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प्रशासनिक अक्षमता से भरा हुआ है सप्तपदी ब्रांड लॉक डाउन

मुंबई मे हज़ारों मज़दूर लॉक डाउन तोड़ कर सड़कों पर आ गए हैं और सारी सोशल डिस्टेंसिंग और फिजिकल डिस्टेंसिंग, की बातें धरी की धरी रह गयीं। इक्कीस दिनी लॉक डाउन के बाद यह प्रवासी कामगारों का तीसरा बड़ा लॉक डाउन उल्लंघन है। पहले दिल्ली, फिर सूरत और अब मुम्बई में प्रवासी कामगारों की भीड़ सड़कों पर अपने-अपने घर जाने के लिये उमड़ कर आ गयी है। लॉक डाउन करने के पहले ऐसी समस्या भी हो सकती है इस पर शायद किसी ने सोचा भी नहीं था। ऐसे लॉक डाउन का कोई अर्थ नहीं और न ही ऐसी फिजिकल डिस्टेंसिंग का कोई मतलब।

खबर है मुंबई पुलिस ने 1000 लोगों के खिलाफ मुक़दमे दर्ज किये हैं और सड़कों पर आने का आह्वान करने वाले विनय दुबे नामक एक यूट्यूब ब्लॉगर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है जिसने एक वीडियो संदेश द्वारा लोगों विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी कामगारों जिन्हें मुंबई में उत्तर भारतीय कहा जाता है को घर यानी अपने गांव जाने के लिये खुल कर सड़क पर उतरने का आह्वान किया था। इस वीडियो संदेश के वायरल होने से लोग सड़कों पर निकल आये और जब लम्बे समय तक कोई कहीं बिना काम धाम और रुपये पैसे से फंसा हो तो, लोगों का किसी भी अफवाह या आह्वान पर निकल पड़ना स्वाभाविक है। यही दिल्ली में हुआ, यही सूरत में हुआ और अब यही मुंबई में भी हुआ।

विनय दुबे, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे नेता,  राज ठाकरे के करीबी समझे जाते हैं, और वह विधानसभा का एक चुनाव भी लड़ चुके हैं, हालांकि उसमें उनकी ज़मानत तक ज़ब्त हो चुकी है। मुंबई में उत्तर भारतीयों के नाम के कल्याण के लिये इनका एक एनजीओ भी कार्यरत है। यह भी खबर है कि, इन्होंने 15 अप्रैल को रेलवे स्टेशन से 50 बसें उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में ले जाने की बात कह कर प्रवासी कामगारों को इकट्ठा तो किया पर न तो वहां बसें थीं और न ही उनके परमिट। कुछ लोग विनय दुबे के इस बेमतलब और गैर जिम्मेदारी भरे आह्वान के पीछे महाराष्ट्र सरकार को अस्थिर करने की राजनीति से जोड़ कर देख रहे हैं, पर यह अभी एक संभावना है कोई स्पष्ट तथ्य नहीं है। फिर भी इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों को इकट्ठा करने और उन्हें उत्तेजित कर के कानून व्यवस्था को भंग करने का जो अपराध बनता है उसके लिये विनय दुबे दोषी तो हैं ही। यह तो लॉक डाउन के इस घोर संकट में, गरीबों और अभावों के बीच प्रतिबंध के एक-एक दिन काट रहे प्रवासी कामगारों की भावनाओं से एक निंदनीय खिलवाड़ भी है।

अब सवाल उठता है कि, प्रवासी मज़दूरों की मुंबई के बांद्रा में हुई भीड़, क्या सरकार की प्रशासनिक अक्षमता नहीं है ?

इसके उत्तर के लिये मैं एक क्रोनोलॉजी दे रहा हूँ जिसे आप देखें।

● जब इक्कीस दिनी लॉक डाउन हुआ था तो यह कहा गया था कि यह इक्कीस दिन तक चलेगा और यह ज़रूरी है। जनता ने इसे मान लिया। रेलों का आवागमन बंद था और लोगों को लगा कि यह 14 या 15 अप्रैल तक बंद रहेगा। रेलवे ने 14 अप्रैल तक संचालन बंदी की घोषणा भी की।

● ए मल्लेश्वर राव जो साउथ सेंट्रल रेलवे के डिप्टी चीफ कॉमर्शियल मैनेजर हैं ने एक पत्र दिनांक, 13 अप्रैल 2020 को जारी किया जिसमें उन्होंने यह कहा कि 13 अप्रैल 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के बाद यह तय हुआ है कि प्रवासी कामगारों को उनके घर पहुंचाने के लिये जनसाधारण ट्रेन जिसमें अनारक्षित कोच होते हैं चलाई जाएगी।

● चूंकि ट्रेनों का संचालन लॉक डाउन की अवधि जो 14 अप्रैल तक थी, तक बंद था अतः 13 अप्रैल को इसकी तैयारी कि ट्रेन चला कर फंसे हुए प्रवासी कामगारों को मुंबई से निकाल कर उनके घरों तक पहुंचा दिया जाए, रेलवे ने शुरू कर दी।

● रेलवे मंत्रालय ने 15 अप्रैल से संभावित ट्रेन परिचालन के मद्देनजर कोरोना वायरस संबंधी प्रोटोकॉल तैयार किए, जिसके अनुसार,

◆ रेल यात्री को एयरपोर्ट की तर्ज पर ट्रेन छूटने से 4 घंटे पहले स्टेशन आना होगा। ◆ रेलवे स्टेशन पर हर यात्री की थर्मल स्क्रीनिंग होगी।

◆ रेलवे स्टेशन पर केवल आरक्षित टिकट वाले यात्री को प्रवेश करने की अनुमति होगी।

◆ इस दौरान प्लेटफार्म टिकट की बिक्री नहीं होगी।

◆ रेलवे सिर्फ नॉन एसी ट्रेन (स्लीपर श्रेणी) चलाएगा।

◆ ट्रेनों में एसी श्रेणी कोच नहीं होंगे।

◆ यात्रा से 12 घंटे पहले यात्री को अपनी सेहत की जानकारी रेलवे को देना अनिवार्य होगा।

◆ कोरोना संक्रमण के लक्षण पाए जाने पर रेल यात्री को बीच सफर में ट्रेन से जबरिया उतार दिया जाएगा।

◆ यात्री को 100 फीसदी रिफंड वापस दिया जाएगा।

◆ रेलवे वरिष्ठ नागरिकों को सफर नहीं करने का सुझाव भी देगी।

◆ कोरोना पर गठित मंत्रियों के समूह के निर्देश-सुझाव के अनुसार उक्त प्रोटोकॉल को यथावत अथवा बदलाव के साथ लागू किए जाएंगे।

● रेलवे ने बताया कि उत्तर भारत में 307 ट्रेन चलाने की योजना है। इसमें से एडवांस बुकिंग के चलते 133 ट्रेन में सीटें फुल होने के कारण लंबी वेटिंग चल रही हैं। वेटिंग टिकट को रद्द किया जाएगा।

● 14 अप्रैल को पीएम सार्वजनिक रूप से टीवी पर आकर इस लॉक डाउन की घोषणा करेंगे, इस बात का अंदाज़ा सबको तो था पर रेलवे को यह अंदाजा क्यों नहीं लग पाया?

● क्या लॉक डाउन बढ़ेगा ही ऐसी कोई भी अधिकृत सूचना रेलवे या अन्य सरकारी विभाग को नहीं थी ?

● भले ही इसकी घोषणा पीएम टीवी पर करते लेकिन सभी संबंधित विभागों और राज्य सरकारों को इसकी जानकारी दे दी जानी चाहिए थी लेकिन जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि सरकार में ही आपसी समन्वय की कमी है जो हर बड़े और महत्वपूर्ण निर्णय के समय उधड़ जाती है।

● रेलवे के 13 अप्रैल 2020 के उक्त पत्र के आधार पर ब्रेकिंग न्यूज़ सिन्ड्रोम से पीड़ित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एबीपी मराठी चैनल ने एक ट्वीट किया और 14 अप्रैल को सुबह यह खबर प्रसारित कर दी कि आज ट्रेनें चल सकती हैं। लेकिन एक प्रश्नवाचक चिह्न भी लगा दिया।

● टीवी को भी यह खबर पूरे खुलासे के साथ बतानी चाहिए थी कि ट्रेन चलने की तैयारी हो रही है और अभी टाइम टेबल तय नहीं है। क्योंकि 13 मार्च के पत्र में ट्रेन के संचालन की बात तो लिखी गयी है पर कोई समय नहीं दिया गया है।

● लेकिन तैयारी हो रही थी और टिकट 14 अप्रैल से बुक हो रहे थे। इसलिए यह सवाल उठता है कि, जब ट्रेनों के संचालन की कोई समय सारिणी ही तय नहीं थी और 14 अप्रैल से ट्रेनों का आवागमन शुरू होना ही नहीं था तो आईआरसीटीसी ने क्यों टिकटों की बुकिंग शुरू कर दी ?

● रेलवे को यह पता नहीं था क्या कि लॉक डाउन आगे बढ़ेगा, जबकि महाराष्ट्र सहित कुछ राज्यों ने लॉक डाउन की अवधि को 30 अप्रैल तक बढ़ा दिया था।

● एक खबर यह भी है कि रेलवे ने 40 लाख टिकट प्रधानमंत्री के भाषण के बाद रद्द किए। दूसरे, यात्रियों को आज 4 घंटे पहले स्टेशन बुलाया गया था। फिर, एबीपी मराठी न्यूज़ चैनल ने मुंबई में, क्यों आज सुबह यह खबर प्रसारित कर दी कि ट्रेनें चलेंगी ?

● ऐसी ही स्थिति सूरत में भी हुयी जहां तीन दिन प्रवासी कामगारों के सड़क पर निकल आने के बाद पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। क्या दुबारा लॉक डाउन करने के पहले इस समस्या पर सोचा नहीं गया था ?

● राज्य सरकारों की तो बात छोड़ दीजिए लॉक डाउन के बढ़ने के पहले तो लगता है रेल मंत्री को भी विश्वास में नहीं लिया गया था ।

● मुम्बई  के एक प्रमुख मराठी समाचार चैनल द्वारा यह खबर प्रसारित होते ही यह अफवाह फैल गयी कि ट्रेन संचालन फिर से शुरू होने वाला है जिसके कारण प्रवासी कामगारों का बहुत बड़ा समूह बांद्रा स्टेशन पर पहुंच गया।

● और जब यह सब हो गया तो इसको साम्प्रदायिक रंग देने के लिये आईटीसेल सक्रिय हुआ और अफवाफ़बाजी का दौर शुरू हुआ।

इसके बाद जब यह अव्यवस्था फैल गयी और देशभर में मीडिया और सोशल मीडिया पर खबरें चलने लगीं तो सबकी उंगली रेलवे के उसी निर्णय और एबीपी मराठी न्यूज चैनल की ओर उठने लगी। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री आदित्य ठाकरे और वहां के गृहमंत्री ने भी इस दुर्व्यवस्था के लिये रेलवे और एबीपी मराठी चैनल को दोषी ठहराया। जब इस बदइंतजामी का जिम्मेदार केंद्र सरकार को ठहराया जाने लगा तो सरकार समर्थक मीडिया और बीजेपी आईटी सेल ने बांद्रा स्टेशन पर एक मस्जिद ढूंढ ली और फिर राग तकसीम ( विभाजनकारी ) की शुरुआत हो गयी।

रात में ही रजत शर्मा और कपिल मिश्र के ट्वीट आ गए औऱ वे इसमे साज़िश ढूंढने लगे। साज़िश विनय दुबे के वीडियो ब्लॉग की हो या रेलवे और एबीपी मराठी न्यूज चैनल द्वारा फैलाये गए भ्रम की, यह तो मुंबई पुलिस जांच के बाद खुद ही बता देगी लेकिन बीजेपी आईटीसेल और गोदी मीडिया ने तुरन्त इस पूरे मामले को हिंदू मुस्लिम का साम्प्रदायिक रंग देना शुरू कर दिया। सरकार को श्मशान और कब्रिस्तान सूट भी तो बहुत करता है।

अब रजत शर्मा का यह ट्वीट पढ़िये,

” बांद्रा में जामा मस्जिद के बाहर इतनी बड़ी संख्या में लोगों का इकट्ठा होना चिंता की बात है। इन्हें किसने बुलाया? अगर ये लोग घर वापस जाने के लिए ट्रेन पकड़ने के लिए आए थे तो उनके हाथों में सामान क्यों नहीं था ? “

यह ट्वीट 14 अप्रैल की रात 8 बज कर 06 मिनट का है। रजत को बांद्रा स्टेशन नहीं दिखा पर मस्जिद ज़रूर दिख गयी। स्टेशन के पास ही यह मस्जिद है और जो भीड़ है वह इतनी अधिक थी कि मस्ज़िद तक फैल गयी ।

अब कपिल मिश्र का यह ट्वीट देखें जो बीजेपी आईटी सेल के ही मॉडल पर है और यह फेसबुक,व्हाट्सएप्प, औऱ ट्विटर द्वारा खूब फैलाया गया। ट्वीट इस प्रकार है,

” तीन बड़े कड़वे सवाल –

1. अगर घर जाने वाले मजदूरों की भीड़ तो इनमें से किसी के भी पास बड़े बैग, थैले, समान क्यूं नहीं?

2. भीड़ जामा मस्जिद के सामने क्यूँ?

3. महाराष्ट्र में 30 अप्रैल तक का लॉकडाउन पहले से ही घोषित था तो आज हंगामा क्यूं?

ये साजिश है।”

लेकिन इस साजिश की जांच की बात कपिल मिश्रा कभी नहीं करेंगे। क्योंकि उन्हें भी इसकी वास्तविकता ज्ञात है। पर क्या करें वे अपने पोलिटिकल एजेंडे को कैसे छोड़ दें !

दरअसल, नोटबन्दी हो या जीएसटी या इक्कीस दिनी लॉकडाउन, या यह सप्तपदी ब्रांड लॉक डाउन इन सबके पीछे सरकार की गंभीर प्रशासनिक अक्षमता है। प्रधानमंत्री जी खुद ही घोषणा करना चाहते हैं। इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। वे अधिक से अधिक हमसे रूबरू होना चाहें तो ज़रुर हों पर सरकार का कोई निर्णय लेने के पहले उसके क्रियान्वयन में क्या क्या समस्याएं आ सकती हैं इसका निदान भी सोचना और उसका समाधान करना यह भी सरकार का ही काम है। अगर रेलवे ने अपने 13 अप्रैल के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के फैसले के आधार पर तैयारियां शुरू न की होतीं, आईआरसीटीसी ने 14 अप्रैल की रेल टिकटें बुक न की होतीं, मीडिया ने आधी अधूरी सूचना न फैलाई होती तो विनय दुबे के वीडियो सन्देश का भी बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ा होता। लेकिन तीनों ही बातों ने, जो बिल्कुल ही बिना किसी आधार के थीं एक साथ मिल कर जिस अफवाह के मायाजाल को रच दिया उससे यह अराजकता फैल गयी और भक्त मीडिया तथा आईटी सेल ने इससे मोदी सरकार को बचाने के लिये जब अपने चिर परिचित हिंदू मुस्लिम के विभाजन कारी मुद्दे पर चलने लगा तो सीन ही दूसरा दिखने लगा।

झूठ का कुहाँसा छटता ही है। माया और छल का आसुरी युद्ध पराजित ही होता है। सुबह तक सारा अंधकार तिरोहित भी हो गया। लोगों को सूरज साफ दिखने भी लगा। पर यह निष्कर्ष और पुख्ता हुआ कि मोदी सरकार प्रशासनिक रूप से न केवल अक्षम है बल्कि किसी भी आपात समस्या में किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाने के लिये अभिशप्त भी है। सरकार से भी एक अनुरोध है कि सरकार चलाना तो सीखिये सरकार ! मिथ्या वाचन, दुष्प्रचार, हवाई वादे और हवा बाजी से सरकार तो बनाई जा सकती है पर सरकार चलाई नहीं जा सकती है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

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This post was last modified on April 15, 2020 3:30 pm

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