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Categories: बीच बहस

दस्तावेजी सबूत है कि आरएसएस ने आपातकाल का समर्थन किया था

आपातकाल के साढ़े चार दशक पूरे होने के मौके पर कई लोगों ने मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए भारतीय लोकतंत्र के उस त्रासद और शर्मनाक काल खंड को अलग-अलग तरह से याद किया। याद करने वालों में ऐसे लोग हैं ही, जो आपातकाल के दौरान पूरे समय जेल में रहे थे या भूमिगत रहते हुए आपातकाल विरोधी संघर्ष में जुटे हुए थे। मगर आपातकाल को उन लोगों ने भी बढ़-चढ़कर याद किया, जो उस दौर में अपनी गिरफ्तारी के चंद दिनों बाद ही माफ़ीनामा लिखकर जेल से बाहर आ गए थे, ठीक उसी तरह, जिस तरह विनायक दामोदर सावरकर अंग्रेजों से माफी मांग कर जेल से बाहर आए थे।

आपातकाल के दौरान सरकार से माफी मांग कर जेल से बाहर आने वालों ने अपने माफ़ीनामे में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय और उनके बेटे संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करते हुए वादा किया था कि वे भविष्य में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे। ऐसा करने वालों में सर्वाधिक लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और तत्कालीन जनसंघ आज की भाजपा से जुड़े हुए थे।

कई सरकारी और गैर सरकारी दस्तावेजों में दर्ज इस तथ्य के बावजूद आरएसएस में दीक्षित हुए भाजपा महासचिव राम माधव ने बेशर्मी के साथ दावा किया कि देश में लोकतंत्र इसलिए बचा हुआ है, क्योंकि आज सरकार चला रहे नेता उनमें से हैं, जिन्होंने आपातकाल के खिलाफ दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ी थी। वे नेता लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति किसी मजबूरी की वजह से नहीं बल्कि एक धर्म सिद्धांत के तौर पर समर्पित हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी आपातकाल को याद करते हुए कहा कि वह दौर कभी भुलाया नहीं जा सकता। हालांकि मोदी और शाह न तो उस दौर में जेल गए थे और न ही आपातकाल विरोधी किसी संघर्ष से उनका कोई जुड़ाव था। अमित शाह की तो उस समय उम्र ही 10-12 वर्ष के आस पास रही होगी।

बहरहाल राम माधव जो दावा कर रहे हैं,  उसे फर्जी साबित करने वाले कई तथ्य हैं, लेकिन यहां सिर्फ आरएसएस के तीसरे और तत्कालीन सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उर्फ बाला साहब देवरस के उन पत्रों का उल्लेख करना ही पर्याप्त होगा, जो उन्होंने आपातकाल लागू होने के कुछ ही दिनों बाद जेल में रहते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे को लिखे थे। उन्होंने यरवदा जेल से इंदिरा गांधी को पहला पत्र 22 अगस्त, 1975 को लिखा था, जिसकी शुरुआत इस तरह थी:

”मैंने 15 अगस्त, 1975 को रेडियो पर लाल क़िले से राष्ट्र के नाम आपके संबोधन को यहां कारागृह (यरवदा जेल) में सुना था। आपका यह संबोधन संतुलित और समय के अनुकूल था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखने का फ़ैसला किया।’’

इंदिरा गाँधी ने देवरस के इस पत्र को जवाब नहीं दिया। देवरस ने 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा गांधी को एक और पत्र लिखा। इस पत्र की शुरुआत उन्होने सुप्रीम कोर्ट द्बारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दिए गए फैसले के लिए बधाई के साथ की। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में भ्रष्ट साधनों के उपयोग का दोषी मानते हुए पद के अयोग्य क़रार दिया था। देवरस ने इस पत्र में लिखा- ”सुप्रीम कोर्ट के सभी पाँच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव को संवैधानिक घोषित कर दिया है, इसके लिए हार्दिक बधाई।’’

गौरतलब है कि विपक्ष का दृढ मत था कि यह फैसला कांग्रेस सरकार के दबाव में दिया गया था। देवरस ने अपने इस पत्र मे यहाँ तक कह दिया- ”आरएसएस का नाम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ अन्यथा जोड़ दिया गया है। सरकार ने अकारण ही गुजरात आंदोलन और बिहार आंदोलन के साथ भी आरएसएस को जोड़ दिया है… संघ का इन आंदोलनों से कोई संबंध नहीं है…।’’

चूंकि इंदिरा गाँधी ने देवरस के इस पत्र का भी जवाब नहीं दिया। इसलिए आरएसएस प्रमुख देवरस ने विनोबा भावे से संपर्क साधा, जिन्होंने आपातकाल को अनुशासन पर्व की संज्ञा देते हुए उसका समर्थन किया था। देवरस ने दिनांक 12 जनवरी, 1976 को लिखे अपने पत्र में विनोबा भावे से आग्रह किया कि आरएसएस पर प्रतिबंध हटाए जाने के लिए वे इंदिरा गाँधी को सुझाव दें।

विनोबा भावे ने भी देवरस के पत्र का जवाब नहीं दिया। हताश देवरस ने विनोबा एक और पत्र लिखा जिस पर तिथि अंकित नहीं है। उन्होंने लिखा- ”अख़बारों में छपी सूचनाओं के अनुसार प्रधानमंत्री (इंदिरा गाँधी) 24 जनवरी को वर्धा, पवनार आश्रम में आपसे मिलने आ रही हैं। उस समय देश की वर्तमान परिस्थिति के बारे में उनकी आपके साथ चर्चा होगी। मेरी आपसे याचना है कि प्रधानमंत्री के मन में आरएसएस के बारे में जो ग़लत धारणा घर कर गई है, आप कृपया उसे हटाने की कोशिश करें, ताकि आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटाया जा सके और जेलो मे बंद आरएसएस के लोग रिहा होकर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश की प्रगति के लिए सभी क्षेत्रों में अपना योगदान कर सकें।’’

विनोबा ने देवरस के इस पत्र का भी कोई जवाब नहीं दिया। यह भी संभव है कि दोनों ही पत्र विनोबा जी तक पहुंचे ही न हों। जो भी हो, इंदिरा गांधी और विनोबा जी को लिखे गए ये सभी पत्र देवरस की पुस्तक ‘हिंदू संगठन और सत्तावादी राजनीति’ में परिशिष्ट के तौर पर शामिल हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन जागृति प्रकाशन, नोएडा ने किया है।

बहरहाल, इंदिरा गांधी और आचार्य विनोबा को लिखे देवरस के पत्रों से यह तो जाहिर होता ही है कि आरएसएस आधिकारिक तौर पर आपातकाल विरोधी संघर्ष में शामिल नहीं था। संगठन के स्तर पर आपातकाल का समर्थन करने और सरकार को सहयोग देने की उसकी औपचारिक पेशकश जब बेअसर साबित हुई तो आरएसएस के जो कार्यकताã गिरफ्तार कर लिए गए थे, उन्होंने व्यक्तिगत तौर माफीनामे देकर जेल से छूटने का रास्ता अपनाया। ऐसे सारे लोग आज अपने-अपने प्रदेशों में राज्य सरकार से मीसाबंदी के नाम पर 10 से 25 हजार रुपए तक की मासिक पेंशन लेकर डकार रहे हैं। पेंशन लेने वालों में कई सांसद, विधायक और मंत्री भी शामिल हैं।

आपातकाल के दौरान आरएसएस के कई स्वयंसेवक तो इतने ‘बहादुर’ निकले कि उन्होंने आपातकाल लगते ही गिरफ्तारी से बचने और अपनी राजनीतिक पहचान छुपाए रखने के लिए अपने घरों में दीवारों पर टंगी हेडगेवार, गोलवलकर और सावरकर की तस्वीरें भी उतार कर नष्ट कर उनके स्थान पर इंदिरा गांधी और संजय गांधी की तस्वीरें लटका ली थीं। ऐसे लोगों ने अपनी राजनीतिक पहचान तब तक जाहिर नहीं होने दी थी, जब तक कि लोकसभा के चुनाव नहीं हो गए थे और जनता पार्टी की सरकार नहीं बन गई थी। इस तरह के तमाम लोगों ने भी आपातकाल को उसकी 45वीं बरसी पर याद करते हुए सोशल मीडिया पर बड़ी शान से बताया कि वे भी आपातकाल विरोधी संघर्ष में शामिल थे।

बहरहाल, उन लोगों के संघर्ष को सलाम, जो तानाशाही हुकूमत के सामने झुके या टूटे बगैर जेल में रहे या वास्तविक तौर पर भूमिगत रहते हुए लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में जुटे रहे और जिसकी वजह से उनके परिजनों ने तरह-तरह की दुश्वारियों का सामना किया।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on June 27, 2020 3:07 pm

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