Wednesday, April 17, 2024

गैर-बराबरी के समंदर में डूबते भारत का क्या है भविष्य?

“भारत दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश है और साथ ही सबसे ज्यादा विषम भी। हमारे ताजा पेपर (शोध पत्र) के मुताबिक पिछले एक दशक में आबादी के टॉप एक फीसदी हिस्से का धन तेजी से बढ़ा है, जबकि नीचे की आधी आबादी का हिस्सा बेहद कम बना हुआ है। अच्छे दिन आए हैं, लेकिन अधिकांशतः ऐसा धनी लोगों के लिए ही हुआ है।”

“भारत में तेजी से बढ़ती गैर बराबरी के बीच अगले महीने आम चुनाव होंगे। हमारे ताजा पेपर के मुताबिक टॉप की एक फीसदी आबादी का धन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। अरबपति राज का आगमन हो चुका है।”

“(नरेंद्र) मोदी ने भारत में गैर-बराबरी बढ़ने की रफ्तार तेज कर दी है। साथ ही उन्होंने लोकतांत्रिक पड़ताल के लिए आवश्यक डेटा को खत्म कर दिया है। अब हम फिर से टुकड़ों को जोड़ कर ये कहानी सामने रख रहे हैं।”

ये तमाम टिप्पणियां फ्रांस के अर्थशास्त्री लुकस चांसेल की हैं। चांसेल ने ये बातें भारत में आर्थिक गैर-बराबरी के बारे में अपने ताजा अध्ययन पत्र को जारी करते हुए कहीं। यह अध्ययन पत्र भारत में हो रहे आम चुनाव के मौके पर जारी किया गया है। चांसेल पेरिस स्थित संस्था ‘स्कूल फॉर एडवांस्ड स्टडीज फॉर सोशल साइंसेज’ से जुड़े हुए हैं। लेकिन दुनिया भर में उनकी शोहरत ‘इनइक्वैलिटी लैब’ के लिए किए गए उनके अध्ययनों के कारण है।

इनइक्वैलिटी लैब के साथ मशहूर अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी का नाम जुड़ा हुआ है। पिकेटी पहली बार चर्चा में 2013 में आए, जब उनकी पहली किताब Capital in the Twenty-First Century प्रकाशित हुई थी। ये वो समय था, जब 2008 की वैश्विक मंदी के क्रम में दुनिया भर में आर्थिक गैर-बराबरी का सवाल प्रमुख मुद्दा बना हुआ था। अमेरिका में हुए Occupy Wall Street आंदोलन ने एक प्रतिशत बनाम 99 प्रतिशत की बहस छेड़ी थी। Occupy आंदोलन यूरोप में भी फैल गया था। इन आंदोलनों ने यह विमर्श खड़ा किया कि कैसे नव-उदारवादी दौर में पैदा हो रहे धन का सबसे बड़ा हिस्सा टॉप एक फीसदी आबादी के हाथों में सिमट रहा है।

पिकेटी का योगदान यह रहा कि उन्होंने इस अनुभवजन्य बहस को ग्राफ और सारणियों के माध्यम से पेश किए गए आंकड़ों और तथ्यों के जरिए एक ठोस आधार प्रदान कर दिया। पिकेटी ने अपनी किताब में r>g की theory की व्याख्या की। इसके जरिए उन्होंने बताया कि जब संपत्तियों और निवेश पर रिटर्न (यानी मुनाफा) ग्रोथ (आर्थिक वृद्धि) से अधिक हो जाता है, तो धनवान लोगों की संपत्ति और बढ़ती चली जाती है। जाहिर है, ऐसा बहुसंख्यक आम आबादी की कीमत पर होता है।

तब से पिकेटी की पहचान आर्थिक विषमता के विशेषज्ञ के रूप में रही है। पिकेटी ने अपने काम को आगे बढ़ाते हुए पेरिस में Inequality Labs की स्थापना की, जिसमें अर्थशास्त्रियों की टीम लगातार विश्व में गैर-बराबरी के ट्रेंड का अध्ययन करती रहती है। अपने शोध के जरिए इन अर्थशास्त्रियों ने वैश्विक गैर-बराबरी के बारे में विस्तृत आंकड़ा भंडार (World Inequality Database) तैयार किया है।

पिकेटी की 2013 में आई किताब की एक बड़ी कमी यह बताई गई थी कि उसमें भारत के बारे में कुछ नहीं बताया गया था। इससे संबंधित प्रश्न पर पिकेटी ने कहा था कि भारत में आय संबंधी ठोस आंकड़ों का अभाव है। इसलिए वे भारत का अध्ययन नहीं कर पाए।

लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने लुकस चांसेल के साथ मिल कर भारत के बारे में अध्ययन शुरू किया। 2017 में उन्होंने भारत के बारे में अलग से एक विशेष अध्ययन रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट Indian income inequality, 1922-2015: From British Raj to Billionaire Raj? नाम से प्रकाशित हुई थी। (Microsoft Word – ChancelPiketty2017WIDworld.docx)

अब लुकस चांसेल ने अपने उसी काम को आगे बढ़ाया है। (Economic inequality in India: the “Billionaire Raj” is now more unequal than the British colonial Raj – WID – World Inequality Database) इसके जरिए उन्होंने बताया है कि 2015 से 2023 तक विषमता के मोर्चे पर क्या हुआ। इस ताजा शोध पत्र के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैः

  • भारत में आजादी के बाद से 1980 के दशक तक गैर-बराबरी में कमी आई। उसके बाद इसमें फिर बढ़ोतरी शुरू हुई, जो 21वीं सदी के पहले दशक के आरंभिक वर्षों से बहुत तीव्र गति से बढ़ने लगी।
  • धन संकेंद्रण के लिहाज से 2014-15 और 2022-23 के बीच गैर-बराबरी में हुई वृद्धि खास ध्यान खींचती है। 2022-23 तक देश की कुल आमदनी और धन का क्रमशः 22.6 प्रतिशत और 40.1 प्रतिशत हिस्सा टॉप एक फीसदी आबादी के हिस्से में जा चुका है।
  • सबसे धनी एक फीसदी आबादी के पास देश की आय एवं धन के संकेद्रण का यह सबसे ऊंचा स्तर है।
  • भारत दुनिया के उन देशों में पहुंच गया है, जहां टॉप एक फीसदी आबादी की आमदनी का स्तर सबसे ऊंचा है। इस मामले में भारत ने दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। (यानी भारत में उन देशों की तुलना में भी अधिक गैर-बराबरी हो चुकी है।)
  • चांसेल के पिछले अध्ययन के अनुरूप ही ताजा शोध पत्र भी इस निष्कर्ष पर है कि (देश के) सकल धन के नजरिए से देखा जाए, तो कहा जाएगा कि भारत का इनकम टैक्स सिस्टम प्रतिगामी (regressive) है।
  • शोध पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत में आर्थिक डेटा की गुणवत्ता खराब है। इसमें हाल के वर्षों में और गिरावट आई है। पत्र में कहा गया है- “अतः यह संभव है कि ये नए अनुमान गैर-बराबरी की स्थिति को उससे कहीं कम बता रहे हों, जितनी यह असल में है।”
  • इन निष्कर्षों के आधार पर शोध पत्र में कुछ सुझाव भी दिए गए हैँ। कहा गया है कि आय एवं धन दोनों मोर्चों पर टैक्स संहिता का ढांचा फिर से तैयार किए जाने की जरूरत है, ताकि स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण में व्यापक सार्वजनिक निवेश हो सके।
  • इस संदर्भ में शोध पत्र में देश के सबसे धनी 167 परिवारों पर दो फीसदी का सुपर टैक्स लगाने का सुझाव दिया गया है। कहा गया है कि उससे राष्ट्रीय आय के 0.5 प्रतिशत हिस्से के बराबर का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा, जिससे सरकार उपरोक्त मदों में निवेश करने के अधिक योग्य हो सकेगी।

इनकम टैक्स के ढांचे को बदल कर सचमुच विषमता की समस्या का मुकाबला किया जा सकता है या नहीं, यह एक विवादास्पद मुद्दा है। इसकी वजह यह समझ है कि खुद आय में गैर-बराबरी के पीछे ठोस ढांचागत कारण मौजूद है। यह कारण है धन की असमानता। खासकर उत्तराधिकार में मिलने वाला धन, जो जन्म से ही गैर-बराबरी पैदा कर देता है।

और अगर विभिन्न देशों के आंकड़ों पर गौर करें, तो सामने यह आता है कि वहां धन की जितनी विषमता है, आय की विषमता उससे काफी कम है। यहां तक कि स्कैंडिनेवियन देशों की भी इस मामले में बदसूरत तस्वीर उभरती है, जबकि आम तौर पर उन देशों को सोशल डेमोक्रेटिक और अधिक समान माना जाता है। इन देशों में स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे और फिनलैंड शामिल हैं।

दुनिया भर का अनुभव यह है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में धन से धन पैदा होता है। धनी लोगों के पास अपनी जमीन, जायदाद, संपत्ति, निवेश आदि से rent कमाने की सुविधा बनी रहती है, जिस कारण वे लोग हमेशा नुकसान में रहते हैं, जिनके पास आर्थिक उपार्जन का एकमात्र स्रोत अपनी हुनर और मेहनत है।

इसी हकीकत को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश अर्थशास्त्री माइकल रॉबर्ट्स ने कहा है- ‘टैक्स और विनियमन के जरिए आय की गैर-बराबरी घटाने की नीतियां ज्यादा प्रभावशाली नहीं होंगी। यहां तक कि ऐसा श्रमिकों का वेतन भी बढ़ा कर नहीं किया जा सकता है। ऐसा तब तक नहीं होगा, जब तक धन की असमानता का ऊंचा स्तर बना रहेगा। धन की विषमता का कारण हैउत्पादन के साधनों और वित्त का कुछ हाथों में संकेद्रण। अगर स्वामित्व के ढांचा को जैसे को तैसा बने रहने दिया जाता है, तो फिर धन पर टैक्स लगाने से भी (गैर-बराबरी दूर करने का) मकसद हासिल नहीं होगा।’ (Wealth or income? – Michael Roberts Blog (wordpress.com))

थॉमस पिकेटी ने 2013 की अपनी किताब में गैर-बराबरी घटाने के लिए टैक्स सिस्टम को प्रगतिशील बनाने के सुझाव दिए थे। लेकिन बाद में उन्हें भी संभवतः यह अहसास हुआ कि यह तरीका नाकाफी है। 2020 में उनकी नई किताब Capital and Ideology आई। इसमें उन्होंने दलील दी कि गैर-बराबरी एक चयन है। इसे समाज खुद चुनते हैं। यह टेक्नोलॉजी या भूमंडलीकरण का अनिवार्य परिणाम नहीं है।

पिकेटी ने कहा कि अनेक समाजों में गैर-बराबरी बढ़ी है, क्योंकि वहां के शासक वर्ग गैर-बराबरी के पक्ष में फर्जी तर्क पेश करने में सफल रहे हैं। हर समाज विषमता को सही ठहराने के लिए एक विचारधारा पैदा करता है। पिकेटी ने कहा कि रॉनॉल्ड रेगन के युग से लेकर आज तक अमेरिका में मुक्त बाजार पूंजीवाद का वर्चस्व रहा है। रेगन-वाद ने धन के संकेद्रण को उचित ठहराना शुरू किया, जैसे कि अरबपति हमारे रक्षक हों! तब से गैर-बराबरी दो गुना हो गई है। आबादी के धनी हिस्सों की तरफ धन के ट्रांसफर के इस दौर को खत्म करने की जरूरत है।

इस रूप में पिकेटी अपनी आरंभिक समझ से आगे बढ़े। इसके बावजूद वे अभी तक धन एवं स्वामित्व के पारंपरिक ढांचे को तोड़ने की जरूरत उन्होंने नहीं महसूस की है। उन्हें लगता है कि विचारधारात्मक संघर्ष के जरिए रेगन-थैचर के दौर से चल रही अर्थव्यवस्था को पलटा जा सकता है और इस तरह गैर-बराबरी का समाधान ढूंढा जा सकता है। जबकि एक दूसरी- कहीं अधिक तार्किक एवं गहरी- समझ यह है कि विचारधारा खुद समाज में वर्ग संघर्ष का परिणाम होती है। (Capital not ideology – Michael Roberts Blog (wordpress.com))

बहरहाल, यह एक गंभीर और दूरगामी बहस है। फिलहाल, इसे यहीं छोड़ते हुए हम बढ़ रही गैर-बराबरी के मुद्दे पर लौटते हैं। गैर-बराबरी इस वक्त संभवतः दुनिया की सर्वोपरि समस्या है। दरअसल, अनेक ऐसे मसले, जो हमारी रोजमर्रा की चर्चाओं पर छाये रहते हैं, उनकी जड़ में भी यही समस्या मौजूद है। मसलन, इस समय लोकतंत्र का ह्रास एक विश्वव्यापी चिंता है। जबकि अगर गहराई से देखा जाए, तो इसका मूल कारण यही नजर आता है कि बढ़ी गैर-बराबरी से अधिक ताकतवर हुए समृद्ध वर्ग अपनी सुख-सुविधा को निरंतर बढ़ाने की चाहत में लोकतांत्रिक प्रणालियों को पटरी से उतारने में लगे हुए हैं।

इसलिए विषमता अब सिर्फ समाजवादी चिंतकों या अर्थशास्त्रियों की चिंता का विषय नहीं रह गई है। बल्कि बेलगाम पूंजीवाद और मुक्त बाजार की संचालक प्रमुख एजेंसी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पदाधिकारी भी इसके दुष्परिणामों पर चर्चा करने लगे हैं। आईएमएफ की महानिदेशक क्रिस्टीना जियोरगिएवा ने हाल में कहा-‘दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि दर घट रही है। वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर निम्न स्तर पर है। इसका कारण धन और आय की बढ़ती गैर-बराबरी है। हमें उस खामी को दूर करना है, जो पिछले 100 वर्ष से मौजूद है- यह खामी है आर्थिक गैर-बराबरी। आईएमएफ के रिसर्च से यह सामने आया है कि अगर आय की गैर-बराबरी कम हो, तो अधिक ऊंचा और टिकाऊ ग्रोथ हासिल होता है।’ (How the G20 Can Build on the World Economy’s Recent Resilience (imf.org))

जियोरगिएवा आईएमएफ के महानिदेशक पद पर पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा करने जा रही हैं। अब उन्होंने दूसरा कार्यकाल पाने की मुहिम शुरू की है। इसमें उन्होंने गैर-बराबरी घटाने को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया है। उन्होंने कहा है कि ग्रोथ और समृद्धि के नव-उदारवादी मॉडल को अब बदले जाने की जरूरत है। इसकी जगह समावेशी विकास (inclusive growth) का मॉडल अपनाए जाने की जरूरत है, जिसका मकसद सिर्फ जीडीपी बढ़ाना नहीं, बल्कि विषमता घटाना भी हो।

यह अफसोसनाक है कि जब नव-उदारवाद के सबसे बड़े पैरोकार एवं पंडित इस मॉडल पर पुनर्विचार कर रहे हैं, भारत के राजनीतिक एवं चुनावी विमर्श में यह मुद्दा सिरे से गायब है। हमारे यहां अभी भी उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमंडलीकरण के उस मॉडल से पक्ष और विपक्ष बिना किसी बहस-मुबाहिशे के चिपके हुए हैं, जिसे अब खुद उसके गढ़ में चुनौती मिल रही है। 1980 के दशक में कही गई मार्गरेट थैचर की इस बात पर भारत में आज भी लगभग आम सहमति दिखती है कि इस मॉडल का कोई विकल्प नहीं है। जबकि इस मॉडल के दुष्परिणामों ने इसके सबसे बड़े गढ़ अमेरिका को झकझोर दिया है। इस मॉडल के कराण महाशक्ति की उसकी हैसियत आज खतरे में पड़ी दिखती है।

जब गढ़ का यह हाल हुआ, तो इस मॉडल के कारण पिछलग्गू देशों और वहां की बहुसंख्यक आबादी की हुई बदहाली को आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन हमारा राजनीतिक नेतृत्व इस साधारण समझ से भी दूर नजर आता है। इसीलिए लुकस चांसेल (यानी इनइक्लिटी लैब) का ताजा शोध पत्र भारत में कोई बड़ी बहस खड़ी नहीं कर पाया है। एक दिन की अखबारी सुर्खियों के साथ यह खबर पृष्ठभूमि में चली गई है। यह भारत के बौद्धिक वातावरण पर एक प्रतिकूल टिप्पणी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति भारत के वर्तमान एवं (निकट) भविष्य को लेकर मायूसी पैदा करती है।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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