Wednesday, December 7, 2022

 क्या जगदीप धनखड़ साध पाएंगे भाजपा के समीकरण ?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यकारिणी ने एनडीए की तरफ से उपराष्ट्रपति पद के लिए जगदीप धनखड़ के नाम पर मुहर लगाकर एक बार फिर से सभी को चौंका दिया। जहां राजनीतिक विश्लेषक लगातार मुख्तार अब्बास नकवी के नाम की सम्भावना जता रहे थे, वैसी सभी आशंकाएं धड़ाम हो गईं। जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद का दावेदार बनाए जाने के पीछे एनडीए की एक दूरगामी और सोची-समझी रणनीति है। धनखड़ वर्तमान में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं पिछले तीन साल के कार्यकाल के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उनका टकराव सक्रिय राजनीति का केंद्र रहा है। बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व उनके ऑपरेटिंग सिस्टम से बहुत प्रभावित हुआ यही कारण है कि धनखड़ को ‘जनता के राज्यपाल’ के रूप में जाना जाने लगा।

जाट आरक्षण के लिए लड़ चुके हैं लम्बी लड़ाई 

दूसरी बात, धनखड़ राजस्थान से आते हैं। राजस्थान में जाटों के आरक्षण के लिए उन्होंने एक लम्बी लड़ाई लड़ी है, इसलिए जाटों ने अतीत में भाजपा को वोट किया। अगले वर्ष वहां विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में जाट समाज पर किसी भी पार्टी का दारोदार कम नहीं होगा। प्रदेश में जाट समाज के दबदबे का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि हर चुनाव में 10 से 15% विधायक जाट समुदाय से ही आते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में 31 जाट विधायक चुने गए थे। सीधे तौर पर राजस्थान में जाट वोटर 50 से 60 विधानसभा सीटों पर असर डालते हैं। राजस्थान में झुंझनू, नागौर, सीकर, भरतपुर और जोधपुर ऐसे इलाके हैं जिन्हें ‘जाट बेल्ट’ कहा जाता है। गृहमंत्री अमित शाह का भी सबसे ज्यादा फोकस इन्हीं जाट मतदाताओं पर रहता है। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों पार्टियां जब भी टिकटों का बंटवारा करती हैं, जाट समाज को आगे रखती हैं।

नाराज़ किसानों को लुभाने की रहेगी कोशिश

बीते कुछ समय में किसान आन्दोलन और अग्निवीर योजना के विरोध के कारण विपक्ष ने भाजपा के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाने की कोशिश की है। किसान नेताओं के विरोध के कारण यूपी, पंजाब और हरियाणा के जाटों ने एक ऐतिहासिक आंदोलन को अंजाम दिया, जिसका असर यूपी विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला हालांकि इससे सत्ता में कोई बदलाव नहीं हुआ लेकिन भाजपा के पास एक अवसर है जब वह किसान नेताओं की नाराज़गी को दूर करने का प्रयास कर सकती है। उधर मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक भी बीजेपी के खिलाफ बयान देकर जाटों की सहानुभूति को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ममता बनर्जी से टकराव का मिला पुरस्कार

बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में बड़ी पैठ बनाई और 2021 के विधानसभा चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन भाजपा मैनेजमेंट ने चुनाव परिणामों के ठीक बाद बंगाल हिंसा के दौरान वहां के नागरिकों को उन्हीं के हालात पर छोड़ दिया था तब धनखड़ ने मोर्चा संभाला और ममता बनर्जी को बताया कि धनखड़ उनके हाथ की कठपुतली नहीं है। बंगाल का राज्यपाल रहते हुए धनखड़ ने जो प्रयास किए हैं, उसका उन्हें पुरस्कार मिला। वह राज्यपाल के नियमित संचालन की आदत से बाहर निकले और हिंसा के कारण प्रभावित लोगों की आवाज को उठाने और उभरने का प्रयास किया। लोगों ने उन पर केन्द्र सरकार के आदेश पर काम करने का भी आरोप लगाया, लेकिन वह अपनी कोशिशों पर डटे रहे।

विपक्ष के लिए कड़ी परीक्षा 

वहीं उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में धनखड़ का आह्वान करके भाजपा ने पं बंगाल में बैकफुट में पनप रही प्रतिस्पर्धा को खड़ा कर दिया है अब ममता बनर्जी के सामने संकट खड़ा हो गया है। ममता बनर्जी को अपनी पार्टी से यह सवाल करना होगा कि धनखड़ के जाने के बाद वह क्या करेंगी? राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत भी उनका विरोध करने से पहले जरूर विचार करेंगे क्योंकि वह भी राजस्थान से हैं, गहलोत सरकार को उपराष्ट्रपति चुनाव में अपने कदम फूंक-फूंककर रखने की कोशिश करनी होगी अन्यथा जाट बेल्ट आगामी विधानसभा चुनाव में किसके पाले में जाए ? कहना मुश्किल होगा, इसलिए कांग्रेस के लिए भी यह परेशानी का विषय हो सकता है।

विचारधारा के विपरीत चुना चेहरा

यहां पर एक गौर करने वाली बात है एनडीए ने अपनी हिंदुत्व की विचारधारा के अनुकूल जाना-पहचाना चेहरा नहीं चुना, इसके बजाय उसने सर्वसम्मति के सिद्धांत पर भरोसा जताया है। इसकी वजह भाजपा की एक रणनीति है यदि वह उपराष्ट्रपति पद के लिए कोई हिंदुत्वादी चेहरा चुनती तो भाजपा को विपक्ष के साथ एक कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता। राष्ट्रपति पद के लिए भी भाजपा ने ऐसा ही किया और एक आदिवासी महिला को चुना। तो क्या यह कहना ग़लत होगा कि भाजपा ने माहौल को भांपते हुए ओबीसी उम्मीदवार के चयन के माध्यम से प्रतिस्पर्धा की एकता को तोड़ दिया है‌?

(प्रत्यक्ष मिश्रा स्वतंत्र पत्रकार हैं आजकल अमरोहा में रहते हैं।)

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