Wednesday, April 17, 2024

आदिवासी सेंगेल अभियान का नारा- वोट किसे दें, की बजाय जरूरी है कि वोट क्यों दें?  

ओडिशा के मयूरभंज जिला मुख्यालय बारिपदा के छोउ पोड़िआ में विगत 24 मार्च 2024 को आदिवासी सेंगेल अभियान बारिपदा की जोनल कमेटी ने एक जनसभा का आयोजन किया था। इस दौरान जनसभा में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए और आदिवासी समाज को पुनर्स्थापित करने के लिए सेंगेल अभियान का नारा है “मांझीबाबा (ग्राम प्रधान) बदलो, गांव बचाओ” क्योंकि अधिकांश मांझीबाबा अशिक्षित, पियक्कड़, संविधान व कानून से अनभिज्ञ होते हैं और वे आदिवासी ग्राम समाज में नशापन, अंधविश्वास, डाहाणी प्रथा (डाहाणी के नाम पर हत्या), ईर्ष्या-द्वेष, जुर्माना लगाना, सामाजिक बहिष्कार करना, चुनाव में वोट की खरीद-बिक्री, महिला विरोधी मानसिकता आदि फैला रहे होते हैं। वहीं सरना धर्म कोड को मान्यता कराने के लिए अपने गांवों में बैठक नहीं करते हैं, सहयोग भी नहीं करते हैं। अत: सेंगेल ने उक्त कुप्रथा को दूर करने की ठान ली है। 

बताना जरूरी हो जाता है कि मांझीबाबा यानी संथाल आदिवासी समाज का ग्राम प्रधान का पद संथाल समाज की पारंपरिक शासन व्यवस्था के तहत वंशानुगत होता है। ऐसे में उसी के हर फैसले को मानना संथाल समाज के सभी लोगों की मजबूरी होती है। चाहे वह फैसला सामाजिक दृष्टिकोण और सामयिक तौर पर गलत ही क्यों ना हो। इस वंशानुगत व्यवस्था का विरोध आदिवासी सेंगेल अभियान द्वारा लगातार किया जा रहा है।

जनसभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज को बचाने के लिए सरना धर्म कोड को मान्यता दे कर प्रकृति पूजक आदिवासियों को धार्मिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। क्योंकि 2011 की जनगणना में 50 लाख आदिवासियों ने सरना धर्म लिखा था, लेकिन जैनियों ने केवल 44 लाख लिखा था। बावजूद आदिवासियों का उनका कोड नहीं दिया गया, यह एक तरह से आदिवासियों के संवैधानिक मौलिक अधिकार नहीं दिया जाना है, जो केंद्र सरकार की एक साजिश है। आदिवासियों को अलग कोड नहीं दिए जाने के कारण परोक्ष रूप से उन्हें हिन्दू धर्म मे परिवर्तित होने को बाध्य किया जा रहा है। अतः अब व्यापक आदिवासी जन एकता और वृहत निर्णायक जन आंदोलन के बिना कुछ नहीं बचेगा। अतएव इस साल के चुनाव में किसे वोट देना है, की बजाय यह सोचना जरूरी है कि वोट क्यों दें? मतलब सरना धर्म कोड की बात जो करेगा, आदिवासी उसी को वोट देगा। 

वक्ताओं में केंद्रीय सेंगेल संयोजक बुधन मार्डी, ओडिशा प्रदेश सेंगेल अध्यक्ष नरेंद्र हेम्ब्रम, ओडिशा प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष मल्हा मार्डी, पानमनी हेम्ब्रम, बारिपदा उपखंड सेंगेल अध्यक्ष विकास चंद्र हेम्ब्रम, जोनल उपाध्यक्ष बहादुर मुर्मू, जीतेंद्रनाथ हेम्ब्रम, जोनल परगना माधव चंद्र मुर्मू, बबलु मुर्मू, उदयनाथ हेम्ब्रम, चंदन कुमार सोरेन, पीथ मांझी, मेघराय सोरेन मुख्य रूप से अपना विचार रखे। जनसभा का आयोजन सेंगेल परगना अध्यक्ष नारन मुर्मू के नेतृत्व में किया गया।

वहीं दूसरी तरफ पूर्व सांसद और आदिवासी सेंगेल अभियान के केंद्रीय अध्यक्ष सालखन मुर्मू ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा है कि आदिवासी गांव- समाज पिछड़ने को मजबूर है। उसकी आंतरिक कमजोरियों ने उसे आगे बढ़ने से रोक रखा है। जिसमें आदिवासी स्वशासन व्यवस्था अर्थात मांझी परगना व्यवस्था का जनतांत्रिक और संवैधानिक विरोधी रवैया प्रमुख है। अंतत: यह स्वशासन से स्वशोषण में तब्दील हो गया है। स्वशासन के नाम पर गांव-गांव में वंशानुगत नियुक्त अधिकांश मांझी और परगना जहां अनपढ़ और पियक्कड़ हैं, वहीं संविधान, कानून और मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन करते हैं। नतीजतन आए दिन किसी को भी मनमानी जुर्माना लगाना, सामाजिक बहिष्कार करना और किसी को भी डायन करार देना इनका रोजमर्रा का कार्यक्रम बन गया है।

आदिवासी गांव- समाज में जनतांत्रिक और संवैधानिक मर्यादाओं को लागू करते हुए सबको न्याय, सुरक्षा और विकास के पथ पर अग्रसर करने हेतु आदिवासी सेंगेल अभियान ने संलग्न नारा और 5 उत्तर के साथ जन जागरण अभियान को गांव गांव तक पहुंचाने का कार्य शुरू कर दिया है। दीवार लेखन और पर्चा वितरण 7 प्रदेशों के लगभग 50 ज़िलों में जारी है। यह व्यवस्था परिवर्तन की मांग निश्चित आदिवासी गांव- समाज को गुलामी से आजादी की ओर, हार से जीत की ओर अग्रसर कर सकेगा।

  “माझी बदलो, गांव बचाओ” का नारा क्यों ?

 ■ क्योंकि अधिकांश माझी (ग्राम प्रधान) गांव- समाज बचाने में सहयोग नहीं करते हैं।

 ■ आदिवासी एजेंडा अर्थात हासा (भूमि), भाषा (संताली राजभाषा), जाति (ST), धर्म (सरना- मरांग बुरू), रोजगार (डोमिसाइल, आरक्षण) आदि बचाने में सहयोग नहीं करते हैं।

 ■ आदिवासी एजेंडा के लिए गांव में बैठक नहीं करते हैं।

 ■ वंशानुगत माझी- परगना व्यवस्था के कारण निर्दोष गांव- समाज मर रहा है। चूंकि अधिकांश माझी-परगना अनपढ़, पियक्कड़ हैं।

 ■ आदिवासी एजेंडा पर चुप रहने वाले सामाजिक- राजनीतिक नेता और संगठन आदिवासी गांव- समाज के शत्रु हैं, अतः हमें सावधान रहना होगा।

(झारखंड से विशद कुमार की रिपोर्ट)

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