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ट्रंप का दौरा भारत-अमरीकी संबंधों का इतिहास

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत की यात्रा पर हैं। वे 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे। अमेरिकी संविधान के अनुसार, वहां के राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है, और यह अवधि इस साल समाप्त हो रही है। नए राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया अमेरिका में चल रही है। वहां  अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली है, और राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया भी अलग तथा जटिल है। मूलतः वहां द्विदलीय व्यवस्था है।

एक डेमोक्रेटिक पार्टी है दूसरी रिपब्लिकन। ट्रंप रिपब्लिकन दल से हैं। उनसे पहले बराक ओबामा डेमोक्रेटिक पार्टी से थे। आर्थिक नीतियों के सवाल पर दोनों ही दलों की सोच एक ही जैसी है। फिर भी डेमोकेट्रिक पार्टी को रिपब्लिकन दल से अपेक्षाकृत उदार माना जाता है। ट्रंप अपने देश में भी अपने स्वभाव, अक्खड़पन, ज़िद्दी और बड़बोलेपन के कारण काफी विवादित रहे हैं।

यह संभवतः पहले राष्ट्रपति हैं, जिनके निर्वाचन के बाद अमेरिकी नागरिकों ने नॉट माय प्रेसिडेंट के नाम से उनके विरूद्ध एक अभियान चलाया था। कभी सीएनएन और अन्य मीडिया संस्थानों के साथ अपने तल्ख स्वभाव के लिए तो कभी अपनी रंगभेदी और सांप्रदायिक टिप्पणियों के कारण भी वह सुर्खियों में रहते हैं। ट्रंप ख़ुद को भले ‘बाहुबली’ बताते हों, पर अमेरिकी सीनेटर बर्नी सांडर्स उनको आदतन झूठा, नस्लभेदी, स्त्री-विरोधी, होमोफ़ोब, कट्टर धर्मांध और अमेरिकी इतिहास का सबसे ख़तरनाक राष्ट्रपति कह रहे हैं।

ऐसा नहीं कि यह अमेरिका में चुनावी काल है तो यह सब बातें कही जा रही हैं। कुछ और लोगों की राय पढ़ें, प्रोफ़ेसर कॉर्नेल वेस्ट ने ट्रंप को नियो-फ़ासिस्ट गैंगस्टर कहा है। एचबी ग्लूशाकोव ने 2016 में एक किताब लिखी थी, ”माफ़िया’ डॉन: डोनाल्ड ट्रंप्स 40 इयर्स ऑफ़ मॉब टाइज़’। इसमें उनके आपराधिक संबंधों का पूरा रिकॉर्ड बताया गया है।

राष्ट्रपति बुश द्वितीय के भाषण लेखक रहे डेविड फ़्रम ने दिसंबर में ‘द अटलांटिक’ में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था, ‘ए गैंगस्टर इन द व्हाइट हाउस’. उन्होंने 2018 में एक किताब भी लिखी थी- ‘ट्रंपोक्रेसी: द करप्शन ऑफ़ द अमेरिकन रिपब्लिक’। यह सब उद्धरण, ट्रंप को एक विवादास्पद राष्ट्रपति साबित करते हैं।

खुद ट्रंप ने हमारे प्रधानमंत्री के ऊपर भी कुछ अनावश्यक टिप्पणियां की हैं, जैसे अफ़ग़ानिस्तान में लाइब्रेरी बनाने की बात का और अंग्रेजी न जानने के संबंध में, अपनी चिरपरिचित शैली में उनका मज़ाक़ उड़ाया है। हो सकता है यह खिल्ली उड़ाना, उनके स्वभाव का एक अंग हो, पर एक राष्ट्राध्यक्ष के रूप में जब उनकी हर एक बात पर चर्चा होगी और मीनमेख निकाले जाएंगे तो, ऐसी बातों पर लोग चटखारे लेकर बात करते हैं और बातों का बतंगड़ बनेगा ही।

तो वही महाबली अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप 24 फरवरी से भारत में हैं और उनका दौरा चल रहा है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री ट्रंप के कार्यक्रमों में शामिल नहीं होंगे। ऐसा प्रतिबंध अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी का है। यह थोड़ा अटपटा भी लग रहा है और स्थापित प्रोटोकॉल के विपरीत भी है कि जिस राज्य में कार्यक्रम हो, वहां उस कार्यक्रम में उस राज्य के मुख्यमंत्री ही उपस्थित न रहें। इसके अलावा और कुछ भी राजकीय कार्यक्रम होंगे।

1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के अनेक परिणामो में एक परिणाम यह हुआ कि यूरोप की परंपरागत औपनिवेशिक शक्तियां, ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, डच कमज़ोर हो गईं और इन्हीं के यहां से भेजे गए इनके नागरिकों द्वारा बसाई गई नई दुनिया, अमेरिका, एक शक्तिशाली राष्ट्र बनकर उभरा।

उधर सोवियत क्रांति के बाद कम्युनिस्ट ब्लॉक, जिसमें चीन भी शामिल था एक तरफ था, तो दूसरी तरफ अमरीका के नेतृत्व में ब्रिटेन, फ्रांस आदि देश एकजुट हो गए। आज़ादी के बाद भारत को अपने खेमे में लाने की पूरी कोशिश अमेरिका ने की थी। यह कोई भारत के प्रति अनुराग के कारण नहीं था बल्कि सोवियत रूस और चीन के रूप में जो कम्युनिस्ट ब्लॉक उभर गया था उसके खिलाफ दक्षिण एशिया में एक मजबूत ठीहा उसे चाहिए था।

भारत की आबादी, विशाल आकार, खनिज और कृषि की ताकत, ब्रिटेन का सबसे महत्वपूर्ण और धन देने वाला उपनिवेश बने रहना, प्रथम और द्वितीय विषयुद्धों में भारतीय सैनिकों की शौर्यगाथा जैसे कारक तत्व भारत की तरफ अमेरिका को आकर्षित कर रहे थे। भारत का तत्कालीन नेतृत्व जो जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस का था, कि अर्थिक विचारधारा पूंजीवाद विरोधी और समाजवाद की तरफ उन्मुख थी। जो अमेरिकी सोच के विपरीत थी।

भारत ने उस दो ध्रुवीय विश्व के बीच एक नया रास्ता चुना जो दोनों से ही अलग था और निर्गुट आंदोलन का नेता बना, लेकिन अमेरिका से भारत के संबंध शुरू से ही अच्छे रहे और 1970 तक यह संबंध ठीक तरह से चले भी। 1971 में भारत सोवियत बीस साला रक्षा संधि से इन संबंधों में खटास आई और जब 1971 में भारत पाक युद्ध और बांग्ला मुक्ति संग्राम हुआ तो, उस समय यह सम्बंध बहुत अधिक बिगड़ गए थे।

आधुनिक भारत और अमेरिका के बीच अंतरराष्ट्रीय संबंधों की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति हेनरी ट्रूमैन के समय 1949 में ही हो गई थी। जैसा कि यह स्पष्ट है उस समय नेहरू की विचारधारा समाजवादी थी और अमेरिका पूंजीवादी विचारधारा को लेकर चल रहा था। परिणाम स्वरूप भारत अमेरिका संबंध मात्र एक औपचारिकता ही थे।

अमेरिका को जब लगा कि भारत से उसे उतनी निकटता प्राप्त नहीं हो सकती जो वह भारत का उपयोग, सोवियत रूस और चीन के विरुद्ध अपने सैन्य और कूटनीतिक उद्देश्यों के लिए करना चाहता था तो वह पाकिस्तान की ओर मुड़ा। पाकिस्तान के रूप में उसे दक्षिण एशिया में एक ठीहा मिला और पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध एक मजबूत साथ। तब 1954 में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ मिलकर ‘सेंटो’ नामक एक संगठन की स्थापना की, जो भारत के विरुद्ध तो नहीं था पर उसकी सकारात्मक प्रतिक्रिया भारत में नहीं हुई, इसी के कारण भारत जो सोवियत रूस की तरफ पहले ही झुका था अब और उधर सरक गया। सोवियत रूस से रिश्ते और मजबूत होते गए।

द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका और सोवियत रूस दोनों फासिस्ट धुरी राज्यों के विरुद्ध एक साथ थे। पर यह साथ वैचारिक आधार पर नहीं था। यह फासिस्ट और लोकतंत्र विरोधी ताकतों के खिलाफ था। जब ये फासिस्ट ताकतें पराजित हो गईं और उसके नेता मुसोलिनी को जनता ने चौराहे पर फांसी दे दी और हिटलर ने आत्महत्या कर ली तो फिर इस आपसी संबंध का उद्देश्य ही समाप्त हो गया। फिर दोनों के बीच जो हुआ वह युद्ध नहीं था बल्कि एक दूसरे की जासूसी, षड़यंत्र और शीत युद्ध था।

यह दौर सीआईए और केजीबी जैसी शक्ति साधन संपन्न खुफिया एजेंसियों का था। शीत युद्ध के कारण लंबे समय तक पूरी दुनिया दो गुटों में बंटी रही। शीत युद्ध में एक गुट अमेरिका का था और दूसरा सोवियत संघ का। विश्व की प्रत्येक समस्या को गुटीय स्वार्थ के दृष्टिकोण से देखा जाने लगा। शीत युद्ध के परिणाम स्वरूप नाटो, सीटो, सेंटो, वारसा पैक्ट जैसे कई सैन्य गुट बन कर तैयार हुए। दोनों गुट अधिक से अधिक देशों को अपने ग्रुप में शामिल करने की होड़ में जुट गए, ताकि विश्व के अधिकांश क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व बढ़ाया जा सके। भारत इनसे अलग बना रहा।

भारत समाजवादी विचारधारा का समर्थक था, इसलिए उसका झुकाव कहीं ना कहीं अप्रत्यक्ष रूप से सोवियत संघ की तरफ था। अमेरिका को यह बात रास नहीं आ रही थी, क्योंकि भारत एशिया का एक महत्वपूर्ण और बड़ा देश था। हालांकि भारत ने किसी भी गुट में शामिल न होते हुए अलग गुट का निर्माण किया, जिसे गुटनिरपेक्ष कहा गया। दुनिया के कई देशों ने मिलकर गुटनिरपेक्ष रहने का निर्णय लिया।

1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान अमेरिका ने चीन के साथ मिलकर पाकिस्तान का पूरा सहयोग किया, जो कि भारत के लिए बेहद चिन्ता का विषय था। भारत ने भी 20 साल के लिए रूस से जो समझौता और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किया, वह अमेरिका और चीन दोनों को रास नहीं आया था। अमेरिका पाकिस्तान का लगातार सहयोग कर रहा था। परिणामस्वरुप भारत की मजबूरी बन गई थी कि भारत को गुटनिरपेक्ष रहते हुए भी रूस के साथ बना रहे।

इस शीत युद्ध से अपने आप को भारत ने बिल्कुल अलग रखा। लेकिन 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका पाकिस्तान के साथ था और वह कालखंड अमेरिकी रिश्तों के ठंडेपन का समय था। जब उस युद्ध में भारत की जीत हुई, तब अमेरिका नें दक्षिणी एशिया में भारत को एक बड़ी शक्ति माना और भारत के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन यह ठंडापन कमोबेश बरकरार रहा।

इसके बाद जब 1991 में सोवियत रूस का विघटन हुआ तो दुनिया एक ध्रुवीय हो गई और फिर धीरे-धीरे गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी कमजोर पड़ गया। भारत की आर्थिक नीति में भी प्रत्यक्ष परिवर्तन हुआ और पूंजीवादी आर्थिक स्थिति का तेजी से उभार हुआ। जिसके बाद भारत और अमेरिका के संबंध मजबूत होते गए।

1974 में भारत ने परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को चौंका दिया, क्योंकि भारत से पहले इस तरह का न्युक्लियर परमाणु परीक्षण संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थाई सदस्यों को छोड़कर किसी ने नहीं किया था। भारत परमाणु परीक्षण के बाद दुनिया के उन ताकतवर देशों की सूची में शामिल हो गया, जिसके पास परमाणु हथियार थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस परमाणु परीक्षण ‘बुद्ध मुस्कुराये’ को शांतिपूर्ण परीक्षण कहा।

भारत के परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत को परमाणु सामग्री और ईंधन आपूर्ति पर रोक लगा दी, साथ ही भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए, लेकिन इस विषम परिस्थिति में रूस ने भारत का साथ देकर भारत और रूस के साथ संबंधों को और मजबूत किया। पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद भारत के पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान दोनों में खलबली मच गई। भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाने का दबाव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाया जाने लगा। भारत और अमेरिका के बीच अंतरराष्ट्रीय संबंध सामान्य तरीके से ही चलते रहे लेकिन इसमें कोई सुधार नहीं आया।

तब से आज तक भारत और अमेरिका की रिश्तों में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। 90 के दशक में जब भारत एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हो रहा था, तब भी अमेरिका को यह अच्छा नहीं लगा था। वह भारत को साथ मे रखना तो चाहता है पर स्वावलंबी भारत उसे पसंद नहीं है। वह पाकिस्तान जैसा साथी चाहता है जो हर मुद्दे पर चाहे वह आर्थिक सहायता की बात हो या सैन्य संबंधों की, झुक कर साथ रहे। पर भारत ऐसा बन नहीं सकता है। इसी के चलते भारत ने जब 1998 में परमाणु परिक्षण किया था, तब अमेरिका ने इसका खुल कर विरोध किया था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत से सभी रिश्तों को ख़त्म करने की धमकी दी थी।

1998 के परीक्षण के बाद अमेरिका सहित कई देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध भी लगा दिए। अमेरिका ने भारत से अपने राजदूत को भी वापस बुला लिया था। इसके बाद कुछ समय तक दोनों देशों के बीच काफी तनातनी रही, लेकिन फिलहाल के वर्षों में दोनों देश एक दूसरे से बहुत नजदीक आए हैं। अमेरिका को एशिया में अपना प्रभुत्व जमाए रखने के लिए भारत की सख्त जरूरत है।

उसी प्रकार भारत को व्यापार और रक्षा कारणों से अमेरिका की जरूरत है। वर्ष 2002 में अटल जी ने अमेरिका ने संयुक्त सत्र को संबोधित कर भारत और अमेरिका के बीच नए संबंधों की नींव रखी थी। 2008 में डॉ. मनमोहन सिंह के समय भारत और अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर डील ने भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को और भी मजबूत किया।

बराक ओबामा के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों में और निकटता आई और दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग सुधार और व्यापार में वृद्धि हुई। वर्ष 2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत यात्रा की। ओबामा ने भारतीय कारोबारियों को संबोधित किया, साथ ही भारत में निवेश करने और तकनीकी हस्तांतरण जैसे तमाम मुद्दों पर समझौता भी किया।

वर्ष 2015 में बराक ओबामा की दूसरी भारत यात्रा ने भारत और अमेरिका के रिश्ते को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया, क्योंकि भारत और अमेरिका ने साथ मिलकर आतंकवाद को खत्म करने और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के निर्माण के लिए कई समझौते किए। साथ ही जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, गरीबी, कुपोषण, मानवाधिकार जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर साथ रहकर काम करने की इच्छा जताई। इससे दोनों देश कई मुद्दों पर एक दूसरे के करीब आए।

ट्रंप के कार्यकाल के दौरान भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों को और मजबूती मिली। डोनाल्ड ट्रंप का भारत के खिलाफ शुरू से रवैया काफी ख़ास रहा है। ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के समय कहा था कि यदि वे राष्ट्रपति बनते हैं, तो अमेरिका में रह रहे भारतीयों के लिए लिए व्हाइट हाउस में एक सच्चा दोस्त होगा। ट्रंप ने आतंकवाद को खत्म करने के लिए भारत से ख़ास मदद मांगी। अफगानिस्तान में भारत को सहयोग देने को कहा, हालांकि इसमें अमेरिकी हित अधिक हैं।

उधर चीन की बढ़ती आर्थिक ताक़त भी अमेरिका के लिए चिंता का एक कारण है। चीन के प्रभाव को कम करने के लिए भारत और अमेरिका की नेवी ने एशिया और प्रशांत महासागर में एक साथ युद्धाभ्यास किया। स्पष्ट है कि आज अमेरिका को अगर चीन को तगड़ा जवाब देने और उसके प्रभाव को कम करने के लिए भारत की सख्त जरूरत है।

राष्ट्रों के आपसी संबंध भले ही आत्मीय दिखते हों पर वे आत्मीय होते नहीं है। यह काल, परिस्थितियों, परस्पर कूटनीतिक जरूरतें, अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों और समीकरणों पर आधारित होते है। ट्रंप और हमारे पीएम कितनी भी गर्मजोशी से परस्पर आलिंगनबद्ध दिखें पर दोनों ही अपने-अपने देश के आर्थिक और राजनीतिक ज़रूरतों को ध्यान में रखते हैं।

सुरक्षा और आवभगत के बढ़िया प्रबंधन को छोड़ दें तो सबसे अहम प्रश्न यह उपस्थित है कि ट्रंप की इस यात्रा से हमें क्या लाभ होगा। वे कहते हैं भारत ने उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया पर वे मोदी को बहुत निकट मानते हैं। यह उनकी निजी यात्रा तो नहीं है? अगर यह राजनयिक शिखर यात्रा है तो फिर भारत को उनकी यात्रा से क्या हासिल हो रहा है? अभी तक तो ऐसा कुछ भी नहीं प्रकाश में आया है कि उनकी भारत यात्रा से हमें किसी प्रकार के लाभ होने की उम्मीद हो। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद भारत को क्या उपलब्धि मिली यह तो नही मालूम, पर जो नुकसान और विपरीत बात हुई, वह कुछ इस प्रकार है,
● भारत को आयात निर्यात में जो विशेष दर्जा मिलता था, वह खत्म हो गया है। इसका असर भारतीय उद्योगों पर बुरी तरह पड़ेगा।
● वीसा नीति में बदलाव होने से हमारे
नागरिकों को अमेरिका में दिक्कतें हुईं।
● कोई बड़ा समझौता उनके आगमन के अवसर पर होने वाला भी नहीं है और आगे भी यह कहा जा रहा है कि चुनाव के पहले हो या बाद में यह अभी तय नहीं।
● अगर ट्रंप चुनाव हार जाते हैं तो यह सब नीतियां क्या करवट लेंगी, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है।

ट्रंप के कार्यकाल में भारत अमेरिका सम्बंध अधिकतर सनक भरे ही रहे। खुद ट्रंप एक अहंकारी और सनकी व्यक्ति लगते हैं। अमेरिकी मीडिया को नियमित पढ़ने और देखने वाले लोग वहां की मीडिया में उनके बारे में प्रकाशित और प्रसारित होने वाली रोचक तथा दिलचस्प खबरों को पढ़ कर उनके बारे में अपनी राय बना सकते हैं। सीएनएन ने एक ट्विट में साल 2019 में ट्रंप द्वारा बोले जाने वाले झूठ पर एक दिलचस्प टिप्पणी लिखी है। सीएनएन के अनुसार, ट्रंप ने साल 2019 में प्रतिदिन सात झूठ की दर से झूठ बोला है।

अमेरिकी मीडिया हमारी मीडिया की तरह से समर्पित मीडिया नहीं है और सीएनएन तो अपनी साफगोई के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। भारत यात्रा के बारे में भी सीएनएन का कहना है कि यहां भी ट्रंप 25 झूठ प्रतिदिन की दर से बोल सकते हैं। आज जब भारत में सरकार से सवाल करने वाला मीडिया बहुत कम बचा है तो अमेरिकी मीडिया का यह साहस प्रशंसनीय है।

फिर भी एक अतिविशिष्ट अतिथि हमारे घर आए हैं। यात्रा के समापन के बाद अगर कोई साझी प्रेसवार्ता, दोनों नेताओं की होती है तभी इस यात्रा की उपयोगिता और अनुपयोगिता का मूल्यांकन किया जा सकता है। ट्रंप की यात्रा के संबंध में सुब्रमण्यम स्वामी का एक बेबाक दृष्टिकोण उल्लेखनीय है। उनका कहना है कि ” ट्रंप इसलिए आये हैं कि उनकी आर्थिकी को और गति मिले, न कि हमारी अर्थव्यवस्था को। हो सकता है कुछ रक्षा सौदे हों और उससे उन्हीं के देश की आर्थिकी को मजबूती मिलेगी।”

डॉ. स्वामी अपनी ही सरकार की आर्थिक नीतियों के आलोचक हैं। किसानों के लिए डेयरी उद्योग, पॉल्ट्री उद्योग में जो आयात खोलने की बात कही गई है, उसे लेकर भी आशंकाएं हैं, लेकिन हमने नमस्ते ट्रंप से क्या पाया और क्या खोया का मूल्यांकन तभी किया जा सकता है जब दोनों देशों के समझौते, जो भी उभय देशों के बीच होते हों, सामने आ जाएं, तभी संभव है। फिलहाल ट्रंप की यात्रा चल रही है। यह यात्रा हमारे कूटनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक हित में ही हो, यही शुभकामनाएं हैं।

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This post was last modified on February 25, 2020 3:34 pm

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