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आखिरी वक्त में भी हाथ उठाकर बंधी रही चितरंजन भाई की मुट्ठी!

चितरंजन भाई अपने गांव लौट गए थे। कुछ महीने पहले। ग्राम सुल्तानपुर, तहसील बांसडीह, जिला बलिया, घाघरा का कछार और दियारे के एक कोने में ऊंचाई पर टिका गांव।

चितरंजन भाई अपने जीवन का वृत्त पूरा कर रहे थे। सोचने वाली बात है कि अपने जीवन के आखिरी सभा के रूप में चुना पीयूसीएल के मंच को। 10 अक्तूबर, 2019, बलिया शहर, टॉउनहाल का सभागार। साथ में मंच पर थे इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष श्री लाल बहादुर सिंह। लाल बहादुर भाई लिखते हैं कि गंभीर बीमारी और कमजोरी के बावजूद चितरंजन भाई गरज रहे थे। इस फासिस्ट सत्ता का विकल्प यह बिका हुआ, घुटने के बल चल रहा विपक्ष नहीं है।

आखिरी यात्रा।

वह कहीं जनांदोलनों के ढेर में छिपी चिंगारियों में है। अगले दिन वे जनकवि केदारनाथ सिंह के गांव में थे। साथ में थे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर सूर्य नारायण सिंह। साहित्य राजनीति के आगे मशाल लेकर चल रही थी। चितरंजन भाई उसी मशाल की लौ को बचाने में आखिरी सांस तक लगे रहे। 1979-1980 उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट था। 1979, जब उत्तर प्रदेश के छात्र राजनीति के आकाश में क्रांतिकारी तेवर और नये कलेवर के साथ पीएसओ नाम से एक नये नक्षत्र का विस्फोट हो रहा था। जिसने प्रतिभासंपन्न छात्रों और वंचित समाज के युवाओं को अपने आगोश में ले लिया था।

आखिरी सभा की तस्वीर।इविवि छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष लाल बहादुर सिंह और भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के साथ।

और प्रदेश के हर यूनिवर्सिटी-कॉलेज कैंपस में इसके झंडे और नारे गूंजने लगे थे। इस संगठन के निर्माण के पीछे दो चेहरे जो दिखाई पड़ रहे थे वे रामजी भाई और चितरंजन सिंह थे। बाकी सभी छात्र थे। चितरंजन भाई ने अपने जीवन का मकसद तय कर लिया था। वो सत्तर का दशक था। उत्तर प्रदेश के ऊपर से एक नई बयार गुजर रही थी जो अपने साथ नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम और भोजपुर की दास्तान लेकर बढ़ रही थी।

केपीयूसी छात्रावास में रह रहे पूर्वांचल से आए दबंग छवि के इस युवक को मानो इसी की तलाश थी। छेड़खानी के खिलाफ व चाटुकार अध्यापक गिरोह के खिलाफ ग्रुप बनाकर अभियान चलाने वाले चितरंजन भाई को लगा कि असली समस्या तो पूरी व्यवस्था में है। और इसी कारण दो साल बलिया में प्रैक्टिस कर उन्होंने काली कोट को उतार फेंका और अपने गांव सुल्तानपुर से निकल पड़े चितरंजन भाई अपनी नई दुनिया गढ़ने, तराशने और तलाशने।

1980 लगता है उन्हीं का इंतजार कर रहा था। उत्तर प्रदेश में पीयूसीएल की स्टेट यूनिट बनाने के लिए इलाहाबाद को चुना गया था। हिंदुस्तानी एकेडमी के हाल में चितरंजन भाई के प्रयास से प्रख्यात पत्रकार और पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरुण शौरी और देवी प्रसाद त्रिपाठी आए। संगठन का ऐलान हुआ और उसके बाद पीयूसीएल और चितरंजन भाई ने फिर पीछे मुड़ के नहीं देखा।

फर्जी मुठभेड़ों, हिरासतों में मौतों, थर्ड डिग्री टॉर्चर, जनांदोलनों पर फायरिंग और पुलिसिया उत्पीड़न के विरूद्ध जो हिम्मत और निर्भीकता दिखाई उन्होंने, उसकी मिसाल सिर्फ और सिर्फ एपीसीएलसी के बाला गोपाल और पीयूसीएल के केजी कन्नाबिरान में दिखी और कहीं नहीं। चितरंजन भाई को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में प्रकांड संविधान वेत्ता और मानवाधिकार विशेषज्ञ के रूप में श्री रवि किरन जैन जी जैसा विराट व्यक्तित्व मिला जिन्होंने न्यायपालिका की चूलें हिला कर रख दी। जनहित याचिकाओं की झड़ी लग गयी। हर कदम पर सरकार शर्मसार होने लगी।

कुछ नजीरें गौरतलब हैं। पीलीभीत में सिख तीर्थयात्रियों को बस से उतार कर आतंकी बता कर एक क्रूर पुलिस कप्तान ने लाईन में खड़ा करके गोलियों से भून दिया और अदम्य साहस की शोहरत बटोरने लगा। चितरंजन भाई ने इस भय और सन्नाटे को छिन्न-भिन्न कर दिया। वहीं प्रेस कांफ्रेंस कर के उसे फर्जी मुठभेड़ बताया। जांच किया और अदालत जाके सजा दिलवाई।

मिर्जापुर के मड़िहान थाने के भवानीपुर गांव में 16 लोगों को गिरफ्तार कर वहीं गोलीमार कर हत्या कर दी गयी। उसमें कुछ बच्चे भी थे। चितरंजन भाई ने उस गांव में सभा की। जिसमें रिटायर्ड जस्टिस राम भूषण मेहरोत्रा भी गए। जांच दल गठित हुआ। रिपोर्ट तैयार हुई। और याचिका दायर की गयी। 2 अक्तूबर, 1994 को रामपुर तिराहा कांड हुआ मुजफ्फरनगर जिले में जब दिल्ली प्रदर्शन करने जा रहे, स्वतंत्र उत्तराखंड की मांग कर रहे उत्तराखंड के प्रदर्शनकारियों को आधी रात को रोका गया और अपराध शास्त्र में लिखे गए सारे जुल्म और अपराध उन पर ढाए गए। और फिर झूला घर मसूरी समेत पूरे राज्य में पुलिस द्वारा लूट, हत्या, बलात्कार का कहर बरपा कर दिया।

माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य और मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन के साथ।

पीयूसीएल ने पूरे राज्य का दौरा कर तथ्य संकलन किए। उस टीम में चितरंजन सिंह के साथ श्री रवि किरन जैन, जस्टिस मुरली धर, ओडी सिंह, सुधांशु धुलिया, केएन भट्ट, सिद्धार्थ वर्मा, कमला पंत, पीसी तिवारी, शमशेर सिंह बिष्ट आदि थे। उत्तराखंड संघर्ष समिति के नाम से जनहित याचिका दाखिल हुई। एक ऐतिहासिक फैसला आया। मानवाधिकार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण फैसला।

गोंडा में पुलिस कप्तान के इशारे पर पुलिस की एक टीम ने लेखक, कवि व पुलिस में डिप्टी एसपी केपी सिंह की हत्या कर दी। मुठभेड़ के बाद में चितरंजन भाई तन्हा उन फर्जी मुठभेड़कर्ताओं से भिड़ गए। दसियों साल पैरवी करते रहे, कोर्ट का चक्कर लगाते रहे और करीब एक दर्जन दोषी पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा करवाई।

एक कार्यक्रम में पुरस्कार देते हुए।

अविभाजित उत्तर प्रदेश में अल्मोड़ा में अमर उजाला से जुड़े उमेश डोभाल की शराब माफियाओं द्वारा की गयी हत्या के विरुद्ध जन अभियान चलाया और कई वर्षों तक उमेश डोभाल की स्मृति में व्याख्यान माला चलवाने में योगदान किए।

दल्ली राजहरा में जब शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी गयी तो इस हत्या के विरुद्ध लखनऊ, भिलाई, रायपुर और दिल्ली में अभियान चलाया और नियोगी जी के मित्र व पीयूसीएल नेता सायल के साथ हर वर्ष शहादत दिवस पर रायपुर में पैदल मार्च और बड़ी जनसभा आयोजित करने में आयोजक मंडल में रहे। यह बहुत कम लोगों को मालूम है सन 84 के सिख विरोधी दंगे और नरसंहार में इलाहाबाद काफी कुछ बचा रहा। उस समय सिखों की कालोनी ‘दरभंगा कालोनी’ में चितरंजन भाई ने प्रोफेसर एमपी सिंह के साथ रातों में पहरा दिया था। और प्रोफेसर साहब राइफल लिए रहते थे। 1986 के इलाहाबाद के सांप्रदायिक दंगे और 1992 के वाराणसी के दंगे के दौरान पीड़ितों की मदद करने व अमन कायम करने के प्रयासों में चितरंजन भाई आगे-आगे रहे।

1982 में विभिन्न संगठनों को लेकर दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में जब आईपीएफ की स्थापना हुई इंदिरा निरंकुशता के खिलाफ सच्चे लोकतंत्र को स्थापित करने का जिम्मा उन्होंने लिया और जगह-जगह किसान-मजदूर छात्र आंदोलनों में तालमेल बैठाते रहे और संगठन का निर्माण करते रहे।

उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिकता विरोधी अभियान का गठन करके और कई शहरों में सेकुलर मार्च निकालने में उनका बड़ा योगदान रहा। राजेंद्र सायल और ‘पीस’ के अनिल चौधरी के इसरार पर वे ‘इंसाफ’ संगठन में सक्रिय हुए। और पहली बार विधानसभा चुनाव के पहले जनता इलेक्शन मैनिफेस्टो जारी कर एक सम्मेलन कराया गया। जिसमें विपक्षी पार्टियों के मोहन सिंह, अतुल अंजान समेत दिग्गज नेताओं से प्रश्नोत्तर हुआ।

चितरंजन भाई प्रफुल्ल बिदवई के साथ परमाणु निरस्त्रीकरण के खिलाफ स्थापित संगठन कोलिशन फॉर न्यूक्लियर डिसार्मामेंट एंड पीस (सीएनडीपी) में बहुत सक्रिय रहे और कोडाईकनाल सहित कई परमाणु केंद्रों पर हुए प्रदर्शनों में भाग लिया।

भारत-पाक जन मैत्री के अभियान में कुलदीप नैयर, राजिंदर सच्चर, अचिन विनायक आदि के साथ प्रयासरत रहे। हर वर्ष बाघा बार्डर पर सरहद के दोनों ओर से प्रबुद्ध नागरिक खड़े होकर मोमबत्तियां जलाते थे और दोस्ती की शपथ लेते थे। हर वर्ष चितरंजन भाई वहां मोमबत्ती जला कर खड़े रहते थे।

सामाजिक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक-संपादक सीमा आजाद और विश्व विजय की गिरफ्तारी के खिलाफ और उनके रिहाई के सवाल पर काफी सक्रिय रहे।

एक स्थिति ऐसी भी आई कि अपनी आंतरिक बेचैनी को अभिव्यक्ति देने के लिए चितरंजन भाई हिंदी के प्रमुख अखबारों में नियमित लेख लिखने लगे। नीलाभ जी ने बड़े जतन से 2008 में ‘सदानीरा प्रकाशन’ के बैनर से ‘कुछ मुद्दे: कुछ विमर्श’ नाम से प्रकाशित किया जो मानवाधिकार पर बहुत लोकप्रिय पुस्तक हुई।

भाई मनोरंजन और परिवार के सदस्यों के साथ।

कठिनाइयों भरे जीवन चर्या और बेतरतीब जिंदगी अपनी कीमत भी वसूलती है। झंझावती पारिवारिक जीवन की त्रासदियों ने हौसले में घुन लगाना शुरू कर दिया। इलाहाबाद, लखनऊ, बलिया, बनारस, दिल्ली जैसे शहरों में बहुत परिवारों में वो सदस्य की तरह रहे। चितरंजन भाई थकने लगे तभी उनकी रीढ़ की हड्डी में दबे पांव एक रोग का प्रवेश हुआ जिसने उनके पांव में जंजीरें डाल दीं।

वे अपने भाई मनोरंजन के यहां जमशेदपुर चले गए। फोन करके आने को कहा जाता तो थकी आवाज में कहते ‘हा कमल, हा अरुण, हा मुन्ना, हम आएंगे, रहेंगे तुम्हारे यहां!’ फोन रख देते। वे अपने पारंपरिक परिवार में लौट गए थे। अपनी जड़ों के इर्द-गिर्द। जीवन का वृत्त पूरा हो रहा था। जब डॉक्टर के इलाज से मना कर देने पर मनोरंजन उन्हें वापस गांव सुल्तानपुर ले गए तो स्मृति लोप होने लगा था। धीरे-धीरे कोमा में जा रहे थे। घड़ी की सुई की टिक-टिक खामोश हो रही थी। आखिर में अपने चाचा को, मनोरंजन को मुश्किल से पहचाने। फिर वो भी नहीं।

मैंने मनियर के डॉक्टर राम प्रकाश जी और सहतवार के एडवोकेट श्याम कृष्ण गुप्ता को उनके गांव भेजा और पूछा क्या हाल है चितरंजन भाई का?

‘कोमा में चले गए। डीएम और एसडीएम आए थे हाल जानने!’

चितरंजन भाई अस्पष्ट रूप से कुछ बड़बड़ा रहे थे। जोर से बोलने की कोशिश कर रहे थे। हाथ उठाना और मुट्ठी बांधना चाह रहे थे!! उन्होंने कहा, ‘मुझे लगा जिंदगी के आखिरी लम्हों में भी उनके अवचेतन में यह चल रहा था कि जब कलेक्टर, कप्तान सामने हो तो हाथ उठाकर, मुट्ठी बांध कर ऊंची आवाज में मिला जाता है’!!

(के के राय इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। साथ ही मानवाधिकार कार्यकर्ता चितरंजन सिंह के साथ राजनीति से लेकर मानवाधिकार की लड़ाई के मोर्चे पर लंबा वक्त गुजार चुके हैं।)

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This post was last modified on June 27, 2020 8:22 pm

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