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कोरोना के संक्रामक आतंक को जरा ‘जूम’ करके देखें

आज ऐसे तथ्यों की कमी नहीं है, जो बताते हैं कि कोविड 19 से कई गुणा विनाशकारी इससे उपजे आतंक का संक्रमण है। विभिन्न शोधों के अनुसार कोरोना की मृत्यु दर नगण्य है। इसके अधिकांश मरीज स्वयं ठीक हो जाते हैं। बहुत कम को ही अस्पताल की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन सरकारें  भय और आतंक के संक्रमण को कम करने की बजाय बढ़ाती जा रही हैं।

मानव जाति के कीमती आयु-समूह (बच्चे, किशोर, युवा पुरूष और युवा स्त्रियां) को कोविड से सबसे कम खतरा है। इस आयु समूह को प्राय: यह बीमारी नहीं होती। अगर होती भी है तो मृत्यु की संभावना बहुत कम है।

अधिकांश मामलों में मनुष्य की जीवन-प्रत्याशा (Life expectancy) और कोविड से मरने वाले लोगों की औसत आयु में समानता है। मसलन, सबसे अधिक प्रभावित देशों को देखें। इटली में औसत जीवन-प्रत्याशा 83 वर्ष की होती है, स्पेन 83 वर्ष, अमेरिका की 79, जर्मनी में 78, फ्रांस में 77,  ईरान में 72 जबकि भारत में यह 69 वर्ष है। इन सभी देशों के आंकड़े बताते हैं कि मृत्यु का अधिक खतरा औसत जीवन-प्रत्याशा पूरा कर चुके लोगों को है। बुजुर्ग हमारे समाज के बहुत महत्वपूर्ण अंग हैं। उनके अनुभवों से ही दुनिया आगे बढ़ती रही है लेकिन कोविड से संघर्ष मृत्यु मात्र को जीत लेने का संघर्ष तो नहीं ही है, न ही इसे होना चाहिए।

ऐसा भी नहीं है कि कोविड से पीड़ित होने वाले व्यक्ति को मर्मांतक पीड़ा सहनी होती है, जैसा कि कैंसर की कीमोथेरेपी, पथरी, सिस्टीसरकोसिस (फीता क्रीमी के संक्रमण से होने वाली बीमारी), चिकनगुनिया, कालाजार, आदि में होती है।

कोरोना के संक्रमण की दर (Basic reproduction rate) अलग-अलग शोधों के अनुसार, 1.4 लेकर 5 तक है। यानी, कोरोना का शिकार एक व्यक्ति अधिकतम 1.4 से लेकर 5  व्यक्ति को यह संक्रमण दे सकता है। यह बहुत कम तो नहीं, लेकिन अन्य बीमारियों की तुलना में बहुत ज्यादा भी नहीं है। छोटी माता (Chickenpox)  की संक्रमण-दर 10-12, बड़ी माता  गलसुआ  (कनफेड़) का 10-12, खसरा की 12-18, टीबी की 9-10, पोलियो की 5-7, काली खांसी की 5.5, डेंगू की 3, मलेरिया की 60 -70 (मच्छर के माध्यम से) तथा जुकाम की 2-3 होती है।

यह सोचना कतई अतिश्योक्ति नहीं है कि दुनिया पर मौत के साये की तरह निरंतर मंडराती इन बीमारियों का वास्तविक समय (रीयल-टाइम) में आंकड़ा जमा कर प्रसारित किया जाए, जैसा कि आज कोविड के मामले में किया जा रहा है, तो दृश्य इससे बहुत अधिक अलग नहीं होगा। लेकिन इससे पैदा हुए भय का कारोबार तीन कारणों से नहीं हो सकेगा। एक तो यह कि इन दवाओं की वैक्सीन नहीं बन सकती, दूसरे कि इनके बारे में यह कह कर भयादोहन नहीं किया जा सकेगा कि ये लाइलाज हैं। सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि इनमें से अधिकांश बीमारियों से मृत्यु को प्राप्त होने वाले न सिर्फ कम उम्र के हैं, बल्कि अधिकांश गरीब और तीसरी दुनिया के देशों के हैं। ये सभी चीजें उन्हें दुनिया के नीति निर्धारण में गैर- महत्वपूर्ण बनाती है।

कोराना को लेकर यह खेल क्यों और कैसे शुरू हुआ है और कैसे चल रहा है, वह एक अलग अनुसंधान का विषय है।

लेकिन इसका यह आशय कतई नहीं है कि कोविड को हल्के में लिया जाना चाहिए। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि इससे पैदा हो रहा भय वास्तविक समस्या की तुलना में अनुपातहीन है। यह अनुपातहीन भय दुनिया भर में हजारों लोगों की आत्महत्या, हजारों लोगों की भूख और बदहाली से मौत, हजारों अन्य बीमारियों से पीड़ित लोगों की असमय मौत का कारण बन चुका है और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले तीन से पांच सालों में इस भय के कारण बनी सामाजिक-आर्थिक वैश्विक स्थितियों के चलते करोडों लोग मारे जाएंगे।

लॉकडाउन से होने वाली मौतों और डिजिटल तानाशाही के खतरे के बारे में  मैंने अन्यत्र अपने लेखों में लिखा है।

आज हम तकनीक के व्यापार-जगत की छोटी सी लगने वाली एक घटना को देखें। शिक्षा-जगत से जुड़े लोग विशेष कर इस घटना से परिचित होंगे।

जूम और टीम की कहानी

आप लोगों ने “जूम” नाम वाले वीडियो कॉलिंग एप से संबंधित विवाद देखा होगा। इसके मालिक और अन्वेषक चीन के एक मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुए एरिक युआन हैं। कंपनी अमेरिका में रजिस्टर्ड है।

यूआन ने जूम का सॉफ्टवेयर वर्ष 2013 में लांच किया था। अपने सरल इंटरफेस और 40 मिनट की मुफ्त कॉलिंग के कारण यह दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हुआ। यहां तक कि माइक्रॉसाफ्ट, (बिल गेट्स जिसके पूर्व स्वामी हैं) और गूगल के समतुल्य एप भी इसके सामने पानी भरने लगे। महज चार सालों में जूम की एक बिलियन डॉलर की कंपनी बन गई। सामूहिक वीडियो कॉल की सुविधा के कारण इस एप को सबसे अधिक शिक्षा संस्थानों और वीडियो-मीटिंग करने वाली संस्थाओं ने अपनाया। यह एक बहुत सफल बिजनेस मॉडल था क्योंकि मुफ्त उपयोग के बाद संस्थाएं आमतौर पर अधिक फीचरों के लिए उसका पेड वर्जन खरीद लेती थीं। वर्ष 2018 में यह दुनिया की 200 प्रमुख विश्वविद्यालयों में से 180 को अपनी सेवाएं दे रही थी। इसके अतिरिक्त 6900 अन्य शिक्षण संस्थान 7 लाख बिजनेस-हाऊस इसके ग्राहक थे।

जूम की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए माइक्रोसाफ्ट ने इसे खरीदने के लिए एडी-चोटी एक कर दी थी। माइक्रोसॉफ्ट की ओर से एरिक युआन को अनेक बार जूम को बेच देने का प्रस्ताव दिया गया, जिसे उन्होंने बार-बार ठुकराया। जूम की लोकप्रियता का आलम यह था कि वर्ष 2019 में यह 16 बिलियन डॉलर की कंपनी बन गई। अप्रैल, 2019 में वॉल स्ट्रीट में इसके शेयर अपने आईपीओ मूल्य से लगभग 75 प्रतिशत ऊंचे मूल्य पर बिक रहे थे।

इस साल फरवरी में जब दुनिया पर लॉकडाउन का कहर बरपा तो जो व्यापार सबसे अधिक चमका वह वीडियो कॉलिंग का ही था। स्वाभाविक तौर पर जूम ने इसमें बाजी मारी। उसका कारोबार अप्रत्याशित रूप से बढ़ा। लॉकडाउन झेल रहे गरीब और विकासशील देशों के मध्यवर्ग से जुड़े विभिन्न व्यवसायिक और शैक्षणिक संस्थानों ने इसे तेजी से अपनाना शुरू कर दिया। जूम की पूंजी छलांग लगाकर 35 बिलियन डॉलर पर पहुंच गई। लेकिन अचानक दुनिया भर में खबरें प्रसारित की जाने लगीं कि जूम का उपयोग ‘सुरक्षित’ नहीं है। अनेक रहस्यमयी संस्थाएं जूम का उपयोग न करने की सलाहें जारी करने लगीं, जिसे तीसरी दुनिया के देशों में कार्यरत न्यूज-ऐजेंसियों के माध्यम से अखबाराें और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को भेजा जाने लगा।

नतीजा वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी। भारत समेत तीसरी दुनिया के अनेक देशों में लॉकाडाउन के दौरान बढ़ रही जूम की जड़ें उखड़ गईं। इसका सीधा फायदा माइक्रोसाफ्ट के “टीम” नामक वीडियो कॉलिंग एप को हुआ। इन दिनों माइक्रोसाफ्ट के सेल्स-एग्जीक्यूविट बड़े पैमाने पर सरकारों और निजी संस्थानों को खरीद के लिए लुभाने वाले प्रस्ताव देने में जुटे हैं।

बहरहाल, आखिर विश्व की 180 टॉप यूनवर्सिटियों को, उनके विज्ञान व तकनीक संबंधी विभागों, हजारों प्रमुख आईटी कंपनियों को सेवाएं दे रहा जूम अचानक “असुरक्षित” किन कारणों से घोषित कर दिया गया? और वह भी सिर्फ विकासशील और गरीब देशों में, जहां के बाजार में इन तकनीकों के लिए अपूर्व संभावनाएं हैं। दूसरी ओर, यूरोप और अमेरिका में विश्व के प्रमुख विश्वविद्यालय और हजारों अन्य संस्थान अब भी निश्चिंत भाव से जूम के माध्यम से ही मीटिंग कर रहे हैं। वे इस व्यापार-युद्ध को समझते हैं।

वास्तविकता यह है कि कथित तौर जूम जितना असुरक्षित है, उतना ही असुरक्षित माइक्रॉसाफ्ट का “टीम” भी है। प्रतिष्ठित पत्रिका फ़ोर्ब्स ने 27 अप्रैल, 2020 को प्रकाशित अपनी -“आपकी पूरी कंपनी का माइक्रोसॉफ्ट टीम डाल एक दुष्ट जीआईएफ से उड़ाया जा सकता है- शीर्षक रिपोर्ट में बताया है कि किस प्रकार सिर्फ जूम ही नहीं, बल्कि टीम व अन्य सभी सामूहिक वीडियो कॉलिंग एप में सुरक्षा संबंधी गड़बड़ियां हैं। फोर्ब्स ने अपनी  रिपोर्ट में दुनिया की प्रमुख साइबर सुरक्षा कंपनी ‘साइबर अर्क” के हवाले से बताया कि “टीम” पर अटैक करने वाला हैकर आपके संगठन के सभी डेटा तक पहुंच सकता है, टीम खातों, गोपनीय जानकारी, पासवर्ड, निजी जानकारी, आपकी व्यवसायिक योजनाएं, सब कुछ चुरा सकता है।

बाद में जूम और टीम, दोनों ने उन कथित गड़बड़ियों को दूर कर लेने का दावा किया।

लेकिन टीम के असुरक्षित होने के बारे में ये तथ्य भारत समेत तकनीक की दुनिया के बड़े और संभावनाशील बाजारों तक नहीं पहुंचे। आखिर क्यों और कैसे यह संभव हुआ? इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय माइक्रोसॉफ्ट भारत की सभी बड़ी यूनिवर्सिटियों, राष्ट्रीय महत्व के बड़े संस्थानों, मंत्रालयों और विभागों से लगातार संपर्क कर रहा है, उन्हें “टीम” चलाने की मुफ्त ट्रेनिंग दे रहा है और खरीद के बड़े आर्डरों को सुनिश्चित कर रहा है। जबकि जूम तीसरी दुनिया के देशों से लगभग बाहर हो चुका है।

एकलव्य एरिक युआन और द्रोणाचार्य

जूम के संस्थापक एरिक युआन के बारे में एक और बात यहां जानना शायद आपको रोचक लगे। नए अरबपतियों में शुमार युवा युआन का आज अमेरिका के तकनीक-जगत में काफी सम्मान है। उन्होंने अपने ग्रेजुएशन की पढ़ाई जापान से की थी। वहीं एक बार एक समारोह में बोलने के लिए बिल गेट्स आए थे। गेट्स ने वहां इंटरनेट की संभावनाओं पर भाषण दिया।

20 वर्षीय युआन उस दिन गेट्स से बहुत प्रभावित हुए थे और उन्होंने उसी समय अमेरिका में जाकर वहां सिलिकॉन वैली में हो रही तकनीकी क्रांति में हिस्सा लेने का फैसला किया था। अंग्रेजी नहीं बोल पाने वाले मध्यवर्गीय युआन के लिए यह राह कितनी कठिन रही होगी, इसका अनुमान इस तरह से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने अमेरिका जाने की कोशिश की तो वीज़ा के लिए उनके द्वारा किया गया आवेदन आठ बार रद्द हुआ। एक बार रद्द होने पर वे दुबारा आवेदन करते, दो साल के संघर्ष के बाद नौवीं बार में उन्हें वीज़ा मिला।

भारत की शब्दावली में कहें तो बिल गेट्स उनके गुरू हैं, उनके द्रोणाचार्य!

यह देखकर खुशी होती है कि युआन अपना अंगूठा कम से कम दान में देने को तत्पर नहीं हैं!

लेकिन कोरोना की आड़ में जो कुछ चल रहा है, उस पर नजर रखना आवश्यक है। ऐसी अनेक छोटी-छोटी घटनाएं हैं, जिनकी ओर प्राय: हमारी नजर नहीं जाती। वैश्विक स्वास्थ्य बाजार के किंग पिन माने जाने बिल गेट्स इनमें से अधिकांश घटनाओं से आपको जुड़े हुए दिखाई देंगे।

और यह सिर्फ व्यापार तक ही सीमित नहीं है, राजनीति भी तेजी से इससे साठ गांठ कर रही है। जीविका अर्जित करने की आजादी, देश-देशांतर घूमने की आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी, तर्क और विश्लेषण की आजादी, सरकारें और चुनने, कथित तौर पर हमारी सुरक्षा के लिए बनी नीतियों पर सवाल उठाने की आजादी – सब कुछ दांव पर है।

(पिछले दो दशक से आलोचना व पत्रकारिता में सक्रिय प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन में रही है। रंजन इन दिनों असम विश्वविद्यालय के रवींद्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ लैग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज में प्राध्यापक हैं। ‘साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘महिषासुर : मिथक व परंपराएं’ (संपादित) और ‘शिमला-डायरी’ (संस्मरणात्मक कोलाज) उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं।)

This post was last modified on May 6, 2020 2:33 pm

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