Sunday, October 17, 2021

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सुप्रीम कोर्ट में जो सरकार कहे वही सही !

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कोरोना संकट को लेकर तरह-तरह की राहत को लेकर उच्चतम न्यायालय में याचिकाएं डाली जा रही हैं और दूसरी और सरकार का यही रुख है कि ये स्व- रोजगार पैदा करने वाली याचिकाएं हैं। इस तरह की याचिकाओं को कोर्ट को सुनना ही नहीं चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को नर्सों और स्वास्थ्य कर्मचारियों, सफाई कर्मचारियों के संरक्षण और सुरक्षा के अलावा उन प्रवासी कामगारों को मज़दूरी के भुगतान के लिए, जो देशव्यापी तालाबंदी के कारण बिना काम के रह गए हैं, कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई की। अंततः सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि उसके निर्देशों का पालन किया जाए, जिसे न्यायालय ने दर्ज़ किया।

स्वामी अग्निवेश की याचिका

कोरोनो वायरस संकट के दौरान गरीबों को तत्काल राहत प्रदान किए जाने की मांग वाली स्वामी अग्निवेश की याचिका सुनवाई के लिए आई तो स्वामी अग्निवेश के लिए पेश वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विसने कहा कि लॉकडाउन ने एक बड़ा संकट पैदा कर दिया है और ऐसा नहीं है कि सॉलिसिटर जनरल जो दावा कर रहे हैं, उस पर जमीनी कार्रवाई की जा रही है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उक्त याचिका के औचित्य पर चिंता व्यक्त की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस विशेष याचिका के संबंध में मेरी गंभीर आपत्तियां हैं। ये स्व-रोजगार पैदा करने वाली याचिकाएं हैं। इस तरह की याचिकाओं को कोर्ट को सुनना ही नहीं चाहिए। मुझे इस तरह की याचिकाओं के बारे में गंभीर समस्याएं हैं।

दरअसल केंद्र ने कोरोनो वायरस महामारी के मद्देनजर 21 दिन के देशव्यापी लॉकडाउन के कारण काम पर गए प्रवासी श्रमिकों को मजदूरी के भुगतान के लिए एक्टिविस्ट द्वारा दायर याचिकाओं का भी कड़ा विरोध किया था। 3 अप्रैल को, प्रवासी श्रमिकों की दुर्दशा पर हर्ष मंदर द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि जब तक देश इस संकट से बाहर नहीं निकलता तब तक PIL की दुकानें बंद होनी चाहिए। जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि वातानुकूलित कार्यालय में बैठकर बिना किसी जमीनी स्तर की जानकारी या ज्ञान के जनहित याचिका तैयार करना ‘सार्वजनिक सेवा नहीं है।

स्वामी अग्निवेश की याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति एन वी रमना, न्यायमूर्ति, संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ ने की और केंद्र सरकार द्वारा जमीनी स्तर पर प्रस्तावित राहत उपायों के कार्यान्वयन के बारे में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बयानों को दर्ज किया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि लॉकडाउन ने एक बड़ा संकट पैदा कर दिया है और सॉलिसिटर जनरल द्वारा पेश किए गए हलफनामे के बावजूद, कि सब कुछ किया जा रहा है, उस पर कोई उचित कार्यान्वयन नहीं किया जा रहा है। सॉलिसिटर जनरल  तुषार मेहता ने पीठ से  कहा कि केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि निर्देशों का पालन किया जाए। उन्होंने ने कहा कि हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इसका पालन किया जाए। हम राज्यों से बात करेंगे। केंद्र सरकार के दिन-प्रतिदिन के निर्देशों का अनुपालन राज्यों द्वारा किया जा रहा है।

पीठ ने सॉलिसिटर जनरल को बताया कि शिकायत यह है कि उपायों को जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जा रहा है। इस पर तुषार ने जवाब दिया कि बेंच के पास केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं करने का कोई कारण नहीं है। सॉलिसिटर जनरल ने स्व-रोजगार पैदा करने वाली याचिकाओं के नियमों पर भी प्रकाश डाला और कहा कि न्यायालयों को इस तरह की जनहित याचिकाओं पर विचार करने से बचना चाहिए। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल के बयान को दर्ज करने के लिए कहा कि याचिका में प्रार्थनाओं को संबोधित करने के लिए उचित कदम उठाए जा रहे हैं। तदनुसार, याचिका का निस्तारण किया गया।

एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर नोटिस नहीं

उच्चतम न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका, जिसमें सरकारी दिशानिर्देशों के अप्रभावी कार्यान्वयन की शिकायत की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप ऐसे नागरिकों को, जिन्हें तत्काल/सुसंगत चिकित्सा की आवश्यकता होती है (जैसे कि कैंसर रोगी और गर्भवती महिलाएं) को मुश्किल उठानी पड़ी थी, को खारिज कर दिया गया है। ज‌स्टिस एनवी रमना, संजय किशन कौल और बीआर गवई की खंडपीठ ने कहा कि एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर नोटिस जारी नहीं किया जा सकता है, इसलिए जनहित याचिका को खारिज किया जाता है। वरिष्ठ अधिवक्ता सोनिया माथुर याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुई थीं।

याचिका में मेडिकल इमरजेंसी के संदर्भ में ‘आवश्यक’ अपवादों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए सरकारी अधिकारियों/अस्पतालों को निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। याचिका में मुद्दा उठाया गया था कि इन दिनों स्वास्थ्य-सेवा का पूरा अमला कोविड-19 के मरीजों के इलाज में लगा हुआ है, जिसके चलते अनजाने में कैंसर, एचआईवी और गुर्दे की बीमारियों जैसे रोगियों को चिकित्सा सुविधाएं पाने में मुश्किल आ रही है।

यह सोचना जरूरी है कि ऐसे मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और मौजूदा स्थिति में उन्हें देश भर के अधिकांश ओपीडी और ऑपरेशन थिएटरों के बंद होने के कारण परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। याचिका में कहा गया कि लॉक डाउन की अव‌धि में आवश्यक सेवाओं की श्रेणी में शामिल होने के बावजूद “आपातकालीन/ जीवन रक्षक चिकित्सा आवश्यकताओं” के प्रावधानों को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है, इसलिए, विभिन्न प्रकार के रोगियों के जीवन दांव पर लग गया है।

स्वास्थ्य कर्मियों की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन

केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया है कि स्वास्थ्य कर्मचारियों की शिकायतों को दूर करने के लिए जल्द ही एक हेल्पलाइन नंबर शुरू किया जाएगा। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि स्वास्थ्य सेवा से जुड़े कर्मचारी PPE की गैर-उपलब्धता, वेतन में कटौती, घर मालिकों द्वारा बेदखली आदि की शिकायत उस हेल्पलाइन पर कर सकते हैं और दो घंटे के भीतर उनकी शिकायतों का निवारण किया जाएगा।

जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस  बीआर गवई की पीठ युनाइटेड नर्सेज एसोसिएशन और इंडियन प्रोफेशनल नर्सेज एसोसिएशन व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कोविड -19 के लिए एक राष्ट्रीय प्रबंधन प्रोटोकॉल तैयार करने के लिए शीर्ष अदालत से निर्देश मांगे गए थे। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि एक हेल्पलाइन नंबर दिया जाएगा और कोई भी परेशान स्वास्थ्य कर्मचारी पीपीई की गैर-उपलब्धता, वेतन कटौती, घर मालिकों द्वारा बेदखली आदि के बारे में हेल्पलाइन कॉल कर सकता है। कॉल के 2 घंटे के भीतर किसी भी शिकायत का ध्यान रखा जाएगा।  केंद्र सरकार के इस आश्वासन पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं का निपटारा कर दिया।

सफाईकर्मियों की सुरक्षा पर सुनवाई से इनकार

उच्चतम न्यायालय ने उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया जिसमें ये कहते हुए दिशा-निर्देश मांगे गए थे कि कोरोना के प्रकोप के दौरान देशभर में सफ़ाई कर्मचारियों की समुचित सुरक्षा नहीं की जा रही है और कई राज्यों में वे उचित सुविधाओं के अभाव में मर रहे हैं। जस्टिस एन वी रमना, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने इस याचिका का निपटारा कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील महमूद प्राचा ने न्यायालय के समक्ष दलील दी थी कि सफ़ाई कर्मचारी मर रहे हैं और उनके लिए एक अलग पैकेज होना चाहिए। साथ ही उन्हें सुविधाएं भी दी जाएं। उन्होंने दावा किया कि डब्लूएचओ के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है। यहां तक कि उनके पास सुरक्षा गियर तक नहीं हैं। मुंबई में एक सफाई कर्मी की मौत भी हो गई।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ये पूरी तरह से झूठे आरोप हैं। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वे कहां मरे हैं? डब्लूएचओ के दिशानिर्देशों का पालन किया जा रहा है और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ-साथ इस खंड का भी ध्यान रखा जा रहा है। इन दलीलों के बाद पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को एक सामान्य बयान नहीं देना चाहिए और कहीं किसी की मौत हुई है तो वो हाईकोर्ट जा सकते हैं। पीठ ने इस याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को ये स्वतंत्रता दी जाती है कि वह किसी भी शिकायत के संबंध में संबंधित राज्य के हाईकोर्ट के पास जा सकते हैं।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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