Thursday, December 2, 2021

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न्यायाधीशों को राजाओं की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय ने हाईकोर्ट को हिदायत दी है कि राजाओं जैसा व्यवहार न करें। बार-बार अफसरों को तलब करना जनहित के खिलाफ है। इससे जरूरी कामों में देरी हो सकती है। उच्च न्यायालयों द्वारा लगातार सरकारी अफसरों को तलब करने को सुप्रीम कोर्ट ने गलत ठहराया है। अदालत ने कहा, “जजों को भी उनकी सीमा पता होनी चाहिए। उनमें विनम्रता होनी चाहिए। इससे कई जरूरी कामों में देरी हो सकती है”।

जस्टिस संजय किशन कौल और हेमंत गुप्ता की पीठ  ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य सचिव को पेश होने के नोटिस को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा, कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा अफसरों को बार-बार तलब करने की परंपरा को सही नहीं ठहरा सकते। अफसरों को तलब करना और उन पर अपनी इच्छा अनुरूप आदेश पारित करवाने का प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव डालना सही नहीं है। यह एक तरह से न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के बंटवारे की सीमा का उल्लंघन है।

सरकारी अधिकारी प्रशासन के हित में फैसला लेने के लिए बाध्य हैं। अधिकारियों के जो फैसले न्यायिक समीक्षा में खरे न हों उन्हें खारिज करने के अधिकार हमेशा न्यायालय के पास हैं। लेकिन अफसरों को बार-बार तलब करने की सराहना नहीं की जा सकती।

पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर विचार करते हुए कहा कि जैसा कि उसे ज्ञात हुआ है हाईकोर्ट ने मेडिकल हेल्थ सचिव को कोर्ट में तलब किया था। [इस मामले में, रिट याचिकाकर्ता ने उसे स्थानांतरित किये जाने के आदेश को चुनौती दी थी] पीठ  ने कहा कि  कुछ हाईकोर्ट में अधिकारियों को अविलंब तलब करने और प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से दबाव बनाने का चलन विकसित हो गया है। अधिकारियों को तलब करके न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण की रेखा पार करने को कहा जाता है और उन्हें कोर्ट की इच्छा के हिसाब से आदेश जारी करने के लिए दबाव बनाया जाता है।

पीठ ने कहा कि कार्यपालिका के सरकारी अधिकारी भी शासन के तीसरे अंग के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। अधिकारियों द्वारा की गयी कार्रवाई या फैसले उनके फायदे के लिए नहीं होते हैं, बल्कि सरकारी कोष के रक्षक के तौर पर और प्रशासन के हित में कुछ फैसले लेने ही होते हैं। हाईकोर्ट के लिए यह रास्ता हमेशा खुला है कि वह न्यायिक समीक्षा में खरे नहीं उतरने वाले फैसलों को निरस्त कर दें, लेकिन अधिकारियों को बार-बार तलब किया जाना किसी भी प्रकार से सराहनीय कदम नहीं है। इसकी निंदा कड़े शब्दों में की जाने योग्य है।

पीठ ने ‘अरावली गोल्फ क्लब एवं अन्य बनाम चंदर हास’ मामले में डिविजनल मैनेजर के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायाधीशों को अपनी सीमा जाननी चाहिए। उनमें शील और शालीनता होनी चाहिए और उन्हें शासकों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी के काम का अपना व्यापक क्षेत्र है। सरकार के इन तीनों अंगों में से किसी के लिए भी यह उचित नहीं है कि वह दूसरे के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश करे, अन्यथा संविधान का नाजुक संतुलन बिगड़ जायेगा और इसकी एक प्रतिक्रिया होगी।

पीठ ने यह भी कहा कि अधिकारियों को तलब करना जनहित के खिलाफ है, क्योंकि उनको सौंपे गये महत्वपूर्ण कार्यों में देरी हो जाती है, जिससे उस अधिकारी पर अतिरिक्त् बोझ आता है अथवा उनके मंतव्य के इंतजार में फैसले में देरी होती है। हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए पीठ ने कहा  कि  हमारा मानना है कि एक बार फिर यह स्पष्ट करने का समय आ गया है कि सरकारी अधिकारियों को अनावश्यक तौर पर कोर्ट में नहीं बुलाया जाना चाहिए। यदि अधिकारी को कोर्ट में बुलाया जाता है तो उससे कोर्ट की गरिमा या महिमा नहीं बढ़ती। कोर्ट का सम्मान हासिल किया जाता है न कि मांगा जाता है और सरकारी अधिकारियों को बुलाकर इसमें वृद्धि नहीं होती। सरकारी अधिकारी की मौजूदगी अन्य आधिकारिक कार्यों की कीमत पर होती है, जिन पर उनके ध्यान की जरूरत होती है। कभी-कभी अधिकारियों को लंबी दूरी की यात्रा करनी होती है। इसलिए अधिकारी को तलब करना जनहित के खिलाफ होता है, क्योंकि इससे उन्हें सौंपे गये अनेक महत्वपूर्ण कार्यों में देरी होती है, जिससे उस अधिकारी पर अतिरिक्त काम का बोझ बढ़ता है या उनके मंतव्य के इंतजार में फैसले में देरी होती है।

पीठ ने कहा कि कोर्ट की कार्यवाही में भी समय लगता है, क्योंकि आजकल अदालतों में निश्चित समय पर सुनवाई का कोई तंत्र नहीं है। यदि कोर्ट के समक्ष कोई मुद्दा विचार के लिए आता है और सरकार की ओर से पेश हो रहा वकील जवाब देने में सक्षम नहीं होता है, तो इस तरह के संदेह को आदेश में लिखने और सरकार या उसके अधिकारियों को जवाब देने के लिए समय देने की सलाह दी जाती है।

इसी पीठ ने अवमानना के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जारी समन आदेश के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका पर अप्रैल 2021 में जारी एक आदेश में कहा था कि कोर्ट द्वारा उच्चाधिकारियों को बार-बार, अचानक और चिंताकुल समनिंग की सराहना नहीं की जा सकती है। वर्ष 2019 में जारी एक अन्य आदेश में भी इसी पीठ  ने इस तरह की टिप्पणी की थी। 

हाल ही में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अग्रिम जमानत मामले में झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया था जिसमें आपराधिक न्यायिक प्रणाली की बेहतरी के लिए सरकारी अधिकारियों की व्यक्तिगत मौजूदगी की मांग की गयी थी। 

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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