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‘ग़रीब-कल्याण-रोज़गार’ के नाम पर अभी तो सरकार ने सिर्फ़ मुनादी ही करवाई है

कृपया मेरी इस वेदना पर यक़ीन करें कि 30 साल के अपने पत्रकारीय जीवन में मैंने कभी किसी एक ख़बर का ब्यौरा जानने के लिए इतनी मगज़मारी या इतनी मेहनत नहीं की, जितना बीते चार दिनों में ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ का ब्यौरा जानने के लिए की। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि तमाम सरकारी शोर-शराबे और डुगडुगी बजाकर मुनादी करवाने वाले चिर-परिचित अन्दाज़ के साथ शुरू हुई 50,000 करोड़ रुपये के अभियान का वास्ता जिस ‘ग़रीब’, ‘कल्याण’ और ‘रोज़गार’ से है, वहीं तीनों मिलकर ही तो असली ‘भारत’ बनाते हैं।

लिहाज़ा, ‘इंडिया’ वाली कोरोना और भारत-चीन सीमा विवाद के सच-झूठ पर नज़र रखते हुए मैं अभियान की बारीकियाँ जानने में भी जुटा रहा। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के कुछेक आला अफ़सरों से भी सम्पर्क किया, लेकिन सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों, ट्विटर-फ़ेसबुक के ढकोसलों और पॉवर प्वाइंट प्रेज़ेंटेशन वाले ऑडियो-वीडियो भाषणबाज़ी के सिवाय और कुछ भी हाथ नहीं लगा।

कैसे होगा चमत्कार?

यानी, मेरा सारा पत्रकारीय कौशल और अनुभव भी ये पता नहीं लगा पाया कि बिहार और बंगाल की चुनावी बेला को ध्यान में रखकर घोषित हुआ केन्द्र सरकार का चमत्कारी अभियान वास्तव में ज़मीन पर कब से और कितना चमत्कार दिखा पाएगा? कोरोना की मार खाकर बदहवासी के साथ अपने गाँवों को लौटे कितने स्किल्ड (हुनरमन्द) प्रवासी मज़दूरों को, कितने दिनों का, कितनी आमदनी वाला और कैसा रोज़गार देकर उनका उद्धार करके उन्हें और उनके गाँवों को ख़ुशहाल बना पाएगा?

दरअसल, किसी भी सरकारी योजना को तमाम बन्दिशों से गुज़रना पड़ता है। जैसे, यदि सरकार एक बाँध बनाना चाहे तो महज इसका एलान होने या बजट आवंटन होने या शिलान्यास होने से काम शुरू नहीं हो जाता। ज़मीन पर काम शुरू होने की प्रक्रिया ख़ासी लम्बी और जटिल होती है। मसलन, बाँध कहाँ बनेगा, वहाँ का नक्शा बनाने के लिए सर्वे होगा, सर्वे से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) बनेगी, फिर तरह-तरह के टेंडर होंगे और टेंडर अवार्ड होने के बाद बाँध के निर्माण का काम शुरू होगा। इसके साथ ही ये पता लगाया जाएगा कि बाँध में कितना इलाका डूबेगा, वहाँ के लोगों का पुर्नवास कहाँ और कैसे होगा, इसकी लागत और अन्य झंझट क्या-क्या होंगे? इसके बाद भी सारा मामला इतना जटिल होता है कि दस साल की परियोजना, अनुमानित लागत के मुकाबले पाँच गुना ज़्यादा वास्तविक लागत से तीस साल में तैयार हो पाती है।

कितनी मिलेगी मज़दूरी?

इसी तरह ये जानना भी ज़रूरी है कि सरकार 50,000 करोड़ रुपये की जिस ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की बात कर रही है, उसके विभिन्न आयाम क्या-क्या हैं? क्योंकि अभी तक सरकार ने इस अभियान को ‘गड्ढे खोलने वाली’ मनरेगा से अलग बताया है। मनरेगा में 202 रुपये मज़दूरी और साल के 365 दिनों में से कम से कम 100 दिन काम की गारंटी की बातें हैं। अब चूँकि कोरोना की वजह से शहरों से गाँवों को लौटे प्रवासी मज़दूरों की ‘स्किल मैपिंग’ करवाने की बातें भी हुई हैं तो क्या अलग-अलग स्किल के हिसाब से लोगों को अलग-अलग मज़दूरी भी मिल जाएगी?

इसी तरह, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को लेकर फ़िलहाल, इतना ही बताया गया है कि इसे देश के 733 में से 116 ज़िलों में 125 दिनों तक प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिए मिशन मोड में चलाया जाएगा। ये ज़िले 6 राज्यों – बिहार (32), उत्तर प्रदेश (31), मध्य प्रदेश (24), राजस्थान (22), ओडिशा (4) और झारखंड (3) के हैं। इनमें से बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तो ऐसे हैं जिन्हें 1980 में बीमारू राज्य का ख़िताब मिला था। बीते 40 वर्षों में इन बीमारू राज्यों ने विकास के एक से बढ़कर एक अद्भुत ध्वजवाहकों की सरकारें देखीं, लेकिन कोई भी अपने राज्य को बीमारू के कलंक से उबार नहीं सका। उल्टा जिन आधारों पर ये बीमारू बताये गये थे, उसके मुताबिक इनके अलग हुए झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड भी बीमारू की श्रेणी में ही पहुँच गये।

अगली ज्ञात जानकारी है कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ को 12 विभिन्न मंत्रालयों का साझा कार्यक्रम बनाया जाएगा। इनके नाम ग्रामीण विकास, पंचायती राज, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, खान, पेयजल और स्वच्छता, पर्यावरण, रेलवे, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, नयी और नवीकरणीय ऊर्जा, सीमा सड़क, दूरसंचार और कृषि मंत्रालय। इनके बीच समन्वय की ज़िम्मेदारी ग्रामीण विकास मंत्रालय की होगी। अभियान के तहत कम्युनिटी सैनिटाइजेशन कॉम्पलेक्स, ग्राम पंचायत भवन, वित्त आयोग के फंड के तहत आने वाले काम, नेशनल हाइवे वर्क्स, जल संरक्षण और सिंचाई, कुएँ की खुदाई, वृक्षारोपण, हॉर्टिकल्चर, आंगनवाड़ी केन्द्र, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, रेलवे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी RURBAN मिशन, PMKUSUM, भारत नेट के फाइबर ऑप्टिक बिछाने, जल जीवन मिशन आदि 25 स्कीम्स में काम कराये जाएँगे।

दर्जन भर मंत्रालय करेंगे क्या?

लेकिन कोई नहीं जानता है कि इन दर्जन भर मंत्रालयों को अपनी-अपनी योजनाओं के लिए ‘स्किल्ड प्रवासी मज़दूर’ क्या ग्रामीण विकास मंत्रालय सुलभ करवाएगा या फिर उनके बजट को लेकर उन्हें सिर्फ़ वाहवाही थमा देने की कोई ख़ुफ़िया रणनीति है। हालाँकि, जितनी जानकारी अभी तक सामने आयी है, उसके आधार पर इसे ‘अच्छे दिन’ की एक और उपलब्धि बताना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन ये मानने का भी कोई आधार तो हो ही नहीं सकता कि सरकारी अमला इस अभियान के फ़ायदों को ज़मीन पर उतारने में महीनों से पहले कामयाब हो जाए। अब तो ज्यों-ज्यों चुनाव नज़दीक आएगा, त्यों-त्यों किसी न किसी तरह के शिलान्यास का ढोल खासकर बिहार में ज़रूर बजाया जाएगा।

आँकड़ों को परखें

अब ज़रा 50,000 करोड़ रुपये की भारी भरकम रकम की महिमा को भी खंगाल लिया जाए। एक मोटा अनुमान है कि किसी भी सरकारी निर्माण पर क़रीब आधी रकम मज़दूरी और बाक़ी मैटेरियल तथा रिश्वतख़ोरी पर खर्च होती है। इसका मतलब ये हुआ कि ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ के तहत ताज़ा एलान में मज़दूरी का हिस्सा क़रीब 25,000 करोड़ रुपये होगा। इसे यदि 125 से विभाजित करें तो रोज़ाना का 200 करोड़ रुपये बैठेगा। फिर इसे 116 ख़ुशनसीब ज़िलों से विभाजित करें तो हरेक ज़िले के हिस्से में रोज़ाना के 1.72 करोड़ रुपये आएँगे। अब यदि हम ये मान लें कि स्किल्ड प्रवासी मज़दूरों को मनरेगा के मज़दूरों के मुकाबले डेढ़ गुना वेतन भी मिला तो इसका औसत रोज़ाना 300 रुपये बैठेगा। इस 300 रुपये से यदि 1.72 करोड़ रुपये को विभाजित करें तो हम पाएँगे कि हरेक ज़िले में 57,471 प्रवासी मज़दूरों की ही 125 दिनों तक किस्मत सँवर पाएँगी।

अलबत्ता, यदि मज़दूरी 300 रुपये से ज़्यादा हुई तो मज़दूरों की संख्या उसी अनुपात में घटती जाएगी। अब ज़रा सोचिए कि इस अभियान से उन एक करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूरों में से कितनों का पेट भरेगा, जिन्हें रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के ज़रिये शहरों से उनके गाँवों को भेजा गया है। यहाँ उन अभागे प्रवासी मज़दूरों का तो कोई हिसाब ही नहीं है जो चिलचिलाती धूप में सैकड़ों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल नापकर या रेल की पटरियों पर चलकर अपने गाँवों को पहुँचे हैं।

ऊँट के मुँह में जीरा

ज़रा तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखिए कि वित्त मंत्रालय ने 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया था कि देश में कुल 48 करोड़ से ज़्यादा कामगार हैं और हरेक तीसरा कामगार प्रवासी मज़दूर है। यानी, प्रवासी मज़दूरों की संख्या 16 करोड़ बैठी। हालाँकि, महीने भर पहले जब वित्त मंत्री ने 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज़ का ब्यौरा दिया तो उन्होंने प्रवासी मज़दूरों की संख्या को 8 करोड़ मानते हुए उन्हें तीन महीने तक 5 किलो चावल या गेहूँ मुफ़्त देने के बजट का वास्ता दिया था। साफ़ है कि ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान के असली लाभार्थियों की संख्या जितनी बड़ी है, उसके लिए 50,000 करोड़ रुपये और 12 मंत्रालयों की सारी क़वायद ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित होगी।

फ़िलहाल, इतना ज़रूर है कि अक्टूबर-नवम्बर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता पक्ष इस अभियान को लेकर ख़ूब ढोल पीटता रहेगा। 25 अक्टूबर को बिहार में दुर्गापूजा की धूम रहेगी, फिर 14 नवम्बर को दिवाली की तथा 20 नवम्बर को छठ पूजा की। बिहार की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 29 नवम्बर तक है। इससे पहले जनादेश आ ही जाएगा। और हाँ, ‘ग़रीब कल्याण रोज़गार अभियान’ की 125 दिनों की मियाद 26 अक्टूबर को ख़त्म हो जाएगी। हालाँकि, सरकार का कहना है कि वो इस अभियान को आगे भी जारी रख सकती है। लेकिन बात कैसे और कब आगे बढ़ेगी? इसे जानने के लिए तो इन्तज़ार ही करना होगा।

तब तक यदि प्रवासी मज़दूरों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गयी तो सरकार का वैसे ही कोई दोष नहीं होगा, जैसे कोरोना संक्रमितों की संख्या का रोज़ाना अपना ही रिकॉर्ड तोड़ने का सिलसिला जारी है। या फिर, जैसे विकास का सारा बोझ अपने कन्धों पर उठाये पेट्रोल-डीज़ल के दाम रोज़ाना नये रिकार्ड बनाने में जुटे हुए हैं। या फिर, लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर बग़ैर किसी घुसपैठ के भारतीय सैनिक ख़ुद को शहीद करने पर आमादा हो चुके हैं, वायुसेना के लड़ाकू विमानों की अग्रिम अड्डों पर तैनाती और ‘फ़्लाई पास्ट’ हो रहा है तथा शान्ति का नारा लगा रहे चीनी सेना के जवाब में हमारी थल सेना भारतीय इलाके में मज़मा लगाकर और तालियाँ बजाकर उनका अभिनन्दन कर रही है। ज़ाहिर है, अब तक 130 करोड़ भारतीयों में से जितने भी ‘नासमझ’ हैं वो ‘झुकने और बिकने’ का मतलब तो बहुत अच्छी तरह से समझ चुके हैं!

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on June 21, 2020 10:17 pm

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