगिता (प्रतिनिधित्व की प्रतियोगिता) का फायदा उठाया और उसे बढ़ावा दिया।

इस प्रक्रिया में पिछड़ी-दलित जातियों के विभिन्न अलग-अलग समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों और नेताओं ने भाजपा के साथ गठजोड़ किया। बिहार में नीतीश कुमार, मुकेश साहनी, जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान (स्मृति शेष) आदि इसी के उदाहरण हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद और ओमप्रकाश राजभर आदि की पार्टियां भाजपा से गठजोड़ कायम की । इन दो तत्वों के अलावा जिस तीसरे तत्व ने दलित-पिछड़े और आदिवासियों का वोट भाजपा को दिलाया वह तत्व हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्रवाद का था, जिसका बुनियादी तत्व मुसलमानों के प्रति घृणा है।

लेकिन इन तीनों कारकों में कोई भी ऐसा कारक नहीं है, जो स्थायी रूप से पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को आरएसएस और भाजपा के साथ जोड़ सके। पिछड़े-दलितों का सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में मुख्य संघर्ष अपरकॉस्ट से है। कार्पोरेट आदिवासियों के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में सामने आते हैं। सच यह है कि आरएसएस-भाजपा पिछले नौ वर्षों से जिस आर्थिक समूह (कार्पोरेट घरानों) और सामाजिक समूह (अपरकॉस्ट) के हितों की सेवा कर रहे हैं, उनका पिछड़ी-दलित जातियों और आदिवासियों से सीधा संघर्ष है।

इस संघर्ष में आरएसएस-भाजपा इन तीनों समहूों के खिलाफ खड़े हैं। यह तथ्य धीरे-धीरे उजागर होने लगा है। पिछड़े, दलितों और आदिवासियों को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व देने के नाम पर जिस नरेंद्र मोदी, रामनाथ कोविंद और द्रौपदी मुर्मु और अन्य लोगों को खड़ा किया गया है, वे सिर्फ कार्पोरेट घरानों और अपरकास्ट के हितों के पोषक के रूप में सामने आए हैं।

इन तीनों समूहों के वास्तविक हितों से कोई लेना-देना नहीं रहा है। इसके उलट इन लोगों ने इन तीनों समूहों के हितों को बड़े पैमाने पर सत्ता का इस्तेमाल करके नुकसान पहुंचाया है। यह तथ्य धीरे-धीरे जाहिर हो रहा है। पिछड़े, दलितों और आदिवासियों के ये तथाकथित प्रतिनिधि उन समूहों के हितों के सबसे बड़े संरक्षक संविधान और लोकतांत्रिक ढांचे को ही खत्म कर रहे हैं। इन्होंने विभिन्न तरीकों से प्रतिनिधित्व के सबसे महत्वपूर्ण रूप आरक्षण को तहस-नहस कर दिया है। इसके भी तथ्य धीरे-धीरे उजागर हो रहे हैं।

कम से कम पिछड़े, दलितों और आदिवासियों के सचेत हिस्से को इसका गहरा अहसास हो रहा। इन समूहों का यह सचेत हिस्सा यह समझ गया है कि प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व के नाम पर उन्हें आरएसएस-भाजपा और नरेंद्र मोदी ने धोखा दिया है। इन समूहों की इस समझ का तेजी से फैलाव और विस्तार हो रहा है।

कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां और बहुजनों की पार्टियां खुद को पिछड़े, दलितों और आदिवासियों से जोड़ने के लिए कार्य कर रही हैं। पिछले दिनों कांग्रेस, वामपंथी पार्टियों और बहुजन पार्टियों द्वारा उठाए गए कदम इसकी पुष्टि करते हैं। भारतीय समाज, विशेषकर हिंदी पट्टी में तेजी से इस चेतना का विस्तार हो रहा है कि आरएसएस और भाजपा सिर्फ और सिर्फ कार्पोरेट घरानों और अपरकॉस्ट के हितों की पूर्ति कर रही हैं।

आरएसएस-भाजपा को भी यह अच्छी तरह पता है कि प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व और मुसलमानों के प्रति घृणा के आधार पर ज्यादा दिनों तक वंचित जातियों को बरगलाया नहीं जा सकता है। ऐसी स्थिति में खुद को जातिगत भेदभाव के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही हैं और उन राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को टारगेट करने का निर्णय लिया है, जो आरएसएस-भाजपा को कार्पोरेट और अपरकॉस्ट की पार्टी के रूप में चिन्हित करते हैं और असली चरित्र को उजागर करते हैं।

आरएसए-भाजपा के यह डर सता रहा है कि यदि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के बड़े हिस्से में यह बात फैल जाती है कि भाजपा इन समूहों की सबसे बड़ी दुश्मन हैं, तो 2024 को चुनावों में हार का सामना करना पड़ सकता है। 2024 में यदि भाजपा हार जाती है, तो सिर्फ यह एक चुनावी हार नहीं होगी। यह हार उसके हिंदू राष्ट्र निर्माण की परियोजना को बड़ा धक्का होगी। उसके हिंदू राष्ट्र निर्माण की चाहत को हमेशा-हमेशा के लिए डस्टबिन में डाल सकती है।

अपने गठन (1925) के सौ साल (2025) पूरे होने पर आरएसएस हिंदू राष्ट्र के अपने स्वप्न को पूरा होते देखना चाहता है। 2024 में भाजपा की पराजय उसके इस स्वप्न को हमेशा के हमेशा के लिए दफ्न कर सकता है। आरएसएस ने अपने शीर्ष निकाय अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में यह ठीक ही चिन्हित किया है कि हिंदू एकता या संयुक्त हिंदू समाज की सबसे बड़ी फॉल्ट लाइन जाति है। यह फॉल्ट लाइन उसके हिंदू एकता को तोड़ सकती है। यदि यह टूटता है, तो 2024 में नरेंद्र मोदी की पराजय निश्चित है। इसलिए यह उसके लिए चिंता का सबसे बड़ा विषय है। जिसकी अभिव्यक्ति आरएसएस के शीर्ष निकाय अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक हुई।

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