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Monday, September 20, 2021

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इमरजेंसी संस्मरण: बैरक नंबर 10 बटा 4 सेंट्रल जेल ग्वालियर

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(एक)
बैरक नंबर 10 बटा 4 सेंट्रल जेल ग्वालियर। सबसे लम्बे समय तक -इमरजेंसी की पूरी जेल अवधि- में यही हमारा पता था। यूं जेल प्रवास कोई साढ़े तीन साल का है, मगर बैरकें, कभी-कभी जेल भी, अदल-बदल के। इत्ता समय एक ही जगह पहले या बाद के जीवन में भी कहीं-कभी नहीं रहे।
सारे 14 के 14 कामरेड (बाद में बिलासपुर जेल से ट्रान्सफर होकर भाऊ आये, भाऊ मंझे अजय मेंढ़ेकर Ajay Mendhekar , तो 15 हुए – कामरेड मोतीलाल शर्मा बेगमगंज जेल भेज दिए गए फिर 14 रह गए) ऊपर वाली बैरक के दक्षिण वाले कोने का 40 फीसद हिस्सा घेरे थे। 
कुल 6 खिड़कियां हमारे हिस्से आयी थीं : बारिशों में वे खूब बड़ी खिड़कियां याद आती हैं और भीगती रात में बीपी सोनिया जी का तलत महमूद और भाऊ का अपनी आवाज में गाना, कामरेड आदिराम और अब्दुल हमीद पेंटर का मल्हार सुनाना आज भी कानों में गूंजता है। 

इनके अलावा तीन ट्यूब लाइट्स, आठ चबूतरे और शौचालय (अटैच्ड) हमारे हिस्से में था। तब तक शौचालय का पदनाम लैट्रिन ही था, वह सभ्य होकर बाथरूम के मध्ययुगीन सम्बोधन से होते हुए वाशरूम की इलीट अवस्था को प्राप्त नहीं हुआ था। हम, शैली, भाऊ और बीपी सोनिया जी तो लगभग शौचालय के सामने ही जमीन पर थे। यही वजह है कि उस जमाने से ही हम लोगों को प्रेरित कर रहे हैं कि भैय्ये, नीचे वाले बड़े काम्प्लेक्स में जाओ- काहे यहीं ग़दर मचाये हो !! 

 हमारा कार्नर, जेल का टी कार्नर था। हम चारों खुद को दूध पीने की उम्र से ऊपर मानते थे। (हालांकि शैली 18 के भी पूरे नहीं हुये थे, हम 20 में दाखिल होने को थे।) इसलिए चारों का तीन किलो दूध, कुछ जेल के डॉक्टर भटनागर साब द्वारा लिखा दूध इकठ्ठा होकर सभी विचारों के चायखोरों की साझी थाती था। बत्ती वाला स्टोव और दो भगोनी अम्मा दे गयी थीं। तेल जुगाड़ लिया जाता था।
चायागन्तुकों को कम करने के पुष्ट इरादे से शैली ने सूखे गुलाबों का रंग बनाकर एक कोने में अंगुली से ‘एसएफआई टी कार्नर’ लिख कर सितारा बना दिया था। हालांकि उससे कोई फर्क नही पड़ा। चाय की चुस्की लेते लेते एक बार टेम्बे साब ने कहा था, at times Tea rejuvenate more than the Ideology !! पितृतुल्य आयु के टेम्बे साब पीजीवी स्कूल के प्रिंसिपल थे। आरएसएस के थे, मगर भले और समझदार इंसान थे। शतरंज में हमारे प्रतिद्वंदी और ब्रिज में पार्टनर होते थे। वी मिस हिम बैडली, इवन टुडे !!

शैली ने 2 गिलहरियाँ पाली थीं। कैदी बड़े नाराज हुए थे। कैदियों के अंधविश्वास बड़े अनोखे होते हैं। वे चींटियों को आटा या चीनी डालने या कबूतरों को दाना चुगाने को अच्छा नहीं मानते। उनको लगता है कि इससे ये प्राणी अपने उपकारकर्ता को आशीष देते हैं, दुआ करते हैं कि यह हमें रोज खिलायें। इन दुआओं से जेल के बंदियों को लगता है कि उनके छूटने में और देर हो सकती है। शैली ने उनके इसी मिथक को आधार बनाकर गिलहरियों को पाला जाना उनके लिए शुभ ठहरा दिया था। 

वैसे भी ही वाज द मोस्ट यंग एण्ड मोस्ट लव्ड पर्सन इन एंटायर जेल। न जाने कितने कैदियों के बच्चों के पुराने फोटोज से उन्होंने स्केच बनाकर दिए, जिन्हें ह्त्या और अन्य आरोपों के खतरनाक कहे जाने वाले वे सजायाफ्ता मुजरिम अपने तकिये के नीचे रखकर सोते थे। उनके कितने बच्चों के नामों से उनकी सालगिरह के गीत लिखकर दिए थे। युवा कैदियों की तरफ से उनकी पत्नियों के लिए काव्यात्मक चिट्ठियां लिखीं थीं। शैली की इस लोकप्रियता के चलते न जाने कितने लाभ हमें मिले। बॉलीवाल के एक टूर्नामेंट में तो आम कैदियों ने लड़कर उन्हें अपनी टीम में ले लिया था- उस मैच में मीसाबन्दियों की टीम हारी थी।
इमरजेंसी – आपातकाल – की यह जेल हमारी पहली जेल नहीं थी। मगर यह एक तरह से दीक्षांत समारोह था – एक ऐसी धमन भट्टी थी, जिसने हम जैसों को ढाला है। 
यही ढलाई है जो इन दिनों विदूषकों की तरह उछल रहे इतिहास कलंकियों के गिरोह के शेखचिल्लीपन से लड़ने की ताब देती है। इनकी कायरता और “चारित्रिक ऊंचाइयों” के बारे में बाद में कभी !!

वैसे भी यह दौर इस तरह के अनुभवों को साझा करने का दौर है। ब्रेख्त (फासिज्म के दौर के बड़े जर्मन साहित्यकार, कवि, नाटककार, निर्देशक, कहानीकार बर्तोल्त ब्रेख्त) कह गए हैं न; 
“क्या ज़ुल्मतों के दौर में भी 
गीत गाये जाएंगे ?
हाँ, ज़ुल्मतों के दौर के ही 
गीत गाये जाएंगे !!”
“In the dark times 
Will there also be singing? 
Yes, there will also be singing.
About the dark times.” ― Bertolt Brecht

(दो) 

इमरजेंसी की जेल में खेल-कूद सेक्युलर काम था- दल, विचार, उम्र की सीमाओं से परे और उमंग और उल्लास से सराबोर।
बालीवाल का जिक्र पिछली पोस्ट में था। मगर इसे खेलने के लिए मीसा बंदियों को जेल के मुख्य कैंपस में जाना होता था। हमारे अंगने में इसकी जगह नहीं थी। 
मगर इसका लाभ यह था कि बाकी के कैदियों से गप-शप होती थी। उन्हें फायदा यह था कि नयी बॉल समय से मिल जाती थी। कमाल के खिलाड़ी थे उनके बीच। 

इसी खेल में लगी चोट से कॉमरेड शैली की एक अंगुली – कनिष्ठा – टेढ़ी हो गयी थी। जो आखिर तक रही। हालांकि उन्होंने उसका इस्तेमाल घी निकालने के लिए कभी नहीं किया। घी और चाशनी से हम लोगों की विरक्ति बाल्यकाल से ही रही है । 
कभी कभी फॉउल या बॉल के नेट छूने, न छूने को लेकर तकरार भी होती थी। मगर रेफरी का कहा मान लेते थे। यूं भी रेफरी आमतौर से सीओ (convicted officer, सीनियर सजायाफ्ता बंदी को कहते थे। ये उस जमाने में तीन तरह के थे: पीला कुरता, नीला कुर्ता और ख़ास बनावट का सफ़ेद कुर्ता) हुआ करते थे । जेल के अंदर के असली प्रशासक !!

कभी कभार कबड्डी या दौड़ प्रतियोगिता भी कर लेते थे। तब तो ऐसे नहीं सोचा था, मगर आज अजीब लगता है कि अक्सर इस तरह के फील्ड गेम्स में भी हम लोग (कामरेड, समाजवादी, सर्वोदयी) पहले या दूसरे स्थान पर कैसे रह लिया करते थे। जबकि आरएसएस में तो इन्हें नियमित रूप से सिखाया जाता है। शायद हम लोगों की कम उम्र इसकी वजह हो या शायद वह अवसाद जो इस अनिश्चित जेल के चलते इन मित्रों पर तारी था। हालांकि हर बार टीम राजनीतिक आधार पर बनने का कोई नियम नहीं था।

ज्यादा खेले जाने वाले खेल ताश के थे। कुछ लोग चौसर भी खेलते थे। मगर कैरम, शतरंज और ब्रिज (ताश के पत्तों का एक खेल) की बाकायदा प्रतियोगितायें होती थीं। भिण्ड के श्रीनाथ गुरु, ग्वालियर के वरिष्ठ जनसंघ नेता नाथूलाल चौरसिया, पीजीवी के प्रिंसिपल टेम्बे जी और शैलेन्द्र शैली शतरंज के जेल के सबसे धुरंधर खिलाड़ी हुआ करते थे। संयोग यह बना कि एक सेमीफाइनल में उधर चौरसिया जी को हराकर शैली और इधर टेम्बे जी से जीत कर हम फाइनल में पहुंचे। बेस्ट ऑफ़ थ्री बाजी के फाइनल में क्या हुआ यह नहीं बताएँगे!! 
ब्रिज में टेम्बे जी और हमारी जोड़ी, सोनिया जी और मोघे जी (श्री राजाराम मोघे) की जोड़ी के साथ फाइनल में थी।

कोशिश तो मौलिक लेखन (कथा, कहानी, व्यंग) और विषय आधारित साप्ताहिक डिबेट की भी हुयीं। किन्तु वैचारिक संघर्ष के घमासान होने के आसार देख कर नरेश जौहरी जी, धर्मस्वरूप सक्सेना जी, सीताराम ताटके और कामरेड मोतीलाल शर्मा जैसे बड़े बुजुर्गों की सलाह पर इसे अधबीच में छोड़ना पड़ा ।
जेल में एक वालपेपर (दीवार अखबार) भी शुरू किया गया था। इसमें बीबीसी (हमारे सहित कुल मिलाकर 5 ट्रांजिस्टर्स थे कोई 350 मीसा बंदियों के बीच) की खबरों के अलावा अलग-अलग बैरकों की खबरें भी होती थीं। कुछ बैरेक्स में तो विशेष संवाददाता भी थे, जिन्हें खबर चिपक जाने के बाद कई बार अपनों की ही धमकियों का भी सामना करना पड़ा। 
सबक : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस फ्रीडम को खतरे बाहर से ही नहीं होते – अपनों से भी होते हैं ।

तीन 
इमरजेंसी की जेल में परिजनों से मुलाक़ात एक महीने में सिर्फ 2 बार हो सकती थी। उसमें भी पिता-माँ-पत्नी भर से मिलने की इजाजत थी। जिनके ये न हों, उनके बेटे-बेटियां मिल सकते थे। बहनें नहीं मिल पाती थीं। नतीजे में दो रक्षाबंधन ऐसे निकले जिसमें आम कैदियों की बहनें तो आकर राखी बाँध गयीं- मीसाबन्दी टापते ही रह गये। 
याद नहीं कि कभी पापा- मुकुट बिहारी सरोज – हमसे मिलने आये हों। शायद नहीं ही आये थे। हालांकि उनके बेटे होने का फायदा हमें जेल में भी मिला। उन्हें अलबत्ता मुश्किलें ही उठानी पड़ीं ।

एक रात पुलिस आयी और उन्हें और संगम भाई साब को उठा ले गयी। जनकगंज कोतवाली के विशाल बरगद (शायद पीपल) के नीचे कोई सात दिन तक उनका कयाम रहा। हमें लगता है उन्होंने इस हवालात का जो आनन्द लिया है, वह शायद ही किसी हिंदी कवि को मिला हो।
वे बताते थे कि उनके रहने तक कोतवाली की कोठरियों में बन्द आम हवालाती भी मजे में रहे। शहर में हड़कम्प मच गया था कि सरोज जी थाने में बन्द हैं सो इमरजेंसी के आतंक के बावजूद दिन में देखने वालों का तांता लगा रहता। जाने कौन आकर चाय और कौन फल पहुंचा जाता – हवालातियों और सिपाहियों की तो जैसे दीवाली मन रही थी। 
हमें पता चला कि सातों दिन की उनकी शामें भी खोटी नहीं हुयीं। आसानी से सारे इंतजाम होते रहे ।
दिन भर न जाने कहाँ-कहाँ ढूंढ कर थके हुए टीआई सेठी रात कोतवाली में लौटते और झुंझला कर कहते ये दोनों (शैली-बादल) अगर मिल गए तो गोली मार दूंगा। पापा अपने अंदाज़ में चुटकी लेकर कहते गोली बाद में मारना, पहले पकड़ तो लो !!

 संगम भाई साब, जिनकी तभी शादी हुयी थी, उन्होंने बाद में बताया कि जब टीआई ने रात डेढ़ बजे घर पर धावा बोला था और हम दोनों को टांड़ (हमारे मोहल्ले में कमरों में ऊपर साइड में सामान रखने के लिए बने हिस्से को टांड़ कहते हैं – आले को तिखाल, सीढ़ियों को ज़ीना और छत को गच्ची) आलमारी और बिस्तरों के नीचे तलाशने के बाद पसीने में नहाये खड़े थे, तब पापा ने बहुत ही मासूमियत से कहा कि इस टेबल की दराज में और देख लेते!! रिफ्लेक्स एक्शन में बिना सोचे ही टीआई ने दराज खींच ली- बाद में अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ। क्या करता, खिसियाकर हँस पड़ा।

कवि के रूप में उनके प्रशंसक देश भर में थे – सेन्सर के बावजूद उनकी गिरफ्तारी की खबर फैल गयी, सरकार की काफी थू-थू हुयी जिसके चलते सात दिन बाद उनकी रिहाई हो गयी, अगले सात दिन तक इसका सेलीब्रेशन चला। इसमें बलवीर सिंह रंग से लेकर परसाई जी – जो उस समय मंझधार के दूसरे किनारे पर थे – तक शामिल हुए । 
मगर उसके बाद उनका तबादला -वे सरकारी स्कूल में हिंदी के व्याख्याता थे- मुंगावली कर दिया गया। उन्ही दिनों मुंगावली में खुली जेल भी बनी थी। उन्हें यह संयोग अच्छा लगा, इसका भी लुत्फ़ लिया ।

उनकी नश्तर की तरह पैनी विट और निर्मम व्यंग के लिए इससे बड़ा बूस्टर क्या मिल सकता था !! “इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं” और “ऐसे ऐसे लोग रह गए/बने अगर तो पथ के रोड़ा/करके कोई ऐब न छोड़ा/असली चेहरे दीख न जाएँ/इस कारण हर दर्पण तोड़ा” कवितायें उन्होंने इसी दौर के कवि सम्मेलनों में खुद मुख्यमंत्री की ओर हाथ करके, बाकायदा उन्हें समर्पित करके सुनाई । इसका एक फ़ोटो था जिसमें मुख्यमंत्री के चेहरे पर खीज और झेंप चिपकी हुयी है और पापा का पूरा शरीर नख से शिख तक तीक्ष्ण भंगिमाओं के साथ इस कविता के व्यंग को जीता हुआ सा नजर आ रहा है ।
एक बार किसी सरकारी न्यौते या सम्मान का संदेशा लेकर कलेक्टर उनसे मिलने आये। उन दिनों हमारी सरगर्मियां ग्वालियर केंद्रित थीं, क़ानून-व्यवस्था के सरदर्द माने जाते थे। कलेक्टर ने बातों-बातों में, झिझकते-झिझकते, उनसे पूछा कि: सर, क्या आप भी बादल सरोज की तरह ……उसका प्रश्न पूरा होने से पहले ही वे उसकी आँखों में आँखे डाल कर बोले : मैं उसका बाप हूँ। इस श्लेष अलंकार का सुख पता नहीं कलेक्टर ले पाए कि नहीं। 

वे सरोज जी थे -उनका आभामंडल था- जो सप्ताह भर में बाहर आकर मुंगावली पठा दिए गए। वरना हमारे साथ मीसा में दर्जन भर से अधिक ऐसे भी बंद थे जिनका कसूर बस इतना था कि उनके खानदान में कोई समाजवादी रहा, या जेपी उनके घर के बगल वाले मकान में आये थे और वह उन्हें देखने पहुँच गया था। 
इमरजेंसी के तकरीबन बीस महीनों में कांग्रेस और श्रीमती इंदिरा गांधी ने जितने गुनाह किये हैं, उनका बोझ इतना अधिक है कि कुछ पीढ़ियां और गुजर जाएंगी किन्तु हल्का नहीं होगा। सदियों तक जब जब लोकतंत्र पढ़ाया जाएगा ये साढ़े उन्नीस महीने, उसके उल्लंघन, व्यतिक्रम और नकार के सबक के रूप में, उसका हिस्सा जरूर होंगे।

चार 
वरिष्ठ पत्रकार और सतना स्वदेश के संपादक भी रहे शिव बरुआ जी इमरजेंसी की जेल में हमारी नीचे वाली बैरक में थे। स्वभाव से बहुत आत्मकेंद्रित। उन्हें हंसाना सबसे मुश्किल था – चिढ़ाना बहुत आसान। 
संघ के प्रति उनकी प्रतिबध्दता इतनी प्रगाढ़ थी कि – अनेक अन्य रिश्ते और परिचयों के बावजूद – उन्होंने हम लोगों को कभी घास नहीं डाली। वे कवि भी थे, और जगदीश तोमर जी के अपवाद को छोड़ दिया जाये तो, वे मीसाबंदियों में उस वैचारिक परिवार में अकेले रचनाधर्मी थे। जेल के बाहर आने के बाद उनसे कभी मुलाक़ात नहीं हुयी। उनकी स्मृति को प्रणाम।

उन दिनों अखबारों में होली के दिन चुटीली उपाधियाँ देने का प्रचलन था । हम लोगों ने भी इसके लिए जेल के अपने दीवार अखबार -वाल पेपर- का विशेष संस्करण निकाला था। जहमत से बचने के लिए, चिपकाई जाने वाली उपाधि तय करने हेतु सभी धड़ों से एक एक को लेकर 5-7 लोगों की एक समिति बनाई गयी थी । कुछ उपाधियाँ काफी तुर्श Spicy भी थीं। ज्यादातर ने इसे उसी उत्सवी भावना से लिया था । तीन थे जिन्हें खुद पर चस्पां उपाधि चुभी थी । शिव बरुआ जी उनमें से एक थे। वे काफी नाराज भी हुए थे। 
व्यक्तित्व उनका गरिमामयी था। वे अल्पभाषी थे। परिधानों के मामले में भी चूजी और सुसंस्कृत !! वे इतने आग्रही थे कि उन्हें इस बात का भी यकीन नहीं होता/होगा कि हम उनके बारे में लिखेंगे/लिख रहे हैं । 

न जाने क्यों धारणायें मनुष्य से ऊपर हो जाती हैं, नतीजे में जो अमूर्त होता है वह प्रमुख बन जाता है और जो मूर्त होता है वह गौण हो जाता है। 
विचार मनुष्य से है – मनुष्य विचार से नहीं है – इसी तरह विचार मनुष्य के लिए है, मनुष्य विचार के लिए नहीं। नए सत्यों के उद्घाटन और नयी खोजों के बाद धारणायें बदलती हैं, बदल सकती हैं। मनुष्य तो मूलतः मनुष्य ही रहता है। 
हमें तो जब भी चिकटे जी (जेल में निरुद्ध संघ के सबसे वरिष्ठ प्रचारक महिपत बालकृष्ण चिकटे) या बाबा साब खानविलकर सम्मुख पड़ते थे तो हम उनसे सादर प्रणाम करते थे, झण्डा लेकर धमैया नहीं मचाते थे। अत्यंत मितभाषी चिकटे जी की आँखे चमक जाती थीं और उनका स्थायी सा प्रश्न हुआ करता था: आज क्या ऊधम मचाने वाले हो। वे उधम बोलते थे। हाँ, जब राजनीतिक बहसें होती थीं तो जम कर लड़ते भी थे – मगर व्यक्ति से नहीं, विचार से।
बांग्ला कवि चण्डीदास के शब्दों में साबेर ऊपर मानुष सत्य …..(सबसे बड़ा सच मनुष्य है, उससे ऊपर कोई नहीँ)। इमरजेंसी लोकतंत्र को बचाने का काल था, यह समय मनुष्य और उसकी मनुष्यता को बचाने का समय है ।

पांच ; जेल के पहले के कुछ दिन !!
कुछ सप्ताहों की फरारी के बीच एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया) की हमारी टीम इमरजेंसी के खिलाफ शहर को पोस्टर्स से पाटने में लगी थी । कांग्रेसियों में कोहराम था। गिरफ्तारी के लिए आकाश पाताल किये थे। (दबाव बनाने के लिए पापा और संगम भाई साब को पकड़ लिए जाने का जिक्र पहले किया जा चुका है ।) मगर पकड़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। 
और उसकी वजह दिलचस्प थी। एसएफआई उन दिनों ग्वालियर का सबसे लोकप्रिय और व्यापक संगठन हुआ करती थी। भांति-भांति की पृष्ठभूमि के छात्र एसएफआई में थे। ऐसे भी थे जिनके पिता या परिवार के खिलाफ लड़ाईयों में हम लोग अगुआई करते थे – वे इसका बुरा नहीं मानते थे। बल्कि कई तो शामिल भी हुआ करते थे। 

जेबों से पैसों की रार आज भी है, तब तो और अधिक थी । दो दो रुपयों के लाले थे, सो दिन भर सोते थे और शाम के धुंधलके में किसी परिचित छात्र के घर कुछ पैसा मांगने जाते थे। उसी से कागज और स्केच पेन खरीदवा लिया करते थे। ऐसी ही एक शाम शैली हमें अपने एक परिचित छात्र के नाले (वैसे स्वर्णरेखा नाम है उस नाले का) के किनारे के घर ले गए थे। उन्होंने अंदर घर से लाकर कुछ रूपये हमें दिए- कितने दिए ये तो याद नहीं, उनका नाम याद है, प्रमोद प्रधान !! जो आज भी शरीकेसफर हैं ।
फरारी के दो दिन-रात तो हमने उस डीएसपी के घर में उसके बेटे के स्टडी रूम में काटे, जिसकी ड्यूटी ही हम लोगों को पकड़ने के लिए लगी थी। जाहिर है उस की जानकारी के बिना ऐसा हुआ था। चारों समय का खाना उन्हीं की पत्नी ने बनाकर खिलाया था- क्योंकि पत्नी के दायित्व के ऊपर माँ की ममता हावी हो गयी थी। 

पोस्टरबाजी रोकने जो पुलिस वाले रात रात भर हमारी ढूंढ में जाते, हम पुलिस लाइन में उन्हीं के घरों में चाय पीते हुए पोस्टर्स लिखते थे पता रहता था कि रात की गश्त सुबह साढ़े चार बजे समाप्त होगी। अगली ड्यूटी साढ़े छह से पहले नहीं आएगी। इसी हिसाब से उनके घर लौटने के पहले निकल कर, उन्हीं के बेटों के साथ साइकिल पर सवार होकर जाते और चिपकाने भिड़ जाते। 
रात की खुमारी टूटने के बाद युवा कांग्रेसी निकलते और इंदिरा-संजय और आपातकाल की मुखालफत करने वाले पोस्टर्स रामपुरी चाकू से उखाड़ते। उसका नजारा ही कुछ अलग हुआ करता था ।

हम लोगों ने पोस्टर के लिए सबसे पतला कागज, इसे राइस पेपर कहते थे, चुना था और चिपकाने की लेई अरारोट से निहायत पतली बनाया करते थे। नतीजे में पोस्टर इतना जम कर चिपक जाता था कि उखाड़ना नामुमकिन हो जाता था । 
कई बार (जैसे बाड़े के तबके रणजीत होटल पर) तो पानी से भिगोने पर भी पोस्टर्स नही उखड़ा तो युवा कांग्रेसियों ने लकड़ी का वह पल्ला ही उखाड़ लिया जिस पर वह लगा था। इस उखाड़ा पछाड़ी में और ज्यादा तमाशबीन जुट जाते थे ।
जब हम उन्हें लगा रहे होते थे तो उत्सुकता में कुछ मॉर्निंग वॉकर्स देखने आ जाते थे। मगर जैसे ही पढ़ते थे तुरंत तेजी से दूर चले जाते थे। इमरजेंसी का आतंक बहुत गहरा था। एक दो के मुंह से तो हमने चीख निकलते और उन्हें बगटुट भागते भी देखा। ऐसे एक सीन के बाद हमारे किसी साथी ने कहा कि जल्दी करो, ये जरूर पुलिस के पास गया होगा। मगर सबकी राय बनी कि डर गया है सा……, सीधा हाँफते हाँफते घर पहुंचेगा । 

तभी से मॉर्निंग वॉकर्स की बहादुरी को लेकर अपनी एक राय बन गयी , तभी तो अपन इस चक्कर में नहीं पड़ते।  
पोस्टर्स शब्दों में ही नहीं प्रस्तुति में भी बहुत कलात्मक और आकर्षक हुआ करते थे। शैली चित्रकार भी थे, बेहद सुन्दर लिखते भी थे, प्रदीप बंसल की लिखावट भी अच्छी थी। अलग-अलग घरों में तीन लड़कियां भी थीं जिन्होंने इस पोस्टर वॉर में योगदान किया था।
आज सोचते हैं कि काहे इतना बिल्लियाये हुयी थी सरकार ? क्या बिगड़ जाता इन नन्हें नन्हें पोस्टरों से ? मगर नहीं : तानाशाह शब्दों से बहुत डरते हैं । बेतहाशा भय खाते हैं। शब्द बहुत ताकतवर होते हैं। बन्दूक, छुरी, तलवार, खन्जर, नेजे और त्रिशूलों यहां तक कि एटम बम तक के जखीरों पर बैठे तानाशाहों की भी हवा निकाल देते हैं शब्द । 

तानाशाह नियमतः बुध्दिहीन और अज्ञानी होते हैं । वे हर असले और हथियार का जवाब दे सकते हैं, शब्दों के मुकाबले शब्द लाकर उनकी काट करने और प्रश्नों के उत्तर देने की ताब नहीं होती उनमें।
इसीलिए तो वे कविता के जवाब में कविता, लेख के जवाब में लेख नहीं लिखते : गाली बकते हैं। कुलबुर्गी, पानसारे, दाभोलकर का खण्डन करने की तीन लाइन तक नहीं लिख सकते इसलिए तीन गोलियों से काम चलाते हैं। मगर गोली सिर्फ एक बार असर करती है, शब्द दीर्घायु होते हैं।

जारी….

(बादल सरोज लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्ति सचिव हैं।)

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